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Wednesday, 15 July, 2026
होममत-विमतFTA में व्यापार घाटा नाकामी की निशानी नहीं, पतंग को उड़ाने वाली डोर की तरह ज़रूरी है आयात

FTA में व्यापार घाटा नाकामी की निशानी नहीं, पतंग को उड़ाने वाली डोर की तरह ज़रूरी है आयात

भारत का $1 ट्रिलियन का एक्सपोर्ट टारगेट वैसे ही पूरा किया जाएगा जैसे हर ट्रेडिंग देश ने किया है: जो सबसे सस्ता सामान बेचता है, उससे ज़्यादा इंपोर्ट करके, और सिर्फ़ कुल घाटे की चिंता करके.

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दिप्रिंट में हाल ही में छपे एक लेख में कहा गया है कि भारत के मुक्त व्यापार समझौते (FTA) इसलिए विफल रहे, क्योंकि जिन देशों के साथ ये समझौते हुए, उनके साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार घाटा दूसरे देशों की तुलना में ज्यादा तेज़ी से बढ़ा. आसियान देशों के साथ यह घाटा 381 फीसदी, जापान के साथ 318 फीसदी और कोरिया के साथ 268 फीसदी बढ़ा, जबकि जिन देशों के साथ FTA नहीं है, उनके साथ यह 142 फीसदी बढ़ा. आंकड़े सही हैं, लेकिन उनसे निकाला गया निष्कर्ष सही नहीं है. द्विपक्षीय व्यापार घाटा सिर्फ हिसाब-किताब का मामला है, इसे नुकसान का पैमाना नहीं माना जा सकता. अगर इस घाटे को कम करने के लिए व्यापार नीति बनाई गई, तो भारत और गरीब हो जाएगा.

पहले यह समझते हैं कि रोज़ाना की ज़िंदगी में क्या होता है. हर घर में भारी द्विपक्षीय व्यापार घाटा होता है. हम किराने का सामान, बिजली और दूसरी चीज़ें खरीदते हैं. हम कई दुकानदारों और सेवा देने वालों के ग्राहक होते हैं, लेकिन हम उन्हें अपना श्रम नहीं बेचते. जिस परिवार में घरेलू हेल्पर काम करती है, उस परिवार का उसके साथ 100 फीसदी व्यापार घाटा होता है. परिवार हर महीने उसे पैसे देता है, लेकिन वह उस परिवार से कुछ भी नहीं खरीदती. फिर भी किसी को इससे परेशानी नहीं होती क्योंकि हर कोई जानता है कि आखिर में उसका पूरा हिसाब बराबर हो जाता है. वह अपना श्रम उस परिवार को देती है और बदले में परिवार से उतनी कीमत का सामान नहीं खरीदती, जितना परिवार इस्तेमाल करता है.

नोबेल पुरस्कार विजेता रॉबर्ट सोलोव ने एक बार कहा था, “मेरे और मेरे नाई के बीच हमेशा व्यापार घाटा रहता है क्योंकि वह मुझसे कुछ नहीं खरीदता.” लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा बात को साफ कर देता है. हम सभी अपने एम्प्लॉयर के साथ हमेशा व्यापार सरप्लस में रहते हैं. फिर भी यह रिश्ता दोनों के लिए फायदेमंद होता है.

देशों के साथ भी यही बात लागू होती है. स्विट्जरलैंड घड़ियां बनाने के लिए कच्चा माल कई देशों से खरीदता है. वह घाना और दक्षिण अफ्रीका से सोना, दूसरे विकासशील देशों से स्टील, चमड़ा, नीलम जैसी चीज़ें आयात करता है. फिर वह घड़ियां बनाकर उन्हें उन देशों को ऐसी कीमत पर बेचता है, जिसे वहां के ज्यादातर लोग खरीद नहीं सकते. इसलिए स्विट्जरलैंड का इन देशों के साथ हमेशा द्विपक्षीय व्यापार घाटा रहेगा. लेकिन वह इसे अपनी व्यापार नीति की विफलता नहीं मानता. क्योंकि यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि जब भी स्विट्जरलैंड घाना से एक औंस सोना खरीदे, तो घाना भी हर बार उसके बदले रोलेक्स की एक घड़ी जरूर खरीदे.

