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Friday, 23 October, 2026
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गरीबी घटाने में यूपी सबसे आगे, लेकिन प्रति व्यक्ति आय में दूसरे नंबर पर सबसे नीचे

उत्तर प्रदेश बड़े स्तर पर सरकारी मदद से लोगों की ज़िंदगी बेहतर करने की क्षमता दिखाता है. हालांकि, इसकी उपलब्धियों को इसकी सीमाओं के साथ देखकर समझना जरूरी है.

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नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश भारतीय अर्थव्यवस्था में एक बड़ा विरोधाभास दिखाता है. नीति आयोग के अनुमानों के मुताबिक, 2013-14 से 2022-23 के बीच राज्य में 5.94 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए. यह संख्या सभी राज्यों में सबसे ज्यादा है और ज्यादातर देशों की आबादी से भी ज्यादा है. फिर भी राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत की करीब आधी है और सभी राज्यों में दूसरे नंबर पर सबसे कम है.

इससे पता चलता है कि उत्तर प्रदेश ने लोगों की ज़िंदगी को बेहतर करने में काफी प्रगति की है, लेकिन आय के मामले में दूसरे राज्यों के बराबर पहुंचना अभी पूरा नहीं हुआ है. इस बदलाव के पीछे के तरीकों को समझना और यह समझना ज़रूरी है कि व्यापक आर्थिक विकास के बिना इन उपलब्धियों को लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल क्यों है. यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करना है और देश का हर छह में से एक व्यक्ति उत्तर प्रदेश में रहता है.

राज्य की मदद से बेहतर हुई ज़िंदगी

इस विरोधाभास का पहला हिस्सा इस बात से जुड़ा है कि गरीबी को कैसे मापा जाता है. नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने कहा था कि गरीबी को सिर्फ कम आय के रूप में नहीं, बल्कि लोगों की जरूरी क्षमताओं और सुविधाओं की कमी के रूप में समझना चाहिए. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में सबीना अलकायर और जेम्स फोस्टर ने इसी सोच के आधार पर बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) तैयार किया.

इन्फोग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट

इस तरीके से देखें तो उत्तर प्रदेश ने काफी प्रगति की है. राज्य में गरीबी की दर 2005-06 में 69.5 प्रतिशत से घटकर 2019-21 में 22.9 प्रतिशत रह गई. वहीं, राष्ट्रीय औसत से राज्य का अंतर 14.2 प्रतिशत अंक से घटकर 8.0 प्रतिशत अंक रह गया.

नीति आयोग के मुताबिक, भारत में गरीबी कम होने का बड़ा कारण पोषण, शिक्षा, साफ-सफाई और खाना पकाने के ईंधन की सुविधाओं में सुधार रहा है. इसमें स्वच्छ भारत, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना और पोषण अभियान जैसी योजनाओं का भी योगदान रहा. यह उस सोच को दिखाता है जिसे अमर्त्य सेन और जीन द्रेज ने अपनी 1989 की किताब ‘हंगर एंड पब्लिक एक्शन’ में बताया था. उन्होंने इसे “मदद से मिलने वाली सुरक्षा” कहा था.

उन्होंने “विकास के जरिए मिलने वाली सुरक्षा” और “मदद से मिलने वाली सुरक्षा” के बीच अंतर बताया था. विकास के जरिए मिलने वाली सुरक्षा में लोगों की बढ़ती आय से परिवार अपनी जीवन स्थितियों को बेहतर बनाते हैं. वहीं मदद से मिलने वाली सुरक्षा में सरकार ज़रूरी चीज़ें उपलब्ध कराती है, जिससे आय बढ़ने से पहले ही लोगों की जिंदगी बेहतर हो सकती है. श्रीलंका, कोस्टा रिका और केरल में ऐसा देखा गया है.

उत्तर प्रदेश का अनुभव बड़े स्तर पर यह दिखाता है कि सरकारी मदद से लोगों की जिंदगी बेहतर हो सकती है. हालांकि, इसकी उपलब्धियों को इसकी सीमाओं के साथ देखना भी जरूरी है.

