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Friday, 10 July, 2026
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महाराष्ट्र और ओडिशा की महिलाओं के लिए नकद सहायता योजनाओं से बढ़ी आर्थिक स्वतंत्रता—EAC-PM रिपोर्ट

एक स्टडी से पता चला है कि महाराष्ट्र में जिन महिलाओं को कैश ट्रांसफर मिलता है, उनके पुरुष रिश्तेदार हर महीने 49% कम खर्च करते हैं और 23% ज़्यादा बचत करते हैं, जबकि महिलाओं का अपना खर्च 46% बढ़ गया है. ओडिशा में भी पुरुषों के खर्च में कमी देखी गई है.

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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के इस महीने प्रकाशित एक वर्किंग पेपर में कहा गया है कि महाराष्ट्र में जब महिलाओं को मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना के तहत हर महीने 1,500 रुपये मिलने लगे, तो उनके घर के पुरुषों ने अपना खर्च लगभग आधा कर दिया और अपने बैंक खातों में ज्यादा पैसे बचाने लगे.

इस पेपर में योजना की लाभार्थी महिलाओं और उनके बैंक खातों से जुड़े रिश्तेदारों के महीने-दर-महीने बैंक अकाउंट के आंकड़ों का अध्ययन किया गया है. इसे EAC-PM के पार्ट-टाइम सदस्य और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर सौम्य कांति घोष और SBI की अर्थशास्त्री शगिश्ना के ने लिखा है.

लाडकी बहिन योजना की लाभार्थी महिलाओं के पुरुष रिश्तेदारों के बैंक खातों में महीने के आखिर में बची रकम औसतन 23 प्रतिशत बढ़कर 8,234 रुपये से 10,144 रुपये हो गई. वहीं उनका मासिक खर्च 49 प्रतिशत घटकर 3,124 रुपये से 1,607 रुपये रह गया. लेखकों ने इसे “फाइनेंशियल सब्स्टीट्यूशन इफेक्ट” कहा है. उनके मुताबिक, इस योजना से मिलने वाली राशि के कारण महिलाओं को रोजमर्रा के खर्च के लिए पुरुष रिश्तेदारों पर पहले जितना निर्भर नहीं रहना पड़ता.

उन्होंने यह भी कहा कि पुरुषों के खर्च में आई कमी का मतलब यह नहीं है कि परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हुई है. बल्कि अब खर्च की जिम्मेदारी पुरुष से महिला की तरफ चली गई है. इसी दौरान महिलाओं का अपना खर्च 46 प्रतिशत बढ़ गया.

ओडिशा में भी ऐसा ही रुझान देखने को मिला. सुभद्रा योजना की लाभार्थी महिला के बैंक खाते में औसतन 10 प्रतिशत बढ़ोतरी होने पर उसके रिश्तेदारों का खर्च 1.9 प्रतिशत कम हुआ. ओडिशा के आंकड़ों में जुड़े रिश्तेदारों में 40 प्रतिशत पति, 21 प्रतिशत पिता और 14 प्रतिशत बेटे थे. वहीं महाराष्ट्र में 68 प्रतिशत जुड़े रिश्तेदार पति थे.

ओडिशा में किए गए एक अलग परीक्षण में यह नहीं पाया गया कि महिला लाभार्थी के खर्च और उसके पुरुष रिश्तेदार के बैंक बैलेंस के बीच कोई महत्वपूर्ण संबंध है. लेखकों का कहना है कि इससे पता चलता है कि महिलाएं अब घर के पुरुषों पर निर्भर हुए बिना अपने खर्च का फैसला कर रही हैं. पेपर में इसे “उभरती हुई आर्थिक स्वतंत्रता” कहा गया है.

दोनों योजनाएं

महाराष्ट्र सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग ने जून 2024 में, विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले, लाडकी बहिन योजना की घोषणा की थी. इसके तहत 21 से 65 साल की उन महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपये दिए जाते हैं, जो महाराष्ट्र की निवासी हैं और जिनके परिवार की सालाना आय 2.5 लाख रुपये से कम है. योजना का पैसा जुलाई 2024 से लागू माना गया और अगस्त 2024 में महिलाओं के खातों में पहली किस्त के रूप में 3,000 रुपये भेजे गए.

जो महिलाएं पहले से किसी दूसरी सरकारी योजना के तहत हर महीने 1,500 रुपये या उससे ज्यादा पा रही हैं, उन्हें इस योजना का लाभ नहीं मिलता. आयकर देने वाले लोग, सांसद, विधायक, सरकारी या पीएसयू कर्मचारी वाले परिवार और ट्रैक्टर छोड़कर चार पहिया वाहन रखने वाले परिवार भी इसके दायरे से बाहर हैं. यह पैसा महिला के आधार से जुड़े, उसके नाम वाले सिंगल बैंक खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए भेजा जाता है.

