नयी दिल्ली, 13 जुलाई (भाषा) हरियाणा के गुरुग्राम जिले के एक निजी स्कूल में सात-वर्षीय बच्चे की हत्या के पांच साल बाद उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि आरोपी किशोर से नए सिरे से पूछताछ की जानी चाहिए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कथित अपराध के लिए उसके खिलाफ एक वयस्क के तौर पर मुकदमा चलाया जाए या नहीं।
न्यायालय ने यह भी कहा कि आरोपी किशोर के भविष्य के बारे में सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन किये बगैर निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए।
शीर्ष अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के निष्कर्ष से सहमति जतायी कि मनोवैज्ञानिक की सिफारिश के बाद आरोपी का आगे का मूल्यांकन किया जाना चाहिए था। उच्च न्यायालय ने संस्थान का नाम भी सुझाया था।
न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने मृतक बच्चे के पिता की ओर से दाखिल अपीलों को खारिज कर दिया, जिनमें 11 अक्टूबर, 2018 के पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी।
किशोर न्याय बोर्ड ने दिसम्बर 2017 में कहा था कि हत्या के आरोपी किशोर की मानसिक और शारीरिक क्षमता के आधार पर प्रारम्भिक आंकलनों के बाद उसके खिलाफ वयस्क के तौर पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा था कि किशोर के पास ‘अपराध करने के लिए पर्याप्त मानसिक और शारीरिक क्षमता’ थी।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘किसी व्यक्ति के अपराध करने के कई कारण हो सकते हैं। दुनिया यह मानती है कि कानून का उल्लंघन करने वाले बच्चों के साथ कानून का उल्लंघन करने वाले वयस्कों की तुलना में अलग व्यवहार किया जाना चाहिए। इसका कारण यह है कि बच्चे का दिमाग परिपक्वता तक नहीं पहुंच पाया होता है और यह अब भी विकसित हो रहा होता है।’’
पीठ ने अपने 95 पन्नों के आदेश में कहा, ‘‘इसलिए, बच्चे का विभिन्न मापदंडों पर परीक्षण किया जाना चाहिए और उसे मुख्यधारा में लाने का अवसर दिया जाना चाहिए, अगर उसने अपनी किशोरावस्था के दौरान कानून के विपरीत काम किया है।’’
इसमें कहा गया है कि बाल मनोविज्ञान विकास मनोविज्ञान की एक विशिष्ट शाखा है, इसकी उत्पत्ति इस आधार पर होती है कि बच्चों और वयस्कों में अलग-अलग विचार प्रक्रियाएं होती हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि उसका विचार है कि जहां बोर्ड में बाल मनोविज्ञान या बाल मनोरोग में डिग्री प्राप्त पेशेवर शामिल नहीं हैं, तो बोर्ड अनुभवी मनोवैज्ञानिकों या मनोसामाजिक कार्यकर्ताओं, या अन्य विशेषज्ञों की सहायता लेने के लिए बाध्य होगा।
शीर्ष अदालत ने केंद्र और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को ऐसे मामलों के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने के लिए भी कहा।
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि बच्चे की हत्या के आरोपी 16 वर्षीय छात्र को मुकदमे के दौरान वयस्क माना जाएगा।
पीड़ित परिवार की ओर से पेश अधिवक्ता सुशील टेकरीवाल ने कहा था कि उच्च न्यायालय ने कहा है कि आरोपी को वयस्क के रूप में पेश करने के लिए निचली अदालत द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है और इस मामले में कोई नया फैसला लेने के लिए इसे वापस किशोर न्याय बोर्ड को भेज दिया जाना चाहिये।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने आरोप पत्र में कहा था कि किशोर ने कथित तौर पर परीक्षाएं स्थगित कराने और निर्धारित अभिभावक-शिक्षक बैठक (पीटीएम) रद्द कराने के लिए छात्र की हत्या की थी।
गौरतलब है कि आठ सितंबर, 2017 को गुरुग्राम के भोंडसी इलाके में स्थित स्कूल के शौचालय में छात्र का शव मिला था, जिसका गला कटा हुआ था।
इससे पहले, अदालत ने मीडिया को इस मामले में 16 वर्षीय किशोर के नाम का इस्तेमाल करने से रोक दिया था और इसके बजाय काल्पनिक नाम का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया था। अदालत ने सात वर्षीय पीड़ित का नाम ”प्रिंस” रखा था और किशोर आरोपी का नाम ”भोलू” जबकि स्कूल का नाम ”विद्यालय” रखा गया था।
इससे पहले जांच एजेंसी ने स्कूल बस के चालक अशोक कुमार को यह कहते हुए क्लीन चिट दे दी थी कि अपराध में उसकी संलिप्तता को साबित करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं है। गुड़गांव पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया था।
सीबीआई ने निर्मम हत्या को लेकर राष्ट्रव्यापी रोष फैलने के बाद 22 सितंबर, 2017 को इस मामले की जांच अपने हाथ में ले ली थी।
भाषा सुरेश पवनेश
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