नई दिल्ली: भारतीय अदालतें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के मामलों में अंडरट्रायल आरोपियों को ट्रायल शुरू होने और खत्म होने में असाधारण देरी के आधार पर तेजी से जमानत दे रही हैं. इससे यह सवाल प्रमुखता से सामने आया है कि आतंकवाद रोधी कानून के तहत जमानत की याचिकाओं में “ट्रायल में वक्त लगेगा” वाली दलील आखिर कितने समय तक चल सकती है?
यह सवाल 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के मामलों में भी महत्वपूर्ण हो जाता है. इनमें आरोपी बनाए गए छात्र-कार्यकर्ता शरजील इमाम और उमर खालिद क्रमशः करीब सात और छह साल से अंडरट्रायल के तौर पर जेल में हैं.
UAPA के तहत जमानत के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान धारा 43-D(5) है. सामान्य जमानत की कार्यवाही से अलग, यह धारा अदालत को आरोपी को रिहा करने से रोकती है, अगर अभियोजन पक्ष की सामग्री की जांच करने के बाद यह मानने के लिए “उचित आधार” हो कि आरोपी के खिलाफ लगाया गया आरोप पहली नजर में सच है.
इससे एक मुश्किल स्थिति पैदा होती है: जमानत के स्तर पर अदालत सबूतों की जांच के लिए पूरा ट्रायल नहीं कर सकती. इसके बजाय जज केवल राज्य की ओर से पेश किए गए बुनियादी तथ्यों को देखते हैं. अगर पहली नज़र में ये तथ्य पर्याप्त मजबूत लगते हैं, तो कानून अदालत को जमानत देने से इनकार करने के लिए कहता है.
हालांकि, यह सख्त नियम अक्सर एक बड़े मौलिक अधिकार से टकराता है: किसी व्यक्ति को ऐसे ट्रायल का इंतज़ार करते हुए हमेशा जेल में नहीं रखा जा सकता, जिसे पूरा होने में कई साल लग सकते हैं.
सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने ISIS समर्थक समूह हरकत-उल-हरब-ए-इस्लाम से कथित संबंध और ISIS की विचारधारा फैलाने और जैश-ए-मोहम्मद की विचारधारा का समर्थन करने से जुड़े NIA मामले में UAPA आरोपी मोहम्मद साकिब उर्फ साकिब इफ्तेकार को जमानत दे दी. वह आठ साल से जेल में था.
जस्टिस नवीन चावला और रविंदर डुडेजा की पीठ ने दर्ज किया कि NIA ने 120 गवाहों को पेश करने की बात कही थी, जिनमें से केवल 40 से पूछताछ हुई थी. NIA ने 39 गवाहों को हटाने की बात कही, इसके बावजूद पीठ ने कहा कि ट्रायल “जल्द खत्म होता नजर नहीं आ रहा था.”
सोमवार को उसे जमानत देते हुए पीठ ने कहा, “गवाहों के बयानों और अपीलकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर विचार करने और खास तौर पर अपीलकर्ता की लंबे समय से चली आ रही हिरासत को देखते हुए, हमारी राय है कि अपीलकर्ता ने जमानत पर रिहा किए जाने का मामला बना लिया है.”
इस महीने की शुरुआत में दिल्ली हाई कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी साजिश के एक मामले में पांच साल से ज्यादा समय से जेल में बंद दो लोगों को जमानत दी थी. कोर्ट ने कहा था कि उनका ट्रायल जल्द खत्म होने वाला नहीं है.
सोबिया अजीज और कामरान अशरफ रेशी को अक्टूबर 2021 में जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी साजिश के एक मामले में UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था. इस मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने की थी.
3 सितंबर के एक फैसले में जस्टिस चावला और डुडेजा की खंडपीठ ने कहा कि करीब पांच साल में एक मामले में पेश किए गए 359 गवाहों में से केवल 21 से पूछताछ हुई थी.
