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Sunday, 5 July, 2026
होमदेश'भारत ने कश्मीर पर कब्जा किया': अलगाववादी सामग्री पर जम्मू-कश्मीर की स्कूली किताबें वापस ली गईं

‘भारत ने कश्मीर पर कब्जा किया’: अलगाववादी सामग्री पर जम्मू-कश्मीर की स्कूली किताबें वापस ली गईं

इस मामले ने एक बड़े विवाद का रूप ले लिया है, क्योंकि विधानसभा में विपक्ष के बीजेपी नेता सुनील शर्मा ने इसे 'एकेडमिक जिहाद' करार दिया है. बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की भी मांग की है.

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नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर स्कूल शिक्षा विभाग ने शुक्रवार को आठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया और एक संविदा कर्मचारी की सेवा समाप्त कर दी. इसकी वजह यह थी कि सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई दो किताबों— ‘Personalities and Legends of J&K’ (जम्मू-कश्मीर की हस्तियां और दिग्गज) और ‘Great Personalities of Jammu and Kashmir’ (जम्मू और कश्मीर की महान हस्तियां)—में कथित तौर पर “अलगाववादी प्रचार” मिला. केंद्र शासित प्रदेश सरकार के एक सूत्र ने दिप्रिंट को बताया कि इन किताबों में दोषी आतंकियों जैसे मकबूल भट और मसरत आलम को “शहीद” और “महान व्यक्तित्व” बताया गया था.

अब इन दोनों किताबों को वापस ले लिया गया है और स्कूल लाइब्रेरी से हटा दिया गया है. ‘Personalities and Legends of J&K’ की 123 प्रतियां जम्मू, रामबन और उधमपुर जिलों के स्कूलों में भेजी गई थीं. वहीं ‘Great Personalities of J&K’ की 128 प्रतियां जम्मू और बारामूला के स्कूलों में दी गई थीं.

सूत्रों के मुताबिक, इन किताबों में कश्मीर के लिए “Indian Occupied Kashmir” (भारत के कब्ज़े वाला कश्मीर) और “Indian Held Kashmir” (भारत-नियंत्रित कश्मीर) जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया. भारत को वैध संप्रभु प्रशासन नहीं बताया गया, बल्कि साफ तौर पर लिखा गया कि “भारत एक कब्जा करने वाला और दमनकारी देश है”, जो “औपनिवेशिक जैसी व्यवस्था” और “नव-औपनिवेशिक शासन” चला रहा है.

इन किताबों को वापस लेने और अधिकारियों को निलंबित करने का फैसला उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के आदेश पर लिया गया. ‘Personalities and Legends of J&K’ के लेखक डॉ. हिलाल अहमद और संतोष मीणा हैं तथा इसे जम्मू की ओबेरॉय बुक सर्विस ने प्रकाशित किया है. वहीं ‘Great Personalities of Jammu and Kashmir’ के लेखक डॉ. सुशांत गिरी हैं और इसे दिल्ली के ऑरोरा प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.

अब इन दोनों लेखकों और प्रकाशकों पर जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में प्रतिबंध लगा दिया गया है और उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है.

सूत्र के मुताबिक, इन किताबों को समग्र शिक्षा योजना के जरिए वितरित किया गया. यह शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की एक केंद्र प्रायोजित योजना है. सूत्र ने कहा कि “इस तरह जनता के टैक्स के पैसे से अलगाववादी प्रचार वाली किताबें जम्मू-कश्मीर के स्कूलों की लाइब्रेरी तक पहुंचाई गईं.”

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि किताब को विश्वसनीय दिखाने के लिए इसमें परमवीर चक्र विजेता बाना सिंह, रॉ के पूर्व प्रमुख जी. सी. सक्सेना और पूर्व मुख्यमंत्री सैयद मीर कासिम जैसे असली भारतीय राष्ट्रवादियों की प्रोफाइल भी शामिल की गई.

अधिकारी ने कहा, “लेकिन इन वास्तविक हस्तियों के साथ-साथ दोषी आतंकियों और कट्टर अलगाववादी नेताओं को भी ‘शहीद’ और ‘महान व्यक्तित्व’ बताकर पेश किया गया है.”

