नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई. मामला पिछले महीने कुछ एक्टिविस्टों को कथित तौर पर यातना देने और गैरकानूनी हिरासत में रखने से जुड़ा है. कोर्ट ने कहा कि गंभीर आरोपों के मामलों में भी कानून की प्रक्रिया का पालन जरूरी है.
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुडेजा की बेंच ने जांच एजेंसी से कहा कि या तो उचित कार्रवाई बताओ, नहीं तो मामला सीबीआई को सौंप दिया जाएगा.
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा, “अगर कोई किसी पर आरोप लगा दे, तो आप उसे उठा लेंगे? हम ऐसा होने नहीं देंगे. अगर आपके पास शक करने का आधार था, तो कानून में तय प्रक्रिया है. अगर नहीं था, तो हम कमिश्नर से जांच कराने को कहेंगे. हमें आरोप कितना गंभीर है, इससे मतलब नहीं है. हमें प्रक्रिया से मतलब है. संविधान कहता है कि कानून के अनुसार प्रक्रिया होनी चाहिए.”
कोर्ट ने कहा, “हमें बताओ कि क्या कार्रवाई की गई है, नहीं तो हम कोई राय दिए बिना यह कहेंगे कि आरोप बहुत गंभीर हैं और मामला सीबीआई को भेजा जाना चाहिए.”
कोर्ट ने कहा कि यातना के गंभीर आरोप हैं, और पूछताछ के लिए यातना का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने कहा, “आप आतंकवाद के एंगल से जांच कर रहे हों, लेकिन अगर आप किसी को पकड़ते हैं, तो प्रक्रिया का पालन करना होगा.”
दिल्ली पुलिस ने सभी आरोपों से इनकार किया और कोर्ट में सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट दी.
लेकिन कोर्ट उस रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हुआ और कहा कि पूरा केस रिकॉर्ड 19 मई को पेश किया जाए.
कोर्ट उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिनमें आरोप है कि मार्च में कुछ एक्टिविस्टों को दयाल सिंह कॉलेज और विजय नगर से उठाकर गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखा गया.
एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने कहा कि जिस तरीके से पुलिस ने लोगों को उठाया और हिरासत में रखा, वह गलत है और इसकी निंदा होनी चाहिए.
लक्षिता राजौरा की छोटी बहन द्वारा दायर याचिका के जवाब में पुलिस ने पहले कहा था कि हिरासत में यातना और गैरकानूनी हिरासत के आरोप झूठे हैं और जांच को प्रभावित करने के लिए लगाए गए हैं.
याचिका में आरोप था कि उन्हें और अन्य छात्रों को अगवा कर न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी की एक इमारत में ले जाया गया.
हाई कोर्ट में दाखिल जवाब में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को सिर्फ “कानूनी पूछताछ” के लिए बुलाया गया था. यह पूछताछ जुलाई 2025 में दर्ज एफआईआर के संबंध में थी.
पुलिस ने दावा किया कि ये एक्टिविस्ट भगत सिंह छात्र एकता मंच जैसे संगठनों से जुड़े हैं, जिन्हें उन्होंने “राष्ट्र विरोधी” और “नक्सल समर्थक” सामग्री फैलाने वाला बताया.
पुलिस ने कहा, “कोई गैरकानूनी हिरासत, अपहरण, दबाव या यातना नहीं हुई. ये आरोप बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए हैं, आपस में विरोधाभासी हैं और इनके पास कोई सबूत नहीं है. यह जांच एजेंसी पर दबाव बनाने की कोशिश है.”
पुलिस ने कहा कि पूछताछ पेशेवर तरीके से और महिला स्टाफ की मौजूदगी में की गई.
एफिडेविट में कहा गया, “किसी भी व्यक्ति के साथ कोई यातना या धमकी नहीं दी गई. पूछताछ कानून के अनुसार और पेशेवर तरीके से की गई.”
पुलिस के अनुसार जांच एक ऐसे मामले से जुड़ी है, जिसमें एक महिला के गायब होने का मामला है, जिसे माओवादी विचारधारा से जुड़े लोगों ने प्रभावित किया था.
सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने की मांग पर पुलिस ने कहा कि न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित स्पेशल सेल ऑफिस का फुटेज सुरक्षित रखा गया है, लेकिन विजय नगर और मॉरिस नगर के कुछ स्थानों का फुटेज उपलब्ध नहीं है.
पुलिस ने यह भी कहा कि एक्टिविस्टों ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई मेडिकल दस्तावेज या एमएलसी पेश नहीं किया और इन आरोपों को बाद में बनाया गया बताया.
याचिका के अनुसार 12 से 14 मार्च के बीच 10 लोगों को, जिनमें दिल्ली के अलग-अलग कॉलेजों के छह छात्र, दो श्रमिक अधिकार कार्यकर्ता और दो विस्थापन विरोधी कार्यकर्ता शामिल हैं, पुलिस ने गैरकानूनी रूप से हिरासत में लिया.
इनमें से कुछ छात्रों पर पहले भी इंडिया गेट पर वायु प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान माओवादी नारे लगाने का मामला दर्ज हुआ था.
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