नई दिल्ली: उत्तर गोवा में रहने वाली एक महिला के “डिजिटल अरेस्ट” की जांच में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को एक बहुत बड़े मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क का पता चला है. महिला को कथित तौर पर 10 दिनों में 2.6 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने के लिए ठगा गया था. जांच में 27,850 करोड़ रुपये से ज्यादा के बैंक लेन-देन और करीब 2,904 करोड़ रुपये की नकद जमा का पता चला है.
जो जांच 2.6 करोड़ रुपये की साइबर ठगी से शुरू हुई थी, उसने पैसों के लेन-देन का एक जटिल जाल सामने ला दिया है. ईडी को पता चला कि ठगी के कुछ ही घंटों के अंदर पीड़िता का पैसा बंद और नए खोले गए बैंक खातों के जरिए भेजा गया. इसे 400 से ज्यादा लाभार्थी खातों में बांटा गया और कथित तौर पर एक संगठित व्यवस्था में डाला गया. इस व्यवस्था का इस्तेमाल साइबर ठगी से मिले पैसे को पहले बैंक खातों से नकद में और बाद में विदेशी मुद्रा में बदलने के लिए किया जाता था.
ईडी ने यह भी आरोप लगाया है कि इस नेटवर्क में आपस में जुड़े कमोडिटी, ट्रेडिंग, ट्रैवल और फॉरेक्स से जुड़े संस्थान शामिल थे. इनमें भारतीय रिजर्व बैंक से Full Fledged Money Changers (FFMCs) का लाइसेंस लेने वाली कंपनियां भी शामिल हैं.
जांचकर्ताओं ने 27,850 करोड़ रुपये से ज्यादा के बैंक लेन-देन और करीब 2,904 करोड़ रुपये की नकद जमा का पता लगाया है. ईडी के एक अधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि इसमें कई जगहों पर 61,448 Bulk Note Acceptance Machine (कैश जमा मशीन) से किए गए लेन-देन के जरिए जमा किए गए 584.70 करोड़ रुपये भी शामिल हैं.
एजेंसी ने इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया है. इनकी पहचान फहीम मोइन हुसैन सैयद और नईम मुईन सैयद के रूप में हुई है.
ईडी की जांच के मुताबिक, 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज 330 पुलिस शिकायतों और 163 एफआईआर को कथित ठगी से जोड़ा गया है. इसमें कुल 417.49 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. ईडी के एक अधिकारी ने कहा, “इनमें से 101 शिकायतों में एक ही ठगी के दौरान एक पीड़ित का पैसा इसी नेटवर्क की दो या उससे ज्यादा कंपनियों में भेजा गया.”
17 जुलाई को मुंबई और गोवा में 20 जगहों पर कानून की धारा 17 के तहत तलाशी ली गई और 21 अगस्त को कुछ और जगहों पर तलाशी ली गई. इसके अलावा 3.25 करोड़ रुपये की नकदी जब्त की गई है. डिजिटल डिवाइस, रिकॉर्ड और कानूनी रजिस्टर भी जब्त किए गए हैं, जिनकी जांच की जा रही है.
ईडी के सूत्रों के मुताबिक, जांच में आगे पता चला कि जिन कंपनियों के जरिए ठगी का पैसा भेजा गया, वे बहुत कम पैसे वाले लोगों के नाम पर बनाई गई थीं. इनमें ड्राइवर और एक कमरे में रहने वाले किरायेदार भी शामिल थे. इन्हें कंपनी का डायरेक्टर दिखाया गया, जबकि कंपनी के खाते और उसके कामकाज का नियंत्रण दूसरे लोगों के पास था.
ईडी के एक अधिकारी ने समझाया, “यह मनी लॉन्ड्रिंग का एक सामान्य तरीका है. पैसा उन शेल कंपनियों के जरिए भेजा जा रहा था, जो ड्राइवरों और कर्मचारियों जैसे लोगों के नाम पर खोली गई थीं. उन्हें मालिक और डायरेक्टर दिखाया गया था. उन्हें मालिक दिखाने के लिए कागजों पर बहुत बड़ा रिकॉर्ड तैयार किया गया था.”
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