इंदौर, 10 अप्रैल (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में धार के भोजशाला विवाद के मुकदमे में हिंदू पक्ष के एक याचिकाकर्ता ने शुक्रवार को दावा किया कि 11वीं सदी का यह स्मारक परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा स्थापित सरस्वती मंदिर है और इससे जुड़ी ‘ज्ञान पीठ’ में अलग-अलग विद्याओं का अध्ययन किया जाता था।
याचिकाकर्ता ने कहा कि इस मंदिर में स्थापित सरस्वती की मूर्ति फिलहाल लंदन के एक संग्रहालय में है जिसे वापस भारत लाकर भोजशाला में फिर से स्थापित किया जाना चाहिए।
भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है।
उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ भोजशाला के धार्मिक स्वरूप के विवाद को लेकर दायर चार याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रही है। सबसे पहले याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनी जा रही हैं।
सुनवाई के पांचवें दिन हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं में शामिल कुलदीप तिवारी के वकील मनीष गुप्ता ने न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी के सामने अपनी दलीलें पेश कीं।
गुप्ता ने खंडपीठ के सामने स्पष्ट किया कि उनके मुवक्किल की याचिका भोजशाला परिसर पर मालिकाना हक के दावे को लेकर दायर नहीं की गई है और इसमें अदालत द्वारा इस परिसर का धार्मिक चरित्र तय करने की गुहार की गई है।
उन्होंने कहा कि एएसआई के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान भोजशाला परिसर में मिलीं हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों के अवशेष, भित्तिचित्र, शिलालेख और अन्य सामग्री साबित करती है कि यह स्मारक राजा भोज का स्थापित सरस्वती मंदिर है।
अपने दावे पर जोर देने के लिए गुप्ता ने खुद राजा भोज की रचित पुस्तक ‘समरांगणसूत्रधार’ का उल्लेख किया जो मंदिर निर्माण, मूर्तिकला, नगर नियोजन, महलों और घरों की वास्तुकला पर आधारित है।
हिंदू पक्ष के वकील ने कहा,‘‘भोजशाला के मंदिर में स्थापित वाग्देवी (सरस्वती) की मूर्ति फिलहाल लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में है। इस मूर्ति की बनावट समरांगणसूत्रधार पुस्तक में परमारकालीन प्रतिमाओं को लेकर दिए गए विशिष्ट ब्योरे से मेल खाती है।’’
गुप्ता ने उच्च न्यायालय से गुहार लगाई कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह लंदन के संग्रहालय में रखी सरस्वती देवी की मूर्ति को भारत वापस लाए और इसकी भोजशाला परिसर में फिर से स्थापना सुनिश्चित करे।
उन्होंने यह गुहार भी की कि भोजशाला परिसर में केवल हिंदुओं को उपासना की अनुमति दी जानी चाहिए।
गुप्ता ने मेरुतुंगाचार्य की रचित पुस्तक ‘प्रबंध चिंतामणि’ और अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों का उल्लेख करते हुए कहा,’राजा भोज महान कला प्रेमी और विद्वानों के संरक्षक थे। उनके द्वारा स्थापित भोजशाला उस वक्त देश भर में ज्ञान पीठ के रूप में मशहूर थी जहां विभिन्न विद्याओं का अध्ययन और ज्ञान का आदान-प्रदान होता था।’
उच्च न्यायालय ने भोजशाला मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 अप्रैल की तारीख तय की है।
भाषा
हर्ष रवि कांत
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