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Friday, 18 September, 2026
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ईरान के ग़ालिबफ़, अमेरिकी फेड और ‘स्ट्रेट्स टेलर रूल’: ‘मज़ाक’ के पीछे की अर्थव्यवस्था

बुधवार को, ज़्यादा महंगाई के बीच फेड ने अपनी ब्याज दरें 25 बेसिस पॉइंट बढ़ा दीं. इससे कुछ घंटे पहले, ईरान के स्पीकर ने सेंट्रल बैंकिंग के सबसे मशहूर फ़ॉर्मूलों में से एक का नया वर्शन पोस्ट किया.

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नई दिल्ली: दुनिया के सबसे ताकतवर केंद्रीय बैंक, अमेरिकी फेडरल रिजर्व, के तीन साल में सबसे बड़े फैसलों में से एक लेने और ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी करने से कुछ घंटे पहले, ईरान की संसद के स्पीकर ने दशकों पुराने उस आर्थिक फॉर्मूले को सामने रखा, जिसे दुनिया भर के सभी सेंट्रल बैंकर मानते हैं, और उसे चुपचाप बदल दिया. उन्होंने इसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और बाब अल-मंदेब के लिए नए टर्म जोड़ दिए.

सीधे तौर पर, दुनिया के दूसरे हिस्से से मोहम्मद बाघेर ग़ालिबफ़ का संदेश था: आप जितना चाहें ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं, लेकिन सिर्फ ब्याज दरें बढ़ाकर किसी शिपिंग लेन को नहीं चला सकते. क्या ग़ालिबफ़ के इस मजाक के पीछे की अर्थव्यवस्था वाली बात सही बैठती है?

दिप्रिंट बता रहा है कि ईरानी नेता ने वास्तव में क्या बदलाव किए हैं?

बुधवार को फेडरल रिजर्व ने अपनी बेंचमार्क ब्याज दर में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की और इसे 3.75 से 4 फीसदी की टारगेट रेंज तक पहुंचा दिया. नई फेड चेयर केविन वॉर्श के नेतृत्व में तीन साल में यह पहली बढ़ोतरी थी, जिसे सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई. यह फैसला ऐसे समय आया जब महंगाई ऊंची बनी हुई थी और इसकी बड़ी वजह बढ़ती ऊर्जा कीमतें थीं.

इस फैसले से कुछ घंटे पहले ग़ालिबफ़ ने ऐसी चीज पोस्ट की, जिसकी आमतौर पर अर्थशास्त्रियों को किसी राजनेता से उम्मीद नहीं होती. उन्होंने केंद्रीय बैंकिंग के सबसे मशहूर फॉर्मूलों में से एक का बदला हुआ वर्जन पोस्ट किया, जिसे ईरान के स्पीकर ने ‘स्ट्रेट्स टेलर रूल’ कहा.

असली टेलर रूल

टेलर रूल 1992 में अमेरिकी अर्थशास्त्री जॉन बी. टेलर ने पेश किया था. यह वह फॉर्मूला है, जिसका केंद्रीय बैंक ब्याज दरें तय करने के लिए एक मोटे गाइड के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.

सीधे शब्दों में, इसका कहना है कि केंद्रीय बैंक जो ब्याज दर तय करता है, वह दो चीजों पर निर्भर होनी चाहिए. पहली, महंगाई अपने टारगेट से कितनी दूर है. दूसरी, अर्थव्यवस्था का आउटपुट अपनी पूरी क्षमता से कितना दूर है. अगर महंगाई ज्यादा है, तो ब्याज दरें बढ़ाएं. अगर अर्थव्यवस्था अपनी क्षमता से कम चल रही है, तो दरें घटाएं.

इस फॉर्मूले के अंदर r-star (या r*) नाम की एक चीज होती है, जिसे ‘न्यूट्रल रेट ऑफ इंटरेस्ट’ कहा जाता है. यह वह ब्याज दर है जो न तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाती है और न ही उसे धीमा करती है. यह उसका बैलेंस पॉइंट है. केंद्रीय बैंक के लोग यह पता लगाने में काफी समय लगाते हैं कि r-star असल में कहां है, क्योंकि फॉर्मूले की बाकी सारी चीजें इसी के आधार पर तय होती हैं.

हमने ऐसा पहले भी देखा है

यह समझने के लिए कि ग़ालिबफ़ का मजाक वास्तव में क्यों असर करता है, हमें 1970 के दशक में वापस जाना होगा.

