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Wednesday, 15 July, 2026
होमदेशअर्थजगतअमेरिका का रूसी तेल खरीदने वाले 5 बड़े देशों के लिए नया प्रतिबंध बिल. भारत पर क्या होगा इसका असर?

अमेरिका का रूसी तेल खरीदने वाले 5 बड़े देशों के लिए नया प्रतिबंध बिल. भारत पर क्या होगा इसका असर?

रूसी कच्चे तेल के टॉप 5 खरीदार चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अज़रबैजान हैं. इस बिल में उन देशों के लिए छूट का प्रस्ताव है जो अपनी प्राकृतिक गैस का 15% से कम हिस्सा रूस से आयात करते हैं.

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नई दिल्ली: रूस से कच्चे तेल पर भारत की बढ़ती निर्भरता पर एक बार फिर दबाव बढ़ सकता है. अमेरिका के कुछ सीनेटरों ने एक नया प्रतिबंध विधेयक (सैंक्शंस बिल) पेश किया है. इसमें उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है, जो रूस से तेल खरीदना जारी रखेंगे.

यह संशोधित प्रस्ताव पहले के बिल की तुलना में काफी नरम है. पहले वाले प्रस्ताव में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत का एक समान टैरिफ लगाने की बात थी. अब टैरिफ की अधिकतम सीमा 100 प्रतिशत कर दी गई है. साथ ही इसे सिर्फ दुनिया के पांच सबसे बड़े रूसी तेल या प्राकृतिक गैस खरीदार देशों तक सीमित कर दिया गया है. इससे भारत और चीन इस बिल के केंद्र में आ गए हैं.

रॉयटर्स के मुताबिक, इस बिल में उन देशों को छूट देने का भी प्रस्ताव है, जो अपनी कुल प्राकृतिक गैस का 15 प्रतिशत से कम रूस से खरीदते हैं और इन आयातों को कम करने के लिए कदम उठा रहे हैं.

रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीदने वाले पांच देश चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान हैं.

भारत के लिए यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब उसके कुल तेल आयात में सबसे बड़ा हिस्सा रूसी कच्चे तेल का है.

वैश्विक व्यापार डेटा एनालिटिक्स कंपनी Kpler के मुताबिक, जून में भारत ने रूस से करीब 26 लाख बैरल प्रतिदिन (2.6 mbpd) कच्चा तेल आयात किया. यह उसके कुल कच्चे तेल आयात का आधे से ज्यादा हिस्सा था. मार्च से इसमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है और जुलाई में भी आयात मजबूत रहने की उम्मीद है.

रूसी तेल भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा का सहारा

Kpler में मैनेजर सुमित रितोलिया ने कहा कि खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच रूसी कच्चा तेल भारत के लिए आपूर्ति बाधित होने से बचाव का सबसे बड़ा सहारा बन गया है.

रितोलिया ने दिप्रिंट से कहा, “रूस से आने वाले तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को पूरी क्षमता के साथ काम करने, ईंधन की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने और एशिया की कई दूसरी रिफाइनरियों में आई दिक्कतों से बचने में मदद की है.”

उन्होंने कहा कि रूसी तेल ने दुनिया के तेल बाजार को स्थिर रखने में भी मदद की है.

उन्होंने कहा, “मूल प्रतिबंध व्यवस्था इस तरह बनाई गई थी कि रूसी तेल की आपूर्ति जारी रहे, क्योंकि अगर हर दिन लाखों बैरल तेल बाजार से हट जाता, तो वैश्विक आपूर्ति पर दबाव बढ़ता और तेल की कीमतें बहुत तेजी से ऊपर चली जातीं.”

विश्लेषकों का कहना है कि सबसे बड़ी चुनौती भारत और दूसरे आयातक देशों के सामने यह होगी कि अगर रूस से तेल की खरीद में बड़ी कमी आती है, तो उसकी जगह तेल कहां से आएगा.

