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Saturday, 27 May, 2023
होमदेशसावधान हो जाएं इंफ्लूएंसर! झूठे विज्ञापन या पेड कंटेंट का खुलासा न करने पर हो सकता है लाखों का जुर्माना

सावधान हो जाएं इंफ्लूएंसर! झूठे विज्ञापन या पेड कंटेंट का खुलासा न करने पर हो सकता है लाखों का जुर्माना

उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय इस माह कुछ दिशानिर्देश जारी कर सकता है, जिसमें पेड कंटेंट और सोशल मीडिया प्रोमोशन को भी शामिल किया जाएगा और नियम-कायदों की किसी भी तरह की अनदेखी पर 10 लाख से 50 लाख रुपये तक जुर्माने लग सकता है.

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नई दिल्ली: उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से झूठे और भ्रामक विज्ञापनों को हटाने के लिए कमर कस ली है. दिप्रिंट को मिली जानकारी के मुताबिक इस संबंध में मंत्रालय की तरफ से इसी माह कुछ दिशा-निर्देश जारी किए जाने की संभावना है जिसके तहत न केवल पेड प्रोमोशन का खुलासा करना जरूरी होगा, बल्कि प्रामाणिक डेटा के बिना कोई भ्रामक प्रचार नहीं किया जा सकेगा.

ये दिशानिर्देश सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर, सेलिब्रिटी प्रोमोशन और इंफ्लूएंसर मार्केटिंग कंपनियों पर समान रूप से ही लागू होंगे जो सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर का इंतजाम करती हैं और उन संगठनों के साथ इंफ्लूएंसर कैंपेन चलाती हैं जो अपने उत्पादों को बेचना चाहते हैं.

उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव निधि खरे ने कहा कि यद्यपि मानदंडों का पालन न करने वालों को मंत्रालय के समक्ष अपना पक्ष रखने और यह बताने का मौका मिलेगा कि उन्होंने दिशानिर्देशों का पालन क्यों नहीं किया, लेकिन दोषी पाए जाने पर उन्हें 10 लाख रुपये से लेकर 50 लाख रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है.

इस साल जून में विज्ञापन उद्योग पर नजर रखने वाली भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) ने यह मुद्दा उठाया था कि कई प्रमुख शिक्षा प्रौद्योगिकी (एड-टेक) कंपनियां और क्रिप्टो कंपनियां अपने विज्ञापनों में भ्रामक दावे कर रही हैं.

एएससीआई ने पिछले साल ‘डिजिटल मीडिया में इन्फ्लुएंसर एडवरटाइजिंग संबंधी दिशानिर्देश’ जारी किए थे और सुझाव दिया था कि पेड कंटेंट या विज्ञापनों से संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट पर इसकी जानकारी होनी चाहिए, अन्यथा इसे लोगों को जानबूझकर धोखा देना माना जाएगा.

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हालांकि, एएससीआई एक सेल्फ-रेग्युलेटिंग बॉडी हैं और इसके पास दंड देने की कोई शक्ति नहीं है. मंत्रालय और संगठन के सूत्रों ने कहा कि यह सरकार को एक ऐसी व्यवस्था बनाने में मदद कर रही है, जिसमें ‘भ्रामक दावे’ वाले विज्ञापन अगर पूरी बंद न भी हो पाएं तो भी तुलनात्मक रूप से उन्हें काफी कम किया जा सके.

अब एएससीआई को उम्मीद है कि मंत्रालय के नए दिशानिर्देश सरकार को उपभोक्ताओं के संरक्षण में सक्षम बनाएगी ताकि वे उचित खुलासे के बिना पेड कंटेंट वाले विज्ञापनों से झांसे में आने से बच सकें.

सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि दिशानिर्देशों को जारी करने के लिए फिलहाल सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (आईएंडबी) की मंजूरी का इंतजार किया जा रहा है. हालांकि, इन्हें उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की तरफ से जारी किया जाना है लेकिन इस पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की सहमति जरूरी है क्योंकि संचार प्लेटफार्म इसकी निगरानी में ही आते हैं.

उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय में सचिव रोहित कुमार सिंह ने दिप्रिंट को बताया, ‘हम खास तौर पर खुलासे में रुचि रखते हैं. हम चाहते हैं कि ये संगठन और इंफ्लूएंसर यह स्पष्ट करें कि उन्हें किसी सेवा या उत्पाद को बढ़ावा देने या उसका प्रचार करने के लिए धन कब मिला.

इस बीच, सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर और इंफ्लूएंसर मैनेजिंग कंपनियों ने कहा है कि वे अपनी तरफ से पूरी सावधानी बरतने को तैयार हैं, लेकिन लापरवाही के मामलों में दंड कंपनी की वित्तीय क्षमता और कैटेगरी को देखते हुए ही तय किया जाना चाहिए.


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‘एक सीमा रेखा खींचना जरूरी है’

मंत्रालय के सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि दिशानिर्देशों को तैयार करने से पहले मंत्रालय के अधिकारियों, स्व-नियामक निकायों और एडवरटाइजिंग प्रोफेशनल्स के साथ कई दौर का विचार-विमर्श हुआ है. मंत्रालय का कहना है कि यद्यपि वह रचनात्मकता को प्रोत्साहित करना चाहता है, लेकिन साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए ‘एक रेखा खींचने’ की जरूरत है कि उपभोक्ताओं को गुमराह न किया जाए.