पीठ ने कहा, “जहां तक ट्रायल लंबित रहने के दौरान लंबे समय तक हिरासत में रहने को जमानत देने के आधार के रूप में देखने का सवाल है, हम ऊपर कानून को पहले ही संक्षेप में बता चुके हैं. मौजूदा मामले में भी अपीलकर्ता करीब 5 साल से ट्रायल लंबित रहने के दौरान हिरासत में है. ट्रायल जल्द खत्म होने की कोई संभावना नहीं है.”
इससे पहले, 25 अगस्त को राउज एवेन्यू कोर्ट की विशेष NIA और UAPA अदालत की जज अनु ग्रोवर बालीगा ने मोहम्मद कफील अहमद को जमानत दी थी. वह 14 साल से जेल में था और ट्रायल खत्म होने का इंतजार कर रहा था. अहमद को 2012 में गिरफ्तार किया गया था.
पिछले महीने इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा और जस्टिस राजेश सिंह चौहान की पीठ ने अंसाद बदरुद्दीन और फिरोज खान को जमानत दी थी. दोनों पर आतंकवादी साजिश, विस्फोटक और हथियारों से जुड़े UAPA मामले में आरोप लगाए गए थे. फरवरी 2021 में गिरफ्तार किए गए दोनों ने साढ़े पांच साल जेल में बिताए थे. इस दौरान अभियोजन पक्ष के 18 गवाहों में से केवल पांच से पूरी तरह पूछताछ हुई थी और मुख्य गवाह से जिरह भी नहीं हुई थी.
हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसा तब हुआ, जब उसने ट्रायल में तेजी लाने के लिए दो बार निर्देश दिए थे.
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जल्द ट्रायल के अपने अधिकार का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने दोनों को जमानत दे दी. कोर्ट ने कहा कि ट्रायल के जल्द खत्म होने की “कोई संभावना नहीं” है. पीठ ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने केवल अभियोजन पक्ष के गवाहों से पूछताछ के लिए 95 अलग-अलग तारीखें तय की थीं, लेकिन ट्रायल पूरा होता नज़र नहीं आ रहा था.
इस साल जुलाई में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने निर्मल सिंह उर्फ नीलधारी उर्फ लल्ली को जमानत दी थी. उस पर सह-आरोपियों से ड्रग्स का पैसा लेकर अपराध से हुई कमाई को ट्रांसफर करने में मदद करने का आरोप था. निर्मल सिंह 6.5 साल से जेल में था.
ज़मानत हासिल करने की यह उसकी दूसरी कोशिश थी. पिछली याचिका खारिज होने के पांच साल से ज्यादा समय बाद यह याचिका “सिर्फ लंबे समय से जेल में रहने के आधार पर” दायर की गई थी.
जमानत देते हुए जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की पीठ ने कहा, “…हमारी राय है कि अपीलकर्ता पहले ही लंबे समय तक हिरासत में रह चुका है. इसके साथ ट्रायल की धीमी गति और जल्द ट्रायल पूरा होने की बेहद कम संभावना, ऐसी असाधारण परिस्थितियां हैं जिनमें अपीलीय अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया जाना उचित है.”
पीठ ने व्यक्ति की पहले से चली आ रही लंबी हिरासत और ट्रायल की स्थिति पर ध्यान दिया, जहां अब तक केवल एक चौथाई गवाहों से पूछताछ हुई थी.
जून 2026 में एक महत्वपूर्ण फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज और पत्रकार इरफान मेहराज को साढ़े चार साल की हिरासत के बाद जमानत दे दी. दोनों पर एक NGO के आतंकवादी फंडिंग मामले में आरोप थे. उनके खिलाफ अक्टूबर 2020 में NIA ने मामला दर्ज किया था. उनके खिलाफ UAPA का मामला 2021 में दर्ज किया गया था. जस्टिस चावला और डुडेजा की पीठ ने कहा कि ट्रायल आरोप तय करने पर बहस के चरण में है और अभियोजन पक्ष एक मामले में 197 गवाहों से पूछताछ करना चाहता है.

