Sunday, 3 July, 2022
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कैसे हेमंत सोरेन का खुद ही लीज हासिल करना BJP के लिए उन्हें अयोग्य ठहराने में मददगार बना

सोरेन के पास खनन और पर्यावरण दोनों विभागों का प्रभार है, जिसने पिछले साल उनकी कंपनी को खनन पट्टे को 'मंजूरी' दी थी. भाजपा जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत उन्हें अयोग्य ठहराने की मांग कर रही है.

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नई दिल्ली: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ‘खनन पट्टे’ विवाद में बुरी तरह घिरते जा रहे हैं. विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी विधानसभा से उनकी अयोग्यता के लिए लगातार दबाव बना रही है. फिलहाल झारखंड में सियासी हंगामा मचा है. सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) वाली मौजूदा गठबंधन सरकार का भविष्य अस्थिर लगने लगा है.

बुधवार को झारखंड कांग्रेस के प्रभारी अविनाश पांडे ने राज्य में ‘राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनाने की कोशिश’ के लिए भाजपा को दोषी ठहराया और आत्मविश्वास से भरे लहजे में विपक्षी दल पर प्रहार करने की कोशिश की. गठबंधन पर सवालों के जवाब में पांडे ने कहा, ‘हमारे पास पर्याप्त संख्या है और सरकार निश्चित रूप से अपना कार्यकाल पूरा करेगी. सभी गठबंधन सहयोगी एक साथ हैं.’

पांडे की टिप्पणी 2 मई को भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के नोटिस के दो दिन बाद आई है, जिसमें सोरेन से कथित तौर पर खुद को दिए गए खनन पट्टे पर अपना रुख स्पष्ट करने के लिए कहा गया है. चुनाव आयोग ने झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन को नोटिस भेजकर यह बताने के लिए कहा कि उनके पक्ष में खदान का पट्टा जारी करने के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए, जो लोक जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 9ए का उल्लंघन करती है. आयोग ने इससे पहले 8 अप्रैल को मुख्य सचिव सुखदेव सिंह से पट्टे से संबद्ध प्रासंगिक और ‘प्रमाणित’ दस्तावेज मांगे थे, जिन्हें चुनाव आयोग को भेजा जा चुका है.

सरकार के एक सूत्र के अनुसार, सोरेन को 2 मई के नोटिस का जवाब देना अभी बाकी है.

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 9ए में कहा गया है कि एक व्यक्ति को अयोग्य घोषित किया जाएगा (संसद या राज्य विधानमंडल की सदस्यता से) ‘यदि, और इतने लंबे समय के लिए, उसके द्वारा सरकार के साथ अपने व्यापार या व्यवसाय के दौरान, माल की आपूर्ति के लिए या उस सरकार द्वारा किए गए किसी भी कार्य के निष्पादन के लिए एक अनुबंध किया गया है.’

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दिप्रिंट ने वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और संविधान के एक विशेषज्ञ से बात की थी. उनके अनुसार, सोरेन के मामले में उन्होंने कथित तौर पर खुद को एक खनन पट्टा आवंटित किया था, जिसे अगर लागू किया जाता तो इसका इस्तेमाल क्षेत्र में एक पत्थर की खदान स्थापित करने के लिए किया गया होता.

झारखंड के मुख्यमंत्री के लिए मुसीबत फरवरी में शुरू हुई, जब पूर्व सीएम और भाजपा के वरिष्ठ नेता रघुबर दास ने सोरेन पर आरोप लगाया कि उन्होंने पिछले साल मई में रांची के अंगारा ब्लॉक में 0.88 एकड़ में फैली एक पत्थर की खदान के लिए खनन पट्टा आवंटित किया और जून 2021 में ग्राम सभा द्वारा इसे मंजूरी मिल गई. सोरेन की कंपनी को सितंबर में परियोजना के लिए पर्यावरण मंजूरी भी मिल गई थी.

वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के साथ- साथ खान एवं भूतत्व विभाग भी सोरेन के पास ही है.

दास के आरोपों के एक दिन बाद 11 फरवरी को सोरेन ने लीज सरेंडर कर दी. हालांकि, अप्रैल में दास ने झारखंड के सीएम के खिलाफ नए आरोप लगाए और दावा किया कि सोरेन ने रांची के औद्योगिक क्लस्टर में अपनी पत्नी को 11 एकड़ जमीन आवंटित की थी. सोरेन के पास राज्य के उद्योग विभाग का प्रभार भी है.

फरवरी में झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस को सौंपी गई एक याचिका में भाजपा ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 9 ए के प्रावधानों के आधार पर उनकी अयोग्यता की मांग की. जब विधानसभा से सीएम को अयोग्य घोषित करने की मांग जोर पकड़ने लगी तो राज्यपाल ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग की कानूनी राय मांगी.

दिप्रिंट ने इस विवाद के राजनीतिक नतीजों पर नजर डाली है.

‘चुनाव आयोग और राज्यपाल के पास कार्रवाई करने का कानूनी अधिकार’

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 9ए के प्रावधानों पर चर्चा करते हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत सिन्हा ने दिप्रिंट को बताया, ‘मुझे इस मसले के तथ्यों की जानकारी नहीं है. सार्वजनिक तौर पर जितना सुना है बस उतना ही जानता हूं. अपनी इस जानकारी के आधार पर मैं कह सकता हूं कि अगर आरोप साबित हो जाते हैं तो चुनाव आयोग और राज्यपाल के पास कार्रवाई करने का कानूनी अधिकार है. ऐसे मामलों में अंतिम फैसले का अधिकार चुनाव आयोग के पास ही है.’

