तिरुवनंतपुरम, 20 जनवरी (भाषा) केरल में मंगलवार को तब विवाद उत्पन्न हो गया जब मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने विधानसभा में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर के संबोधन समाप्त करने के तुरंत बाद आरोप लगाया कि उन्होंने राज्य मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित नीतिगत भाषण को पूरी तरह नहीं पढ़ा।
इसके जवाब में लोक भवन ने दावा किया कि राज्यपाल के सुझावों को मूल मसौदे से हटा दिया गया था।
आर्लेकर के दो घंटे लंबे नीतिगत भाषण के समाप्त होने और सदन से चले जाने के बाद, विजयन ने विधानसभा को बताया कि राज्यपाल ने भाजपा शासित केंद्र की राजकोषीय नीति की आलोचना करने वाले अंशों और लंबित विधेयकों के संदर्भों सहित कई अंशों को छोड़ दिया था।
इसके कुछ देर बाद ही लोक भवन ने विवाद को ‘अनावश्यक और निराधार’ बताया और दावा किया कि राज्यपाल ने भाषण के मसौदे से ‘अर्ध-सत्य’ तथ्यों को हटाने का अनुरोध किया था।
उसने कहा, “सरकार ने जवाब दिया था कि राज्यपाल द्वारा उचित समझे जाने वाले संशोधनों के साथ भाषण तैयार किया जा सकता है और पढ़ा जा सकता है। यह भी संकेत दिया गया था कि सुझाए गए परिवर्तनों के साथ भाषण को दोबारा भेजा जा सकता है।”
लोकभवन ने कहा, “ हालांकि, कल आधी रात के बाद बिना किसी संशोधन के वही भाषण राज्यपाल को वापस भेज दिया गया। राज्यपाल कोझिकोड से तिरुवनंतपुरम देर रात लौटे और उन्होंने आज सुबह विधानसभा में भाषण पढ़ा।”
लोक भवन के अनुसार, “शुरू में यह बताया गया था कि यह भाषण उनके द्वारा सुझाया गया था और सरकार ने इस पर सहमति व्यक्त की थी।”
इसने कहा है कि मसौदे में यह उल्लेख किया गया था कि सरकार ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया था क्योंकि विधायिका द्वारा पारित विधेयकों को लंबे समय से मंजूरी नहीं मिली थी, और शीर्ष न्यायालय ने उन्हें एक संवैधानिक पीठ के पास भेज दिया था।
लोक भवन ने कहा कि यह तथ्यात्मक रूप से गलत है, क्योंकि ‘उच्चतम न्यायालय ने उन्हें संवैधानिक पीठ के पास नहीं भेजा है।’
इसलिए राज्यपाल ने अनुरोध किया था कि इस संदर्भ को हटा दिया जाए।
इसके मुताबिक, उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि भाषण का वह हिस्सा हटा दिया जाए, जिसमें कहा गया था कि केंद्र सरकार का रुख आर्थिक संघवाद के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
लोक भवन ने कहा कि इसके बजाय, यह सिफारिश की गई कि यह दर्ज किया जाए कि अग्रिम धनराशि से इनकार किए जाने के कारण केरल गंभीर वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रहा है।
इससे पहले सुबह में विजयन ने सदन में कहा कि राज्यपाल ने दस्तावेज के 12वें पैरा का शुरुआती हिस्सा और 15वें पैरा के अंतिम हिस्से को नहीं पढ़ा।
उन्होंने कहा कि इसके अलावा, 157 पैरा और 72 पृष्ठों वाले नीतिगत भाषण के 16वें पैरा में राज्यपाल द्वारा एक पंक्ति जोड़ी गई।
विजयन ने सदन को बताया कि जिन अंशों को राज्यपाल ने नहीं पढ़ा, उनमें एक यह था- “इन सामाजिक और संस्थागत उपलब्धियों के बावजूद, केरल को केंद्र सरकार की एक के बाद एक प्रतिकूल कार्रवाइयों के कारण गंभीर राजकोषीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जो राजकोषीय संघवाद के संवैधानिक सिद्धांतों को कमजोर करता है।”
उनके अनुसार, राज्यपाल द्वारा नहीं पढ़ा गया एक अन्य अंश था- “राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयक लंबे समय तक लंबित रहे हैं। इन मुद्दों पर मेरी सरकार ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया है, जिन्हें संविधान पीठ के पास भेजा गया है।”
आर्लेकर द्वारा जोड़े गए अंश के संदर्भ में, विजयन ने कहा कि राज्यपाल ने पैराग्राफ 16 के दूसरे हिस्से में “मेरी सरकार मानती है” जोड़ दिया, जो इस प्रकार है -“कर का बंटवारा और वित्त आयोग अनुदान राज्यों का संवैधानिक अधिकार है, यह कोई दान नहीं है। और इस जिम्मेदारी से जुड़े संवैधानिक निकायों पर किसी भी तरह का दबाव संघीय सिद्धांतों को कमजोर करता है।”
विजयन ने विधानसभा अध्यक्ष से आग्रह किया कि राज्य मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर नीतिगत संबोधन को ही आधिकारिक संस्करण के तौर पर स्वीकार किया जाए तथा राज्यपाल द्वारा उसमें जोड़े गए या छोड़ गए हिस्से का स्वीकार किये बिना।
इस पर विधानसभा अध्यक्ष ए. एन. शमशीर ने कहा कि सदन की पूर्व परंपराओं के अनुसार मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित संबोधन में कोई हिस्सा छोड़े जाने या कोई हिस्सा जोड़ने को आधिकारिक मान्यता नहीं दी जाती और इस बार भी वही रुख अपनाया जाएगा।
इस बीच विधानसभा में विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन ने आर्लेकर द्वारा राज्य विधानसभा में पढ़े गए वामपंथी सरकार के नीतिगत संबोधन की कड़ी आलोचना करते हुए इसे ‘झूठे दावों और अर्ध-सत्य’ से भरा दस्तावेज बताया।
राज्यपाल और सरकार के बीच चल रही खींचतान पर सतीशन ने कहा, ‘जब भी सरकार संकट में होती है, राज्यपाल से टकराव शुरू हो जाता है। संकट टलने पर वे सुलह कर लेते हैं।’
राज्यपाल के नीतिगत भाषण देने के तुरंत बाद, सतीशन यूडीएफ नेताओं के साथ पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि नीतिगत भाषण ही इस बात का प्रमाण है कि सरकार गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रही है।
सरकार के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को कायम रखने के दावे पर कटाक्ष करते हुए सतीशन ने कहा कि यह विरोधाभासी है।
उन्होंने आरोप लगाया, ‘चरम सांप्रदायिक टिप्पणियां करने वाले साजी चेरियन जैसे मंत्री को मंत्रिमंडल में बनाए रखकर सरकार धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा का दावा करती है।’
भाषा नोमान प्रशांत
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