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Monday, 22 April, 2024
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‘आखिरी खत, संगठनकर्ता, इमरजेंसी’: तीसरे संघ प्रमुख बालासाहब देवरस ने RSS को कैसे बदल दिया

गुरुजी के अंतिम संस्कार से पहले दाे पत्रों को बालासाहब ने पढ़ा. उन्होंने महाराष्ट्र प्रांत संघचालक बाबाराव भिड़े को तीसरा पत्र पढ़ने के लिए दिया, जिसमें नए सरसंघचालक के बारे में घोषणा की गई थी.

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5 जून, 1973 के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य ‘गुरुजी’ का देहावसान हुआ. उस समय बालासाहब देवरस आंध्र प्रदेश में एक प्रशिक्षण शिविर में भाग ले रहे थे. वे 6 जून, 1973 को नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में दोपहर लगभग 12.30 बजे पहुंचे.

गुरुजी ने तीन पत्र लिखे थे और उन्हें 2 अप्रैल, 1973 को ‘अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख’ पांडुरंग पंत क्षीरसागर को सौंप दिया था. ये पत्र आगामी व्यवस्थाओं के लिए थे और पांडुरंग पंत को यह निर्देश दिया गया था कि वे इन्हें गुरुजी के निधन के बाद ही खोलेंगे.

गुरुजी के अंतिम संस्कार से पहले इनमें से दाे पत्रों को बालासाहब ने पढ़ा. उन्होंने महाराष्ट्र प्रांत संघचालक बाबाराव भिड़े को तीसरा पत्र पढ़ने के लिए दिया, जिसमें नए सरसंघचालक के बारे में घोषणा की गई थी.


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भावुक स्वयंसेवक और वो आखिरी खत

बाबाराव भिड़े भावुक स्वयंसेवकों की उमड़ती हुई भीड़ के बीच खड़े थे, जब उन्होंने माइक के सामने वह पत्र पढ़ना शुरू किया, जिसे लाउडस्पीकर के जरिए समस्त स्वयंसेवकों ने सुना.

बाबाराव ने पढ़ा, ‘मेरे सभी बंधु स्वयं सेवकों के लिए, पिछले एक महीने से मेरा शरीर अपनी ताकत बड़ी तेजी से खो रहा है. डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी है. ऐसा लगता है कि सबके मस्तिष्कों में यह विचार आ गया है कि यह शरीर अब अधिक समय तक मेरा साथी न रह पाएगा.’

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‘इस तरह से संघ कार्य के प्रति व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है. संघ (राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ) का कार्य निर्बाध रूप से इसके संविधान के अनुरूप चलता रहेगा. नए सरसंघचालक को चुने जाने का प्रश्न भी उसी संविधान के अंतर्गत निबटाया जाना है. ‘अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल’ के जिन सदस्यों से मैंने इस पर चर्चा की, वे सभी मंजे हुए अनुभवी कार्यकर्ता हैं और प्रांत स्तर पर वे सब संघचालक के रूप में कार्य कर रहे हैं. सरसंघचालक के रूप में यह मेरी जिम्मेदारी बनती है कि मैं उनके समग्र निर्णय को साझा करूं.’

‘मैं अपनी इस जिम्मेदारी को निभा रहा हूं, अपना यह निर्णय सबको बताकर कि मेरी मृत्यु के उपरांत सरसंघचालक की जिम्मेदारी श्री मधुकर दत्तात्रेय उपाख्य बालासाहब देवरस निभाएंगे, जिन्हें आप सब जानते हैं.’

बालासाहब को उस पत्र के पढ़े जाने के बाद इस बात का पता चला कि वे अब संघ प्रमुख होंगे. थोड़े समय के लिए शांति छा गई. यह महसूस किया जा सकता था कि अनिश्चितता की भावना गायब हाे चुकी थी और सर्वसम्मति यह थी कि राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेतृत्व सक्षम हाथों में जा रहा था.

