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Sunday, 5 April, 2026
होमदेश‘‘उस पाठ्यपुस्तक का परिचय देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिसे हम मान्यता नहीं देते’’

‘‘उस पाठ्यपुस्तक का परिचय देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिसे हम मान्यता नहीं देते’’

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नयी दिल्ली, 10 जून (भाषा) राजनीति विज्ञान के विशेषज्ञ सुहास पालसीकर और यागेंद्र यादव ने कहा है कि उन्हें उस पाठ्यपुस्तक का परिचय देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिसे वे अब मान्यता नहीं देते। दोनों ने शनिवार को राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) से एक बार फिर अनुरोध किया कि मुख्य सलाहकार के रूप में उनके नामों को राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों से हटा दिया जाए।

एनसीआरटी को शुक्रवार को लिखे गये पत्र में उन्होंने कहा कि तर्कसंगत बनाने की कवायद में पाठ्यपुस्तकों को ‘विकृत’ कर दिया गया है और इन्हें अकादमिक रूप से बेकार बना दिया गया है।

दोनों ने शनिवार को अपने बयान में कहा कि जो पाठ्यपुस्तकें पहले उनके लिए गर्व का विषय हुआ करती थीं वे अब उनके लिए शर्मिंदगी का विषय बन गयी हैं।

हालांकि, एनसीईआरटी का कहना है कि किसी के भी जुड़ाव को वापस लेने का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि विद्यालयी स्तर पर पाठ्यपुस्तकें किसी दिए गए विषय पर ज्ञान और समझ के आधार पर विकसित की जाती हैं और किसी भी स्तर पर व्यक्तिगत लेखकत्व का दावा नहीं किया जाता है।

पालसीकर और यादव ने बयान में कहा, ‘‘हमने लेखकत्व, कॉपीराइट और एनसीईआरटी के कानूनी प्राधिकार का मुद्दा नहीं उठाया। हमारा कहना बहुत साफ है-यदि वे पाठ को विकृत करने के लिए अपने कानूनी अधिकार का उपयोग कर सकते हैं, तो हमें अपने नाम को उस पाठ्यपुस्तक से अलग करने के अपने नैतिक और कानूनी अधिकार का प्रयोग करने में सक्षम होना चाहिए जिसका हम समर्थन नहीं करते हैं। यदि पाठ्यपुस्तक विकास समिति के नाम हमारे योगदान को स्वीकार करने के लिए हैं, जैसा कि एनसीईआरटी का दावा है, तो हमें इस उदारता को अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए।’’

बयान में कहा गया, ‘‘यदि इस समिति के नाम रिकॉर्ड के रूप में दर्ज किए जाते हैं, जैसा कि दावा किया गय है, तो यह भी दर्ज किया जाना चाहिए कि हम वर्तमान संस्करण को स्वीकार नहीं करते हैं। पुस्तक के वर्तमान संस्करण के अंदर हमारे नामों की निरंतरता समर्थन करने की झूठी धारणा उत्पन्न करती है और हमें इस आक्षेप से अलग होने का पूरा अधिकार है।’’

बयान में आगे उल्लेख किया गया है कि दोनों स्पष्ट रूप से उस हस्ताक्षरित पत्र के ‘लेखक’ हैं जो हर पुस्तक का परिचय देता है।

बयान में कहा गया कि, ‘‘हमें ऐसी पुस्तक का परिचय देने के लिए किस तरह बाध्य किया जा सकता है जिसको हम अब मान्यता नहीं देते? निश्चित ही, यदि एनसीईआरटी को इच्छित परिवर्तन के लिए विशेषज्ञ मिल सकते हैं, तो वह उनके नाम प्रकाशित कर सकती है। लेकिन एनसीआरटी मुख्य सलाहकारों के रूप में हमारे नामों के पीछे नहीं छिप सकती। कृपया उन पाठ्यपुस्तक से हमारे नामों को हटाएं जो कभी हमारे लिए गर्व का विषय हुआ करती थीं, लेकिन अब शर्मिंदगी का विषय बन गई हैं।’’

पालसीकर (शिक्षाविद और राजनीति विज्ञान के विशेषज्ञ) और स्वराज इंडिया के नेता और राजनीति विज्ञान के विशेषज्ञ यादव कक्षा नौ से 12 के लिए राजनीति विज्ञान की पुस्तकों के मुख्य सलाहकार थे, जो मूल रूप से 2006-07 में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या फ्रेमवर्क (एनसीएफ) के 2005 संस्करण के आधार पर प्रकाशित हुई थीं।

दोनों के नामों का उल्लेख ‘छात्रों के लिए लिखे गये पत्र’ और प्रत्येक पुस्तक की शुरुआत में पाठ्यपुस्तक विकास दल के सदस्यों की सूची में है।

पिछले महीने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों से कई विषयों और अंशों को हटाने से विवाद शुरू हो गया था। विवाद के मूल में अहम तथ्य यह है कि तर्कसंगत बनाने की कवायद के तहत किये गये परिवर्तनों के बारे में अधिसूचित किया गया था, लेकिन विवादास्पद रूप से हटाई गई कुछ सामग्री का उल्लेख नहीं किया गया था।

एनसीआरटी ने हटायी गई सामग्री को वापस शामिल करने से इनकार कर दिया और कहा कि ऐसा विशेषज्ञों की सिफारिश पर किया गया है।

भाषा संतोष अविनाश

अविनाश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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