अगर गरीबी की दर को सीधे आंकड़े के बजाय राष्ट्रीय दर के मुकाबले अनुपात के रूप में देखें, तो उत्तर प्रदेश में यह 2005-06 में राष्ट्रीय दर से करीब 1.3 गुना थी और 2019-21 में बढ़कर करीब 1.5 गुना हो गई. इसका मतलब है कि बाकी भारत में गरीबी अपेक्षाकृत ज्यादा तेज़ी से कम हुई. इसके बाद 2022-23 का आंकड़ा नीति आयोग का अनुमान है, न कि किसी नए सर्वे के आधार पर तैयार किया गया आंकड़ा. नीति आयोग की एमपीआई गणना राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) पर आधारित है. एनएफएचएस-5 (2019-21) सर्वे के आधार पर गरीबी का सबसे नया अनुमान देता है.

हालांकि, एनएफएचएस-6 (2023-24) की फैक्ट शीट इस साल 29 मई को जारी की गई थी, लेकिन ओपनसिटी, एक खुले शहरी डेटा प्लेटफॉर्म के मुताबिक, इनमें एमपीआई के कुछ जरूरी संकेतक नहीं हैं. इनमें बच्चों की मृत्यु दर, साफ-सफाई और साफ खाना पकाने के ईंधन तक पहुंच जैसे आंकड़े शामिल हैं. परिवारों के स्तर का डेटा भी अभी जारी नहीं हुआ है.

एनएफएचएस-6 में उपलब्ध आंकड़े मिली-जुली तस्वीर दिखाते हैं. उत्तर प्रदेश में बच्चों के कद के कम होने की दर 39.7 प्रतिशत से घटकर 31.5 प्रतिशत हो गई. यह राष्ट्रीय स्तर पर 35.5 प्रतिशत से 29.3 प्रतिशत की कमी से बेहतर है. हालांकि, बच्चों के कमजोर या बहुत दुबले होने की दर 17.3 प्रतिशत से बढ़कर 19.2 प्रतिशत हो गई. वहीं, कम वजन वाले बच्चों का अनुपात 32.1 प्रतिशत से बढ़कर 34.5 प्रतिशत हो गया. राष्ट्रीय स्तर पर दोनों आंकड़ों में कमी आई.

इन रुझानों से पता चलता है कि सरकारी मदद से शुरुआती सुधार के बाद अब परिवारों की आय को मजबूत करना भी जरूरी है. बच्चे के खाने में सुधार बनाए रखना या यह सुनिश्चित करना कि कोई परिवार अपने रसोई गैस सिलेंडर को दोबारा भरवा सके, अब तेजी से भरोसेमंद रोजगार और कमाई पर निर्भर करता जा रहा है.

रोजगार और कमाई का इंतजार अभी भी

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, 2011-12 में उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय देश की औसत प्रति व्यक्ति आय की 51.4 प्रतिशत थी. इसके बाद के 10 सालों में यह अनुपात 50 से 52 प्रतिशत के बीच रहा और महामारी वाले साल में घटकर 49.9 प्रतिशत हो गया. पिछले दो सालों में यह बढ़कर 53.5 प्रतिशत हो गया, जो मौजूदा आंकड़ों की श्रृंखला में इसका सबसे ऊंचा स्तर है. अगर 2025-26 के लिए राज्य की अनुमानित प्रति व्यक्ति आय 1.2 लाख रुपये होती है, तो यह अनुपात देश की औसत प्रति व्यक्ति आय का करीब 55 प्रतिशत हो सकता है. इस बीच, प्रति व्यक्ति आय का वास्तविक अंतर तीन गुना बढ़कर 95,480 रुपये हो गया है. इसमें कुछ हिस्सा महंगाई का भी है.

