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Sunday, 21 July, 2024
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शक्ति संतुलन या घाटी को अधिकार से वंचित करने की कोशिश! J&K की परिसीमन रिपोर्ट पर मचा हंगामा

परिसीमन आयोग ने इस गुरुवार को मोदी सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी. कश्मीर के नेता इसे केंद्र शासित प्रदेश के जनसांख्यिकीय प्रोफाइल बदलने की कोशिश बता रहे हैं, वहीँ जम्मू के नेताओं का कहना है की यह बराबरी कायम करने वाला है.

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नई दिल्ली: जम्मू और कश्मीर परिसीमन आयोग ने गुरुवार को नरेंद्र मोदी सरकार को अपनी बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट सौंप दी और इसने जम्मू क्षेत्र के लिए छह और कश्मीर के लिए एक नई विधानसभा सीटें जोड़ीं हैं. यह रिपोर्ट जम्मू और कश्मीर में नए चुनाव का रास्ता साफ़ करती है. बता दें कि यह राज्य 2018 से बिना मुख्यमंत्री के है.

इस रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू क्षेत्र की कुल सीटें अब 37 से बढ़कर 43 हो जायेंगी और कश्मीर की मौजूदा सीटें 46 से 47 हो जाएंगी. इसके अतिरिक्त, पहली बार, सभी पांच संसदीय क्षेत्रों में समान संख्या में विधानसभा क्षेत्र – प्रत्येक में 18 – होंगे.

इस बीच, आयोग ने विधानसभा में कश्मीरी प्रवासियों और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर से विस्थापित लोगों को भी प्रतिनिधित्व देने की भी सिफारिश की है.

हालांकि, कश्मीर में राजनीतिक दलों ने इस रिपोर्ट को ‘असंवैधानिक’ और ‘घाटी के लोगों को उनके अधिकार से वंचित करने और उन्हें शक्तिहीन बनाने की एक भयावह योजना’ बताते हुए इसे खारिज कर दिया मगर जम्मू में राजनेताओं ने इसका स्वागत किया और इसे क्षेत्र में ‘शक्ति संतुलन’ लाने का एक साधन बताया.

घाटी के नेताओं ने इस परिसीमन को जम्मू-कश्मीर में ‘हिंदू पकड़’ को बढ़ाने का प्रयास भी कहा है – यह एक ऐसा आरोप है जिसे जम्मू के नेताओं ने निराधार बताया क्योंकि कश्मीर में अभी भी जम्मू की तुलना में अधिक सीटें होंगी.


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शक्तिहीन बनाने की कोशिश या शक्ति की समानता का प्रयास

पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती ने दिप्रिंट को बताया, ‘पहले दिन से ही पीडीपी का मानना रहा है कि परिसीमन आयोग, जो भले ही एक वैधानिक निकाय हो, एक विशेष समुदाय और एक क्षेत्र विशेष के लोगों को सशक्त बनाने के लिए भाजपा के एजेंडे का विस्तार बन गया है.’

महबूबा मुफ्ती ने आगे कहा, ‘भारत सरकार ने चुनावी बहुमत को अल्पमत में बदलकर एक बार फिर इस देश के संविधान को रौंदा है. यह आगे चल कर कैसा रूप लेगा यह किसी के लिए भी अनुमान का ही विषय है. वे सबको आपस में बांटकर दरार पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. यह (घाटी में) जनसांख्यिकीय बदलाव के लिए एक सियासी बुनियाद भी तैयार कर रहा है जो अनुच्छेद 370 के असंवैधानिक उन्मूलन के पीछे की असल योजना रही है.’

वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेता एम.वाई. तारिगामी ने कहा कि इस रिपोर्ट ने लोगों के बीच अविश्वास को और गहरा कर दिया है. उन्होंने कहा, ‘उन्होंने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि यह सत्तारूढ़ दल के हितों के अनुकूल है. इसने पूरी राजनीतिक प्रक्रिया को संदिग्ध बना दिया है.’ तारिगामी ने कहा, ‘संसदीय या विधानसभा सीटों के बढ़ाये या घटाए जाने पर लगी वैधानिक रोक के बावजूद परिसीमन आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप दी है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हालांकि परिसीमन आयोग का गठन 2002 के परिसीमन अधिनियम के तहत किया गया था, मगर केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के निर्वाचन क्षेत्रों को जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 – जिसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है – के प्रावधानों के अनुसार फिर से गठित किया गया है.’

