नई दिल्ली: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुधवार को नोएडा मजदूर प्रदर्शन मामले में छात्र-कार्यकर्ता आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत हिरासत रद्द कर दी. कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी और पांच महीने की हिरासत को “राज्य की बनाई हुई कहानी” बताते हुए इसकी कड़ी आलोचना की.
जस्टिस अतुल श्रीधरन और अचल सचदेव की बेंच ने चौधरी की उस बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई की, जिसमें उन्होंने अपनी हिरासत को चुनौती दी थी. कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर किसी दूसरे मामले में उनकी गिरफ्तारी जरूरी नहीं है, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए.
दिल्ली यूनिवर्सिटी की 25 साल की ग्रेजुएट चौधरी और 65 साल के पत्रकार और एक्टिविस्ट सत्यम वर्मा के खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस ने कड़े NSA के तहत मामला दर्ज किया था. चौधरी पर अप्रैल में हुए मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने का आरोप लगाया गया था.
चौधरी के वकील और वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंसाल्वेस ने दिप्रिंट को बताया कि कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को चौधरी को 5 लाख रुपये मुआवजे के तौर पर देने का भी निर्देश दिया है. उन्होंने कहा कि यह रकम उन अधिकारियों से वसूली जाएगी, जिन्होंने NSA लगाने की मंजूरी दी थी.
उन्होंने कहा, “इसे सत्ता के गलत इस्तेमाल का मामला मानते हुए कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा है कि चौधरी ने कुछ भी गलत नहीं किया था और न ही उन्होंने ऐसा कुछ कहा था, जिससे लोग हिंसा करने के लिए भड़क सकते थे. आदेश में बोलने और अपनी बात रखने की आज़ादी की अहमियत और सरकार के खिलाफ बोलने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है.”
बुधवार की सुनवाई के दौरान राज्य ने कोर्ट को बताया कि चौधरी को 12 अप्रैल को सुबह 10:56 बजे गिरफ्तार किया गया था और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत एक नोटिस दिया गया था.
ऊपर बताई गई धारा के तहत किसी व्यक्ति से शांति या अच्छे व्यवहार को बनाए रखने के लिए कारण बताने या बॉन्ड भरने को कहने से पहले कार्यकारी मजिस्ट्रेट को एक औपचारिक लिखित आदेश जारी करना जरूरी है.
यह नोटिस राज्य के इस आरोप के संबंध में चौधरी को दिया गया था कि उन्होंने एक भीड़ को आगजनी और पथराव करने के लिए भड़काया था.
राज्य की दलील के बाद जस्टिस श्रीधरन ने उसके वकील से पूछा कि क्या चौधरी को BNSS की धारा 126 के तहत नोटिस दिया गया था. यह धारा कार्यकारी मजिस्ट्रेट को शांति बनाए रखने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी करने का अधिकार देती है.
राज्य के वकील ने कोर्ट को बताया कि “BNSS की धारा 126 के तहत कोई नोटिस नहीं दिया गया था” और सिर्फ धारा 130 के तहत नोटिस दिया गया था.
बेंच ने कहा कि BNSS की प्रक्रिया के अनुसार धारा 130, धारा 126 के तहत होने वाली पहले की प्रक्रिया के बाद आती है. जस्टिस श्रीधरन ने कहा, “धारा 130 के तहत दिए गए नोटिस के अनुसार, अगर वह बयान देने के लिए तैयार होतीं, तो उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाता, लेकिन सामान्य डायरी में दर्ज जानकारी के अनुसार, उन्हें पहले गिरफ्तार किया गया और उसके बाद नोटिस दिया गया.”
सामान्य डायरी का हवाला देते हुए कोर्ट ने घटनाओं के क्रम को लेकर राज्य के वकील के दावे पर सवाल उठाया. कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि नोटिस तैयार किए जाने से पहले ही चौधरी को गिरफ्तार किया जा चुका था.
बेंच ने कहा, “उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया, बल्कि पहले गिरफ्तार किया गया. अगर उन्हें पहले गिरफ्तार किया गया होता, तो GD नंबर नहीं होता या फिर वह हाथ से लिखा हुआ होता.”
कोर्ट ने नोएडा मजदूर प्रदर्शन के दौरान कथित हिंसा में चौधरी की भूमिका को लेकर राज्य की दलील की भी जांच की. राज्य के दावे के अनुसार, “11 अप्रैल को लोग नोएडा में प्रदर्शन करने के लिए इकट्ठा हुए थे.”
इस पर सवाल उठाते हुए बेंच ने कहा कि 11 अप्रैल को कोई हिंसा नहीं हुई थी और “जो भी हिंसा हुई है, वह उनकी गिरफ्तारी के बाद हुई है.”
कोर्ट ने मंगलवार को ही राज्य के वकील से ऐसी फुटेज पेश करने को कहा था, जिससे यह पता चल सके कि क्या चौधरी ने प्रदर्शनकारियों को पथराव या आगजनी जैसी हिंसा करने के लिए भड़काया था.
राज्य ने इसके लिए समय मांगा था, लेकिन कोर्ट ने यह कहते हुए मना कर दिया कि चौधरी पिछले पांच महीने से हिरासत में हैं. कोर्ट ने राज्य के वकील से चौधरी की कथित भूमिका के अपने दावे के समर्थन में ठोस सबूत भी पेश करने को कहा था.
राज्य ने कोर्ट को बताया था कि आरोपपत्र पहले ही दाखिल किया जा चुका है. इस पर कोर्ट ने कहा कि राज्य को तब यह देखना चाहिए था कि गवाहों ने चौधरी का नाम लिया था या नहीं. हालांकि, राज्य के वकील ने कहा कि उनके पास सिर्फ गवाहों के बयान हैं.
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