टुकड़ों में मत देखिए

अगर हर देश के साथ द्विपक्षीय व्यापार बराबर रखने की बात करें, तो इसका मतलब होगा कि हर सप्लायर उतना ही बड़ा ग्राहक भी बने, लेकिन दुनिया की कोई भी अर्थव्यवस्था ऐसा नहीं कर सकती और न ही कोई समझदार देश ऐसा करने की कोशिश करेगा. भारत चीन से बड़ी मात्रा में लैपटॉप और सर्वर आयात करता है. इन्हीं का इस्तेमाल करके भारत 200 अरब डॉलर की सॉफ्टवेयर सेवाओं का निर्यात करता है, जिनका सबसे बड़ा बाजार अमेरिका और यूरोप हैं.

यानी चीन के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार घाटा और अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार सरप्लस, एक ही उत्पादन प्रक्रिया के दो हिस्से हैं. अगर हर देश का हिसाब अलग-अलग जोड़ेंगे, तो यह पता नहीं चलेगा कि यह पूरी व्यवस्था सही है या नहीं. इसका सबसे साफ उदाहरण भारत का रिकॉर्ड निर्यात है.

वित्त वर्ष 2026 में भारत ने 2 ट्रिलियन रुपये के आईफोन निर्यात किए. इससे हार्मोनाइज्ड सिस्टम के सभी उत्पादों में आईफोन भारत का सबसे ज्यादा निर्यात होने वाला ब्रांड बन गया, लेकिन इन आईफोन में लगने वाले ज्यादातर पुर्जे चीन, दक्षिण कोरिया, ताइवान और जापान से आयात किए जाते हैं. चिप्स, कैमरा मॉड्यूल, केसिंग और दूसरे लगभग सभी हिस्से विदेश से आते हैं. जब आईफोन से भरे कंटेनर समुद्र के रास्ते पश्चिमी देशों की ओर जाते हैं, तो उससे पहले पूर्वी एशिया से आए इन पुर्जों के कारण भारत का उन देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार घाटा बढ़ता है.

अगर हर देश का हिसाब अलग-अलग देखा जाए, तो भारत की यह बड़ी मैन्युफैक्चरिंग सफलता, सामान सप्लाई करने वाले देशों के साथ विफलता और खरीदने वाले देशों के साथ सफलता जैसी दिखाई देगी, लेकिन स्पेशलाइजेशन (विशेषज्ञता) का मतलब ही यही होता है. इसी तरह रत्न और आभूषण उद्योग कच्चे हीरे आयात करता है, उन्हें पॉलिश करता है और फिर 11 अरब डॉलर के हीरे और आभूषण निर्यात करता है.

दवा उद्योग चीन से दवाओं के लिए जरूरी एक्टिव अवयव (API) आयात करता है और 30 अरब डॉलर की दवाएं निर्यात करता है. वहीं रिफाइनरी उद्योग कच्चा तेल आयात करता है और उसे प्रोसेस करके 40 अरब डॉलर के पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात करता है. डोर पतंग के लिए मुसीबत नहीं होती, बल्कि वही उसे आसमान में ऊंचा उड़ाती है. अगर सिर्फ द्विपक्षीय व्यापार के आधार पर आकलन किया जाए, तो पूरी अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर छिप जाती है.

किसी भी देश का कुल व्यापार संतुलन इस बात से तय होता है कि वह कितना निवेश करता है और कितनी बचत करता है, न कि उसने कितने एफटीए किए हैं. भारत अपनी बचत से ज्यादा निवेश कर रहा है, इसलिए उसे चालू खाते (करंट अकाउंट) में घाटा होता है. यह स्थिति तब भी रहेगी, चाहे भारत 10 एफटीए करे या एक भी एफटीए न करे. एफटीए सिर्फ यह बदलते हैं कि व्यापार किस देश के साथ होगा, कौन-से उत्पाद होंगे और उनकी कीमत क्या होगी. अगर एफटीए वाले देशों से सामान सस्ता मिलता है, तो यह भारतीय कंपनियों और ग्राहकों के लिए फायदा है, नुकसान नहीं. इसलिए पूरे व्यापार घाटे के लिए आसियान समझौते को जिम्मेदार ठहराना वैसा ही है, जैसे घरेलू बचत कम होने के लिए किराने वाले को दोष देना.

बेकार सर्टिफिकेट

इस लेख में किया गया दूसरा दावा भी ध्यान से समझने की ज़रूरत है क्योंकि यह सुनने में काफी सख्त लगता है. दावा किया गया है कि भारत के केवल 20-30 फीसदी जायज निर्यात में ही एफटीए की सुविधा का इस्तेमाल होता है, जबकि भारत में सामान बेचने वाले 60-70 फीसदी विदेशी निर्यातक इसका फायदा उठाते हैं. इसलिए ये समझौते एकतरफा हैं, लेकिन ‘यूटिलाइजेशन रेट’ से फायदे का नहीं, बल्कि कागजी प्रक्रिया (पेपरवर्क) का पता चलता है. कोई निर्यातक एफटीए की सुविधा तभी लेता है, जब उसे मिलने वाली बचत, यानी सामान्य MFN (मोस्ट फेवर्ड नेशन) टैरिफ और एफटीए टैरिफ के बीच का अंतर, जरूरी कागजी प्रक्रिया की लागत से ज्यादा हो.