विशेष NIA अदालत के दिसंबर 2024 के जमानत से इनकार करने वाले आदेश को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके अधिकारों “को संतुलित किया जाना जरूरी है और ये UAPA की धारा 43D (5) के तहत लगाई गई पाबंदी से भी ऊपर हो सकते हैं.”
मई 2026 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने UAPA आरोपी मंसूर अली को जमानत दी थी. वह दो साल और आठ महीने से हिरासत में था और ट्रायल जल्द खत्म होने की संभावना नहीं थी. वह सात आरोपियों में से एक है. इन सभी पर बड़े पैमाने पर बम बनाने और आतंकवादी गतिविधियों में मदद करने के आरोप में UAPA के तहत मामला दर्ज किया गया था.
जस्टिस अरिजीत बनर्जी और जस्टिस अपूर्वा सिन्हा रे की पीठ ने कहा कि अब तक अभियोजन पक्ष के 102 गवाहों में से केवल एक से ही पूछताछ हुई थी और वह भी पूरी नहीं हुई थी. कोर्ट ने कहा, “इसलिए, जिस गति और तरीके से ट्रायल आगे बढ़ रहा है, यह कहना मुश्किल है कि ट्रायल कब पूरा होगा.”
2021 के एक आदेश में अब CJI जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था, “अदालतों से उम्मीद की जाती है कि वे जमानत देने के खिलाफ विधायी नीति को समझें, लेकिन जहां उचित समय के भीतर ट्रायल पूरा होने की कोई संभावना नहीं है और व्यक्ति पहले ही हिरासत में अपनी सजा की तय अवधि के एक बड़े हिस्से से ज्यादा समय बिता चुका है, वहां ऐसे प्रावधानों की सख्ती कम हो जाएगी.”
पिछले कुछ महीनों में सुप्रीम कोर्ट ने भी उन UAPA आरोपियों को जमानत दी है, जो कई साल से जेल में हैं.
मिसाल के तौर पर, मई 2026 में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने जम्मू-कश्मीर के UAPA अंडरट्रायल सुहैल अहमद थोकड़ को जमानत दी थी. वह साढ़े 5 साल से ज्यादा समय से जेल में था.
जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने UAPA मामले के आरोपियों मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अजहर को जमानत दी. कोर्ट ने ट्रायल में हुई असाधारण देरी और निकट भविष्य में इसके खत्म होने की कोई संभावना नहीं होने को आधार बनाया. दोनों 12 साल से जेल में थे.
नजीब, अंद्राबी और लंबित रेफरेंस
उक्त बताए गए सभी मामलों में UAPA के तहत जमानत से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का ज़िक्र है.
पहला फैसला के.ए. नजीब मामले में 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने दिया था. जस्टिस अनिरुद्ध बोस, एन.वी. रमना और सूर्यकांत की पीठ ने कहा था कि UAPA के तहत लगाई गई पाबंदियों और संविधान के तहत अदालतों को मिले अधिकारों के बीच “अच्छा तालमेल” बनाया जा सकता है.
उस समय पीठ की ओर से फैसला लिखने वाले जस्टिस सूर्यकांत, जो अब मुख्य न्यायाधीश हैं, उन्होंने कहा था, “जहां कार्यवाही की शुरुआत में अदालतों से जमानत देने के खिलाफ कानून बनाने की नीति को ध्यान में रखने की उम्मीद की जाती है, वहीं ऐसे प्रावधानों की सख्ती वहां कम हो जाएगी जहां उचित समय के भीतर ट्रायल पूरा होने की कोई संभावना नहीं है और आरोपी पहले ही तय सजा की एक बड़ी अवधि के बराबर समय जेल में बिता चुका है.”
दूसरा फैसला इस साल जनवरी में जस्टिस अरविंद कुमार और एन. अंजलिया की पीठ ने दिया था. इसमें दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के मामले में आरोपी छात्र-कार्यकर्ताओं उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया गया था. खालिद ने अंडरट्रायल के तौर पर जेल में छह साल पूरे कर लिए हैं, जबकि इमाम 6.5 साल जेल में बिता चुके हैं. उनके मामले में अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं.