अक्टूबर 1973 में ऑर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (OPEC), जिसका नेतृत्व अरब तेल उत्पादक देश कर रहे थे, ने योम किप्पुर युद्ध के दौरान अमेरिका के इजरायल को समर्थन देने के जवाब में अमेरिका पर तेल प्रतिबंध लगा दिया. कुछ ही महीनों में तेल की कीमतें चार गुना हो गईं. उस समय आर्थर बर्न्स के नेतृत्व वाला अमेरिकी फेड ठीक उसी दुविधा का सामना कर रहा था, जिसका जिक्र ग़ालिबफ़ आज कर रहे हैं.

महंगाई तेजी से बढ़ रही थी. लेकिन इसकी वजह यह नहीं थी कि अमेरिकी बहुत ज्यादा खर्च कर रहे थे. वजह यह थी कि तेल की कीमत अचानक बढ़ गई थी, लगभग रातोंरात, और इसके पीछे ऐसी वजहें थीं जिनका अमेरिकी मौद्रिक नीति से कोई लेना-देना नहीं था.

उस समय फेड ने फिर भी ब्याज दरों के जरिए इससे लड़ने की कोशिश की. इसका नतीजा स्टैगफ्लेशन रहा — यानी महंगाई और बेरोजगारी दोनों का ऊंचा होना. इसने बाकी पूरे दशक में अमेरिकी अर्थव्यवस्था को परेशान किया. 1980 के दशक की शुरुआत तक, फेड चेयर पॉल वोल्कर के नेतृत्व में ब्याज दरों में ज्यादा आक्रामक और लगातार बढ़ोतरी के अभियान के बाद ही आखिरकार महंगाई को काबू में लाया जा सका. लेकिन इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, जिसमें गहरी मंदी भी शामिल थी.

अर्थशास्त्रियों ने इस दौर का काफी विस्तार से अध्ययन किया है. नोबेल पुरस्कार विजेता मिल्टन फ्रीडमैन ने मशहूर तौर पर कहा था कि महंगाई, उनके शब्दों में, “हमेशा और हर जगह एक मौद्रिक घटना है.” इस विचार ने कई दशकों तक केंद्रीय बैंकिंग को प्रभावित किया.

लेकिन रॉबर्ट बैरो जैसे अर्थशास्त्रियों और बाद में ओलिवियर ब्लैंशार्ड ने खास तौर पर तेल के झटकों को लेकर इस विचार को चुनौती दी. उन्होंने दिखाया कि सप्लाई की वजह से कीमतों में आने वाली तेजी, मांग की वजह से होने वाली महंगाई से काफी अलग तरीके से काम करती है और पारंपरिक मौद्रिक उपाय इनके खिलाफ बहुत सीमित और महंगे साधन हैं.

यही वह बहस है, जिसमें ग़ालिबफ़ ने अपनी बात रखी.

ईरानी बदलाव

ग़ालिबफ़ ने वास्तव में टेलर रूल में दो नए टर्म जोड़ दिए — एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के लिए और दूसरा बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के लिए. ये दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण तेल शिपिंग चोकपॉइंट हैं.

उनकी बात आसान भाषा में यह थी: अभी महंगाई मांग की समस्या नहीं है. यह सप्लाई की समस्या है. तेल महंगा इसलिए नहीं है कि अमेरिकी बहुत ज्यादा खर्च कर रहे हैं, बल्कि इसलिए है क्योंकि दुनिया की दो सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा शिपिंग लेन खतरे में हैं.

और 25 बेसिस पॉइंट की ब्याज दर बढ़ोतरी — यानी एक फीसदी का एक चौथाई — इसे ठीक करने के लिए कुछ नहीं करती. ग़ालिबफ़ ने साफ कहा: “आप किसी चोकपॉइंट पर 25bp नहीं लगा सकते.” आप ब्याज दरें बढ़ाकर किसी स्ट्रेट को जादुई तरीके से फिर से नहीं खोल सकते और न ही हवा से एक बैरल तेल पैदा कर सकते हैं.

स्ट्रेट की बात

यहां रुककर यह समझना जरूरी है कि उस चोकपॉइंट में वास्तव में कितनी ताकत है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अपने सबसे संकरे हिस्से में सिर्फ करीब 33 किलोमीटर चौड़ा है, फिर भी दुनिया की कुल तेल खपत का लगभग पांचवां हिस्सा इससे होकर गुजरता है. यह काफी अंतर से धरती पर तेल के ट्रांजिट का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता है. बाब अल-मंदेब स्ट्रेट, जो लाल सागर को गल्फ ऑफ एडन से जोड़ता है, वहां से गुजरने वाले तेल की मात्रा के मामले में छोटा है, लेकिन रणनीतिक रूप से उतना ही संवेदनशील है, क्योंकि यह उन शिपमेंट्स का रास्ता है जो अफ्रीका के चारों ओर ज्यादा लंबे और महंगे रास्ते से बचना चाहते हैं.