बालासाहब उस समय 58 वर्ष के थे, जब उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई, वे मधुमेह के रोगी थे और उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं था, परंतु इससे वे कदापि विचलित न हुए और अगले दो दशक तक उन्होंने अथक यात्राए कीं, आपातकाल में जेल यात्रा की और एक कठोर जीवन-शैली को अपनाया. उन्होंने कभी भी अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जिक्र किसी के आगे न किया और न ही संघ संबंधी कार्यों पर इसका कोई प्रभाव पड़ने दिया.


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सरसंघचालक के रूप में नियुक्ति पर देवरस क्या कहते थे

बालासाहब अकसर सरसंघचालक के रूप में अपनी नियुक्ति के संदर्भ में एक किस्सा सुनाया करते थे.

वो कहते थे, ‘एक अत्यधिक मोटा व्यक्ति एक बार ट्रेन में सफर कर रहा था. वह इतना मोटा था कि जब वह एक स्टेशन पर उतरना चाहता था, उसने अपनी पीठ प्लेटफार्म की ओर करते हुए उतरने का यत्न किया. चूंकि वहां अत्यिधक भीड़ थी, लोगों को यह ज्ञान न हुआ कि वह उतरना चाह रहा है, तो उन्होंने उसे ऊपर धकेल दिया और वह फिर से ट्रेन के भीतर आ गया और ट्रेन चल पड़ी. इस प्रकार मेरी दशा भी ठीक वैसी ही है. मैं कभी नहीं चाहता था कि मैं सरसंघचालक बनूं, परंतु सबने मुझे अंदर धकेल दिया और मैं सरसंघचालक बन गया. अब मैं केवल आपके विश्वास के माध्यम से ही सफलता पा सकूंगा.’

बालासाहब को जब ‘परम पूजनीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस ’ इन शब्दों से संबोधित किया जाने लगा तो आरंभ में असहज अनुभव करते थे. वे एक व्यक्ति के लिए प्रयुक्त अभिव्यक्ति ‘परम पूजनीय’ से बिल्कुल भी सहज अनुभव न करते थे, परंतु फिर काफी चर्चा के बाद जब सब इस बात पर एकमत थे कि ‘परम पूजनीय’ की अभिव्यक्ति किसी व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि इसका अर्थ सरसंघचालक के पद के प्रति निकाला जाना चाहिए, तब वे कुछ सहज हो गए.

सरसंघचालक बन जाने के बाद बालासाहब देश भर में प्रवास पर निकल पड़े. उन्होंने बड़ी संख्या में एकत्र लोगों, सार्वजनिक सभाओं, सम्मेलनों आदि को संबोधित किया. जिन लोगों ने उन कार्यक्रमों में भाग लिया, उनकी एक बड़ी संख्या स्वयंसेवकों की थी.


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संघ प्रमुख के तौर पर शुरुआती वर्ष

वर्ष 1974 के मध्य तक बालासाहब राष्ट्रीय स्तर पर एक सर्वाधिक शक्तिशाली बुद्धिजीवी, विवेकपूर्ण और देशभक्तिपूर्ण आवाज के रूप में उभरकर सामने आए. जिस प्रकार से उनके यात्रा कार्यक्रमों को आयोजित किया गया, उससे संघ और हिंदुत्व के बारे में विभिन्न गलत धारणाओं को दूर करने और उनके विरुद्ध किए जा रहे दुष्प्रचार को रोकने में मदद मिली.

बालासाहब को वर्ष 1971-72 से यह आभास होने लगा था कि इंदिरा गांधी के नेतृत्ववाली कांग्रेसी सरकार राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाकर रहेगी. इस कारण से देश को यह बताना महत्त्वपूर्ण था कि राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा और गतिविधियां क्या हैं. उन्होंने यह कार्य कुशलतापूर्वक और प्रभावपूर्ण ढंग से किया था.

अधिकतर कार्यक्रम, जो बालासाहब ने अपने प्रथम वर्ष में सरसंघचालक के रूप में किए, उनमें एक प्रश्न-उत्तर सत्र भी था, जिसमें श्रोताओं में से कोई भी व्यक्ति प्रश्न पूछ सकता था और वे उसका उत्तर देते थे. यह बालासाहब के कार्यक्रमों का एक विशेष चरित्र था, जो अगले दो दशकों तक चला.