पेपर के मुताबिक, इस योजना का उद्देश्य सिर्फ आर्थिक मदद देना नहीं है, बल्कि महिलाओं को आर्थिक आजादी देना और परिवार के फैसलों में उनकी भूमिका मजबूत करना भी है. इसमें पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे 2023-24 का हवाला दिया गया है, जिसके अनुसार 15 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों में महिलाओं की वर्कर पॉपुलेशन रेशियो 29.8 प्रतिशत थी, जबकि पुरुषों की 74.3 प्रतिशत थी.

ओडिशा सरकार ने 17 सितंबर 2024 को सुभद्रा योजना शुरू की थी. इसके तहत महिलाओं को साल में 10,000 रुपये दिए जाते हैं. यह राशि 5,000-5,000 रुपये की दो किस्तों में मिलती है. पहली किस्त रक्षी पूर्णिमा पर और दूसरी 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर दी जाती है. पांच साल में यानी 2029 तक कुल 50,000 रुपये दिए जाएंगे. इस योजना का लाभ 21 से 60 साल से कम उम्र की उन महिलाओं को मिलता है, जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम या राज्य की खाद्य सुरक्षा योजना के तहत आती हैं, या जिनके परिवार की सालाना आय 2.5 लाख रुपये से कम है. बाकी नियम महाराष्ट्र की योजना जैसे ही हैं.

इस योजना का लक्ष्य ओडिशा के 30 जिलों में एक करोड़ से ज्यादा महिलाओं को कवर करना है. मार्च 2026 तक करीब 1.02 करोड़ महिलाओं को चौथी किस्त मिल चुकी थी. इस योजना पर सालाना करीब 10,145 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं. बाद में राज्य सरकार ने इसका विस्तार करते हुए सुभद्रा प्लस शुरू करने की घोषणा की, जिसमें कॉल सेंटर, बचत, बीमा और छात्रवृत्ति जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं.

हर महीने करीब 833 रुपये देने वाली सुभद्रा योजना देश की सबसे छोटी नकद सहायता योजना है. दिल्ली की महिला समृद्धि योजना और झारखंड की सीएम मइयां सम्मान योजना में हर महीने 2,500 रुपये मिलते हैं. पश्चिम बंगाल की अन्नपूर्णा भंडार योजना, जो लक्ष्मीर भंडार की जगह ले रही है, उसमें 3,000 रुपये दिए जाते हैं.

खर्च करने की प्रवृत्ति

इस अध्ययन में महाराष्ट्र की 44,547 महिलाओं के 36 महीनों के बैंक खाते के आंकड़ों और ओडिशा की 1.61 लाख महिलाओं के आंकड़ों का अध्ययन किया गया. इसमें 2.5 लाख रुपये से कम सालाना आय वाले परिवारों की महिलाओं की तुलना 2.5 लाख से 3 लाख रुपये सालाना आय वाले परिवारों की महिलाओं से की गई.

महाराष्ट्र में योजना शुरू होने से पहले लाभार्थियों के बैंक खातों में महीने के आखिर में औसतन 8,201 रुपये रहते थे. योजना के बाद यह रकम 6,884 रुपये यानी 84 प्रतिशत बढ़ गई. वहीं हर महीने निकाली जाने वाली राशि 1,349 रुपये यानी 46 प्रतिशत बढ़ गई. ओडिशा में बैंक बैलेंस 6,887 रुपये और खर्च 1,920 रुपये बढ़ा.

मार्जिनल प्रोपेंसिटी टू कंज्यूम यानी अतिरिक्त मिले पैसे में से खर्च करने की दर करीब 0.9 रही. यानी महाराष्ट्र में हर 1,500 रुपये मिलने पर उसमें से लगभग 1,349 रुपये खर्च किए गए. लेखकों का कहना है कि इससे पता चलता है कि लाभार्थियों के पास पहले पैसे की कमी थी.

उम्र के हिसाब से भी अलग असर देखने को मिला. 55 साल या उससे ज्यादा उम्र की महिलाओं ने औसतन अपने बैंक बैलेंस में 10,835 रुपये जोड़े, लेकिन उनका खर्च सिर्फ 485 रुपये बढ़ा. वहीं 21 से 29 साल की महिलाओं ने अपने बैंक बैलेंस में 1,705 रुपये जोड़े और खर्च 869 रुपये बढ़ाया.

धर्म के आधार पर आंकड़े

महाराष्ट्र के नतीजों का धर्म के आधार पर भी विश्लेषण किया गया.

हिंदू महिलाओं की मासिक बचत में सबसे ज्यादा 7,641 रुपये की बढ़ोतरी हुई और उनका खर्च 1,394 रुपये बढ़ा. मुस्लिम महिलाओं की बचत 5,385 रुपये बढ़ी, लेकिन उनका खर्च सबसे ज्यादा 1,755 रुपये बढ़ा.