इसी मामले में कोर्ट ने पांच अन्य सह-आरोपियों—गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद—को 11 शर्तों के साथ जमानत दे दी थी. कोर्ट ने कहा था कि खालिद और इमाम की तुलना में उनकी स्थिति “गुणात्मक रूप से अलग” है.
इसके बाद 18 मई को सैयद इफ्तिकार अंद्राबी के मामले में फैसला आया. जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और उज्जल भुइयां की पीठ ने उन्हें जमानत दे दी. वह UAPA के एक मामले में करीब छह साल तक अंडरट्रायल के तौर पर जेल में रहे थे. कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जल्द ट्रायल का मौलिक अधिकार, UAPA के तहत जमानत पर लगाई गई सख्त कानूनी पाबंदियों से ऊपर है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में जनवरी के उस फैसले के कई पहलुओं पर “गंभीर आपत्ति” भी जताई गई थी, जिसमें उसी स्तर की दूसरी पीठ ने खालिद और इमाम को जमानत देने से इनकार किया था.
फैसला लिखने वाले जस्टिस भुइयां ने नजीब मामले में तय सिद्धांतों को समझाते हुए कहा, “हालांकि, हिरासत में बिताई गई अवधि और निकट भविष्य में ट्रायल पूरा होने की संभावना नहीं होने को ध्यान में रखते हुए, आरोपियों को जमानत पर रिहा करना जरूरी था.”
इसके सिर्फ चार दिन बाद सुप्रीम कोर्ट की एक और पीठ ने UAPA के तहत जमानत पर लगी पाबंदियों और लंबे समय तक जेल में रखने के सवाल को बड़ी पीठ के पास भेज दिया. जस्टिस अरविंद कुमार, जो जनवरी के फैसले का हिस्सा थे और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ ने समकक्ष पीठों के बीच अलग-अलग राय को दूर करने के लिए यह मामला बड़ी पीठ को भेजा.
जस्टिस कुमार की पीठ ने कहा कि एक समकक्ष पीठ दूसरी पीठ के फैसले के मूल सिद्धांत को बदल नहीं सकती. इसलिए मामले को सीजेआई के सामने रखने के लिए औपचारिक रूप से भेजा गया. इस मामले में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने पीठ को बताया था कि के.ए. नजीब के फैसले को जिस तरह पढ़ा और लागू किया जा रहा है, उसमें “अलग-अलग व्याख्या” दिखाई दे रही है. उन्होंने कानून को स्पष्ट करने के लिए मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग की थी.
यह वही फैसला था जिसमें दिल्ली दंगों के आरोपी अब्दुल खालिद सैफी और तसलीम अहमद को जमानत दी गई थी.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
वरिष्ठ वकील तनवीर अहमद मीर का मानना है कि लंबे समय तक जेल में रहना अपने आप में UAPA के तहत जमानत मांगने की शुरुआत का आधार नहीं है. उनके मुताबिक, बचाव पक्ष के वकील को सबसे पहले यह दिखाना होता है कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह मजबूत नहीं हैं और पहली नज़र में अभियोजन पक्ष की सामग्री पर्याप्त भरोसा पैदा नहीं करती.
जून के फैसले में मीर ने जम्मू-कश्मीर के कार्यकर्ता खुर्रम परवेज का सफलतापूर्वक बचाव किया था. उन्होंने कहा कि उन्होंने हिरासत में बिताए समय को अपनी दलील का मुख्य आधार नहीं बनाया था. इसके बजाय उन्होंने अदालत में यह दिखाने की कोशिश की कि गिरफ्तारी असल में “समाज में निगरानी रखने वाले लोगों, खासकर संघर्ष वाले इलाकों में काम करने वाले मानवाधिकार रक्षकों की आवाज को दबाने की कोशिश” थी.
उन्होंने कहा, “जब तक मैं आरोपों की प्रकृति को लेकर जजों की न्यायिक अंतरात्मा को संतुष्ट नहीं कर पाता, तब तक हिरासत में बिताया गया समय कोई असर नहीं डालता.”