अधिकारी ने आगे कहा, “इसमें एक दोषी हत्यारे को ‘शहीद-ए-आज़म’ और ‘कश्मीर का राष्ट्रपिता’ बताया गया है.”

इस कथित “अलगाववादी प्रचार” को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया. बीजेपी नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने इसे “अकादमिक जिहाद” बताया. शनिवार को बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर की शिक्षा मंत्री सकीना इट्टू के इस्तीफे की भी मांग की.

विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कथित तौर पर कहा कि उन्होंने यह किताब पढ़ी ही नहीं है.

‘शहीद’ मकबूल भट, गिलानी और शब्बीर शाह

ऊपर बताए गए सूत्र के मुताबिक, ‘Great Personalities of J&K’ में “शहीद मकबूल भट” शीर्षक से पूरा अध्याय है, जिसमें मकबूल भट की तारीफ की गई है.

मकबूल भट ने 1960 के दशक में CID इंस्पेक्टर अमर चंद की हत्या की थी और नेशनल लिबरेशन फ्रंट की सह-स्थापना की थी. यह संगठन 1971 में भारतीय विमान ‘गंगा’ के अपहरण में शामिल था. भट को 11 फरवरी 1984 को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी.

सूत्र ने कहा, “किताब में दावा किया गया है कि उनकी फांसी जल्दबाजी में इसलिए दी गई क्योंकि बर्मिंघम में एक भारतीय राजनयिक की हत्या का बदला लेना था.”

सूत्र ने कहा, “किताब खुले तौर पर सशस्त्र विद्रोह की वकालत करती है. इसमें कहा गया है कि उनकी फांसी से ‘सशस्त्र क्रांति’ की शुरुआत हुई और उनका मिशन अब भी अधूरा है. इसमें उन्हें ‘पाकिस्तान समर्थित कश्मीर के अलगाववादी आंदोलन का संस्थापक’ और ‘विमान अपहरण की योजना बनाने वाला’ भी बताया गया है.”

सूत्र ने कहा कि किताब में कई अन्य अलगाववादी नेताओं को भी सम्मान दिया गया है, जबकि उनके आतंकवाद से गहरे संबंध रहे हैं.

ऐसा ही एक नाम मसरत आलम भट का है. सूत्र के मुताबिक, वह 1990 से आतंकवादी गतिविधियों में शामिल था, जब उसने हिजबुल्ला जॉइन किया और हथियारों की ट्रेनिंग लेने पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) गया.

सूत्र ने कहा, “उस पर 47 मामले दर्ज हैं और उसे कई बार पब्लिक सेफ्टी एक्ट (PSA) के तहत हिरासत में लिया गया. उसने 2008 और 2010 में बड़े पैमाने पर पत्थरबाजी वाले आंदोलन चलाए, जिनमें 160 से ज्यादा नागरिक मारे गए और हजारों सुरक्षाकर्मी घायल हुए.”

उसे 2019 में NIA ने आतंकवाद के लिए फंडिंग के मामले में गिरफ्तार किया था. 2017 में ED ने हवाला कारोबारी ज़हूर अहमद शाह वटाली के जरिए विदेश से 10 लाख रुपये मिलने के मामले में उसकी जांच की थी. उसके संगठन मुस्लिम लीग जम्मू-कश्मीर (मसरत आलम गुट) पर 2023 में प्रतिबंध लगा दिया गया था.

सूत्र ने कहा, “किताब में बिना किसी विरोध के उसका यह बयान दिया गया है कि ‘मैं बचपन से ही पत्थरबाज हूं.’ इसमें 2008 मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद के समर्थन का भी जिक्र बिना किसी टिप्पणी के किया गया है. इसमें लिखा है कि उसने ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ के नारे लगाए, NDRF और भारतीय सेना को ‘कब्जा करने वाली ताकतें’ कहा और 2015 में पाकिस्तानी झंडा फहराया.”

‘अलगाववादी प्रचार’

किताब में ऑल पार्टीज़ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (APHC) के पूर्व चेयरमैन और तहरीक-ए-हुर्रियत के संस्थापक सैयद अली शाह गिलानी का भी जिक्र है. उनकी 2021 में मौत हो गई थी.