कुमार ने कहा, ‘इंडस्ट्री में ऐसे लोग हैं जो कानूनों को ताक पर रखने के नए-नए तरीके खोजते रहेंगे. हम विज्ञापन उद्योग की जरूरतें समझते हैं, लेकिन खासकर उन लोगों के मामले में एक रेखा खींचनी आवश्यक है जो जनता को गुमराह करते हैं. यहां इरादा कारोबार में कोई बाधा डालने या किसी की आवाज को दबाने का कतई नहीं है, लेकिन हमेशा एक सीमा रेखा होनी चाहिए जिसे पार न किया जाए.’

उन्होंने कहा, ‘बढ़ते डिजिटलीकरण के साथ, पेड कंटेंट का खुलासा होने की आवश्यकता है. इसमें सोशल मीडिया बिचौलियों भी बड़ी भूमिका होती है क्योंकि ऐसे प्लेटफार्म पर कई भ्रामक विज्ञापन हैं. टेलीविजन पर पेड सामग्री अभी भी घोषणा किए जाने के दायरे के तहत होती है लेकिन कई सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर ऐसा नहीं करते हैं और इसलिए इन दिशानिर्देशों को लागू करने की आवश्यकता है.’


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डिजिटल न्यूज मीडिया को भी इन दिशानिर्देशों के तहत लाया जाएगा.

कुमार ने दावा किया, ‘जो डिजिटल न्यूज ऑर्गनाइजेशन नियमों का पालन नहीं करते हैं और ‘एडवडोरियल’ का खुलासा करते, उनके लिए भी इन दिशानिर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा और इनका उल्लंघन करने पर दंडित किया जाएगा. उनमें से तमाम अभी भी यह खुलासा नहीं करते हैं कि किसी उत्पाद या सेवा का समर्थन क्या वे पैसे लेकर कर रहे हैं, और इसलिए उन्हें ऐसा न करने के लिए आगाह किया जाएगा.’

यद्यपि इस व्यवसाय से जुड़े लोग मानते हैं कि नियम-कायदों की आवश्यकता है, लेकिन दिशानिर्देशों के उल्लंघन पर लगने वाले दंड को लेकर कुछ चिंतित हैं.

इंफ्लूएंसर मार्केटिंग कंपनी पल्पकी के संस्थापक अमित मंडल ने कहा, ‘इस उद्योग में नियमों की बहुत आवश्यकता है क्योंकि यह बहुत तेजी से बढ़ रहा है, और हम चाहते हैं कि भारतीय उपभोक्ता टीवी, न्यूज पेपर और होर्डिंग आदि पर बॉलीवुड सेलिब्रिटी जैसे प्रभावशाली लोगों द्वारा किए जाने वाले प्रचार को लेकर अधिक जागरूक हों.’

साथ ही उन्होंने आगे कहा, ‘मेरा मानना है कि जुर्माना एक निश्चित राशि के बजाये इंफ्लूएंसर के कद और उसके प्रभाव को ध्यान में रखकर तय किया जाना चाहिए. उद्योग में हर किसी को इस खबर के बारे में पता होना चाहिए, खासकर छोटे-मोटे इंफ्लूसर को. छोटे-मोटे इंफ्लूएंटर की कम आय को देखते हुए उन पर सेलिब्रिटी की तुलना में कम जुर्माना लगाया जाना चाहिए.’


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‘29 फीसदी शिकायतें इस सेक्टर से जुड़ीं’

इस बीच, एएससीआई की सीईओ और महासचिव मनीषा कपूर ने दिप्रिंट से कहा कि जरूरत पड़ने पर संगठन इस एजेंडे में ‘सरकार का समर्थन करने के लिए पूरी तरह तैयार है.’

उन्होंने कहा, ‘एएससीआई सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर के लिए हमारी एआई-आधारित निगरानी प्रणाली विकसित कर रहा है. पिछले वर्ष लगभग 29 प्रतिशत शिकायतें इसी क्षेत्र से जुड़ी थीं. क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता के मद्देनजर हम इस एजेंडे में सरकार के समर्थन के लिए पूरी तरह तैयार हैं, अगर उन्हें इसकी जरूरत महसूस होती हैं तो. एएससीआई के पास ऐसे संभावित विज्ञापनों को पहचानने और उन पर उपयुक्त कदम उठाने दोनों की ही क्षमता है.

एएससीआई ने अपनी पिछली रिपोर्टों—जून और पिछले साल—में मुख्य रूप से इस पर जोर दिया था कि इस पर ‘स्वैच्छिक अनुपालन’ किया जाना चाहिए.

कपूर ने कहा, ‘स्वेच्छा से पालन करना पहली प्रतिबद्धता होनी चाहिए क्योंकि ये तेजी से और प्रभावी ढंग से लागू हो सकती है और फिर इसमें टैक्सपेयर का कोई पैसा भी खर्च नहीं होना है. हालांकि, गंभीर और बार-बार होने वाले अपराधों पर कड़े और दंडात्मक उपाय उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिहाज से जरूरी हैं. जब तक दिशा-निर्देश वैश्विक मानकों के अनुरूप हैं, और विभिन्न हितधारकों की राय पर विचार किया जाता है, हमें नहीं लगता कि पूरे प्रक्रिया तंत्र पर कोई प्रतिकूल असर पड़ने वाला है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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