इन्फोग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट

सिर्फ सरकारी कल्याण योजनाएं इस आर्थिक अंतर को खत्म नहीं कर सकतीं. 1979 के नोबेल पुरस्कार विजेता डब्ल्यू. आर्थर लुईस ने 1954 में अपने दोहरी अर्थव्यवस्था मॉडल में कहा था कि आय में लगातार बराबरी के लिए कामगारों को कम उत्पादकता वाली खेती से ज्यादा उत्पादकता वाले उद्योग और सेवा क्षेत्र में जाना ज़रूरी है.

दिप्रिंट के एक पुराने इकॉनॉमिक्स कॉलम, ‘There’s a problem with UP’s trillion-dollar economy dream’ में मैंने तर्क दिया था कि उत्तर प्रदेश में आय के दूसरे राज्यों के बराबर आने के बिना ही आर्थिक विकास हो रहा था, क्योंकि अर्थव्यवस्था में जरूरी बदलाव अभी पूरा नहीं हुआ था.

हाल के रोजगार बाज़ार के आंकड़े भी इसी बात को मजबूत करते हैं. अक्टूबर-दिसंबर 2025 के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की 50.3 प्रतिशत कामकाजी आबादी खेती में लगी हुई है, जबकि देश में यह आंकड़ा 43.2 प्रतिशत है. केवल 26.8 प्रतिशत लोग सेवा क्षेत्र में काम करते हैं, जबकि देश में यह आंकड़ा 32.8 प्रतिशत है. राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण से यह भी पता चलता है कि राज्य की अर्थव्यवस्था में खेती का हिस्सा 2017-18 के 24 प्रतिशत से थोड़ा बढ़कर 2024-25 में 24.9 प्रतिशत हो गया है.

श्रम सर्वेक्षण एक और ऐसी समस्या बताता है, जिसके बारे में कम बात होती है: काम करने की उम्र वाले लोगों में रोजगार बाजार में शामिल होने की दर कम है, खासकर महिलाओं में. उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी की दर 5.0 प्रतिशत है, जो देश की 4.8 प्रतिशत की दर के करीब है. युवाओं में बेरोजगारी भी काफी हद तक ऐसी ही है. उत्तर प्रदेश में यह 15.1 प्रतिशत है, जबकि देश में 14.3 प्रतिशत है. ज्यादा बड़ी चिंता यह है कि कितने लोग रोजगार बाजार में शामिल हो रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में 15 साल और उससे ज्यादा उम्र की केवल 24.0 प्रतिशत महिलाएं काम कर रही हैं या काम की तलाश कर रही हैं, जबकि देश में यह आंकड़ा 34.9 प्रतिशत है. पुरुषों की रोजगार बाज़ार में भागीदारी देश के स्तर के करीब है. ऐसे में महिलाओं और पुरुषों के बीच का अंतर, खासकर शहरी इलाकों में, एक बड़ी समस्या बना हुआ है. शहरी उत्तर प्रदेश में केवल 14.7 प्रतिशत महिलाएं रोजगार बाजार में शामिल हैं.

इन्फोग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट

2023 की अर्थशास्त्र की नोबेल पुरस्कार विजेता क्लाउडिया गोल्डिन इस स्थिति को समझने के लिए एक उपयोगी तरीका बताती हैं. आर्थिक विकास और महिलाओं के रोजगार के बीच यू-आकार के संबंध पर उनकी रिसर्च बताती है कि जब अर्थव्यवस्थाएं खेती से आगे बढ़ती हैं और परिवार की खेती में महिलाओं की भागीदारी कम होती है, तो शुरुआत में महिलाओं की रोजगार में भागीदारी घट सकती है. बाद में शिक्षा बढ़ने और महिलाओं के लिए सही तरह की नौकरियां, खासकर सेवा क्षेत्र में, उपलब्ध होने पर उनकी भागीदारी फिर बढ़ती है.

