जयपुर, 20 सितंबर (भाषा) राजस्थान के जयपुर स्थित एक निजी अस्पताल में एओर्टिक स्टेनोसिस नाम की गंभीर बीमारी से जूझ रहे 60 वर्षीय एक मरीज का ‘इंट्रावास्कुलर अल्ट्रासाउंड’ (आईवीयूएस) द्वारा निर्देशित ‘ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व इंप्लांटेशन’ (टीएवीआई) सफलतापूर्वक किया गया। चिकित्सकों ने शनिवार को यह जानकारी दी।
‘ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व इंप्लांटेशन’, ‘ओपन-हार्ट सर्जरी’ की तुलना में संकुचित हृदय वाल्व (एओर्टिक स्टेनोसिस) को बदलने की अपेक्षाकृत एक आसान सर्जरी है जिसके तहत छोटे चीरे लगाए जाने से मरीज को कम दर्द होता है।
‘इंट्रावास्कुलर अल्ट्रासाउंड’, एक उन्नत इमेजिंग प्रक्रिया है जो रक्त वाहिकाओं के अंदर की विस्तृत तस्वीरें बनाने के लिए उच्च-आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों का उपयोग करती है।
यह सर्जरी, यहां राजस्थान अस्पताल में की गई।
ओपन-हार्ट सर्जरी को मरीज के लिए उच्च जोखिम वाला माना गया क्योंकि उनकी पहले भी बाईपास सर्जरी हो चुकी थी।
राजस्थान अस्पताल ने एक बयान में कहा कि अपेक्षाकृत आसान सर्जरी वाली इस प्रक्रिया में एक उन्नत ऊतक वाल्व का इस्तेमाल किया गया।
बयान के मुताबिक, वाल्व की अनुमानित अवधि 20 से 25 साल है। डॉ. रविंदर सिंह राव ने बताया, “उन्नत ऊतक वाल्व, ‘ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व इंप्लांटेशन’ और इमेजिंग मार्गदर्शन के साथ अब हम मरीजों को एक सुरक्षित, न्यूनतम सर्जिक्ल उपचार प्रदान कर सकते हैं, जो लंबे समय तक चलने वाला है।”
ये सर्जरी डॉ. राव के नेतृत्व में हुई।
‘इंट्रावास्कुलर अल्ट्रासाउंड’ इमेजिंग से चिकित्सकों को यह पुष्टि करने में मदद मिली कि वाल्व सही जगह पर लगा है, पूरी तरह से फैला हुआ है और रिसाव मुक्त है, जिससे इच्छानुसार परिणाम सुनिश्चित हुए।
बयान में बताया गया कि यह सफलता भारतीय हृदय चिकित्सा में एक बड़ी उपलब्धि है।
भाषा जितेंद्र संतोष
संतोष
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