नई दिल्ली: S&P ग्लोबल एनर्जी में अपस्ट्रीम स्ट्रैटेजी और ट्रांसफॉर्मेशन के डायरेक्टर राजीव लाला ने दिप्रिंट को एक खास इंटरव्यू में बताया कि भारत की समुद्र मंथन योजना तेल और गैस की खोज करने वाली कंपनियों के लिए देश को ज्यादा आकर्षक बना सकती है, क्योंकि इससे कंपनियों का शुरुआती जोखिम कम होगा. लेकिन सिर्फ नई खोजों से ऊर्जा के आयात पर भारत की निर्भरता में कोई बड़ा बदलाव आने की संभावना नहीं है.
लाला ने बुधवार को कहा कि भारत में तेल और गैस की खोज का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन देश को ऐसे भंडार खोजने में मुश्किल हुई है, जिनसे व्यावसायिक स्तर पर फायदा हो सके और जिनका उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जा सके. नई योजना ज्यादा कंपनियों को आकर्षित कर सकती है और पहले से मौजूद तथा कम खोजे गए समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस तलाशने के नए तरीके सामने ला सकती है.
उन्होंने कहा, “समुद्र मंथन योजना खोज से पहले होने वाले शुरुआती जोखिम को अपने ऊपर लेकर तेल और गैस की खोज से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देती है.” उनका इशारा उस बड़े शुरुआती खर्च की ओर था, जो तेल और गैस कंपनियों को कोई भंडार मिलने से पहले करना पड़ता है.
सरकार की गहरे समुद्र में खोज करने वाली इस योजना का मकसद तेल और गैस कंपनियों को भारत के समुद्री क्षेत्रों में खोज के लिए प्रोत्साहित करना है. इसके लिए खोज के दौरान होने वाले शुरुआती जोखिम और निवेश का बोझ कम किया जाएगा.
हालांकि, भारत को खोज और निवेश के लिए कई दूसरे देशों से मुकाबला करना पड़ रहा है. लाला ने कहा कि अगले एक साल या उसके आसपास 40 से ज्यादा देश कंपनियों को तेल और गैस की खोज के लिए क्षेत्र देने के वास्ते बोली प्रक्रिया शुरू कर चुके होंगे या शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं. कंपनियां अलग-अलग देशों में निवेश के मौकों पर विचार करेंगी. ऐसे में भारत कितना निवेश आकर्षित कर पाता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि यहां तेल और गैस मिलने की संभावनाएं दूसरे देशों के मुकाबले कैसी हैं.
उन्होंने कहा कि नई कंपनियां भारत के पश्चिमी और पूर्वी समुद्री क्षेत्रों में खास तौर पर उपयोगी साबित हो सकती हैं, क्योंकि इन इलाकों में अभी बहुत कम खोज हुई है. ये कंपनियां उन क्षेत्रों में भी खोज के नए तरीके ला सकती हैं, जहां पहले से काम हो रहा है और जहां अब तक खोज नहीं हुई है.
हालांकि, लाला ने कहा कि खोज की कोशिशों से बड़े भंडार मिल भी जाएं, तब भी भारत की आयात पर निर्भरता खत्म होने की संभावना नहीं है, क्योंकि देश में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ती रहेगी.
उन्होंने कहा, “आयात के बिल में थोड़ी कमी जरूर आएगी और यह भी मायने रखता है.” उन्होंने कहा कि देश में तेल और गैस का उत्पादन बढ़ने से आर्थिक गतिविधियां भी बढ़ेंगी, रोजगार पैदा होगा और भारत की इंजीनियरिंग क्षमताएं मजबूत होंगी.
खोजे गए भंडारों से उत्पादन शुरू होने में लगने वाला समय अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों पर निर्भर करेगा. जिन इलाकों के पास पहले से बुनियादी ढांचा मौजूद है, वहां नए भंडार खोजने और उत्पादन शुरू करने के नतीजे जल्दी मिल सकते हैं. वहीं, जिन इलाकों में अभी बहुत कम खोज हुई है, वहां नए क्षेत्रों में खोज करने में आमतौर पर काफी ज्यादा समय लगता है.
भारत को ऊर्जा के लिए ज्यादा विकल्पों की जरूरत
लाला ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध से पैदा हुए मौजूदा भू-राजनीतिक संकट ने दिखा दिया है कि भारत को सिर्फ कच्चे तेल पर ध्यान देने के बजाय ऊर्जा की पूरी सप्लाई चेन में अपनी सुरक्षा मजबूत करने की जरूरत है.
उन्होंने कहा कि भारत को ऊर्जा के लिए “विकल्प बनाए रखने और उन्हें मजबूत करने” चाहिए. इसके लिए अलग-अलग देशों से ऊर्जा खरीदनी चाहिए, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) बढ़ाने चाहिए और ऊर्जा क्षेत्र के हर हिस्से में निवेश जारी रखना चाहिए.
भारत की बड़ी तेल रिफाइनिंग क्षमता उसे काफी लचीलापन देती है. इसकी मदद से भारत अलग-अलग देशों से खरीदे गए कच्चे तेल को घरेलू इस्तेमाल और निर्यात के लिए प्रोसेस कर सकता है. इससे अगर किसी एक देश से सप्लाई रुक जाए या वहां से तेल खरीदना महंगा हो जाए, तो भारत दूसरे विकल्पों का इस्तेमाल कर सकता है.
