कोलकाता: नक्सलवाद के संस्थापक चारू मजूमदार की गिरफ्तारी के 54 साल बाद, जिसने पश्चिम बंगाल में सशस्त्र क्रांति के आकर्षण को खत्म कर दिया था, एक नई इंडी फिल्म एक ऐसे क्रांतिकारी ‘रेड कैडर’ की ज़िंदगी को दिखाती है—जो सत्ता के खिलाफ खड़ा होता है—ठीक राज्य में होने वाले बड़े दांव वाले चुनावों से पहले.
कम बजट वाली यह फिल्म, ‘अदम्य’ (The Unbroken), एक ऐसे युवा कम्युनिस्ट की ज़िंदगी को दिखाती है जो बैलेट बॉक्स के बजाय बंदूक की नली को चुनता है.
13 फरवरी को कुछ ही सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई यह फिल्म, जिसका निर्देशन रंजन घोष ने किया है और जिसे अनुभवी निर्देशक अपर्णा सेन ने प्रस्तुत किया है, दर्शकों के बीच काफी पसंद की जा रही है.
समीक्षकों ने इस फिल्म की काफी तारीफ की है, और पश्चिम बंगाल में इस पर एक तीखी बहस शुरू हो गई है.
‘अदम्य’ हिंसा का सीधा-सीधा महिमामंडन नहीं करती. बल्कि, यह फिल्म मुख्य किरदार की मानसिक यात्रा पर फोकस है.
घोष ने दिप्रिंट को फोन पर बताया, “आखिर में, ‘अदम्य’ दर्शकों को यह संदेश देती है कि दमन के खिलाफ लड़ाई जारी रहनी चाहिए.”
“शायद यही एक वजह है कि यह दर्शकों के दिलों को छू गई है, न कि नायक द्वारा अपनाए गए हिंसक तरीकों की वजह से.”
व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा
‘अदम्य’ युवा पलाश की कहानी बताती है, जिसका किरदार आर्यून घोष ने निभाया है.
पलाश एक क्रांतिकारी छात्र है जो पश्चिम बंगाल में एक मौजूदा सांसद की हत्या करने की कोशिश करता है.
दिलचस्प बात यह है कि वह सांसद अपने चुनावी भाषणों में विकास की बातें करता है और हिंदी में बोलता है.
पलाश अपने मिशन में बुरी तरह नाकाम रहता है—जैसा कि असल ज़िंदगी में ज़्यादातर नक्सलियों के साथ हुआ था—और इसके बजाय वह एक युवा पुलिसकर्मी की हत्या कर बैठता है.
इसके बाद वह सुंदरबन के मनमोहक जंगलों में भाग जाता है, जबकि उसे पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चलाया जा रहा होता है.
जड़ी-बूटियों से भरे एक तालाब के पास बनी एक सुनसान झोपड़ी में, जहां उसके साथ सिर्फ़ वह खुद होता है और कभी-कभार फोन पर आने वाली कोई आवाज़ उसे संक्षिप्त निर्देश देती है, पलाश अपने अतीत के भूतों और वर्तमान की शिकायतों का सामना करता है.
यह सब तब होता है जब बंगाल में चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर होती है और बड़े-बड़े विकास प्रोजेक्ट्स के लिए आदिवासियों के विस्थापन की बातें सुर्खियाँ बन रही होती हैं.
झोपड़ी में अकेला बैठा पलाश अपने मन ही मन अपने एक मृत साथी से बातें करता है—जिसके प्रति शायद वह अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा था—और अपनी बूढ़ी मां के बारे में सोचता है, जिसकी ज़िंदगी का एकमात्र सहारा वह खुद ही है, और अगर पुलिस उसे पकड़ लेती है तो उसकी मां का वह सहारा भी छिन जाएगा.