रितोलिया ने कहा, “अगर ऐसे द्वितीयक टैरिफ लागू किए जाते हैं, जिनसे रूस से कच्चे तेल की खरीद में बड़ी कमी आती है, तो सबसे पहला सवाल होगा कि उसकी भरपाई के लिए तेल कहां से आएगा?”

उन्होंने कहा कि दुनिया में अतिरिक्त उत्पादन क्षमता सीमित है. होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिम अब भी खत्म नहीं हुए हैं और दूसरे स्रोतों से आपूर्ति भी सीमित है.

उन्होंने कहा, “भारत के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है. बहुत कम ऐसे आपूर्तिकर्ता हैं जो रूस की तरह इतनी बड़ी मात्रा में, भरोसेमंद तरीके से और उसी कीमत पर तेल दे सकें. भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी कच्चा तेल अब भी सबसे व्यावहारिक और प्रतिस्पर्धी विकल्प है.”

अबू धाबी में कमोडिटी विश्लेषक नतालिया काटोना ने भी रितोलिया की बात से सहमति जताई. उन्होंने कहा कि भारत जल्दी से रूसी तेल का विकल्प नहीं ढूंढ सकता, क्योंकि अब उसके कुल कच्चे तेल आयात का अधिकांश हिस्सा रूस से आता है.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “दूसरे स्रोतों से तेल ज्यादा महंगा होगा. उनमें से कई अब भी खाड़ी क्षेत्र के समुद्री मार्गों पर निर्भर हैं, जो जोखिम में हैं. साथ ही रिफाइनरियों को अपने कच्चे तेल के मिश्रण में बदलाव करने के लिए समय भी चाहिए होगा.”

भारत के लिए रूसी तेल इसलिए भी आकर्षक बना हुआ है क्योंकि यह मध्य पूर्व के कई ग्रेड के मुकाबले सस्ते दाम पर मिलता है. इससे रिफाइनरियां अपनी लागत को नियंत्रित रख पाती हैं.

बिल तुरंत लागू होने की संभावना नहीं

रितोलिया ने कहा, “यह टैरिफ प्रस्ताव भू-राजनीतिक अनिश्चितता जरूर बढ़ाता है, लेकिन इसे वास्तव में लागू करना और इसका तेल की आपूर्ति पर असर उतना सीधा नहीं है, जितना सुर्खियों से लगता है.”

उनके मुताबिक, ऐसी कोई भी नीति जो रूस के तेल निर्यात को बड़े स्तर पर प्रभावित करेगी, पहले से दबाव झेल रहे वैश्विक तेल बाजार को और तंग कर देगी और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ा देगी.

काटोना का भी मानना है कि यह प्रस्ताव जल्दी लागू होने की संभावना नहीं है, या फिर मौजूदा रूप में लागू नहीं होगा.

उन्होंने कहा कि सांसद पहले ही मूल प्रस्ताव को काफी नरम कर चुके हैं. टैरिफ की सीमा 500 प्रतिशत से घटाकर 100 प्रतिशत कर दी गई है. इसे सिर्फ रूस से ऊर्जा खरीदने वाले पांच सबसे बड़े देशों तक सीमित किया गया है. साथ ही इसमें कई छूट और राष्ट्रपति को विशेष अधिकार भी जोड़े गए हैं.

काटोना ने चेतावनी दी कि जब ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत पहले ही 85 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर है और होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति का जोखिम बना हुआ है, तब रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दंडात्मक टैरिफ लगाना उल्टा पड़ सकता है. अगर भारत और चीन को रूसी तेल से दूर किया गया, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें और ज्यादा बढ़ जाएंगी.

भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में यह प्रस्तावित कानून उसकी ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों दोनों को लेकर नई अनिश्चितता पैदा करता है.

हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि रूस से बढ़ती निर्भरता और उसके विकल्पों की कमी को देखते हुए भारत के लिए जल्द ही रूसी तेल से दूरी बनाना संभव नहीं दिखता.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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