नयी दिल्ली, छह नवंबर (भाषा) चालू रबी सत्र में बुवाई के लिए अभी पर्याप्त समय है और अब तक बुवाई का रकबा घटने को लेकर चिंता जताना जल्दबाजी होगी। किसान दिसंबर तक बुवाई कर सकते हैं। कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने शुक्रवार को यह कहा।
हालांकि, सरकार ने पहली बार बुवाई के रकबे में संभावित गिरावट से जुड़ी चिंताओं से निपटने के लिए आकस्मिक योजना तैयार की है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 30 अक्टूबर तक रबी फसलों का कुल रकबा 46 प्रतिशत घटकर 37.56 लाख हेक्टेयर रह गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 69.02 लाख हेक्टेयर था।
रबी की प्रमुख फसल गेहूं की बुवाई अब तक केवल 19,000 हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 3.34 लाख हेक्टेयर थी। फसल वर्ष 2025-26 (जुलाई-जून) में गेहूं की बुवाई 336 लाख हेक्टेयर में हुई थी।
रबी की फसलों की बुवाई आमतौर पर अक्टूबर-नवंबर में होती है, जबकि इनकी कटाई मार्च और अप्रैल में की जाती है।
अधिकारी ने अब तक बुवाई का रकबा घटने को लेकर चिंता दूर करते हुए कहा, ”रबी की बुवाई पर बात करना अभी जल्दबाजी होगी। अभी पर्याप्त समय है। दिसंबर तक बुवाई की जा सकती है।”
उन्होंने कहा कि चालू महीना बुवाई की प्रगति के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
अधिकारी के मुताबिक, देश के कुछ हिस्सों में मानसून की कम बारिश और मिट्टी में नमी की कमी को देखते हुए मंत्रालय ने 225 जिलों के लिए आकस्मिक योजना तैयार की है। हालांकि, मौसम की स्थिति में सुधार के साथ इसमें बदलाव होता रहता है।
उन्होंने बताया कि सरकार रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल को कम करने के प्रयासों के तहत मृदा स्वास्थ्य नीति भी तैयार कर रही है, जिसकी घोषणा अगले तीन-चार महीनों में की जा सकती है।
अधिकारी ने कहा कि खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम करने के भी प्रयास किए जा रहे हैं।
पराली जलाने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि हरियाणा और पंजाब दोनों में पराली जलाने की घटनाओं में काफी कमी आई है। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण के लिए पराली जलाना कोई प्रमुख कारण नहीं है।
इससे पहले, सोमवार को समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों को खरीफ फसलों की कटाई के तुरंत बाद रबी फसलों की बुवाई में तेजी लाने और खेतों में बची नमी का अधिकतम उपयोग करने का निर्देश दिया था।
उन्होंने कहा था कि सिंचाई के पानी की कमी वाले क्षेत्रों के किसानों को कम पानी और कम लागत वाली फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इनमें चना, सरसों, मसूर और मोटे अनाज शामिल हैं।
चौहान ने तापमान में उतार-चढ़ाव को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित जलवायु अनुकूल और गर्मी सहन करने वाली किस्मों के बीज किसानों को उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए थे।
मंत्रालय ने कहा कि रबी सत्र के लिए यूरिया, डीएपी, एमओपी और एनपीके उर्वरकों के साथ-साथ प्रमाणित बीजों का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। राज्यों के साथ समन्वय कर जिला स्तर तक आपूर्ति व्यवस्था की निगरानी की जा रही है।
साप्ताहिक आंकड़ों के अनुसार, दलहन की बुवाई का रकबा घटकर 9.45 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले साल 19.56 लाख हेक्टेयर था। चने की बुवाई का रकबा भी 14.35 लाख हेक्टेयर से घटकर 5.90 लाख हेक्टेयर रह गया।
तिलहन की बुवाई 20.97 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 38.62 लाख हेक्टेयर थी। इसके तहत सरसों और रेपसीड का रकबा 38.07 लाख हेक्टेयर से घटकर 20.50 लाख हेक्टेयर रह गया।
मोटे अनाज की बुवाई का रकबा पिछले साल के 4.22 लाख हेक्टेयर के मुकाबले थोड़ा घटकर 3.78 लाख हेक्टेयर रहा। वहीं, शीतकालीन धान की बुवाई 3.29 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 3.16 लाख हेक्टेयर में हुई।
विशेषज्ञों ने बुवाई में देरी का कारण जून से सितंबर के दौरान मानसून की बारिश में 13 प्रतिशत की कमी को बताया है। इसके कारण बुवाई शुरू होने से पहले मिट्टी में बची नमी कम हो गई।
भाषा राजेश राजेश रमण
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