‘हिंसा का कोई महिमामंडन नहीं’
गंभीर आर्थिक तंगी, बहुत कम संसाधन, और एक ऐसे स्टिल फ़ोटोग्राफ़र अर्को प्रभा दास का सिनेमैटोग्राफ़र के तौर पर डेब्यू—जिनके पास मुख्य विज़ुअल टूल के तौर पर सिर्फ़ एक Sony A7R III कैमरा था—इन सब मुश्किलों के बावजूद घोष ने एक ऐसी फ़िल्म बनाई है, जिसने उन दर्शकों के दिलों को छुआ है जो कुछ नया और मौलिक देखना चाहते हैं. हालांकि ‘अदम्य’ हमें 1970 के दशक के उस ‘गुस्सैल दौर’ की याद दिलाती है, जब कोलकाता के कॉलेजों और यूनिवर्सिटी के सबसे होनहार छात्र सशस्त्र विद्रोह को एक ‘रोमांटिक’ चीज़ के तौर पर देखते थे.
फ़िल्म की शूटिंग घोष और उनकी टीम के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी. डायरेक्टर ने बताया, “हमारे पास तो एक ट्राइपॉड भी नहीं था. हमने सुंदरबन में अपने मेज़बानों से लकड़ी का एक औज़ार उधार लिया और उसे ही ट्राइपॉड की तरह इस्तेमाल किया.” उन्होंने आगे बताया कि रात के दृश्यों को रोशन करने के लिए वे टॉर्च की रोशनी, घरों में जलने वाले बल्ब, या किसी मंदिर से लाई गई ट्यूबलाइट का इस्तेमाल करते थे.
उन्होंने कहा, “इस तरीक़े से फ़िल्म में एक ‘कच्चा’ और ‘ज़िंदा’ सा एहसास बना रहा, जो फ़िल्म की दुनिया के हिसाब से एकदम सही और सच्चा लगता था.”
फ़िल्म की शूटिंग सुंदरबन में चार महीनों के दौरान पूरी की गई थी. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान टीम के सभी सदस्य गांव के एक साधारण से घर में एक साथ रहे. घोष ने बताया, “शूटिंग के लिए पहले से तय सख़्त शेड्यूल पर चलने के बजाय, हमने अपने काम की रफ़्तार को वहाँ के माहौल—जैसे कि ज्वार-भाटा, हवा की गति और बदलती रोशनी—के हिसाब से चलने दिया. इस दौरान कई ऐसे पल भी आए जो पहले से लिखे हुए नहीं थे, लेकिन बाद में वे फ़िल्म का एक अहम हिस्सा बन गए.”

फ़िल्म को लेकर मिली समीक्षाएं काफ़ी उत्साहजनक रही हैं—कुछ समीक्षकों ने इसे ‘ताज़ी हवा के झोंके’ जैसा बताया है, तो कुछ ने कहा है कि ‘इस फ़िल्म के पीछे की मेहनत और कलाकारी पर कोई बहस नहीं हो सकती’.
‘द टेलीग्राफ़’ ने लिखा, “बंगाली फ़िल्म इंडस्ट्री पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वह ‘सुरक्षित रास्ता’ चुनती है और सिर्फ़ पारिवारिक ड्रामा या जासूसी थ्रिलर फ़िल्मों के पुराने फ़ॉर्मूलों पर ही टिकी रहती है. यहां तक कि जो फ़िल्मकार कभी ‘भीड़ से अलग चलकर’ अपनी एक अलग पहचान बना चुके थे, वे भी अब वापस अपने ‘सुरक्षित दायरे’ में लौट आए हैं. ऐसे माहौल में, रंजन घोष की फ़िल्म ‘अदम्य’ सचमुच एक ताज़ी हवा के झोंके की तरह सामने आती है.”
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फ़िल्मकार श्रीजीत मुखर्जी के अनुसार, ‘अदम्य’ ने जिस तरह की सिनेमाई ऊंचाइयों को छुआ है—और वह भी सिर्फ़ छह लोगों की एक छोटी सी टीम के साथ—वह किसी चमत्कार से कम नहीं है. “फिल्म की राजनीति पर बहस हो सकती है, लेकिन इसके पीछे का अदम्य साहस और बेहतरीन शिल्प-कौशल बेमिसाल है,” मुखर्जी ने फेसबुक पर लिखा.
