नयी दिल्ली, 16 जनवरी (भाषा) पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने वर्तमान और पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्तों (सीईसी) तथा निर्वाचन आयुक्तों (ईसी) को अदालती मामलों से प्रदान की गई कानूनी सुरक्षा पर सवाल उठाते हुए शुक्रवार को कहा कि यदि सही निर्णय लिया गया है, तो उसे न्यायपालिका की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।
लवासा ने निर्वाचन आयोग के वर्तमान और पूर्व सदस्यों को प्रदान की गई ‘‘दंड से छूट’’ के बारे में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि यह एक ‘‘असाधारण सुरक्षा’’ है।
उन्होंने निर्वाचन आयोग की जवाबेदही से संबंधित एक परिचर्चा से इतर कहा, ‘‘मुझे नहीं पता कि अन्य सार्वजनिक संस्थानों या लोक सेवकों को इसी तरह की सुरक्षा उपलब्ध है या नहीं। लोकतंत्र में, मेरे विचार से जवाबदेही सर्वोपरि है। इसलिए, मेरे विचार से इस तरह की कानूनी सुरक्षा नहीं होनी चाहिए।’’
पूर्व निर्वाचन आयुक्त ने कहा कि यदि कोई सही निर्णय लिया गया है, ‘‘तो उस सही निर्णय को कानून की अदालत के समक्ष बचाव की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा’’।
शीर्ष अदालत ने इस सप्ताह उस याचिका पर विचार करने पर सहमति जताई, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को उनकी नियुक्ति संबंधी अधिनियम के तहत दिए गए संरक्षण को चुनौती दी गई है।
याचिका में कहा गया है कि संबंधित धारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को ‘‘अभूतपूर्व, बेलगाम शक्ति’’ प्रदान करती है, जिसके तहत उन्हें पद के कथित दुरुपयोग के मामलों में भी दीवानी और आपराधिक दोनों प्रकार की कार्यवाही से स्थायी, पूर्ण छूट प्राप्त होती है।
कानून की धारा 16 के अनुसार, कोई भी अदालत वैसे किसी व्यक्ति के खिलाफ दीवानी या आपराधिक मामले में सुनवाई नहीं करेगी या उसे जारी नहीं रखेगी, यदि वह व्यक्ति वर्तमान या पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयुक्त है और वह अपने आधिकारिक कर्तव्य का निर्वहन करते समय या उसे निभाने का प्रयास करते वक्त कोई कार्य करता है, या कुछ बोलता है।
भाषा सुरेश दिलीप
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