संदर्भ के लिए, साल 2002 का 84वां संशोधन अधिनियम कहता है कि पूरे भारत में परिसीमन का कार्यक्रम 2026 के बाद की पहली जनसंख्या जनगणना तक स्थगित कर दिया जाएगा, जिसके बारे में तारिगामी ने बताया कि यह ‘प्रभावी रूप से 2031 की जनसंख्या’ होगा.

उन्होंने कहा कि पुनर्गठन अधिनियम ने राज्य में मतदान के अधिकार में रद्दोबदल कर दिया है.

उन्होंने कहा, ‘राज्य विधानसभा के लिए मतदान के अधिकार जो पहले केवल स्थायी निवासियों तक ही सीमित थे, उसे अब राज्य के बाहर के लोगों को भी दे दिया गया है. यह साऱी कवायद लंबे समय में जम्मू और कश्मीर के लोगों को शक्तिहीन बना देगी.’

हालांकि, जम्मू के एक राजनीतिक नेता ने उनका नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यह कवायद जम्मू-कश्मीर में ‘शक्ति की समानता’ लाने के मकसद से है.

इस नेता ने कहा, ‘कश्मीर के नेता तो हमेशा साजिश का रोना रोते रहेंगे. इस कवायद की बहुत जरूरत थी. यह लोगों को अपने-अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए सशक्त बनाएगा. लोकतंत्र का सार यही है कि शासन में प्रत्येक व्यक्ति का एक बराबर हिस्सा होता है. जाति और धर्म की परवाह किए बिना समान अवसर दिया जाना चाहिए. इस प्रक्रिया में सभी को भागीदार बनने का मौका दिया जाना चाहिए और यह कवायद बस इसी उद्देश्य को पूरा करेगी.’

उन्होंने दावा किया कि अब तक का शक्ति संतुलन कश्मीर की ओर झुका हुआ था.

उनका कहना था, ‘अब कोई भी मुख्यमंत्री बन सकता है – चाहे वह राजौरी से हो, जम्मू से हो, या कुपवाड़ा से. अब हर बार वही-वही लोग नहीं होंगे.’

भाजपा के वरिष्ठ नेता देवेंद्र सिंह राणा ने इस रिपोर्ट को ‘जम्मू और कश्मीर की आबादी के सभी वर्गों का सर्व-समावेशी राजनीतिक सशक्तिकरण’ कहा.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘इस रिपोर्ट ने राजनीतिक प्रक्रिया और निर्णय लेने में सभी के लिए समान अवसर के दरवाजे खोले हैं, जिससे जम्मू-कश्मीर के सभी निवासियों को समान रूप से सशक्त बनाया गया है.’

उन्होंने कहा, ‘यह कदम सभी को न्याय प्रदान करेगा और शासन तथा निर्णय लेने में समान भागीदार बनाकर उनके भविष्य को आकार देने में उनकी मदद करेगा. आखिरकार, इससे जम्मू-कश्मीर के आईडिया और इस तरह भारत के आईडिया को और मजबूती मिलेगी.‘

जम्मू संभाग में नए बनाये गए छह अतिरिक्त निर्वाचन क्षेत्रों – कठुआ, सांबा, राजौरी, रियासी, डोडा और किश्तवाड़ में एक-एक – के विश्लेषण में दिप्रिंट ने पाया कि इनमे से दो क्षेत्र मुख्य रूप से हिंदू बहुल हैं, एक मुस्लिम बहुल है, जबकि तीन में मिश्रित जनसांख्यिकीय प्रोफ़ाइल है.


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‘भौगोलिक मापदंड पर उठे सवाल’

आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, ‘भौगोलिक विशेषताओं, संचार के साधन, सार्वजनिक सुविधा, विभिन्न कारकों के रूप में क्षेत्रों की निकटता’ को ध्यान में रखते हुए निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के लिए दिशा-निर्देश और इसकी कार्यप्रणाली निर्धारित की गई थी.

कुछ जिलों में, आयोग ने ‘अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर अत्यधिक दूरी या दुर्गम परिस्थितियों के कारण अपर्याप्त संचार और सार्वजनिक सुविधाओं की कमी वाले भौगोलिक क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व को संतुलित करने’ के लिए एक अतिरिक्त निर्वाचन क्षेत्र बनाने का प्रस्ताव दिया है.

विशेष रूप से, 2002 के परिसीमन अधिनियम में कहा गया है कि सभी निर्वाचन क्षेत्र, जहां तक व्यावहारिक हो सके, भौगोलिक रूप से सुसंबद्ध (कॉम्पैक्ट) इलाके होंगे, और उनके परिसीमन में, ‘भौतिक विशेषताओं, प्रशासनिक इकाइयों की मौजूदा सीमाओं, संचार की सुविधाओं और सार्वजनिक सुविधाओं’ पर विचार किया जाना चाहिए.