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वसंत व्याख्यानमाला

मई 1974 में बालासाहब ने पुणे स्थित प्रतिष्ठित ‘वसंत व्याख्यानमाला ’ में एक व्याख्यान प्रस्तुत किया. इस व्याख्यान को राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ यादगार क्षणों के रूप में गिना जा सकता है.

बालासाहब ने इस बेलाग भाषण में जातिगत भेदभाव, जिसमें हिंदू समाज जकड़ा हुआ है, की धज्जियां उड़ाते हुए बड़ी वीरता से घोषणा की, ‘छुआछूत एक अभिशाप है. इसे यहां से पूरी तरह जाना होगा.’

उन्होंने अब्राहिम लिंकन को उद्‍धृत करते हुए कहा था, ‘लिंकन ने कहा था, ‘अगर गुलामी अनैतिक या गलत नहीं है, तो फिर कुछ भी गलत नहीं है.’ हमें भी कहना चाहिए, ‘अगर छुआछूत गलत नहीं है तो फिर कुछ भी गलत नहीं है’.’

उन्होंने कहा था, ‘समाज द्वारा हाशिए पर रखे गए कुछ वर्गों ने सदियों से कष्ट झेले हैं. उनके दिलों में यह दर्द घर कर गया है. हमें भी इस दर्द का अहसास है. हमें इस दशा को बदलना है. समाज का उपेक्षित वर्ग तथा समाज के अन्य वर्गों को एक-दूसरे के साथ इस प्रकार पेश आना चाहिए कि असमानता दूर हो जाए.’

‘भूतकाल के विवादों को वर्तमान में नहीं लेकर आना चाहिए, नहीं तो भविष्य में खतरा पैदा होगा. किसी को भी यह नहीं करना चाहिए. अगर ऐसा होता है तो मार्ग में रुकावटें न होंगी. मुझे पूर्ण विश्वास है कि समाज के उपेक्षित वर्गों को आपकी दयादृष्टि की आवश्यकता नहीं है. वे चाहते हैं कि उनके साथ समान व्यवहार हो. वे अपने स्वयं के प्रयत्नों से ही सबकुछ पाना चाहते हैं. अगर इसे पाने के लिए उन्हें कुछ सुविधाओं की आवश्यकता है तो वे उनको मिलनी चाहिए. उन्हें कब तक वे सुविधाएं देनी होंगी, यह भी उन पर छोड़ देना चाहिए. परंतु अंततः एक समय आना चाहिए, जब प्रत्येक व्यक्ति यह महसूस करे कि हम सब एक समान हैं तथा एक जैसे पढ़े-लिखे हैं. समाज में इसकी स्थापना होनी ही चाहिए.’

यहां इस भाषण को दोबारा लिखना प्रासंगिक होगा, जो राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामाजिक समानता तथा सामाजिक सद्भाव संबंधी मुद्दों के प्रति इसकी विचारधारा के दृष्टिकोण पर एक संदर्भ बिंदु बन चुका है. यह भाषण हिंदुत्व के विभिन्न पहलुओं पर फैले मकड़जाल तथा भ्रांतियों को भी दूर करने का काम करता है.


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आपातकाल

25 जून, 1975 की रात में इंदिरा सरकार ने आंतरिक आपातकाल लागू कर दिया और 4 जुलाई, 1975 को राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया. बालासाहब को उससे काफी पहले 30 जून, 1975 के दिन गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें महाराष्ट्र की यरवदा जेल भेज दिया गया.

सरसंघचालक ने जेल के भीतर से ही आंदोलन को नेतृत्व देने का काम जारी रखा. उन्होंने कहा, ‘यह धैर्य का युद्ध है, भावनाओं पर नियंत्रण रखने का युद्ध है.’

राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने विरोध अभियान, जो तानाशाही शासन के खिलाफ था, को जारी रखने की तैयारी की हुई थी.