राज्य सरकार के एक दूसरे वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि ‘भले ही अयोग्यता के लिए पांच में से चार प्रावधान (संविधान के) मामले में लागू नहीं होते हैं, फिर भी चुनाव आयोग द्वारा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 9ए पर विचार किया जा सकता है. लेकिन मामला अब सत्तारूढ़ दल और चुनाव आयोग के बीच है.’

उधर झारखंड हाईकोर्ट इस मामले में एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है और मुख्यमंत्री को नोटिस जारी किया है. महीने की शुरुआत में एक सुनवाई के दौरान, महाधिवक्ता राजीव रंजन ने अदालत को बताया कि राज्य ने एक ‘गलती’ की और लीज को ‘सरेंडर’ कर दिया. मामला फिलहाल विचाराधीन है.


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राजनीतिक-कानूनी संकट

राज्य के एक तीसरे वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि सोरेन के खिलाफ अभी तक कोई एफआईआर या आधिकारिक शिकायत दर्ज नहीं की गई है. लेकिन सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा ने पहले ही मुख्यमंत्री को बचाने के लिए कानूनी विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है.

झामुमो की महासचिव सुप्रिया भट्टाचार्य ने दिप्रिंट को बताया, ‘भाजपा द्वारा लगाए गए आरोप अदालत में टिक नहीं पाएंगे. वे मुख्यमंत्री पर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 9ए का उल्लंघन करने का आरोप लगा रहे हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी कंपनी को खदान आवंटित करने का आदेश जारी किया था. लेकिन यह एक प्रशासनिक गलती थी और जब इसे मुख्यमंत्री के ध्यान में लाया गया तो उन्होंने इसे ठीक कर दिया.’

उन्होंने आगे कहा, ‘यहां तक कि उन्होंने खदान का पट्टा भी सरेंडर कर दिया. तो ऐसे में मामला कहां बनता है? हमने दो दिन पहले राज्यपाल को एक पत्र लिखा है. हम चाहते हैं कि वह हमारे पत्र को चुनाव आयोग के पास भेज दें, जैसा कि उन्होंने भाजपा के मामले में किया था.’

पार्टी अब चुनाव आयोग के आदेश का इंतजार कर रही है. भट्टाचार्य ने कहा, ‘हम अपना मामला आयोग के सामने पेश करना चाहते हैं. हम कानूनी विकल्प तलाश रहे हैं. लेकिन जब तक हम चुनाव आयोग के फैसले को नहीं देखेंगे तब तक अंतिम फैसला नहीं लेंगे. यह मामला और कुछ नहीं बल्कि विपक्षी नेताओं द्वारा बदनाम करने की कोशिश है.’

राज्य सरकार के साथ काम कर रहे संविधान के एक विशेषज्ञ ने पहचान जाहिर न करते हुए कहा, संविधान के अनुच्छेद 191 में पांच प्रावधानों का उल्लेख है जिसके तहत राज्य विधान सभा के एक सदस्य को अयोग्य घोषित किया जा सकता है.

विशेषज्ञ ने समझाया, ‘ संविधान के अनुच्छेद 191 के तहत राज्य विधान सभा के सदस्य को पांच प्रावधानों के तहत अयोग्य घोषित किया जा सकता है: लाभ के किसी भी पद को धारण करना, दिमागी स्थिति का ठीक न होना, दिवालिया होना, भारत की नागरिकता छोड़ना या किसी दूसरे देश की नागरिकता के लिए आवेदन करना, या संसदीय विधानों का उल्लंघन किया जाना. इस विशेष मामले में अयोग्यता की एकमात्र संभावना खुद को खदान पट्टा आवंटन करने को लेकर है, जो कि एक सरकारी संपत्ति है.’

उन्होंने कहा, ‘यह सरकारी कार्यालय से लाभ प्राप्त करने के समान है. राज्यपाल के पास राज्य विधानसभा के किसी भी निर्वाचित प्रतिनिधि के खिलाफ लाभ के पद का आरोप लगाने वाली किसी भी शिकायत पर कानूनी राय लेने के लिए, उसे चुनाव आयोग के पास भेजने का अधिकार है. चुनाव आयोग का फैसला अंतिम होगा और राज्यपाल उसे स्वीकार करने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य है.’

झामुमो के एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया कि खनन पट्टे के लिए भूमि एक नया आवंटन नहीं था, बल्कि एक ‘नवीकरण’ था. 2019 के चुनावी हलफनामे में इसके बारे में चुनाव आयोग को सूचना दी गई थी.

यह हलफनामा चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध है और इसकी एक प्रति दिप्रिंट के पास है. इसके अनुसार, सोरेन के पास कृषि और गैर-कृषि भूमि और 6.03 करोड़ रुपये की कमर्शियल और आवासीय इमारतों सहित अचल संपत्ति है. गैर-कृषि भूमि में ‘अंगारा रांची में लीज होल्ड प्लॉट’ शामिल है और खरीद की तारीख मार्च 2008 के रूप में उल्लेखित है.

‘पुनः आवंटन’ के दावे को खारिज करते हुए भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने आरोप लगाया कि विचाराधीन 0.88 एकड़ जमीन एक नया पट्टा था और चुनाव आयोग इसकी जांच कर रहा है.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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