सूत्र ने कहा, “किताब में भारत की संप्रभुता के खिलाफ गिलानी के रुख को उनकी निजी ‘विचारधारा’ के रूप में पेश किया गया है. इसमें पाकिस्तान सरकार के साथ उनके सहयोग और हिजबुल मुजाहिदीन आतंकियों के समर्थन का जिक्र नहीं किया गया.”

एक दूसरे सूत्र के मुताबिक, गिलानी हमेशा जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की वकालत करते रहे. उनकी सोच पर अबुल आला मौदूदी का प्रभाव था.

सूत्र ने कहा, “1997 में उनके खिलाफ सऊदी अरब और कश्मीर अमेरिकन काउंसिल के निदेशक सैयद गुलाम नबी फई से पैसे लेने का मामला दर्ज हुआ था. अमेरिका में उन पर ISI एजेंट होने का आरोप भी लगा. उनके नेतृत्व वाले संगठन जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर और तहरीक-ए-हुर्रियत पर 2019 और 2023 में UAPA के तहत प्रतिबंध लगा दिया गया.”

किताब में शब्बीर शाह का भी जिक्र है, जिन्हें 1968 से 2015 के बीच कई बार हिरासत में लिया गया था.

उन्हें जून 2019 में NIA ने आतंकवाद के लिए फंडिंग के मामले में गिरफ्तार किया था. उनके खिलाफ 2005 में ED का मनी लॉन्ड्रिंग मामला भी था. उनकी पार्टी जम्मू-कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी (JKDFP) पर अक्टूबर 2023 में UAPA के तहत प्रतिबंध लगा दिया गया था.

12 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे में देरी के आधार पर उन्हें जमानत दे दी.

सूत्र ने कहा, “किताब में शाह को ‘कश्मीरी आजादी और आत्मनिर्णय के सबसे बड़े समर्थकों में से एक’ बताया गया है.”

किताब में मीरवाइज उमर फारूक का भी जिक्र है, जो अवामी एक्शन कमेटी के प्रमुख थे. इस संगठन को मार्च 2025 में गैरकानूनी संगठन घोषित किया गया था.

सूत्रों के मुताबिक, उन्हें ऐसे नेता के रूप में पेश किया गया है जो “लोगों की इच्छाओं के अनुरूप” विवाद का समाधान चाहते थे. इसमें 2008 और 2012 में पाकिस्तान जाकर वहां के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व से उनकी मुलाकातों का पूरा संदर्भ नहीं दिया गया.

सूत्र ने कहा कि ये सभी लोग ऑल पार्टीज़ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (APHC) से जुड़े रहे, जिसकी स्थापना 3 सितंबर 1993 को हुई थी. इसका उद्देश्य भारत की संप्रभुता को चुनौती देना, आत्मनिर्णय का अधिकार हासिल करना, जिसमें “आजादी का अधिकार” भी शामिल है, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर की स्थिति को “भारत द्वारा जबरन और धोखे से किया गया कब्जा” बताना था.

पैसों के इस्तेमाल की जांच

सरकार के एक अधिकारी ने कहा कि पूरे मामले में वित्तीय ऑडिट कराया जाएगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि कितनी प्रतियां छपीं, समग्र शिक्षा जम्मू-कश्मीर (2025-26) की सीरीज-4 के लिए कुल कितना बजट मंजूर हुआ, प्रकाशक और लेखकों को कितना भुगतान किया गया और किस प्रशासनिक व्यवस्था के तहत इन फंडों को मंजूरी दी गई.

अधिकारी ने कहा, “अगर यह सीरीज-4 का हिस्सा था, तो पहले की सीरीज में क्या सामग्री थी, इसकी भी जांच होनी चाहिए और जिन लोगों ने इसे मंजूरी दी, उनके खिलाफ भी उचित कार्रवाई होनी चाहिए.”

अधिकारी ने यह भी कहा, “इसके अलावा जम्मू-कश्मीर में CBSE लागू करने की प्रक्रिया को भी तेज किया जाना चाहिए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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