मुखर्जी को फिल्म की राजनीति पर बहस लायक इसलिए लगी, क्योंकि यह दर्शकों को 1970 के दशक के कलकत्ता (अब कोलकाता) में ले जाती है. उस दौर में, युवा लड़के-लड़कियां—जिनमें से कई कॉलेज और यूनिवर्सिटी के छात्र थे—चारू मजूमदार के नेतृत्व में एक उग्र, माओ-प्रेरित विद्रोह में शामिल हो गए थे. इस विद्रोह का निशाना ज़मींदार (जिन्हें वे “वर्गीय शत्रु” कहते थे) और सरकारी अधिकारी थे. बंगाल में इस आंदोलन के शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी और सरकार के कड़े दमन के कारण यह आंदोलन थम गया था, लेकिन जल्द ही यह दूसरे राज्यों में भी फैल गया.
घोष ने दिप्रिंट को बताया कि ‘अदम्य’ फिल्म पलाश के सफर को दिखाती है—यह दिखाती है कि “एक नाकाम हमले के बाद छिपकर रह रहे एक उग्र विद्रोही के तौर पर वह खुद का आकलन कैसे करता है और किन नैतिक दुविधाओं का सामना करता है.”
“मेरी फिल्म साफ तौर पर यह पड़ताल करती है कि जायज़ विरोध (विद्रोह) और सरकार-विरोधी हिंसक कार्रवाई (चरमपंथ) के बीच की बारीक लकीर कहाँ है. मैं यह फैसला दर्शकों पर छोड़ना चाहूँगा कि वे पलाश को एक चरमपंथी मानते हैं या एक देशभक्त. यह फिल्म सुकांत भट्टाचार्य की क्रांतिकारी कविता ‘देशलाई काठी’ (माचिस की तीली) से प्रेरित है. इसलिए, यह फिल्म क्रांतिकारी भावना, कमज़ोर होते लोकतांत्रिक मूल्यों और कॉर्पोरेट हितों के खिलाफ संघर्ष पर केंद्रित है,” घोष ने कहा.
घोष ने माना कि यह फिल्म नक्सलवाद और वामपंथी चरमपंथ की विचारधारा से जुड़े विषयों पर बात करती है. यह उन बेबस हालात को दिखाती है जो इन विचारधाराओं को हवा देते हैं. लेकिन, उन्होंने यह भी कहा कि यह फिल्म हिंसा का सीधा-सादा महिमामंडन करने के बजाय, विद्रोही के मन की गहराइयों को समझने (मनोवैज्ञानिक पड़ताल करने) पर ज़्यादा ज़ोर देती है.
‘पूरी दुनिया के लिए एक रूपक’
‘अदम्य’ ऐसे समय में आया है जब ‘राजनीतिक रूप से हिंसक राज्य’ अगले विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुटा है, जो 23 और 29 अप्रैल को होने वाले हैं. जहां एक तरफ़ लड़ाई सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के बीच है—जिसकी अगुवाई पार्टी की कद्दावर सुप्रीमो और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कर रही हैं—और दूसरी तरफ़ विपक्षी बीजेपी है, जिसने 2021 के पिछले विधानसभा चुनावों में 77 सीटें जीती थीं. वहीं दूसरी तरफ़ वाम मोर्चा (Left Front), जिसने 34 सालों तक राज्य पर राज किया था, आज भी दयनीय स्थिति में है.
बंगाल की वामपंथी पार्टियों को 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों के साथ-साथ 2021 के विधानसभा चुनावों में भी एक भी सीट नहीं मिली थी. 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के राज्य सचिव और जाधवपुर लोकसभा सीट से CPI(M) के उम्मीदवार सृजन भट्टाचार्य ने ThePrint को बताया था कि वामपंथ को अब अपने ‘इको चैंबर्स’ (अपनी ही सोच के दायरे) से बाहर निकलने की सख्त ज़रूरत है.
