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Tuesday, 22 September, 2026
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SC के आदेश के बावजूद कई राज्यों में सैनिटरी पैड, शौचालय और सफाई व्यवस्था अधूरी—केंद्र का हलफनामा

जनवरी के आदेश के मुताबिक, सभी स्कूलों में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय, इस्तेमाल करने लायक पानी, मुफ्त सैनिटरी पैड और पर्यावरण के अनुकूल कचरा निपटाने की व्यवस्था होनी चाहिए.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के केंद्र और राज्य सरकारों को स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता की व्यवस्था बनाने के निर्देश देने के करीब आठ महीने बाद भी, ज्यादातर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस आदेश को लागू करने में संघर्ष कर रहे हैं. पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में जमा किए गए आंकड़ों से यह जानकारी मिली है.

जनवरी 2026 के फैसले के मुताबिक, केंद्र और राज्य सरकारों को सभी स्कूलों में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग और इस्तेमाल करने लायक शौचालय, वहां इस्तेमाल करने लायक पानी, मुफ्त सैनिटरी नैपकिन और पर्यावरण के अनुकूल कचरा निपटाने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी है.

केंद्र के विस्तृत हलफनामे से पता चलता है कि अलग-अलग शौचालयों के मामले में राज्यों ने काफी प्रगति की है, लेकिन कई स्कूलों में सफाई के लिए पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं. इससे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करने में रखरखाव और संसाधनों की कमी का पता चलता है.

स्कूलों में छात्राओं को सैनिटरी नैपकिन आसानी से और मुफ्त देने का निर्देश भी अभी लागू होना बाकी है. चंडीगढ़ इसका अपवाद है, जहां सभी स्कूलों में सैनिटरी पैड की वेंडिंग मशीनें लगाई गई हैं और इसके अलावा मुफ्त पैड देने की भी व्यवस्था की गई है. पुडुचेरी के सभी स्कूलों में भी सैनिटरी पैड की वेंडिंग मशीनें हैं, लेकिन सभी 428 स्कूलों में मुफ्त पैड देने की व्यवस्था अभी नहीं की गई है. अभी तक केंद्र शासित प्रदेश के केवल 36.2 प्रतिशत स्कूलों में यह सुविधा है.

आंकड़ों के मुताबिक, स्कूलों को अपने परिसर में ढक्कन वाले कूड़ेदान रखने में भी दिक्कत आ रही है. केवल छह राज्यों ने इस व्यवस्था को पूरी तरह लागू करने की जानकारी दी है.

केंद्र का हलफनामा जनवरी में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद राज्यों ने कितना काम किया है, इसकी स्थिति रिपोर्ट है. यह फैसला सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर की जनहित याचिका पर आया था. उन्होंने कक्षा 6 से 12 तक की हर छात्रा को मुफ्त सैनिटरी पैड देने और सभी सरकारी सहायता प्राप्त और आवासीय स्कूलों में अलग शौचालय बनाने की मांग की थी. इसके साथ शौचालयों के रखरखाव और जागरूकता कार्यक्रमों की भी मांग की गई थी.

फैसला सुनाते हुए जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा था कि मासिक धर्म स्वास्थ्य भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा के अधिकार का हिस्सा है. बेंच ने यह भी कहा था कि मासिक धर्म स्वास्थ्य हर छात्रा के सम्मान, अपने शरीर पर अपने अधिकार और बराबरी के अधिकार से भी जुड़ा है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इन निर्देशों का पालन सरकारी और निजी, दोनों संस्थानों के लिए जरूरी है और केंद्र की राष्ट्रीय मासिक धर्म स्वच्छता नीति पूरे देश में लागू की जानी है. कोर्ट ने आदेश का पालन करने के लिए तीन महीने का समय दिया था. निजी स्कूलों की मान्यता रद्द करने की चेतावनी भी दी थी और सरकारी संस्थानों के लिए राज्य सरकारों को सीधे जिम्मेदार बनाया था.

सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर अदालत की निगरानी में लागू होने वाली बाध्यकारी जिम्मेदारी तय करते हुए, कोर्ट ने इस मामले में लगातार निगरानी का आदेश दिया था. इसके तहत केंद्र को समय-समय पर काम की प्रगति की जानकारी कोर्ट को देनी थी.

फैसले के बाद हर राज्य में कितना काम हुआ, इसकी जानकारी देने वाला केंद्र सरकार का यह संयुक्त हलफनामा इसी निर्देश के जवाब में है. यह हलफनामा केंद्र को अगस्त में अलग-अलग राज्यों से मिली जानकारी पर आधारित है.

‘लागू करने में बड़ी कमियां’

हर राज्य में काम की ताजा स्थिति बताते हुए केंद्र ने सभी राज्य सरकारों की कोशिशों की तारीफ की. केंद्र ने कहा कि राज्य सरकारों ने मासिक धर्म को लेकर जागरूकता बढ़ाने और इससे जुड़ी झिझक कम करने के लिए शिक्षा और मीडिया के नए तरीकों पर ध्यान दिया है.

