चंडीगढ़: अकाल तख्त द्वारा सोमवार को पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को ‘गुरु दोखी’ (गुरुओं का विरोधी) और ‘खालसा पंथ विरोधी’ घोषित करना हाल के दशकों में किसी मौजूदा मुख्यमंत्री और सिख धार्मिक संस्था के बीच सबसे बड़े टकरावों में से एक माना जा रहा है.
पंजाब विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है. ऐसे में इस फैसले ने राज्य की राजनीति में धर्म को फिर से केंद्र में ला दिया है और आम आदमी पार्टी (AAP) के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है. अब तक AAP पंजाब की राजनीति को धार्मिक मुद्दों के बजाय शासन और कल्याणकारी योजनाओं के इर्द-गिर्द रखने में सफल रही थी.
चूंकि, भगवंत मान अमृतधारी सिख नहीं हैं, इसलिए अकाल तख्त की ओर से उन्हें तनखैया घोषित कर धार्मिक सज़ा नहीं दी जा सकती. इसलिए उनके खिलाफ यह फैसला नैतिक निंदा के रूप में देखा जा रहा है. मंगलवार को जारी वीडियो संदेश में मान ने आरोप लगाया कि अकाल तख्त में बैठे “राजनीतिक नियुक्त लोग” उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि वह राज्य के विकास के लिए काम कर रहे हैं.
यह विवाद जनवरी 2026 में शुरू हुआ, जब अकाल तख्त में एक शिकायत दी गई. शिकायत में आरोप लगाया गया कि भगवंत मान ने सिख भावनाओं को आहत करने वाला काम किया है.
शिकायत का आधार एक कथित वीडियो था, जिसमें एक व्यक्ति को दस सिख गुरुओं की प्रतीकात्मक तस्वीरों और जरनैल सिंह भिंडरावाले की प्रतिमा पर शराब जैसा पदार्थ छिड़कते हुए दिखाया गया था.
मंगलवार को मान ने कहा कि वीडियो में दिख रहा व्यक्ति वह नहीं हैं. उन्होंने कहा कि अकाल तख्त एक सम्मानित संस्था है, लेकिन वह अपने “राजनीतिक आकाओं” के प्रभाव में आकर उनके खिलाफ प्रचार कर रहा है.
डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ के राजनीति विज्ञान विभाग की डॉ. कंवलप्रीत कौर ने कहा, “मुख्यमंत्री बनने के बाद से भगवंत मान के सामने यह सबसे बड़ी धार्मिक-राजनीतिक चुनौती है. हालांकि, इसका चुनावी असर पड़ेगा या नहीं, यह तीन बातों पर निर्भर करेगा—मतदाता वीडियो को कितना विश्वसनीय मानते हैं, विपक्ष सिख भावनाओं को कितना एकजुट कर पाता है और 2027 के चुनाव में शासन के मुद्दे धार्मिक विवादों पर भारी पड़ते हैं या नहीं.”
वीडियो सामने आने के कुछ दिन बाद अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने भगवंत मान को तलब किया था. 15 जनवरी को अकाल तख्त पहुंचकर मान ने वीडियो को पूरी तरह फर्ज़ी बताया था और दावा किया था कि इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से बनाया गया है. उन्होंने कहा था कि किसी भी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय फोरेंसिक लैब से इसकी जांच कराई जा सकती है.
हालांकि, मंगलवार को अपने नए बयान में मान ने वीडियो को एआई से बना हुआ नहीं बताया. उन्होंने सिर्फ कहा कि वीडियो में दिख रहा व्यक्ति वह नहीं हैं. मान ने कहा, “उस व्यक्ति की शारीरिक बनावट, कद-काठी और लंबाई मेरी नहीं है. वीडियो में मैं नहीं हूं.”
अकाल तख्त के प्रस्ताव के अनुसार, बाद में भगवंत मान से दो फोरेंसिक लैब के नाम सुझाने को कहा गया था, जहां वीडियो की जांच कराई जा सके. इसके लिए 27 जनवरी को औपचारिक पत्र भी भेजा गया था, लेकिन मुख्यमंत्री या उनके कार्यालय की ओर से कोई जवाब नहीं मिला.
इसके बाद अकाल तख्त ने खुद भारत सरकार से मान्यता प्राप्त दो फोरेंसिक प्रयोगशालाओं से जांच कराई. 27 मई और 13 जून की रिपोर्टों में कथित तौर पर कहा गया कि वीडियो असली है और उसमें किसी तरह की छेड़छाड़ या एआई का इस्तेमाल नहीं हुआ है.
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— Bhagwant Mann (@BhagwantMann) June 16, 2026
सोमवार को अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में विभिन्न सिख संगठनों, विद्वानों और कानूनी विशेषज्ञों की बैठक हुई. बैठक में भगवंत मान को औपचारिक रूप से ‘गुरु दोखी’ और ‘खालसा पंथ विरोधी’ घोषित करने का फैसला लिया गया. साथ ही सिख समुदाय से उनके साथ संबंध न रखने की अपील भी की गई.