प्रतिबंध लगाए जाने के तीन सप्ताह के भीतर 25,000 से भी अधिक स्वयंसेवकों को गिरफ्तार कर लिया गया. 50,000 से भी अधिक स्वयंसेवकों को भूमिगत होना पड़ा, ताकि प्रजातंत्र के पक्ष में आंदोलन चलता रहे.

‘सत्य समाचार’ एक प्रमुख भूमिगत प्रकाशन था, जिसे देश भर में आपातकाल के दौरान राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने चलाए रखा.

प्रशासनिक मशीनरी भरसक प्रयत्नों के बावजूद इस समाचार-पत्र के प्रसार को न रोक पाई, जिसने इंदिरा गांधी के तानाशाही शासन के तमाम बुरे कामों पर से परदा उठाया और इंदिरा गांधी के उन दुराग्रही अधिकारियों की पोल खोली, जिन्होंने लाखों भारतीयों को सताया, जिनमें बड़ी संख्या में स्वयंसेवक थे, ताकि उनकी विरोधी आवाज का दमन किया जा सके. आपातकाल में 1,30,000 से भी अधिक भारतीयों को जेल भेजा गया जिनमें 1,00,000 से अधिक स्वयंसेवक ही थे.

12 दिसंबर, 1976 के दिन ‘द इकाॅनोमिस्ट ’ ने लिखा, ‘श्रीमती इंदिरा गांधी के विरुद्ध चल रहे भूमिगत आंदोलन में यह दावा किया जाता है कि वह विश्व में एक अकेली गैर-वामपंथी क्रांतिकारी ताकत है, जो यह दावा भी करती है कि वह रक्तपात तथा वर्ग संघर्ष दोनों से दूर है. वास्तव में उसे एक दक्षिणपंथी संगठन भी कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें जनसंघ की और इसके सांस्कृतिक सहबद्ध राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रभुता है लेकिन इस समय इसके प्लेटफार्म पर केवल एक ही मुद्दा है और वह यह कि कैसे भारत में प्रजातंत्र को वापस लाया जाए? इस ऑपरेशन के सिपाही (भूमिगत आंदोलन में) हजारों स्वयंसेवक हैं, जो ग्राम स्तर पर चार व्यक्तियों के एक दल के रूप में संगठित हैं. उनमें से अधिकतर राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नियमित सदस्य हैं, यद्यपि बड़ी संख्या में अधिक-से-अधिक नए युवा लोग भर्ती हो रहे हैं. दूसरी भूमिगत पार्टियों, जिन्होंने भूमिगत आंदोलन में सहभागियों के तौर पर शुरुआत की थी, ने जनसंघ तथा राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्ष में पूर्ण रूप से मैदान छोड़ दिया है.’

यहां तक कि इंदिरा गांधी को खुद यह मानना पड़ा, ‘हम राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 10 प्रतिशत स्वयंसेवकों को भी पकड़ न पाए. वे सब भूमिगत हो गए हैं और राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रतिबंध के बावजूद उखड़ा नहीं है. इसके विपरीत, यह नए क्षेत्रों, जैसे केरल में अपनी जड़ें विकसित कर रहा है.’ (दि पीपल वर्सस इमरजेंसी: ‘ए’ सागा ऑफ स्ट्रगल 1991, पृष्ठ-21)


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विजयादशमी पर दिया गया भाषण

वर्ष 1984 में, जब सरसंघचालक के रूप में अपने वार्षिक भाषण में विजयादशमी के अवसर पर (जिसे समकालीन और विचारधारा संबंधी मुद्दों पर राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ठहराव तथा दृष्टिकोण का परिचायक माना जाता है) बालासाहब ने हिंदू समाज के विभिन्न वर्गों को इकट्ठा करने की आवश्यकता पर बल दिया.

वर्ष 1985 में बालासाहब ने निर्णय लिया कि वे संघ के कार्यों की समीक्षा करेंगे और बदलते समय के साथ इसके भविष्य के दिशानिर्देश जारी करेंगे. यह अवसर था संगठन द्वारा 60 वर्ष पूरे किए जाने का.

