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Saturday, 29 November, 2025
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जर्मन बेकरी से मुंबई ट्रेन ब्लास्ट तक: कोर्ट की सुनवाई धीमी, आतंकी ट्रायल आज भी पन्नों में फंसे

1996 लाजपत नगर ब्लास्ट से लेकर 2011 दिल्ली हाई कोर्ट ब्लास्ट तक, कई आतंकी मामले अदालतों की लंबी और उलझी प्रक्रिया में अटके पड़े हैं.

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नई दिल्ली: 10 नवंबर को दिल्ली के घनी आबादी वाले इलाके में ऐतिहासिक लाल किले के पास एक कार में धमाका हुआ, जिसने पूरे देश को हिला दिया. इस धमाके ने 2000 के दशक की उन घटनाओं की यादें ताज़ा कर दीं, जब पब्लिक जगहों पर हुए कई आतंकी हमलों ने लोगों को अपने ही इलाकों में असुरक्षित महसूस कराया था.

उसी रात, दिल्ली पुलिस ने एफआईआर में गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम यानी यूएपीए की धारा 16 और 18 (जो आतंकी गतिविधियों और साजिशों से जुड़ी हैं) लगा दीं. एफआईआर में विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3 और 4 भी शामिल की गईं, जो जानमाल के नुकसान वाले धमाकों पर लगती हैं. दिल्ली स्थित एक विशेष एनआईए अदालत ने पिछले हफ्ते एजेंसी को चार आरोपियों की 10 दिन की हिरासत दी.

यह मामला अभी कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत में है, लेकिन देश में विविध अदालतों में लंबित कई और आतंकी मामलों की कहानी भी इससे मिलती-जुलती है. इनमें सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट द्वारा ट्रायल कोर्ट्स को देरी और बरी करने पर फटकार शामिल है—अक्सर जांच की खामियों के कारण. इससे पीड़ित परिवार सालों तक उस ‘अंतिम फैसले’ का इंतज़ार करते रह जाते हैं, जो कभी नहीं आता.

अदालतें बार-बार आतंकी मामलों में बेहतर जांच और तेज़ ट्रायल की मांग कर चुकी हैं. 1996 लाजपत नगर ब्लास्ट केस में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल में देरी के पीछे की वजहों की ओर भी इशारा किया था. 2023 के अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न तो जांच एजेंसियों ने और न ही न्यायिक अधिकारियों ने पर्याप्त सतर्कता दिखाई. अदालत ने यहां तक कहा कि “हमारी भारी निराशा है कि यह शायद प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता के कारण हुआ होगा, क्योंकि कई आरोपियों में से केवल कुछ को ही ट्रायल का सामना करना पड़ा.”

दिप्रिंट देश के बड़े आतंकी मामलों की अदालतों के भीतर की यात्रा की पड़ताल की.

2011 दिल्ली हाई कोर्ट ब्लास्ट

क्या हुआ था. 7 सितंबर 2011 को सुबह 10.14 बजे, जब वकील और पक्षकार अदालत पहुंचने लगे थे, तभी दिल्ली हाई कोर्ट परिसर में धमाका हुआ. ब्रीफकेस में रखे बम ने 15 लोगों की जान ले ली और 79 लोग घायल हुए.

आरोपी. एक ईमेल (जो हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी यानी हुजी से जोड़ा गया) के मुताबिक यह हमला अफजल गुरु की फांसी की सज़ा माफ कराने की मांग के लिए किया गया था. एनआईए ने छह लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, जिनमें से एक नाबालिग था. आरोपियों में मेडिकल स्टूडेंट वसीम अक़रम मलिक, अमीर अब्बास देव, अमीर कमाल, जुनैद अक़रम मलिक और शाकिर हुसैन शेख/छोटा हाफ़िज़ शामिल थे.

देव सरकारी गवाह बन गया, जबकि अदालत को बताया गया कि शेख 2012 में सेना के साथ मुठभेड़ में मारा गया. नाबालिग को तीन साल की सज़ा दी गई. बाकी आरोपी फरार हैं.

क्या स्थिति है. मुख्य ट्रायल अभी भी वसीम अक़रम मलिक के खिलाफ चल रहा है. यूएपीए, विस्फोटक अधिनियम और आईपीसी की धाराओं में उसका ट्रायल अभी भी सबूतों की पेशी के चरण में है, जबकि यह मामला निचली अदालत में 311 से ज़्यादा बार सूचीबद्ध हो चुका है.