अनुभव बताता है कि अगर यह अंतर 5 प्रतिशत अंक से कम हो, तो ज्यादातर निर्यातक FTA का दावा ही नहीं करते. जापान अपने ज्यादातर मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों पर शून्य या लगभग शून्य MFN टैरिफ लगाता है. इसलिए ओसाका को सामान भेजने वाले भारतीय इंजीनियरिंग निर्यातक के पास एफटीए का दावा करने से कोई खास फायदा नहीं होता और वह कोई कागज जमा नहीं करता. इसके उलट, भारत में औसत आयात शुल्क दुनिया के कई बड़े देशों से ज्यादा है. इसलिए भारत में सामान भेजने वाले कोरिया या जापान के निर्यातकों को एफटीए का ज्यादा फायदा मिलता है. उनके लिए सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन अहम हो जाता है. इसलिए ‘यूटिलाइजेशन रेट’ में अंतर का मतलब यह नहीं है कि भारत के वार्ताकार हार गए. यह सिर्फ यह दिखाता है कि भारत में आयात शुल्क की दीवार अभी भी काफी ऊंची है.

इसके अलावा, एफटीए का कम इस्तेमाल सिर्फ भारत की समस्या नहीं है. दुनिया के हर बड़े व्यापारिक देश में प्राथमिकता उपयोग दर 100 फीसदी से कम रहती है, क्योंकि ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’ का पालन करने में एक तय लागत आती है. छोटी कंपनियों के लिए इसे पूरा करना आसान नहीं होता. इसके अलावा, कई देशों में यह सर्टिफिकेट अब लगभग बेकार हो चुका है. कई सालों से व्यापार उदारीकरण होने की वजह से जापान, सिंगापुर और दूसरे अमीर देशों में ज्यादातर मैन्युफैक्चरिंग सामान पर सामान्य MFN टैरिफ लगभग शून्य हो चुका है.

ऐसे में एफटीए का दावा करने के लिए कोई खास फायदा नहीं बचता और ‘यूटिलाइजेशन रेट’ का भी ज्यादा मतलब नहीं रह जाता. स्विट्जरलैंड ने जनवरी 2024 में इससे भी एक कदम आगे बढ़कर सभी औद्योगिक सामान पर आयात शुल्क एकतरफा खत्म कर दिया. उसका तर्क था कि टैरिफ से मिलने वाली कमाई, उस कागजी प्रक्रिया के मुकाबले फायदेमंद नहीं है, जो कंपनियों पर बोझ बनती है. जब सामान्य आयात शुल्क ही शून्य हो, तो ‘सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन’ और ‘यूटिलाइजेशन रेट’ का भी कोई मतलब नहीं रह जाता, जहां एफटीए का असली फायदा बचता है, वहां सेल्फ सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन, डिजिटल फाइलिंग और आसान ‘वैल्यू कंटेंट’ नियमों को बेहतर बनाया जा सकता है.

भारत इन सुधारों पर बातचीत कर सकता है और इन्हें अपने कस्टम्स प्रशासन में लागू कर सकता है. इसका मतलब यह नहीं है कि हर एफटीए पर शक किया जाए. द्विपक्षीय व्यापार घाटे की गलत सोच से भारत पहले भी नुकसान उठा चुका है. इसी सोच के कारण भारत ने 2019 में रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (RCEP) से खुद को अलग कर लिया था. इसका नुकसान यह हुआ कि भारतीय कंपनियां दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक समूह से बाहर रह गईं, जबकि वियतनाम इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन का अहम हिस्सा बन गया. आज भारत उसी सप्लाई चेन को उत्पादन सब्सिडी देकर अपनी ओर लाने की कोशिश कर रहा है.

अगर भारत को 1 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात का लक्ष्य हासिल करना है, तो उसे वही तरीका अपनाना होगा, जिसे दुनिया के दूसरे व्यापारिक देशों ने अपनाया है. जहां से सामान सबसे सस्ता मिले, वहां से आयात करना होगा और सिर्फ सबसे महत्वपूर्ण कुल व्यापार संतुलन (ओवरऑल बैलेंस शीट) पर ध्यान देना होगा. यही सबसे ज़रूरी बात है. इसका फैसला हनोई या सियोल के कस्टम्स विभागों के आंकड़े नहीं, बल्कि मुंबई में बचत और निवेश से जुड़े फैसले करेंगे.

