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Monday, 18 May, 2026
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला को मंदिर माना, सरकार को मस्जिद के लिए अलग ज़मीन पर विचार का निर्देश

हिंदू पक्ष ने वहां पूजा का विशेष अधिकार मांगा था. हाई कोर्ट ने सरकार से धार में मस्जिद के लिए अलग ज़मीन देने के आवेदन पर विचार करने को भी कहा.

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नई दिल्ली: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शुक्रवार को धार जिले के विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को हिंदू देवी सरस्वती का मंदिर घोषित किया.

अदालत ने 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें इस स्थल पर दोनों समुदायों को पूजा की अनुमति दी गई थी.

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की बेंच ने कहा, “इस क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप भोजशाला और देवी वाग्देवी सरस्वती के मंदिर का माना जाता है.”

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी कहा कि वह जिले में मस्जिद के लिए अलग ज़मीन देने से जुड़े आवेदनों पर विचार करे.

भोजशाला परिसर को लेकर विवाद बढ़ने के बाद एएसआई ने 7 अप्रैल 2003 को आदेश जारी किया था. इसमें हिंदुओं को हर मंगलवार पूजा और मुसलमानों को हर शुक्रवार नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी.

हिंदू पक्ष ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए वहां पूजा का विशेष अधिकार मांगा था. शुक्रवार को हाई कोर्ट ने इस स्थल को एएसआई संरक्षित स्मारक का दर्जा बरकरार रखा और एजेंसी को एएसआई एक्ट 1958 के तहत संरक्षण का काम जारी रखने का निर्देश दिया.

अदालत ने केंद्र सरकार और एएसआई को भोजशाला मंदिर के प्रबंधन और प्रशासन को लेकर फैसला लेने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि “कानून के अनुसार एएसआई संपत्ति के समग्र प्रबंधन और प्रशासन की जिम्मेदारी संभालता रहेगा.”

यह विवाद 11वीं सदी की उस संरचना को लेकर है, जिसे हिंदू देवी वाग्देवी यानी सरस्वती का मंदिर मानते हैं, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है.

एएसआई के सर्वे, जिसकी रिपोर्ट 2,000 से ज्यादा पन्नों की है, में कहा गया था कि धार के परमार राजाओं के समय की एक बड़ी संरचना मस्जिद से पहले मौजूद थी और मौजूदा ढांचा मंदिर के अवशेषों का इस्तेमाल करके बनाया गया था.

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि “ऐतिहासिक साहित्य इस विवादित क्षेत्र को परमार वंश के राजा भोज से जुड़े संस्कृत अध्ययन केंद्र के रूप में स्थापित करता है और साहित्य तथा पुरातात्विक संदर्भ देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर के अस्तित्व की ओर इशारा करते हैं.”

अदालत ने यह भी कहा कि “स्थल पर हिंदू पूजा की परंपरा कभी समाप्त नहीं हुई.”

अपने आदेश में अदालत ने राज्य के संवैधानिक दायित्वों का भी जिक्र किया.

बेंच ने कहा, “हर सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वह ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाले प्राचीन स्मारकों और मंदिरों के साथ-साथ गर्भगृह और आध्यात्मिक महत्व वाली मूर्तियों का संरक्षण और सुरक्षा सुनिश्चित करे.”

अदालत ने कहा कि सरकार का कर्तव्य तीर्थयात्रियों को बुनियादी सुविधाएं देना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना और धार्मिक स्थल की पवित्रता को सुरक्षित रखना भी है.

कोर्ट ने हिंदू याचिकाकर्ताओं की उस मांग पर भी ध्यान दिया, जिसमें लंदन के एक संग्रहालय से देवी सरस्वती की मूर्ति वापस लाने की अपील की गई थी.

अदालत ने केंद्र सरकार को ऐसे आवेदनों पर विचार करने का निर्देश दिया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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