एनआईए ने चार्जशीट और अतिरिक्त दस्तावेजों में 277 गवाहों का जिक्र किया था, जिनमें से कम से कम दो की मृत्यु हो चुकी है.

इस समय मलिक तेज़ ट्रायल की मांग कर रहा है. उसने मार्च 2023 में जमानत याचिका खारिज होने के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील भी की. हाई कोर्ट अब उसके ट्रायल की प्रगति की निगरानी कर रहा है.

जुलाई में विशेष लोक अभियोजक ने बताया कि देरी का कारण यह है कि ज़्यादातर गवाह जम्मू-कश्मीर से हैं और उन्हें दिल्ली लाना मुश्किल होता है. इनमें सरकारी अधिकारी भी शामिल हैं, जो अपनी ड्यूटी के कारण नहीं आ पाते.

सितंबर में हाई कोर्ट को बताया गया कि 25 सितंबर से 22 नवंबर के बीच हर कार्यदिवस पर केस सुना जाएगा.

2010 पुणे जर्मन बेकरी ब्लास्ट

क्या हुआ था. 2010 में वेलेंटाइन डे से एक दिन पहले पुणे की मशहूर जर्मन बेकरी में बम धमाका हुआ. 17 लोगों की मौत हुई और 56 घायल हुए.

आरोपी. एनआईए ने मिर्ज़ा हिमायत इनायत बैग को 2010 में गिरफ्तार किया और छह और आरोपियों को ‘फरार’ दिखाया. 2014 में यासीन भटकल पकड़ा गया. वह इंडियन मुजाहिदीन का सदस्य बताया जाता है.

क्या स्थिति है. यासीन भटकल के खिलाफ ट्रायल पुणे की निचली अदालत में लंबित है. अप्रैल 2019 में उसके खिलाफ आरोप तय हुए—गिरफ्तारी के पांच साल बाद. वजह यह बताई गई कि वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में था. लगभग 100 सुनवाईयों में उसे अदालत में पेश नहीं किया गया. कारणों में सुरक्षा, दिल्ली-पुणे यात्रा पर लगने वाला सरकारी खर्च, ट्रेन टिकट न मिल पाना और वीडियो कांफ्रेंस की तकनीकी दिक्कतें शामिल थीं.

बैग के खिलाफ ट्रायल दिसंबर 2010 में शुरू हुआ और दो साल चार महीने चला. अप्रैल 2013 के 278 पन्नों के फैसले में अदालत ने उसे पांच बार मृत्युदंड और कई उम्रकैद की सज़ा दी. लेकिन 2016 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसे केवल आरडीएक्स रखने और फर्जी दस्तावेज बनाने का दोषी माना. ब्लास्ट से उसका सीधा संबंध साबित न होने पर उसे सिर्फ विस्फोटक अधिनियम में उम्रकैद दी गई. अब राज्य सरकार और बैग की क्रॉस-अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

2006 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट

क्या हुआ था. 7 जुलाई 2006 को मुंबई की पश्चिमी उपनगरीय लोकल ट्रेनों के फर्स्ट-क्लास डिब्बों में 11 मिनट के भीतर सात धमाके हुए. 187 लोग मारे गए, 829 घायल हुए.

आरोपी. तेरह लोगों पर इंडियन पीनल कोड (IPC) के मर्डर और क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी से जुड़े प्रोविज़न, महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ़ ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम एक्ट (MCOCA), और UAPA के तहत चार्ज लगाए गए.

क्या स्थिति है. 2015 में विशेष अदालत ने कमाल अहमद मोहम्मद वकील अंसारी, फैसल अताउर रहमान शेख, एहतेशाम सिद्दीकी, नवीन हुसैन खान और आसिफ खान को मौत की सज़ा दी. सात अन्य को उम्रकैद दी गई. अब्दुल वहीद को बरी कर दिया गया.

जुलाई इस साल बॉम्बे हाई कोर्ट ने सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया. अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान विश्वसनीय नहीं हैं और अभियोजन ‘पूरी तरह विफल’ रहा. उसी महीने सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले के कुछ हिस्सों पर रोक लगा दी, लेकिन स्पष्ट किया कि आरोपियों को जेल वापस नहीं जाना होगा. इसका मकसद यह था कि मकोका की व्याख्या पर हाई कोर्ट का फैसला अन्य मामलों में कानूनी मिसाल न बने.