जब इनमें से किसी भी चोकपॉइंट पर खतरा होता है, तो इसका असर सिर्फ कागज पर नहीं होता — यह सीधे फ्रेट लागत, टैंकरों के इंश्योरेंस प्रीमियम और आखिर में पेट्रोल पंप पर कीमत में दिखाई देता है. यही वह ट्रांसमिशन मैकेनिज्म है, जिसकी ओर ग़ालिबफ़ फॉर्मूले में अपने अल्फा और बीटा टर्म के जरिए इशारा कर रहे हैं — यानी यह विचार कि इन जलमार्गों के आसपास भू-राजनीतिक जोखिम सीधे उस ब्याज दर में शामिल हो जाता है, जिसे सिद्धांत रूप से ‘न्यूट्रल’ ब्याज दर होना चाहिए.

क्या ग़ालिबफ़ सही हैं?

क्या इसके पीछे की आर्थिक बात सही है? काफी हद तक, हां. ग़ालिबफ़ एक वास्तविक और अच्छी तरह से स्थापित विचार की ओर इशारा कर रहे हैं — मांग की वजह से होने वाली महंगाई और सप्लाई की वजह से होने वाली महंगाई के बीच का अंतर.

ब्याज दरें मांग को नियंत्रित करने का एक तरीका हैं. ये कर्ज लेना महंगा करके काम करती हैं, जिससे खर्च और निवेश कम होते हैं. जब महंगाई की वजह से अर्थव्यवस्था का जरूरत से ज्यादा तेजी से चलना हो, तब यह तरीका काफी असरदार होता है.

लेकिन जब महंगाई की वजह कोई सप्लाई शॉक हो — जैसे युद्ध, किसी शिपिंग लेन का बंद होना या तेल पर प्रतिबंध — तो ब्याज दरें बढ़ाने से कमी की समस्या ठीक नहीं होती. इससे सिर्फ कमी के ऊपर ऊंची ब्याज दरों का बोझ और जुड़ जाता है. 1970 के दशक से यही सबक मिला था.

ग़ालिबफ़ का यह कहना कि फेड की ‘न्यूट्रल रेट’ वास्तव में न्यूट्रल नहीं है — और इसका एक हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े छिपे हुए रिस्क प्रीमियम से जुड़ा है — एक वास्तविक और बचाव योग्य आर्थिक बात है, भले ही वह इसका इस्तेमाल वॉशिंगटन पर भू-राजनीतिक तंज कसने के लिए कर रहे हों.

और यही उनके पोस्ट की असली चालाकी है. वह अंत में कहते हैं, “We set it” — यानी हम इसे तय करते हैं. इसका मतलब है कि ईरान उस रिस्क प्रीमियम को नियंत्रित करता है, क्योंकि होर्मुज से होकर जाने के रास्ते पर ईरान का प्रभावी नियंत्रण है.

उनकी आखिरी लाइन थी “Stay unanchored” (किसी एक जगह बंधे न रहें) — यह केंद्रीय बैंकिंग की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक, ‘anchoring inflation expectations’ (महंगाई की उम्मीदों को स्थिर करना), पर एक मजाक है. फेड का काम यह भरोसा दिलाना है कि महंगाई फिर से अपने टारगेट पर लौट आएगी, ताकि बाजार और लोग घबराएं नहीं और कीमतें लगातार न बढ़ती जाएं. ग़ालिबफ़ मूल रूप से कह रहे हैं: जब चोकपॉइंट पर हमारा नियंत्रण है, तब महंगाई की उम्मीदों को स्थिर रखने के लिए शुभकामनाएं.

क्या यह एक मजाक है? हां. लेकिन यह वास्तव में एक मजबूत आर्थिक सिद्धांत पर आधारित है — एक ऐसा सिद्धांत जिसे दुनिया 1970 के दशक में एक बार मुश्किल तरीके से सीख चुकी है. सप्लाई से जुड़ी और भू-राजनीतिक वजहों से होने वाली महंगाई की समस्या के लिए मौद्रिक नीति सही तरीका नहीं है.

और ग़ालिबफ़ का मीम असल में उसी सबक का आज के समय का, ज्यादा तीखा रूप है, जो आर्थर बर्न्स और पॉल वोल्कर ने 50 साल पहले सीखा था: जब ऊर्जा के चोकपॉइंट को लेकर विवाद हो, तो केंद्रीय बैंक के लोग जितनी चाहें ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं — लेकिन वे ऐसी लड़ाई लड़ रहे होते हैं, जिसे सिर्फ ब्याज दरों से जीतने के लिए बनाया ही नहीं गया था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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