मगर, कुछ राजनेताओं ने इसकी आलोचना करते हुए पुंछ और राजौरी जिलों, जो पहले जम्मू संसदीय क्षेत्र का हिस्सा थे, के दक्षिण कश्मीर में स्थित अनंतनाग निर्वाचन क्षेत्र के साथ विलय पर सवाल उठाया.

इन नेताओं ने कहा कि क्षेत्रों में कोई भौगोलिक संपर्क नहीं है. मुगल रोड, जो शोपियां जिले के माध्यम से इन क्षेत्रों को जोड़ता है, सर्दियों के दौरान बंद रहता है और गर्मियों में केवल कुछ ही महीनों के लिए खुलता है.

महबूबा मुफ्ती ने सवाल किया, ‘अगर भूगोल ही मापदंड है, तो उन्होंने पुंछ-राजौरी को अनंतनाग के साथ कैसे रखा? एक इलाका एक तरफ है, दूसरा एकदम दूसरी तरफ है?’

हालांकि, जम्मू में एक दूसरे नेता ने कहा कि चूंकि राष्ट्रीय राजमार्ग के माध्यम से सड़क संपर्क अच्छा हैं, इसलिए यह कहना गलत हैं कि दोनों जगहें बहुत दूर-दूर हैं.

इस नेता ने कहा, ‘यह कहना बिल्कुल गलत है कि ये इलाके आपस में अच्छी तरह से जुड़े हुए नहीं हैं. कोई भी दो से तीन घंटे में पुंछ से शोपियां जा सकता है. इलाके में एक सुरंग भी प्रस्तावित है. इसके बनाने के बाद यह दूरी घटकर सिर्फ एक घंटे रह जाएगी. वे अकारण ही रोना रो रहे हैं. ये राजनेता जम्मू-कश्मीर को एक इकाई के रूप में क्यों नहीं देखते? ऐसा अदूरदर्शी दृष्टिकोण क्यों?’

गूगल मैप्स पर एक त्वरित खोज से पता चलता है कि पुंछ से अनंतनाग की दूरी 155 किमी है, और राजौरी से अनंतनाग तक की दूरी 184 किमी है.


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गुर्जरों को लुभाने के मकसद से एसटी के लिए आरक्षित सीटें

परिसीमन आयोग ने कश्मीरी प्रवासियों और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के विस्थापितों के लिए विधानसभा में अतिरिक्त सीटों की भी सिफारिश की. इसने कुल मिलकर नौ सीटें – जम्मू में छह और घाटी में तीन – अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित की हैं और यह जम्मू-कश्मीर के लिए पहली बार हुआ है. इस आरक्षण को मुख्य रूप से गुर्जरों को लाभ पहुंचाने वाले फैसले के रूप में देखा जा रहा है. पारंपरिक रूप से उन्हें नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के वोट बैंक के रूप में देखा जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस कदम से उन्हें भाजपा की ओर आकर्षित करने में मदद मिलेगी.

द डिस्पैच के संपादक और जम्मू के एक राजनीतिक विश्लेषक जफर चौधरी ने दिप्रिंट को बताया, ‘उन्हें (अलग से) प्रतिनिधित्व दिया गया है और यह निश्चित रूप से भाजपा के लिए एक सॉफ्ट कॉर्नर तैयार करेगा, जिससे उन्हें फायदा होगा.’

इस बीच, इस रिपोर्ट ने इस केंद्र शासित प्रदेश के सिख अल्पसंख्यकों को भी नाराज कर दिया है, जो दावा कर रहे हैं कि आयोग द्वारा उनकी अनदेखी की गई है.

ऑल पार्टीज सिख कोऑर्डिनेशन कमेटी के अध्यक्ष जगमोहन सिंह रैना ने दिप्रिंट को बताया कि उन्होंने इस आयोग से पांच सीटों के लिए कहा था, लेकिन उन्हें कम-से-कम दो सीटें मिलने की उम्मीद थी.’

उन्होंने कहा, ‘हमने कश्मीर के त्राल (पुलवामा) और बारामूला तथा जम्मू के आरएस पुरा एवं गांधीनगर में सिख अल्पसंख्यकों के लिए सीटें आरक्षित करने की मांग की थी. ये मुख्य रूप से सिख मतदाताओं की आबादी वाले क्षेत्र हैं, लेकिन हमारे समुदाय को एक बार फिर से नजरअंदाज कर दिया गया है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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