नई दिल्ली: दिल्ली के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (STPs) को अपग्रेड करने के लिए हैदराबाद की एक कंपनी के पक्ष में टेंडर की शर्तों में कथित तौर पर बदलाव किए जाने वाली दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) की बैठक की अध्यक्षता पूर्व दिल्ली मंत्री सत्येंद्र जैन ने की थी. इसके कुछ महीनों बाद, उस कंपनी ने जैन के लंबे समय से जानने वाले और पड़ोसी से जुड़ी एक फर्म को अपना कमीशन एजेंट बना दिया. दिल्ली एंटी-करप्शन ब्रांच (एसीबी) ने बुधवार को अदालत को यह जानकारी दी. इस फर्म को कुल बिल की रकम का 3 प्रतिशत मिलना था.
एसीबी की रिमांड अर्जी के अनुसार, जैन ने 31 अगस्त, 2021 को डीजेबी के अधिकारियों के साथ एक बैठक की अध्यक्षता की थी. इसमें उस समय के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) उदित प्रकाश राय भी शामिल थे. एजेंसी ने आरोप लगाया कि बैठक में तय किया गया कि 10 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स को अपग्रेड करने के लिए केवल IFAS Fixed Media तकनीक पर विचार किया जाएगा.
इस फैसले से इस प्रक्रिया में लगभग एक ही बोली लगाने वाला बचा, जिसका नाम Euroteck Environmental Pvt. Ltd (EEPL) था. इसके बाद 22 दिसंबर, 2021 को विनोद चौहान के भतीजे द्वारा चलाई जा रही Srijanhar Enterprises को कमीशन एजेंट बनाया गया. ACB ने आगे आरोप लगाया कि 21 और 23 दिसंबर को इन्हीं लोगों के बीच बैठकें हुई थीं, जिनमें टेंडर की शर्तों को अंतिम रूप दिया गया था.
एसीबी ने अपनी रिमांड अर्जी में आरोप लगाया कि इस सौदे के तहत EEPL ने बिना कोई काम किए M/s Srijanhar Enterprises के बैंक खाते में 2.71 करोड़ रुपये जमा किए. एसीबी ने विनोद चौहान की पहचान जैन के पड़ोसी के रूप में की है, जबकि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), जिसने पिछले साल दिसंबर में ही जैन और अन्य लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी, ने चौहान को लंबे समय से जानने वाले व्यक्ति के रूप में बताया है. ईडी के अनुसार, सौदे के लिए EEPL की ओर से एक बिचौलिए ने चौहान से संपर्क किया था.
हालांकि, एसीबी ने जैन की पुलिस हिरासत की मांग नहीं की. जैन आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता हैं और उन्हें पंजाब का सह-प्रभारी बनाया गया है, जहां 2022 से उनकी पार्टी की सरकार है. एसीबी के इस कदम पर पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने सवाल उठाए और पूछा कि अगर जैन से पूछताछ की ज़रूरत ही नहीं थी, तो उनकी गिरफ्तारी क्यों जरूरी थी.
एसीबी ने यह भी आरोप लगाया कि जैन ने दिल्ली जल बोर्ड के मुख्य इंजीनियर के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, जिसमें उपकरणों के लिए ऑक्सीजन ट्रांसफर दक्षता की शर्त को आसान करने की बात कही गई थी. इससे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए बोली लगाने वालों के बीच ज्यादा प्रतियोगिता हो सकती थी.
एसीबी का आरोप है कि यह काम डीजेबी के अधिकारियों, जिसमें पूर्व सीईओ उदित प्रकाश राय भी शामिल थे, और EEPL के मालिक राज कुमार कुर्रा के बीच एक “मिलकर किए गए समझौते” के तहत किया गया था. इसका उद्देश्य रिश्वत के बदले टेंडर की शर्तों में बदलाव करना था. एसीबी के अनुसार, राय को नागेंद्र यादव द्वारा संचालित A.N. Enterprises के जरिए बैंकिंग चैनलों से कथित तौर पर 1.52 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई थी.
एसीबी ने अदालत को बताया कि यादव ने DJB अधिकारियों और EEPL के प्रतिनिधियों के बीच एक “बिचौलिए” के रूप में काम किया. एसीबी ने रिमांड अर्जी में आरोप लगाया, “KVNS Rao (Euroteck) ने पत्र नागेंद्र यादव को दिया, जिन्होंने बाद में इसे सत्येंद्र जैन के कार्यालय में पहुंचाया. इसके बाद, श्री सत्येंद्र कुमार जैन ने DJB में कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे सलाहकार अंकित श्रीवास्तव को निर्देश दिया कि वे श्री KVNS Rao के साथ बैठक के लिए तालमेल करें. इसके लिए श्री KVNS Rao का विजिटिंग कार्ड भी साझा किया गया था. श्री K.V.N.S. Rao और श्री अंकित श्रीवास्तव के बीच चैट का स्क्रीनशॉट श्री K.V.N.S. Rao के मोबाइल फोन से बरामद किया गया.”
एसीबी ने आरोप लगाया कि योजना के तहत 31 अगस्त, 2021 को बैठक हुई और इसके बाद उसी साल 21 और 23 दिसंबर को भी बैठकें हुईं. इन बैठकों के दौरान टर्म्स ऑफ रेफरेंस की नई शर्तें तैयार की गईं, जिसमें STPs के अपग्रेड के लिए केवल IFAS fixed media की मांग की गई.
एसीबी ने डीजेबी में उस समय सलाहकार के तौर पर काम कर रहे अंकित श्रीवास्तव की दो दिन की रिमांड मांगी. उससे यह पूछताछ करनी थी कि EEPL और जैन के बीच वरिष्ठ डीजेबी अधिकारियों की मौजूदगी में ऐसी बैठकें कराने की ज़रूरत क्यों पड़ी.
एसीबी ने जैन पर “मनमाने” फैसले लेने का भी आरोप लगाया. इनमें रोहिणी STP की क्षमता बढ़ाने के मूल तकनीकी प्रस्ताव को 15 MGD से बदलकर 25 MGD करना और इसके बजाय बिना किसी तकनीकी सिफारिश या व्यवहार्यता अध्ययन के इसे 30 MGD तक अपग्रेड करने का आदेश देना शामिल था.
अदालत में हुई सुनवाई के दौरान जैन ने कहा कि वह “विषय के विशेषज्ञ” नहीं थे और उन्होंने केवल डीजेबी अधिकारियों, जिनमें इंजीनियर भी शामिल थे, की तकनीकी सिफारिशों और नोटिंग पर भरोसा किया था. इसलिए उनके फैसलों में गलती नहीं निकाली जा सकती. इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि न तो प्रवर्तन निदेशालय और न ही एसीबी ने ऐसी किसी रिश्वत या कमीशन की पहचान की है, जिसका “सीधे” उनसे संबंध हो.
इसी तरह, एसीबी ने आरोप लगाया कि रोहिणी और नरेला STPs को परियोजना में शामिल किया गया, जबकि ओखला Phase-V STP को बाहर कर दिया गया. इससे अनुमानित तौर पर 123 करोड़ रुपये की लागत बढ़ गई. एसीबी ने रिमांड अर्जी में आरोप लगाया, “मंत्री के ये मनमाने फैसले कथित तौर पर पर्याप्त तकनीकी कारण के बिना लिए गए थे.”
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