“अन्य” श्रेणी में आने वाली महिलाओं, जिनमें सिख, जैन और किसी धर्म को न मानने वाली महिलाएं शामिल थीं, उनके बैंक बैलेंस में 6,086 रुपये और खर्च में 945 रुपये की बढ़ोतरी हुई.

बौद्ध और ईसाई महिलाओं के आंकड़े भरोसेमंद नहीं माने गए. कागज पर ईसाई महिलाओं की बचत सबसे ज्यादा 35,264 रुपये बढ़ी और खर्च 1,307 रुपये कम हुआ. लेकिन बचत के आंकड़े में करीब 22,000 रुपये तक की त्रुटि की संभावना है. यानी असली असर बहुत कम भी हो सकता है या बिल्कुल नहीं भी हो सकता. लेखकों ने कहा कि इन आंकड़ों को योजना के प्रभाव का सबूत नहीं माना जाना चाहिए. पेपर में यह नहीं बताया गया कि अध्ययन में कितनी बौद्ध या ईसाई महिलाएं शामिल थीं.

जहां आंकड़े भरोसेमंद थे, वहां लेखकों ने मुस्लिम महिलाओं के ज्यादा खर्च को अलग पसंद नहीं, बल्कि उनके पास पहले ज्यादा पैसों की कमी होने का संकेत माना. ओडिशा के लिए धर्म के आधार पर ऐसा कोई विश्लेषण नहीं किया गया.

लाइफस्टाइल से जुड़ा डिजिटल खर्च

मर्चेंट कैटेगरी कोड (MCC) के आधार पर यह भी देखा गया कि पैसा कहां खर्च हुआ.

एटीएम से निकाले गए पैसों में शिक्षा पर खर्च की हिस्सेदारी 18 प्रतिशत से बढ़कर 24 प्रतिशत हो गई. यात्रा पर खर्च 31 प्रतिशत से घटकर 29 प्रतिशत और पेट्रोल पंप पर खर्च 26 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत हो गया.

यूपीआई पर तस्वीर अलग रही. योजना शुरू होने से पहले भी और बाद में भी सबसे ज्यादा खर्च लाइफस्टाइल कैटेगरी में हुआ. इसकी हिस्सेदारी 37 प्रतिशत से बढ़कर 42 प्रतिशत हो गई. मेडिकल खर्च 8 प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत हो गया. वहीं यूपीआई के जरिए शिक्षा पर खर्च की हिस्सेदारी 8 प्रतिशत से घटकर 4 प्रतिशत रह गई. पेपर के सार में एटीएम के जरिए शिक्षा पर बढ़े खर्च का जिक्र किया गया है, लेकिन यूपीआई पर घटे खर्च का नहीं.

खर्च और सुझाव

पेपर में “कैश प्लस एम्पावरमेंट फ्रेमवर्क” अपनाने, लाभार्थियों की बेहतर जांच करने और नकद सहायता को बच्चों के पोषण जैसे नतीजों से जोड़ने की भी सिफारिश की गई है.

लाडकी बहिन और सुभद्रा दोनों बिना किसी शर्त वाली योजनाएं हैं. ऐसी ही योजनाएं कम से कम 13 दूसरे राज्यों में भी चल रही हैं. वित्त वर्ष 2026 तक 15 से ज्यादा राज्यों ने ऐसी योजनाएं शुरू कर दी थीं. इन पर कुल मिलाकर करीब 1.7 लाख करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं और करीब 12 करोड़ महिलाओं को लाभ मिल रहा है. वित्त वर्ष 2023 से 2026 के बीच ऐसी योजनाएं चलाने वाले राज्यों की संख्या पांच गुना से ज्यादा बढ़ गई.

इन योजनाओं का बोझ अलग-अलग राज्यों पर अलग तरह से पड़ रहा है. पश्चिम बंगाल अपनी कुल राजस्व खर्च का 11.2 प्रतिशत और कुल राजस्व प्राप्तियों का 12.5 प्रतिशत ऐसी योजनाओं पर खर्च करता है. इसके बाद झारखंड और कर्नाटक का स्थान है. हिमाचल प्रदेश दोनों मामलों में सिर्फ 0.3 प्रतिशत खर्च करता है. झारखंड की मइयां सम्मान योजना में सालाना आय सीमा सबसे ज्यादा 8 लाख रुपये है, जबकि ज्यादातर राज्यों में यह सीमा 2.5 लाख रुपये है.

महाराष्ट्र सरकार का इस योजना पर खर्च पहले 38,310 करोड़ रुपये था, लेकिन ऑडिट के बाद करीब 81 लाख नाम सूची से हटाए गए. इसके बाद खर्च घटकर 26,500 करोड़ रुपये रह गया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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