लेकिन राज्यों के हिसाब से दिए गए आंकड़ों से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने में बड़ी कमियां सामने आती हैं. केंद्र के सामने जमा की गई स्थिति रिपोर्टों से यह साफ नहीं होता कि कितने निजी स्कूल इस आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं.

इस्तेमाल करने लायक शौचालय, हाथ धोने की सुविधा और पानी के कनेक्शन की व्यवस्था के मामले में हलफनामे से पता चलता है कि मध्य प्रदेश (46.79 प्रतिशत) और मिजोरम (50.5 प्रतिशत) को छोड़कर ज्यादातर राज्यों में 70 प्रतिशत से ज्यादा स्कूलों में लड़के-लड़कियों के लिए अलग शौचालय और हाथ धोने की सुविधा है. चार राज्यों (दिल्ली, पंजाब, गोवा और असम) और तीन केंद्र शासित प्रदेशों (दमन और दीव, लक्षद्वीप और पुडुचेरी) के सभी स्कूलों ने यह सुविधा होने की जानकारी दी है.

आंकड़ों से यह भी पता चला कि अरुणाचल प्रदेश के 2,400 से ज्यादा स्कूलों में कोई सफाई कर्मचारी नहीं है. वहीं झारखंड में 35,457 स्कूलों में से केवल एक प्रतिशत स्कूलों में सफाई कर्मचारी हैं. उत्तराखंड तीसरा ऐसा राज्य है, जहां 10 प्रतिशत से भी कम स्कूलों में सफाई कर्मचारी हैं. राज्य ने अपने केवल चार प्रतिशत स्कूलों में इस निर्देश का पालन होने की जानकारी दी है.

बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और असम समेत 15 राज्यों ने सफाई कर्मचारियों की भर्ती के बारे में कोई जानकारी नहीं दी, लेकिन पांच केंद्र शासित प्रदेशों (दमन और दीव, लक्षद्वीप, चंडीगढ़ और पुडुचेरी) और पांच राज्यों (पंजाब, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, गोवा और दिल्ली) की स्थिति रिपोर्ट में बताया गया है कि उनके क्षेत्र के सभी स्कूलों में सफाई कर्मचारी हैं.

सैनिटरी उत्पादों तक पहुंच के मामले में सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों—अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, लक्षद्वीप, ओडिशा और उत्तराखंड—ने बताया है कि 50 प्रतिशत से ज्यादा स्कूलों में वेंडिंग मशीनें लगाई गई हैं. बाकी राज्यों में इन मशीनों की व्यवस्था 1 से 50 प्रतिशत स्कूलों में होने की जानकारी दी गई है.

बिहार के 95,000 से ज्यादा स्कूलों में केवल 2.6 प्रतिशत स्कूलों में ये मशीनें हैं. वहीं आंध्र प्रदेश के 61,079 स्कूलों में केवल पांच प्रतिशत स्कूलों में ये मशीनें हैं. उत्तर प्रदेश की ओर से केंद्र को दी गई जानकारी के मुताबिक, 1.25 लाख से ज्यादा स्कूलों में से 9,957 में ये मशीनें लगी हैं. मध्य प्रदेश की अनुपालन रिपोर्ट के मुताबिक, वहां 1.19 लाख स्कूलों में अभी ये मशीनें लगनी बाकी हैं.

क्योंकि 21 राज्यों ने माना है कि उनके क्षेत्र के 50 प्रतिशत स्कूलों में छात्राओं को सैनिटरी नैपकिन मुफ्त देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का अभी पालन नहीं हुआ है, इसलिए कई स्कूल अदालत के बाध्यकारी निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं.

पिछले हफ्ते केंद्र के हलफनामे की समीक्षा करने के बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इन आंकड़ों में अंतर की ओर ध्यान दिलाया और उन राज्यों की आलोचना की, जिन्होंने पूरी तरह आदेश का पालन होने का दावा किया था. कोर्ट ने कहा कि अगर शौचालय इस्तेमाल करने लायक नहीं है या पानी उपलब्ध नहीं है, तो किसी छात्रा के लिए सिर्फ सर्कुलर का कोई मतलब नहीं है. इसके बाद कोर्ट ने जिला शिक्षा अधिकारियों को अपने क्षेत्र के हर स्कूल में अचानक निरीक्षण करने के लिए शिक्षकों की टीमें बनाने का निर्देश दिया.

इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील वरुण ठाकुर ने दिप्रिंट को बताया कि कोर्ट के आदेश को लागू करने की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र समिति बनाई जानी चाहिए.

उन्होंने कहा, “यह एक ऐतिहासिक फैसला था, जिसमें कोर्ट ने मासिक धर्म स्वच्छता को सम्मान के साथ जीने के अधिकार और छात्रा के शिक्षा के अधिकार का एक अहम हिस्सा माना. ये निर्देश सिर्फ कागजों पर नहीं रह सकते और केवल कोर्ट की ओर से बनाई गई स्वतंत्र समिति ही इनके लागू होने की निगरानी कर सकती है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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