नई दिल्ली: आधार कार्ड का नागरिकता, निवास और पते के प्रमाण के रूप में कथित दुरुपयोग किए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं का हवाला देते हुए दायर याचिका में मांग की गई है कि आधार का इस्तेमाल केवल पहचान सत्यापन तक सीमित किया जाए.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मंगलवार को इस मामले में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा. यह जनहित याचिका अधिवक्ता और दिल्ली भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दायर की है.
याचिका में कहा गया है कि भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) द्वारा जारी आधार का इस्तेमाल स्कूल में दाखिले, संपत्ति खरीदने, जन्म प्रमाण पत्र, राशन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए उम्र, नागरिकता और निवास के प्रमाण के रूप में किया जा रहा है. इसके अलावा नए मतदाता पंजीकरण फॉर्म (फॉर्म-6) में भी इसे जन्म तिथि और निवास के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा रहा है.
याचिका में कहा गया है कि “घुसपैठिए और अवैध प्रवासी आधार का उपयोग कर कई अन्य दस्तावेज़ हासिल कर रहे हैं.”
साथ ही याचिका में आधार अधिनियम, 2016 की धारा 9 का हवाला दिया गया है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “आधार नागरिकता या निवास का प्रमाण नहीं है.” इसके अलावा UIDAI की 22 अगस्त 2023 की अधिसूचना में भी कहा गया है कि “आधार पहचान का प्रमाण है, नागरिकता, पता या जन्म तिथि का नहीं.”
याचिका में कहा गया है कि फॉर्म-6 के तहत मौजूदा सत्यापन व्यवस्था पर्याप्त नहीं है और इससे ऐसे लोगों के भी मतदाता सूची में शामिल होने की संभावना है जिनके पास ज़रूरी दस्तावेज़ नहीं हैं. इससे देश की चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है.
याचिका में आगे कहा गया है कि इससे आधार अधिनियम, 2016 के तहत पहचान व्यवस्था की विश्वसनीयता कमजोर हो रही है और घुसपैठिए तथा अवैध प्रवासी उन सब्सिडी, लाभ और सेवाओं का फायदा उठा रहे हैं जो भारतीय नागरिकों, खासकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए हैं.
याचिका के अनुसार इससे सार्वजनिक संसाधनों का गलत इस्तेमाल हो सकता है, असली लाभार्थी योजनाओं से वंचित हो सकते हैं और संविधान में दिए गए समानता तथा निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है.
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और भारत निर्वाचन आयोग को निर्देश देने की मांग की है कि आधार का इस्तेमाल केवल पहचान के प्रमाण के रूप में किया जाए, न कि नागरिकता, निवास या जन्म तिथि के प्रमाण के रूप में.
इसके अलावा याचिका में यह भी मांग की गई है कि मतदाता पंजीकरण फॉर्म-6 में जन्म तिथि और निवास के प्रमाण के रूप में आधार का उपयोग जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 23(4) और संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ घोषित किया जाए और इसे अमान्य माना जाए.
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि आधार अधिनियम के तहत भारत में रहने वाला कोई भी व्यक्ति, चाहे वह विदेशी नागरिक ही क्यों न हो, आधार बनवा सकता है. कोई व्यक्ति एक वर्ष में 182 दिन भारत में रहने के बाद इसके लिए पात्र हो जाता है.
याचिका में कहा गया है कि किरायानामा और स्थानीय अधिकारियों की सिफारिश जैसे दस्तावेजों के आधार पर नामांकन केंद्रों से आधार बनवाया जा सकता है. इसी कारण अवैध प्रवासी और घुसपैठिए आधार हासिल कर लेते हैं और बाद में मतदाता पहचान पत्र सहित अन्य पहचान दस्तावेज़ भी बनवा लेते हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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