उत्तर प्रदेश की शहरी महिलाएं इस यू-आकार के ग्राफ के सबसे निचले हिस्से में दिखाई देती हैं और पर्याप्त रोजगार के अवसर मिलने का इंतजार कर रही हैं. लुईस के बताए बदलाव की प्रक्रिया तब तक पूरी नहीं होगी, जब तक बड़ी संख्या में महिलाएं उत्पादक आर्थिक गतिविधियों से बाहर रहेंगी.

बेहतर ज़िंदगी को बेहतर कमाई में बदलना

इसलिए यह विरोधाभास असल में कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि बदलाव की एक प्रक्रिया है. सरकारी मदद से मिलने वाली सुरक्षा ने बड़े सुधार किए हैं, लेकिन अब अगला चरण तेज़ी से उत्पादकता, रोजगार और आय बढ़ाने पर निर्भर होना चाहिए. इसके लिए पांच रणनीतिक बदलाव जरूरी हैं.

पहला, सरकारी योजनाओं से मिले फायदे को लोगों की क्षमता में बदलना. बच्चों के कद के कम होने की दर में गिरावट अच्छी बात है, जबकि बहुत दुबले या कमजोर बच्चों की दर बढ़ना चिंता की बात है. बेहतर पोषण का असर बेहतर पढ़ाई और रोजगार के लायक स्किल्स पर भी दिखना चाहिए. इसके लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि कितने बच्चे स्कूल में दाखिल हुए हैं, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि बच्चे कितना सीख रहे हैं.

दूसरा, ज्यादा महिलाओं को वेतन वाले काम में लाना. सुरक्षित परिवहन, बच्चों की देखभाल की सुविधाएं, कामकाजी महिलाओं के लिए हॉस्टल और घर के पास रोजगार के अवसर महिलाओं की रोजगार में भागीदारी बढ़ा सकते हैं और परिवार की आय बढ़ा सकते हैं. ऐसे कदम सीधे पैसे देने वाली योजनाओं के साथ मिलकर काम कर सकते हैं और महिलाओं को खुद ज्यादा कमाने में मदद कर सकते हैं.

तीसरा, जिलों के स्तर पर ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाले उद्योगों को बढ़ावा देना. कृषि से बाहर आने वाले कामगारों को बिना बहुत दूर गए रोजगार देने के लिए कृषि से जुड़े सामान को तैयार करने वाले उद्योग, कपड़ा, चमड़ा और इलेक्ट्रॉनिक सामान की असेंबली जैसे उद्योग मदद कर सकते हैं. औद्योगिक नीति का आकलन सिर्फ निवेश की घोषणाओं से नहीं, बल्कि पैदा हुई औपचारिक नौकरियों और लगाई गई उत्पादन क्षमता के आधार पर होना चाहिए.

चौथा, शहरों को आधुनिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा मानना. अनुमान है कि 2046 तक 35.8 प्रतिशत आबादी शहरी इलाकों में रह रही होगी. ऐसे में छोटे और मध्यम शहरों में निवेश को सिर्फ शहरी नीति नहीं, बल्कि रोजगार नीति का हिस्सा माना जाना चाहिए.

पांचवां, आंकड़ों को समय पर जारी करना. एनएफएचएस-6 के परिवारों से जुड़े आंकड़े उपलब्ध होने के बाद नीति आयोग को राज्य स्तर पर बहुआयामी गरीबी सूचकांक के आंकड़े जल्द जारी करने चाहिए. उत्तर प्रदेश को भी रोजगार बाजार से जुड़े हर तीन महीने के आंकड़ों पर उतनी ही गंभीरता से नजर रखनी चाहिए, जितनी वह निवेश सम्मेलनों पर रखता है.

उत्तर प्रदेश ने दिखाया है कि वह अपने नागरिकों की ज़िंदगी की क्वालिटी में सुधार कर सकता है. अगले दो दशकों की चुनौती इन सामाजिक सुधारों को परिवारों की ज्यादा आय में बदलने की है. यह काम विकसित भारत 2047 के वादे को पूरा करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

 

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