नयी दिल्ली, सात फरवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने जेल में बंद कैदियों को एकांत कारावास में रखने के खिलाफ दायर याचिका पर मंगलवार को केंद्र सरकार से जवाब तलब किया।
मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने वकील हर्ष विभोर सिंघल की ओर से दायर जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया और केंद्र के वकील को इस मामले में निर्देश लेने के लिए छह सप्ताह का समय दिया।
याचिका में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और कैदियों के एकांत कारावास से संबंधित कारागार अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि ये संविधान का उल्लंघन करते हैं।
याचिका में कहा गया है कि एकान्त कारावास ‘अत्यधिक क्रूरता और दुष्टता का तरीका’ है, ‘अमानवीय’ है और सुधार एवं पुनर्वास की किसी भी उम्मीद को नष्ट कर देता है।
हालांकि, यह दावा किया जाता है कि एकांत कारावास दुर्लभतम मामलों में और पूर्व न्यायिक अनुमोदन के साथ दिया जा सकता है, लेकिन जेल अधिकारी न्यायिक निरीक्षण के बिना और अपनी भ्रष्ट जरूरतों को पूरा करने के लिए, ‘नियमित रूप से’ इसका इस्तेमाल करते हैं।
याचिका में कहा गया है, ‘‘एकांत कारावास एक कैदी को समाज से पूरी तरह से काट देता है, जो बर्बर है, और उस कैदी के स्वास्थ्य को खराब कर देता है।’’
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(ए), 20(2) और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का संरक्षण तथा एकांत कारावास विरोधाभासी हैं।
याचिकाकर्ता ने यह सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने का अदालत से अनुरोध किया है कि प्रत्येक राज्य किसी भी कैदी के एकांत कारावास के लिए सिफारिशें देने के वास्ते एक स्वतंत्र कारा दंड बोर्ड का गठन करे।
मामले की अगली सुनवाई 23 मई को होगी।
भाषा सुरेश दिलीप
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