भारत की रिफाइनिंग और निर्यात क्षमता का जिक्र करते हुए लाला ने कहा, “दुनिया में ऐसे ऊर्जा सिस्टम बहुत कम हैं, जो बड़ी मात्रा में ऊर्जा को अपने यहां ले सकें और फिर उसे दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा भी सकें.”
रूसी कच्चे तेल पर भारत की बढ़ती निर्भरता के बारे में उन्होंने कहा कि भारत के पास तेल खरीदने के कई विकल्प हैं और वह उपलब्धता तथा कीमतों के हिसाब से एक सप्लायर से दूसरे सप्लायर की ओर जा सकता है. उन्होंने कहा कि कुछ समय के लिए किसी एक देश से ज्यादा तेल खरीदने का मतलब यह नहीं है कि भारत हमेशा के लिए उस देश पर रणनीतिक रूप से निर्भर हो गया है.
उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं है कि भारत की रणनीति किसी एक देश के पक्ष में या किसी दूसरे देश के खिलाफ है.”
रूसी तेल के भारत में आयात की जांच-पड़ताल बढ़ गई है. इसकी वजह यह है कि अमेरिका ने ऐसा कानून पास किया है, जिसके तहत रूसी कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है.
लाला ने कहा कि रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करने वाले देश के रूप में भारत वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था की एक अहम कड़ी है. इससे अंतरराष्ट्रीय सप्लायरों के पास भी भारतीय बाजार को सप्लाई जारी रखने की एक अतिरिक्त वजह है.
LPG और LNG की कमजोरियां सामने आईं
लाला ने कहा कि मौजूदा संकट ने यह भी दिखाया है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा का आकलन सिर्फ कच्चे तेल के आधार पर नहीं किया जा सकता.
लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) के मामले में उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष के शुरुआती महीनों में भारतीय रिफाइनरियों में घरेलू उत्पादन बढ़ने से सप्लाई की कमी का कुछ हिस्सा पूरा करने में मदद मिली. लेकिन इससे आयात की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी.
उन्होंने कहा, “हम निश्चित रूप से आयात करते रहेंगे.” उन्होंने बताया कि LPG की चुनौती पूरी तरह सप्लाई खत्म होने की नहीं, बल्कि सप्लाई को सही तरीके से संभालने की है.
उन्होंने कहा कि खुले समुद्र तक भारत की पहुंच से सामान लाने-ले जाने में कुछ लचीलापन मिलता है, हालांकि होर्मुज जलडमरूमध्य अब भी एक बेहद अहम रास्ता है, जहां रुकावट आने से सप्लाई प्रभावित हो सकती है. इसलिए सप्लाई सुरक्षित रखने के लिए जहाजों से माल लाने-ले जाने की व्यवस्था मजबूत करना और लागत को संभालना जरूरी रहेगा.
लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के बारे में लाला ने कहा कि फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती कतर जैसे सप्लायरों के साथ पहले से हुए लंबी अवधि के समझौतों में रुकावट आना है, न कि दुनिया भर में गैस की कमी होने की आशंका.
लाला ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य में आई रुकावट और कतर की कुछ सुविधाओं को हुए नुकसान से कतर के साथ भारत के लंबे समय के समझौते प्रभावित हुए हैं. हालांकि, S&P Global Energy का अनुमान है कि अगले दस सालों में बड़ी मात्रा में LNG वैश्विक बाजार में आएगी.
वेनेजुएला में संभावनाएं हैं, लेकिन उत्पादन बढ़ने में समय लगेगा
लाला ने कहा कि वेनेजुएला भारत के लिए कच्चे तेल का एक बड़ा सप्लायर बन सकता है, लेकिन वहां उत्पादन काफी बढ़ाने में समय लगेगा और कई मुश्किलों को दूर करना होगा.
वेनेजुएला में काम करने का अनुभव रखने वाली कंपनियां, जिनमें भारत की कुछ सरकारी तेल कंपनियां भी शामिल हैं, वहां के बाजार से पहले से परिचित हैं. शेवरॉन और सरकारी कंपनी Petróleos de Venezuela, S.A. (PDVSA) भी वहां की प्रमुख कंपनियों में शामिल हैं.
उत्पादन बढ़ाने के लिए मशीनों, उपकरणों और कर्मचारियों की जरूरत होगी. इसके अलावा, भुगतान से जुड़ी मुश्किलें और पुराने बकाया दावे भी कंपनियों के लिए चुनौतियां हैं. लाला ने कहा, “पहले किए गए काम का पैसा मिलने का इंतजार कर रही कंपनियों की पहले से ही एक लंबी कतार है.”
उन्होंने कहा कि इन समस्याओं को हल करने की कोशिशें चल रही हैं, लेकिन इसमें तेजी से प्रगति होने की संभावना नहीं है.
लाला ने कहा कि इस संकट से भारत को सबसे बड़ी सीख यह मिलती है कि किसी एक सप्लायर या एक ही तरह के भंडार पर निर्भर रहने के बजाय पूरे ऊर्जा सिस्टम को मुश्किल हालात का सामना करने के लिए मजबूत बनाना चाहिए. उन्होंने कहा कि रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की पारंपरिक सोच का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि उसमें कच्चे तेल के साथ-साथ LPG और LNG जैसी जरूरी ऊर्जा सप्लाई भी शामिल हो.
उन्होंने कहा कि भारत को देश के अंदर ऐसे अहम रास्तों और जगहों की भी पहचान करनी चाहिए, जहां रुकावट आने से देश के भीतर ऊर्जा की सप्लाई प्रभावित हो सकती है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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