2008 दिल्ली सीरियल ब्लास्ट

क्या हुआ था: 13 सितंबर 2008 को दिल्ली में पांच धमाके हुए. ये धमाके कनॉट प्लेस, करोल बाग, ग्रेटर कैलाश और इंडिया गेट पर हुए. इन धमाकों में 39 लोगों की मौत हुई और 159 लोग घायल हुए.

धमाकों के कुछ ही मिनटों बाद इंडियन मुजाहिदीन (IM) नाम के आतंकी संगठन ने मीडिया को ईमेल भेजकर इसकी जिम्मेदारी ली. पुलिस ने पांच FIR दर्ज कीं और आरोपियों को पकड़ने के लिए इंस्पेक्टर एम.सी. शर्मा की निगरानी में एक टीम बनाई गई.

आरोपी: धमाकों के छह दिन बाद, 19 सितंबर 2008 को दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की टीम जामिया नगर के बटला हाउस में L-18 पर पहुंची. वहां मुठभेड़ हुई, जिसमें दो संदिग्ध IM सदस्य अतीफ अमीन और मोहम्मद साजिद मारे गए. बाकी में मोहम्मद सैफ ने सरेंडर किया, जबकि शहजाद अहमद और अरिज़ खान भाग निकले. इस मुठभेड़ में इंस्पेक्टर शर्मा की भी मौत हुई और दो अन्य अधिकारी घायल हुए.

शहजाद को जनवरी 2010 में गिरफ्तार किया गया और जुलाई 2013 में उसे पुलिस अधिकारियों पर फायरिंग और शर्मा की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया. उसे उम्रकैद मिली, लेकिन 2023 में तेज़ पैनक्रिएटाइटिस के कारण उसकी मौत हो गई.

दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने 2018 में अरिज़ खान को उत्तराखंड के बनबसा से गिरफ्तार किया. पुलिस के अनुसार, उसने नेपाल की नागरिकता और पासपोर्ट ‘मोहम्मद सलीम’ नाम से बनवा लिया था. बटला हाउस केस में उसे 2021 में फांसी की सजा मिली, लेकिन 2023 में दिल्ली हाई कोर्ट ने इसे उम्रकैद में बदल दिया. कोर्ट ने कहा कि यह मामला ‘रेयर ऑफ द रेयरेस्ट’ नहीं है.

दिल्ली ब्लास्ट केस में मोहम्मद हकीम, मुबीन कादर शेख, मंसूर असगर पीरभॉय, असदुल्लाह अख्तर, यासीन भटकल, अरिज़ खान, मोहम्मद सादिक, मोहम्मद ज़ीशान अहमद, साक़िब निसार, जिया-उर-रहमान, आसिफ बशीरुद्दीन शेख, मोहम्मद सैफ, मोहम्मद शकील, कय्यूमुद्दीन कपाडिया और अकबर इस्माइल चौधरी के ट्रायल पटियाला हाउस कोर्ट में जारी हैं.

क्या है स्थिति: दिल्ली ब्लास्ट केस में अभियोजन पक्ष के सबूतों की सुनवाई दस साल से ज्यादा खिंच चुकी है. 2023 में आरोपी मुबीन कादर शेख की ज़मानत याचिका खारिज करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि 497 गवाहों में से 198 को हटा दिया गया, 282 की गवाही हो चुकी है और 17 बाकी हैं. कोर्ट ने विशेष अदालत को हफ्ते में कम से कम दो बार सुनवाई करने का निर्देश दिया, क्योंकि कई आरोपी 2008 से जेल में हैं.

कोर्ट के दस्तावेजों के अनुसार, दिल्ली ब्लास्ट के मुख्य साजिशकर्ता—रियाज भटकल और इक़बाल भटकल—अब भी फरार हैं. दोनों के पाकिस्तान में छिपे होने की खबर है. उनके साथ डॉ. शाहनवाज़ और अमीर रज़ा खान भी बताए जाते हैं.

2008 जयपुर ब्लास्ट

क्या हुआ था: मई 2008 में जयपुर शहर के भीड़भाड़ वाले बाजारों में कई धमाके हुए. इसमें 71 लोगों की मौत हुई और 185 लोग घायल हुए. धमाके मनक चौक खंडा, चांदपोल गेट, बड़ी चौपड़, छोटी चौपड़, त्रिपोलिया गेट, जोहरी बाजार और सांगानेरी गेट पर हुए.