वाणिज्य मंत्रालय को चाहिए कि वह हर देश के साथ द्विपक्षीय व्यापार घाटे के आंकड़ों को रिपोर्ट कार्ड की तरह जारी करना बंद करे. इसके बजाय सिर्फ दो आंकड़े जारी करे— पहला, GDP के मुकाबले कुल व्यापार कितना है. दूसरा, भारत के निर्यात में आयातित सामान का हिस्सा कितना है. ये दोनों आंकड़े जितने बड़े होंगे, उतना ही बेहतर होगा.

शुभो रॉय XKDR में लीगल रिसर्चर हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

बिदिशा भट्टाचार्य का जवाब

भारत में एफटीए के कम ‘यूटिलाइजेशन’ को लेकर मेरे लेख के जवाब में जो बात कही गई है, उसमें ऐसा मुद्दा उठाया गया है, जिस पर मैंने कभी सवाल नहीं उठाया. जवाब का मुख्य तर्क यह है कि द्विपक्षीय व्यापार घाटा सिर्फ हिसाब-किताब का मामला है, इसे किसी तरह का स्कोरकार्ड नहीं माना जाना चाहिए. यह बात सही है. मेरे लेख में भी इससे अलग कोई दावा नहीं किया गया था. मैंने कभी नहीं कहा कि आसियान, जापान और कोरिया के साथ भारत का बढ़ता द्विपक्षीय व्यापार घाटा किसी विफलता का सबूत है. मैंने सिर्फ इतना कहा था कि बढ़ता व्यापार घाटा, साथ ही भारत के निर्यात में 20-30 फीसदी ‘यूटिलाइजेशन’ और आयात में 60-70 फीसदी ‘यूटिलाइजेशन’ यह दिखाता है कि भारतीय निर्यातक उन सुविधाओं का पूरा इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, जो एफटीए के जरिए उनके लिए हासिल की गई थीं.

इस मामले में, जवाब और मेरी राय में उतना अंतर नहीं है, जितना बताया गया है. जवाब में कहा गया है कि ‘यूटिलाइजेशन’ में अंतर इसलिए है क्योंकि भारतीय सामान पर विदेशों में पहले से ही लगभग शून्य MFN टैरिफ लगता है, जबकि भारत में सामान बेचने वाले विदेशी निर्यातकों को यहां ऊंचे आयात शुल्क का सामना करना पड़ता है. मैंने भी अपने लेख में इसी बात को बताया था. यह जानकारी GTRI के विश्लेषण पर आधारित है. उसने इसके लिए कुछ उपाय भी सुझाए हैं, जैसे सेल्फ सर्टिफिकेशन, डिजिटल फाइलिंग और मूल स्रोत (रूल्स ऑफ ओरिजिन) के आसान नियम. ये उपाय लगभग वैसे ही हैं, जैसे FTA इम्पैक्ट मॉनिटरिंग अथॉरिटी और SME कंप्लायंस व्यवस्था बनाने की मांग मैंने की है. यानी हम लगभग एक जैसे समाधान की बात कर रहे हैं. फर्क सिर्फ इस बात को लेकर है कि समस्या की पहचान कैसे की जाए.

RCEP के मामले में हमारी राय पूरी तरह अलग है. मैंने 2019 में भारत के RCEP से बाहर होने का ज़िक्र उसका समर्थन करने के लिए नहीं किया था. मैंने इसका जिक्र सिर्फ यह दिखाने के लिए किया था कि द्विपक्षीय व्यापार घाटे का मुद्दा पहले भी भारत की व्यापार नीति को प्रभावित कर चुका है. मेरा मकसद सिर्फ यह बताना था कि दिल्ली में इन आंकड़ों का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है. मैं यह नहीं कह रही थी कि RCEP से बाहर होना सही फैसला था या गलत. ‘यूटिलाइजेशन’ कम होने का मतलब यह नहीं है कि एफटीए को ही गलत मान लिया जाए.

इसका मतलब सिर्फ इतना है कि बेहतर निगरानी, आसान नियम और निर्यात को मदद देने वाली व्यवस्था बनाई जाए. इससे भारतीय कंपनियां उन समझौतों का सही फायदा उठा सकेंगी, जिन पर भारत के वार्ताकारों ने हस्ताक्षर किए हैं.

यही पतंग की डोर है. इसके बिना 1 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात वाली पतंग उड़ नहीं पाएगी.

इसके साथ ही दिप्रिंट चर्चा समाप्त करता है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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