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Monday, 10 August, 2026
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109 साल पुराने 35 हजार रुपये के ‘युद्ध ऋण’ के दावे की जांच करेगा ब्रिटिश सरकार : मप्र परिवार

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सीहोर (मप्र), 10 अगस्त (भाषा) मध्यप्रदेश के एक कारोबारी द्वारा प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार को दिए गए 35 हजार रुपये के ऋण की अदायगी के दावे पर 109 साल बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने विचार करने पर सहमति जताई है। परिवार के सदस्यों ने सोमवार को यह दावा किया।

तत्कालीन नगर सेठ और प्रमुख कारोबारी एवं भू-स्वामी सेठ जुमा लाल रुथिया के पोते विनय और विवेक रुथिया ने यहां पत्रकारों से कहा कि उनके वकील ने फरवरी में पुराने दस्तावेजों और पत्राचार के आधार पर ब्रिटेन के ऋण प्रबंधन कार्यालय (डीएमओ) को नोटिस भेजा था।

दोनों भाइयों के मुताबिक, ब्रिटेन के डीएमओ ने उनके वकील को जवाब देकर मामले में आगे की कार्रवाई के लिए अतिरिक्त दस्तावेज उपलब्ध कराने को कहा है।

उन्होंने बताया कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक ब्रिटिश सेना में शामिल हुए थे और ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के दौरान भोजन, पानी तथा अन्य खर्चों के लिए भारत से बड़ी राशि जुटाई थी।

रुथिया परिवार ने बताया कि उस समय सेठ जुमा लाल ने ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपये दिए थे और इस 109 साल पुराने ऋण से संबंधित दस्तावेज हाल में उन्हें मिले।

चार जून 1917 को जारी दस्तावेज पर भोपाल के एक राजनीतिक एजेंट के हस्ताक्षर हैं। इसमें लिखा है, ‘‘सेठ जुमा लाल रुथिया ने भारतीय युद्ध ऋण में 35 हजार रुपये का अंशदान किया, जिससे सरकार और साम्राज्य के प्रति उनकी निष्ठा प्रदर्शित होती है।’’

विनय रुथिया (65) ने बताया कि दस्तावेज मिलने के बाद उनके वकील श्रीयांश रानीवाल के माध्यम से ब्रिटेन के ऋण प्रबंधन कार्यालय को ईमेल और डाक के जरिए कानूनी नोटिस भेजा गया।

उन्होंने कहा कि हाल में डीएमओ की ओर से उनके वकील को जवाब मिला, जिसमें परिवार को मामले को आगे बढ़ाने के लिए अन्य दस्तावेज उपलब्ध कराने को कहा गया है।

डीएमओ ब्रिटेन के वित्त मंत्रालय के तहत एक कार्यकारी एजेंसी है। उसने परिवार के दावे की पुष्टि या खंडन नहीं किया है।

डीएमओ ने विनय रुथिया के वकील को भेजे पत्र में कहा है कि यदि उनके मुवक्किल को किसी लावारिस भुगतान का हकदार माना जाता है तो उन्हें संबंधित ‘गिल्ट रजिस्ट्रार’ कंप्यूटरशेयर इन्वेस्टर सर्विसेज पीएलसी’ से संपर्क करना चाहिए और संबंधित निवेश से जुड़ी उपलब्ध जानकारी देनी चाहिए।

कार्यालय ने यह भी कहा कि परिवार द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेज और जानकारी आगे भेज दी गई है, लेकिन प्रमाणपत्र और पत्राचार एवं अन्य दस्तावेज उपलब्ध कराना उपयोगी होगा।

रुथिया भाइयों का दावा है कि 35 हजार रुपये की मूल राशि पर एक सदी से अधिक समय का ब्याज जोड़ने पर इसकी मौजूदा कीमत कई करोड़ रुपये हो सकती है।

विवेक रुथिया (63) ने कहा कि उनके दादा सेठ जुमा लाल का 1937 में निधन हो गया था, यानी ऋण देने के करीब 20 साल बाद।

उन्होंने बताया कि उनके दादा की वसीयत के साथ पुराने कागजात में ब्रिटिश सरकार के साथ हुआ पत्राचार और ऋण संबंधी दस्तावेज मिले।

विवेक ने दावा किया कि ब्रिटिश सरकार ने भोपाल रियासत के प्रबंधन को सुचारू बनाने के लिए यह धन उधार लिया था। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सिद्धांत रूप में किसी संप्रभु देश पर उसके पुराने ऋण चुकाने की कानूनी जिम्मेदारी होती है।

भाषा सं दिमो

राजकुमार

राजकुमार

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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