नयी दिल्ली, 22 अक्टूबर (भाषा) अगर किसी का दिल कमजोर है, तो बैटरी से चलने वाला और शल्य चिकित्सा के जरिये शरीर में लगाया जाने वाला पंप उसे नया जीवन दे सकता है। लेकिन, इस सहायक उपकरण (एलवीएडी) की कीमत एक लाख अमेरिकी डॉलर यानी करीब 95 लाख रुपये है, जो अमीर लोगों को छोड़कर बाकी लोगों की पहुंच से बाहर है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के गंगवाल स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के संस्थापक डीन डॉ. अनिल के. लालवानी इसी तरह की विसंगति को दूर करना चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि 2022 में चिकित्सा और स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित इस मेडिकल स्कूल की प्रमुख परियोजनाओं में से एक ऐसी समस्याओं का स्वदेशी समाधान विकसित करना है, जिनसे भारतीय जूझ रहे हैं। इनमें हृदय की गंभीर बीमारी भी शामिल है।
लालवानी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि भारत को स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का समाधान करने के लिए नागरिकों को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा, ‘‘हम केवल दूसरों के समाधान अपनाते हैं और इसके बजाय यह सोचना होगा कि हम खुद समाधान विकसित करते हैं।’’
एलवीएडी इस समस्या का एक सटीक उदाहरण है।
बैटरी से चलने वाले इस यांत्रिक पंप को हृदय की गंभीर अवस्था की विफलता से जूझ रहे मरीज के शरीर में शल्य चिकित्सा के जरिये लगाया जा सकता है। यह उपकरण हृदय के बाएं निलय से रक्त को मुख्य धमनी यानी महाधमनी में पहुंचाता है, जहां से रक्त शाखा धमनियों के जरिये शरीर के बाकी हिस्सों तक जाता है।
चिकित्सक और नवोन्मेषक लालवानी ने कहा, ‘‘दुर्भाग्य से, अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) से मंजूरी मिलने के बावजूद यह उपकरण अमेरिका में एक लाख अमेरिकी डॉलर से अधिक कीमत पर उपलब्ध है। करीब 1.48 अरब की आबादी वाले देश में बड़े पैमाने पर इतनी कीमत वहन करना संभव नहीं है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमें इस समस्या का स्वदेशी समाधान विकसित करना होगा। भारतीय एलवीएडी बनाना गंगवाल मेडिकल स्कूल की प्रमुख परियोजनाओं में से एक है और यह भारत में किफायती तकनीक विकसित करने के हमारे लक्ष्य का उदाहरण है।’’
यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें उम्मीद है कि मेडिकल स्कूल में विकसित समाधान दुनिया के अन्य देशों तक भी पहुंचेंगे, लालवानी ने कहा कि इसके लिए सोच में बुनियादी बदलाव लाना होगा।
दिल्ली में हाल में आयोजित ‘आईआईटीके समन्वय 2026’ कार्यक्रम से इतर उन्होंने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि हमें कहना होगा कि हम यह कर सकते हैं, हम यह करेंगे और हमें यह करना ही होगा। क्योंकि हम दुनिया के दूसरे देशों के समाधानों के भरोसे नहीं रह सकते। वे हमारे लिए व्यावहारिक नहीं हैं। यही सबसे अहम बात है।’’
लालवानी अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में कान, नाक एवं गला रोग विज्ञान और मैकेनिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हैं। उन्हें 20 अप्रैल को आईआईटी-कानपुर के गंगवाल स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी का संस्थापक डीन नियुक्त किया गया था। यह संस्थान चिकित्सा में स्नातकोत्तर और विभिन्न विषयों को जोड़कर किए जाने वाले शोध कार्यक्रमों के जरिये बदलाव लाने की दिशा में काम कर रहा है।
निर्माणाधीन इस संस्थान परिसर में 500 से अधिक बिस्तरों वाला सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और 50 से अधिक बिस्तरों वाला कैंसर देखभाल एवं अनुसंधान केंद्र भी होगा।
लालवानी ने कहा, ‘‘मेरा मानना है कि इस पहल के पीछे सोच यह थी कि आईआईटी-कानपुर की इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में मजबूत उपस्थिति का लाभ उठाया जाए और इसे मेडिकल स्कूल तथा अस्पताल के साथ जोड़ा जाए, ताकि दोनों के बीच तालमेल बन सके।’’
उन्होंने कहा कि भारत में विकसित समाधानों का एक फायदा यह भी होगा कि वे किफायती होंगे और दुनिया भर में लोगों को सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद करेंगे।
लालवानी के अनुसार, भारत के सामने स्वास्थ्य के क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौतियां और अवसर मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य तथा संक्रामक और उष्णकटिबंधीय बीमारियों से जुड़े हैं। दुनिया के दूसरे देश इन समस्याओं पर उतना काम नहीं करेंगे क्योंकि वे इन चुनौतियों का सामना नहीं करते।
उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी, खासकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) भारत में मौलिक दवा नवाचार को बढ़ावा देने में मदद कर सकती है।
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