भट्टाचार्य ने कहा, “सोशल मीडिया और सड़कों पर हममें से कुछ CPI(M) उम्मीदवारों को लोगों का ज़बरदस्त समर्थन मिला. लेकिन वह सब बस एक ‘बुलबुला’ (अस्थायी भ्रम) था.”
इस युवा कम्युनिस्ट नेता ने अफ़सोस जताते हुए कहा कि जहाँ एक तरफ़ वामपंथ ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ जैसे लोगों से जुड़े बुनियादी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है, वहीं दूसरी तरफ़ बनर्जी ने बंगाल के हर वोटर को उसकी धार्मिक और जातीय पहचान के प्रति बेहद जागरूक कर दिया है.

उन्होंने कहा, “यह सिर्फ़ हिंदू-मुस्लिम का मामला नहीं है. हिंदुओं के बीच भी, मतुआ समुदाय को लेकर यह पूरा विवाद उन्हीं के शासनकाल में खड़ा हुआ. वह समाज में ‘द्वंद्व’ (विभाजन) पैदा करने में कामयाब रही हैं, जिससे पहचान-आधारित ‘वोट बैंक’ तैयार होते हैं.” उन्होंने आगे कहा, “उन्हीं की वजह से BJP और RSS ने राज्य में अपनी गहरी पैठ बना ली है. अब हमें एक वैकल्पिक राजनीतिक विमर्श खड़ा करना होगा.”
शैक्षणिक और पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों पर लिखी नई किताब ‘बैटलग्राउंड बंगाल’ के लेखक सयंतन घोष के अनुसार, वाम-उदारवाद की जड़ें बंगाल की धरती में बहुत गहराई तक जमी हुई हैं.
सयंतन घोष ने दिप्रिंट को बताया, “फिर भी, इस स्थायी जन-चेतना और संस्थागत वामपंथ के खोखले अवशेषों के बीच एक चौंकाने वाला विरोधाभास मौजूद है. CPI(M) के तहत दशकों तक चले कठोर वर्चस्व ने इस आंदोलन को जड़ बना दिया है. पार्टी की ऐतिहासिक ‘35 साल की परछाई’ अब एक नींव के बजाय एक बाधा का काम कर रही है.”
लेखक ने कहा कि अपनी सोच को आधुनिक बनाने से इनकार और एक अड़ियल रूढ़िवादिता के कारण, राजनीतिक वामपंथ उस वैचारिक भंडार का लाभ उठाने में असमर्थ हो गया है जिसे बनाने में उसने खुद मदद की थी, “जिससे बंगाली राजनीति के केंद्र में एक खामोश, कसक भरा खालीपन रह गया है.”
हालांकि, निर्देशक के लिए ‘अदम्य’ पूरी दुनिया का एक रूपक है, न कि सिर्फ पश्चिम बंगाल या भारत का. उन्होंने कहा, “यह फिल्म सत्ता के गलियारों को आईना दिखाने की कोशिश करती है और दुनिया भर के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के प्रति गहरे मोहभंग को दर्शाती है. दुनिया भर में जो कुछ भी हो रहा है, उसे देखिए. हमारे पड़ोसियों को देखिए. हर जगह, मुख्य शब्द ‘शोषण’, ‘लालच’ और ‘दमन’ ही हैं.”
घोष इस स्थिति के लिए राजनीतिक वर्ग की बेतहाशा महत्वाकांक्षा को जिम्मेदार मानते हैं. उन्होंने कहा, “2024 में जब ट्रंप पर दो बार हमला हुआ, तो मुझे अपनी दूरदृष्टि का गहरा अहसास हुआ! जुलाई में हुए हमले में वे तो बच गए, लेकिन एक व्यक्ति मारा गया और दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए! ज़रा सोचिए, हमने उसी साल जनवरी और अप्रैल के बीच ‘अदम्य’ की शूटिंग की थी! तो हां, ‘अदम्य’ की कहानी दुनिया भर में किसी भी शासन व्यवस्था के लिए सार्वभौमिक रूप से सच है. सच कहूं तो, कहीं भी कोई भी अच्छा राजनीतिक विकल्प मौजूद नहीं है.”
(इस फीचर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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