नागपुर में एक पथ-प्रवर्तक भाषण में वर्ष 1985 में उन्होंने कहा कि यद्यपि राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 60 वर्ष पूरे कर लिये हैं, मगर जो प्रगति हुई है, वह संतोषजनक नहीं है और हमें अभी बहुत कुछ करना बाकी है.

उन्होंने सभी स्वयंसेवकों का एक निर्णायक आह्व‍ान किया, ‘हम सभी को आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है. यह समय है कि हम हर प्रकार की नकारात्मकता छोड़ एक नए मार्ग का निर्माण करें.’


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देवरस ने परंपरा बदली

अयोध्या में विवादग्रस्त ढांचे को गिराए जाने के पश्चात केंद्र सरकार ने राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया. बालासाहब का स्वास्‍थ्य कमजोर हो गया था, परंतु गंभीर स्वास्‍थ्य समस्याओं के बावजूद वे दिन-रात संघकार्य में लगे रहे. ज

ब वर्ष 1993 में प्रतिबंध हटा लिया गया, तब उन्होंने सरसंघचालक का प्रभार किसी अन्य को सौंपने की बात सोची. यह एक अविस्मरणीय घोषणा थी, जब किसी सरसंघचालक की नियुक्ति पहली बार एक दूसरे सरसंघचालक ने अपने जीवित रहते हुए की.

11 मार्च, 1994 के दिन उन्होंने नए सरसंघचालक के रूप में रज्जू भैया के नाम की घोषणा कर दी. यह परंपरा उसके बाद निरंतर चल रही है. रज्जू भैया ने बागडोर के.एस. सुदर्शन को सौंपी और स्वयं को कार्यभार मुक्त किया तथा सुदर्शनजी ने बाद में यह जिम्मेदारी मोहन भागवत के हाथों में सौंप दी.


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शुरुआती जीवन

मधुकर दत्तात्रेय देवरस, जिन्हें उनके प्रसिद्ध नाम ‘बालासाहब देवरस ’ से जाना जाता है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीसरे सरसंघचालक थे. वे स्वयंसेवकों के उस पहले समूह में से थे, जिन्होंने डॉ. हेडगेवार द्वारा ‘नागपुर के मोहिते बाड़ा’ में शुरू की गई राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली शाखा में भाग लिया था. राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के मौके पर की गई थी, परंतु पहली दैनिक शाखा कुछ महीनों के बाद वर्ष 1926 में शुरू की गई थी.

बालासाहब का प्रशिक्षण और किसी ने नहीं, बल्कि राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक ने स्वयं अपने हाथों से किया था और शायद यही उन कारणों में से एक था कि लाखों स्वयंसेवकों को, जिन्होंने डॉ. हेडगेवार को कभी नहीं देखा था, उन्हें बालासाहब में राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक की छवि नजर आती थी.

बालासाहब के साथ प्रथम स्वयंसेवकों के दल में केशवराव वकील, त्र्यंबक झिलेदार, अल्हाड़ अंबेडकर, बापू दिवाकर, नरहरि पारखी, बाली यशकुण्यवर,, माधवराव मुले और एकनाथ रानाडे शामिल थे.

ग्यारह वर्षीय बालासाहब निर्विवाद रूप से उन सबके नेता थे और उनके साथी हमेशा से ही उनकी ओर देखा करते थे, यद्यपि रानाडे उनसे उम्र में एक वर्ष तथा मुले तीन वर्ष बड़े थे. बाद में रानाडे और मुले दोनों सरकार्यवह बने और दोनों ने संघ के विकास में उत्कृष्ट भूमिका निभाई.

बालासाहब, मध्य प्रदेश के बालाघाट में 11 दिसंबर, 1915 के दिन करंजा नामक स्थान पर जन्‍मे थे. 9 भाई-बहनों में उनका आठवां स्थान था. बालासाहब देवरस का महाराष्ट्र के पुणे में 17 जून, 1996 के दिन देहावसान हुआ.

(लेखक आरएसएस से जुड़े थिंक-टैंक विचार विनिमय केंद्र में शोध निदेशक हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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