उनके मुताबिक, UAPA के मामलों में बचाव पक्ष की पहली जिम्मेदारी यह दिखाना है कि आरोपी पर लगाए गए अपराधों के आरोप पूरी तरह मजबूत नहीं हैं.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “ऐसा नहीं है कि अदालतें सिर्फ हिरासत में बिताए समय के आधार पर आपको जमानत दे रही हैं. इन अपराधों में अदालतें तब जमानत दे रही हैं, जब आप यह दिखा पाते हैं कि बाकी परिस्थितियों में भी आपके अंत में बरी होने की मजबूत संभावना है.”
वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा कि ऐसा कोई कानूनी नियम नहीं है जिसके तहत किसी आरोपी को एक निश्चित संख्या में साल हिरासत में बिताने के बाद जमानत मिलनी ही चाहिए. हालांकि, जब ट्रायल शुरू भी नहीं हुआ हो, तो लंबे समय तक जेल में रखना सही ठहराना लगातार मुश्किल होता जाता है.
हेगड़े ने कहा कि जहां आरोपों में संगठित हिंसा या आतंकवाद के कारण किसी व्यक्ति की मौत शामिल हो, वहां अदालतें जमानत देने को लेकर खास तौर पर हिचकिचाती हैं.
इसमें अंतर बताते हुए उन्होंने कहा कि “अगर आप पहली बार अपराध करने वाले व्यक्ति की बात कर रहे हैं, जो ऐसी साजिश में शामिल था जिसमें कोई घायल या मौत नहीं हुई, तो जमानत मिलने की संभावना ज्यादा होती है.”
जम्मू-कश्मीर के कार्यकर्ता खुर्रम परवेज का सफलतापूर्वक बचाव करने वाले वकील तनवीर अहमद मीर ने कहा, “ऐसा नहीं है कि अदालतें सिर्फ हिरासत में बिताए समय के आधार पर आपको जमानत दे रही हैं. इन अपराधों में अदालतें तब जमानत दे रही हैं, जब आप यह दिखा पाते हैं कि बाकी परिस्थितियों में भी आपके अंत में बरी होने की मजबूत संभावना है.”
उनका कहना है कि कुछ ऐसे मानक होने चाहिए जिन्हें न्यायपालिका लागू करे और जिनके तहत अभियोजकों को किसी व्यक्ति को लगातार हिरासत में रखने का कारण बताना जरूरी हो. इनमें से कई मामलों में आरोपी के खिलाफ कोई दूसरा आपराधिक मामला नहीं होता. उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि व्यवस्था के साथ समस्या यह है कि “हम किसी अभियोजन के नतीजे पर जरूरी तौर पर ध्यान नहीं दे रहे हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “जांच अधिकारी और पुलिस मूल रूप से फुटेज के आधार पर आगे बढ़ते हैं, गिरफ्तारी करते हैं, जांच करते हैं और फिर सारी सामग्री अदालत के सामने रख देते हैं, जबकि ट्रायल कब खत्म होगा इसकी कोई अंतिम तारीख नजर नहीं आती.”
उमर खालिद की ट्रायल से पहले की हिरासत को लेकर चल रही बहस पर हेगड़े ने कहा कि जनता के सामने मुख्य सवाल यह है कि जब मामला भाषण या कथित साजिश से जुड़ा हो, न कि किसी की मौत से जुड़े आरोप से, तो आरोपी को कितने समय तक हिरासत में रखा जा सकता है.
उनके मुताबिक, सार्वजनिक तौर पर सवाल यह है कि सिर्फ एक भाषण के लिए उमर खालिद को कितने समय तक जेल में रखा जा सकता है? और दूसरी तरफ की दलील यह है: “आप जितना ज्यादा बोलेंगे, आपको उतने ही लंबे समय तक अंदर रखा जाएगा.”
उन्होंने आगे कहा, “जीत या हार का फैसला इस बात से होता है कि आप किसी व्यक्ति को अंदर रख सकते हैं या नहीं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: उमर खालिद ‘राष्ट्रवादी’, ABVP गोडसे को मानता है: कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद