बिलौटी/भोजपुर (बिहार): उमस भरी दोपहर में 45 साल के राज किशोर चौधरी अपना घर बना रहे हैं. वह यह काम खुद कर रहे हैं क्योंकि उनके पास मजदूर या राजमिस्त्री रखने के पैसे नहीं हैं. पास में रखे प्रेशर कुकर में सीटी बज रही है. दोपहर के खाने का समय होने वाला है और चौधरी थोड़ा आराम करने लगते हैं.
चौधरी उन करीब 70 परिवारों में शामिल हैं, जो बिहार के भोजपुर जिले के बिलौटी गांव के पूर्वी हिस्से में बस रहे हैं. सरकार ने इन परिवारों को यहां ज़मीन दी है. भोजपुर तीन तरफ से नदियों से घिरा हुआ निचला मैदानी इलाका है और यहां की ज़मीन बहुत उपजाऊ है.
इनमें से कुछ परिवारों को सरकार की ओर से 1.2 लाख रुपये के पुनर्वास पैकेज में से 80,000 रुपये मिल चुके हैं. यहां हैंडपंप लगाए गए हैं, बिजली के खंभे लगाए गए हैं और विस्थापित परिवारों को बिजली भी मिल रही है. देखने में लगता है कि यहां विकास का काम बहुत तेज़ी से हो रहा है, लेकिन पुनर्वास की यह रफ्तार पूरी सच्चाई नहीं बताती. हाल ही में हुई एक मौत ने विस्थापित लोगों के प्रति सरकारी लापरवाही और अब यहां विकास को लेकर प्रशासन की बढ़ी दिलचस्पी के बीच साफ फर्क दिखा दिया है.
वह मौत भरत तिवारी की थी.
चौधरी बताते हैं, “यहां बुनियादी विकास का काम तेज़ होने के लिए एक जान चली गई. पहले सिर्फ बिजली के खंभे थे, लेकिन उनमें तार नहीं थे. कच्ची सड़क के दोनों तरफ नीची ज़मीन थी.” वह याद करते हैं कि जब करीब दो महीने पहले वह यहां आकर बसने लगे थे, तब हालात ऐसे थे.
उन्होंने कहा, “सिर्फ भरत तिवारी की लगातार कोशिशों और हमारे लिए आवाज़ उठाने की वजह से हमें ये सारी सुविधाएं मिल सकीं. दुख की बात है कि जिन मांगों को उनकी ज़िंदगी में किसी ने नहीं सुना, उनकी मौत के बाद उन्हीं कामों को अब दोगुनी तेज़ी से किया जा रहा है.”

पिछले साल आई बाढ़ के बाद जवनिया गांव से विस्थापित होकर यहां बसे लगभग सभी लोग चौधरी की बात से सहमत हैं.
यह भरत तिवारी की कहानी का दूसरा पहलू है. 28 साल के भरत तिवारी लोगों के हक के लिए खड़े हुए और बिना लाइसेंस वाले हथियार के साथ भोजपुर पुलिस का सामना किया. इसी बस्ती में, जहां चौधरी अब अपना नया घर बना रहे हैं, पुलिस से उनकी मुठभेड़ हुई थी और वहीं उनकी मौत हो गई.
भोजपुर पुलिस का दावा है कि भरत तिवारी मुठभेड़ में मारे गए क्योंकि उनके पास हथियार थे और वे पुलिसकर्मियों और समाज की सुरक्षा के लिए खतरा थे, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों, जिनमें ज्यादातर जवनिया गांव के विस्थापित लोग हैं, की कहानी अलग है. उनका साफ कहना है कि भरत तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया था और अपना हथियार भी फेंक दिया था. ऐसे में उन्हें गोली मारने की कोई ज़रूरत नहीं थी.
चौधरी बिना किसी हिचकिचाहट के कहते हैं, “यह साफ तौर पर हत्या का मामला है.” यह कहते हुए वह फिर से गारा उठाकर काम में लग जाते हैं.

इस मुठभेड़ और उसके बाद लगे आरोप-प्रत्यारोप ने बिहार में सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर दी.
मुख्यमंत्री ने मामले की जांच के लिए पटना हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक तथ्य जांच समिति बनाई. इस बीच भोजपुर पुलिस ने इस कथित मुठभेड़ में शामिल डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (डीएसपी) राजेश शर्मा, थाना प्रभारी (एसएचओ) राजेश मलाकर और टीम के अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया.
‘जुनूनी, इमोशनल’
भरत तिवारी कौन थे? चार बच्चों में तीसरे नंबर पर जन्मे तिवारी अपने परिवार के लोगों के बीच हमेशा से ही किसी भी पब्लिक काम में शामिल होने के लिए हमेशा तैयार रहने वाले इंसान के तौर पर जाने जाते थे. उनकी इकलौती बहन कहती हैं कि वह किसी सोशल काम के लिए घर से निकलने से बस एक कॉल दूर रहते थे.
उनकी बहन पुष्पा देवी याद करती हैं, “जैसे ही उन्हें किसी प्रॉब्लम या घटना के बारे में कॉल आता था, जिसमें उनकी मौजूदगी की ज़रूरत होती थी, वह खाना या कोई और काम बीच में ही छोड़ देते थे.” भरत के पिता काशीनाथ तिवारी बिहार पुलिस में कांस्टेबल और ड्राइवर थे और जब वह ड्यूटी पर होते थे, तो परिवार उनके साथ रोहतास जिले के डेहरी-ऑन-सोन में रहता था.
भरत की पढ़ाई-लिखाई रोहतास में ही हुई और उन्होंने एक लोकल कॉलेज से बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री हासिल की. हालांकि, उनके परिवार के मुताबिक, उन्होंने पुलिस में शामिल होने के मकसद से कुछ फिजिकल ट्रेनिंग के अलावा, भोजपुर या जिले के बाहर कभी नौकरी करने की कोशिश नहीं की.
बिलौटी में अपने घर पर उनके पिता ने कहा, “वह स्कूल के दिनों से ही एक एक्टिविस्ट थे. वह हमेशा बड़े इवेंट्स में हिस्सा लेते थे और उन एक्टिविटीज़ को करने के लिए कड़ी मेहनत करते थे.”
गांववालों ने दिप्रिंट को बताया, घर ज़्यादातर सीनियर तिवारी की पेंशन पर चलता था; भरत के एक्टिविज़्म और गरीबों को दिए जाने वाले डोनेशन से सिर्फ उनके पिता नाराज़ होते थे.
भरत की मां याद करती हैं कि उन्होंने कुछ लाख रुपये खर्च किए थे जो परिवार को उनके घर के पास की ज़मीन बेचकर मिले थे. 60 साल की आशा देवी ने दिप्रिंट को बताया, “शायद यह उनके बागी नेचर की कीमत थी. वह बागी पैदा हुए और बागी ही मरे.”
सीनियर तिवारी ने कहा कि भरत अपनी मर्ज़ी के व्यक्ति थे और उन चीज़ों पर कभी किसी की बात नहीं मानते थे जो उनके लिए खास मायने रखती थीं. सीनियर तिवारी ने कहा, “वह हिंदू राष्ट्र में विश्वास करते थे और 2022 में (खुद को भगवान कहने वाले) धीरेंद्र शास्त्री से मिलने मध्य प्रदेश के छतरपुर पैदल गए थे. मैंने उन्हें पैदल जाने के खतरे के बारे में समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं रुके.”
भरत तिवारी की मां आशा देवी को दुख है कि उनके बेटे ने अपने बागी स्वभाव की कीमत अपनी जान देकर चुकाई | फोटो: मयंक कुमार/दिप्रिंट
पुलिस के साथ अपनी जानलेवा मुठभेड़ से तीन हफ्ते पहले, तिवारी ने बिलौटी के गांव वालों से किए अपने वादों में से एक को पूरा होते देखा था. बिलौटी के रहने वाले मुन्ना कुमार पासवान के मुताबिक, ज़िला प्रशासन ने इस इलाके में एक फायर स्टेशन बनवाया और उसे शुरू किया, जो तिवारी की लंबे समय से की जा रही मांग थी.
तिवारी ने 24 मई को अपने फेसबुक अकाउंट पर लिखा, “इस इलाके और देश के लोगों से किए गए वादे काफी हद तक पूरे हो चुके हैं; आरा ज़िले और बाकी बिहार से जुड़े बाकी वादे भी जल्द ही पूरे हो जाएंगे. मैं इस इलाके के लिए ‘फायर भवन’ का काम शुरू करने के लिए भोजपुर के ज़िलाधिकारी को दिल से धन्यवाद देता हूं.”
एनकाउंटर और झड़पें
भरत तिवारी की जान लेने वाली फायरिंग के पुलिस वाले वर्जन के असली होने पर सवाल उनके फेसबुक अकाउंट से लाइव-स्ट्रीम किए गए वीडियो से उठे. वह वीडियो, जो 3.42 मिनट का था और 17 जून को सुबह करीब 10 बजे रिकॉर्ड किया गया था, उसमें तिवारी कह रहे हैं कि एडमिनिस्ट्रेशन ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि उनकी सभी मांगें पूरी की जाएंगी.
तिवारी ने फेसबुक पर जो पोस्ट पहले ही डाल दी थीं, उनके मुताबिक, जवनिया गांव के रिहैबिलिटेशन साइट पर जो सीन हो रहा था, उसे बनने में काफी समय लगा था.
तिवारी ने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक वीडियो में यही वर्जन शेयर करते हुए लिखा, “मैं समाज और देश के लोगों को बताना चाहता हूं कि बिहार के मुख्यमंत्री और उनका भोजपुर एडमिनिस्ट्रेशन जवनिया गांव के लोगों को दी गई निचली, गड्ढों वाली सरकारी ज़मीन को भरने में नाकाम रहे हैं; न ही उन्होंने इस मामले पर कोई अपडेट दिया है.”
16 जून को टकराव शुरू होने से एक हफ्ते से भी ज़्यादा समय पहले तिवारी ने 7 जून को एक पोस्ट में हिंदी में कहा था, “मैं दो-चार दिन और इंतज़ार करूंगा; अगर वे बातों से नहीं सुनते, तो उन्हें गोलियों से सुनना चाहिए क्योंकि मैंने पहले ही एक क्रांतिकारी जंग का ऐलान कर दिया है, तो कोई गारंटी नहीं है कि इस मकसद के खिलाफ कोई भी घटिया हरकत करने वाले नीच लोगों पर कब गोलियों की बौछार हो जाए. उस एसडीएम उस कमीने का एनकाउंटर तो होगा ही, लेकिन उससे पहले, जो भी ऐसे कामों में शामिल पाया जाएगा, उसे सबसे पहले खत्म किया जाएगा, जिससे इस देश में एक नई क्रांतिकारी जंग शुरू हो जाएगी.”
लेकिन यह तिवारी का एडमिनिस्ट्रेशन के साथ पहला टकराव नहीं था. शाहपुर पुलिस स्टेशन ने उन पर एक पुलिस टीम के साथ गाली-गलौज और मारपीट के आरोप में केस किया था, जो उनके पिता और बिलौटी शहर के एक दूसरे लोकल रहने वाले के बीच ज़मीन के झगड़े की कॉल पर आई थी. उस घटना की रिपोर्ट में, एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर ने आरोप लगाया था कि तिवारी ने उनके साथ गाली-गलौज की, जब उनसे उस ज़मीन से जुड़े डॉक्यूमेंट्स दिखाने के लिए कहा गया तो उन्होंने उनका कॉलर पकड़ लिया.
तिवारी के फेसबुक अकाउंट पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषणों के कई वीडियो हैं, जिनमें वे कानून-व्यवस्था पर अपनी सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड और राज्य से माफिया को खत्म करने में एनकाउंटर की भूमिका पर चर्चा करते हैं.
घटना से पहले के दिनों में भरत तिवारी के फेसबुक पोस्ट में ‘एनकाउंटर’ शब्द का बार-बार इस्तेमाल किया गया था, और जगदीशपुर के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट उनकी लिस्ट में पहला और मुख्य टारगेट थे.
सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल होने के बाद, जिसमें वह हथियार लहरा रहे थे और पुलिस उनसे हथियार छीनने की नाकाम कोशिश कर रही थी, भोजपुर पुलिस ने एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि तिवारी मानसिक रूप से बीमार थे और प्रशासन उन्हें इलाज के लिए ले जाने की कोशिश कर रहा था.
16 और 17 जून को शाम और रात में पुलिस बीच-बीच में मौजूद रही, लेकिन जिस दिन उन्हें गोली मारी गई, उस दिन सुबह तक तिवारी को शायद घेर लिया गया था. उन्होंने अपनी मुठभेड़ के कई वीडियो अपलोड किए, जिसमें 17 जून की सुबह का एक वीडियो भी शामिल है, जिसमें वह पुलिस की गाड़ी पर गोली चलाते दिख रहे हैं. तिवारी ने फेसबुक पर लिखा था, “देश की इस क्रांतिकारी लड़ाई में बिहार पुलिस पर गोलियां चलाई गईं, और जब मैं उनका एनकाउंटर करने निकला तो वे दुम दबाकर भाग गए.”
‘गरीबों के लिए मारा गया’
चौधरी तिवारी की हत्या पर अपना गुस्सा निकालना बंद नहीं कर रहे थे. उन्होंने कहा, “हम यहां मौके पर थे और अपनी आंखों से देखा कि उसने सरेंडर करने की इच्छा जताई थी. उसे एडमिनिस्ट्रेशन ने सिर्फ इसलिए सज़ा दी क्योंकि इससे उनके ईगो को ठेस पहुंची कि कोई आम आदमी जवनिया से बेघर हुए लोगों के फायदे के लिए अपनी आवाज़ उठा रहा है.”
नीता देवी ने कहा कि सुबह करीब 9 बजे थे जब उन्होंने तिवारी को मौके पर आते देखा, उनके पीछे उनके गांव के दूसरी तरफ से एक पुलिस टीम आई. उन्होंने कहा, “वह रोज़ आते थे और हमें सिर्फ यह भरोसा दिलाते थे कि सब कुछ हो जाएगा. अब हम जैसे लोगों के लिए आवाज़ उठाने की हिम्मत कौन करेगा जिनकी ज़िंदगी में कुछ नहीं बचा है?”
“हमें कोई शक नहीं है कि उन्हें सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि वह हमारे जैसे गरीब और बेघर लोगों के हक के लिए आवाज़ उठा रहे थे. वरना उन्हें क्यों मारा जाता? अगर उन्होंने दूसरों की तरह आवाज़ नहीं उठाई होती, तो उन्हें नहीं मारा जाता. सड़क कच्ची है और बारिश में बह जाएगी. हम पिछले साल बाढ़ में बेघर हो गए थे क्योंकि हम निचले इलाके में रहते थे और हमें ऐसे ही इलाके में ज़मीन दी गई थी.”
झोकर बिन की भी यही राय है. “आपको नहीं पता कि उन्हें क्यों मारा गया?”
65 साल के झोकर ने गुस्से से पूछा, “उन्हें इसलिए मारा गया क्योंकि उन्होंने गरीब लोगों के हक़ के लिए आवाज़ उठाई थी. जो लोग गरीबों के लिए बोलते हैं, उन्हें अब मारा जाता है…बिहार में यही हाल रहा है. राम मंदिर ट्रस्ट से पैसे लूटने वालों को क्यों नहीं मारा जाता.”
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