हर जगह बम नए साइकिलों पर लगाए गए थे, जिन्हें मंदिरों और थानों के पास भीड़ वाले इलाकों में रखा गया था. कुल आठ FIR दर्ज की गईं. अगले दिन मीडिया को IM के नाम से ईमेल मिले, जिनमें धमाकों की जिम्मेदारी ली गई थी.

आरोपी: जांच एजेंसियों ने कोर्ट में कहा कि बाटला हाउस मुठभेड़ जयपुर ब्लास्ट केस में बड़ी उपलब्धि थी. उनका कहना था कि मोहम्मद सैफ ने, जिसने दिल्ली मुठभेड़ में सरेंडर किया था, अपने बयान में जयपुर मामले में अपनी भूमिका कबूली और नौ अन्य लोगों के नाम भी बताए. कहा गया कि उन्होंने अलग-अलग जगहों पर बम लगाने में सीधा रोल निभाया था.

कम से कम पांच आरोपियों—मोहम्मद सैफ, सैफुर्रहमान अंसारी, मोहम्मद सलमान, सरवर आज़मी और शहबाज़ हुसैन—के खिलाफ ट्रायल चला.

क्या है स्थिति: दिसंबर 2019 में जयपुर की विशेष अदालत ने मोहम्मद सैफ, सैफुर्रहमान अंसारी, मोहम्मद सलमान और सरवर आज़मी को मौत की सजा सुनाई, जबकि शहबाज़ हुसैन को बरी कर दिया.

लेकिन 2023 में राजस्थान हाई कोर्ट ने चारों की सजाएं और सजा को पूरी तरह रद्द कर दिया और पांचवें आरोपी की बरी होने की पुष्टि की. ये राहत आठ FIRs में मिली. नौवीं FIR में—जिसमें चांदपोल बाजार के रामचंद्र मंदिर के पास एक जिंदा बम मिला था—सैफ, अंसारी, सलमान और आज़मी को इस साल अप्रैल में दोषी ठहराया गया और उम्रकैद दी गई.

आठ मामलों में बरी करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि जांच “खराब, लापरवाह और त्रुटियों से भरी” थी. हाई कोर्ट ने राजस्थान पुलिस के डीजी को जांच टीम के गलतियों के लिए कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया. अब सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकार और पीड़ित परिवारों की अपील सुन रहा है.

1996 लाजपत नगर ब्लास्ट

क्या हुआ: 21 मई 1996 को दिल्ली के व्यस्त लाजपत नगर बाजार में एक बड़ा धमाका हुआ. इसमें 13 लोगों की मौत हुई और 39 लोग घायल हुए.

आरोपी: दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने 17 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की. इनमें से केवल 10 का ट्रायल चला, जबकि सात को “फरार” घोषित कर दिया गया. अभियोजन के अनुसार, जम्मू और कश्मीर इस्लामिक फ्रंट (JKIF) के आतंकियों ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी.

क्या है स्थिति: कुल 10 लोगों पर ट्रायल चला. 2010 में कोर्ट ने चार को बरी कर दिया और दो को आंशिक रूप से दोषी ठहराते हुए उनकी सजा उनके पहले से जेल में बिताए समय के बराबर कर दी. राज्य ने इस फैसले के खिलाफ अपील नहीं की.

ट्रायल कोर्ट ने मोहम्मद नौशाद, मिर्ज़ा निसार हुसैन, मोहम्मद अली भट और जावेद अहमद को दोषी ठहराया. पहले तीन को फांसी और जावेद को उम्रकैद मिली. लेकिन 2012 में दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस की जांच में “गंभीर चूक” बताते हुए मिर्ज़ा निसार हुसैन और मोहम्मद अली भट को बरी कर दिया और नौशाद की फांसी को उम्रकैद में बदल दिया.

जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर हुसैन और भट की बरी को उलट दिया और उन्हें भी बिना रिहाई के अधिकार के उम्रकैद की सजा दे दी. इसका मतलब है कि वे 14 साल बाद भी समय से पहले रिहाई की मांग नहीं कर सकते. 1996 के धमाके के बाद यह फैसला आने में 27 साल लगे.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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