प्रस्ताव में कहा गया, “मुख्यमंत्री का पद अत्यंत सम्मानित होता है और वह पूरे राज्य का प्रतिनिधित्व करता है. बैठक ने माना कि भगवंत सिंह मान ने वीडियो को लेकर श्री अकाल तख्त साहिब के सामने गलत बयान दिया, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या वह मुख्यमंत्री रहते हुए गुरु और सिख समुदाय के हित में सही फैसले ले सकते हैं.”
अकाल तख्त के पास किसी निर्वाचित सरकार के खिलाफ संवैधानिक अधिकार नहीं है, लेकिन सिख समुदाय के एक बड़े वर्ग में उसकी नैतिक और धार्मिक प्रतिष्ठा आज भी काफी प्रभावशाली मानी जाती है. भगवंत मान केवल मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि पंजाब के सबसे प्रमुख सिख राजनीतिक चेहरों में भी शामिल हैं. अब तक उन्होंने खुद को एक सहज, विनम्र और सांस्कृतिक रूप से जुड़ा हुआ नेता के रूप में पेश किया है. अकाल तख्त का फैसला सीधे इसी छवि पर सवाल उठाता है.
इस घटनाक्रम से पंजाब की राजनीति में पंथक मुद्दे फिर से केंद्र में आ गए हैं. AAP के लिए खतरा सिर्फ समर्थन घटने का नहीं, बल्कि चुनावी बहस का शासन और विकास से हटकर धार्मिक पहचान और वैधता के सवालों पर केंद्रित हो जाना है.
पंजाब यूनिवर्सिटी के पूर्व समाजशास्त्र प्रोफेसर मंजीत सिंह ने कहा, “सबसे बड़ा सवाल यह है कि आम सिख मतदाता अकाल तख्त की व्याख्या को स्वीकार करते हैं या नहीं. पंजाब का राजनीतिक इतिहास बताता है कि धार्मिक हस्तक्षेप तभी ज्यादा असर डालते हैं, जब वे पहले से मौजूद जनभावनाओं को मजबूत करते हैं.”
उन्होंने कहा कि अगर मतदाता सरकार के कामकाज, कल्याणकारी योजनाओं और नेतृत्व से संतुष्ट रहे, तो वे इस विवाद को द्वितीयक मुद्दा मान सकते हैं.
मंजीत सिंह के अनुसार, AAP की रणनीति भी इसी सोच पर आधारित होगी. पार्टी यह तर्क देगी कि उसने राज्य में सबसे सख्त बेअदबी विरोधी कानून लागू किया है, राजनीतिक विरोधी धार्मिक संस्थाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं और सरकारों का मूल्यांकन उनके कामकाज के आधार पर होना चाहिए. आने वाले महीनों में यह देखना होगा कि यह तर्क कितना प्रभावी साबित होता है.
दूसरा प्रस्ताव
वीडियो से जुड़े प्रस्ताव के अलावा, पंजाब सरकार द्वारा हाल ही में पारित जगत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026 को लेकर भी एक अन्य प्रस्ताव पारित किया गया. अकाल तख्त का कहना है कि सरकार ने यह कानून सिख समुदाय की प्रमुख संस्थाओं से पर्याप्त सलाह-मशविरा किए बिना पारित कर दिया.
अकाल तख्त ने कहा कि इस कानून को लेकर अपनी आपत्तियां औपचारिक रूप से पंजाब विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां के माध्यम से सरकार तक पहुंचाई गई थीं और सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए पर्याप्त समय भी दिया गया था.
हालांकि, प्रस्ताव के अनुसार सरकार ने इन आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया.
बैठक में सरकार पर “जिद्दी और अहंकारी” रवैया अपनाने का आरोप लगाया गया. साथ ही मुख्यमंत्री भगवंत मान की भी आलोचना की गई. प्रस्ताव में कहा गया कि कानून को लेकर चल रही बहस के दौरान मान ने सार्वजनिक रूप से अकाल तख्त के अधिकार पर सवाल उठाए थे.
इसके परिणामस्वरूप, भगवंत मान को छोड़कर पंजाब मंत्रिमंडल के सभी सिख मंत्रियों और विभिन्न राजनीतिक दलों के सिख विधायकों को 29 जून को अकाल तख्त सचिवालय में पेश होने के लिए बुलाया गया है. इसके अलावा गैर-सिख मंत्रियों से भी इस मामले में जवाब मांगा जाएगा.
डॉ. कंवलप्रीत कौर ने कहा, “29 जून को मंत्रियों और विधायकों को तलब किए जाने से यह विवाद लंबे समय तक चर्चा में बना रहेगा. पंजाब सरकार और सिख धार्मिक नेतृत्व के बीच टकराव अब केवल एक वीडियो या एक बयान तक सीमित नहीं रहा है. यह अब सरकार और सिख संस्थाओं के रिश्तों तथा धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दों को संभालने के तरीके पर एक बड़े विवाद का रूप ले सकता है.”
उन्होंने कहा, “भगवंत मान के लिए चुनौती अब सिर्फ एक आरोप का जवाब देने तक सीमित नहीं है. उन्हें अब ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, जहां सिखों की सर्वोच्च धार्मिक-सांसारिक संस्था ने न केवल उनके व्यवहार बल्कि उनकी विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)