Wednesday, 29 June, 2022
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3 को ज़मानत लेकिन 2 अब भी जेल में- मुनव्वर फारूक़ी के साथ गिरफ्तार हुई जोड़ी क्यों नहीं आई बाहर

इंदौर कैफे से अपमानजनक मज़ाक़ के लिए गिरफ्तार किए गए पांच लोग हैं फ़ारूक़ी, प्रखर व्यास, एडविन एंथनी, नलिन यादव, और सदाक़त ख़ान. यादव और ख़ान अभी जेल में ही हैं.

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नई दिल्ली: वो जनवरी के पहले दो दिन थे, जब स्टैंड-अप कॉमेडियन मुनव्वर फारूक़ी और चार अन्य को, मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के एक कैफे में, तकलीफ पहुंचाने वाले जोक्स के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. छठे अभियुक्त- एक नाबालिग़- को भी पकड़ा गया था, लेकिन उसे जल्दी ही बाल अदालत से ज़मानत मिल गई.

गिरफ्तारी के बाद के डेढ़ महीने में, उन पांच लोगों ने 15 ज़मानत अर्ज़ियां दायर कीं, जिनमें से 12 अभी तक ख़ारिज हो चुकी हैं. फिलहाल स्थिति ये है कि उनमें से तीन- जिनमें फारूक़ी शामिल हैं- ज़मानत पर बाहर आ चुके हैं, जबकि दो अन्य अभी अंदर ही हैं.

इससे एक सवाल खड़ा होता है- समान आरोपों का सामना कर रहे अभियुक्तों के साथ, अलग-अलग बर्ताव क्यों है? मुद्दे की जड़ ये है कि दो अदालतों ने, समान परिणाम की अपेक्षा में समान परिस्थितियों का हवाला देते हुए, समता के क़ानूनी सिद्धांत की अलग अलग ढंग से व्याख्या की है.

गिरफ्तार किए गए पांच लोग हैं फ़ारूक़ी, प्रखर व्यास, एडविन एंथनी, नलिन यादव और सदाक़त ख़ान. इन सब पर भारतीय दंड संहिता, की धारा 295A (किसी भी वर्ग के धर्म या उसकी धार्मिक भावनाओं को, आहत करने के आशय से किए गए विमर्शित और विद्वेषपूर्ण कृत्य), 298 (किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के सविचार आशय से, कोई शब्द उच्चारित करना), 269 (उपेक्षा से किया गया कार्य, जिससे जीवन के लिए ख़तरनाक, किसी रोग का संक्रमण फैलना संभाव्य है),188 (किसी पब्लिक सर्वेंट द्वारा दिए गए आदेशों का उल्लंघन), 34 (सामान्य इरादे), के तहत मुक़दमा क़ायम किया गया है.

बीजेपी विधायक मालिनी लक्ष्मण सिंह गौड़ के बेटे, एकलव्य सिंह की शिकायत पर दर्ज प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि फारूक़ी ने गृहमंत्री अमित शाह और कुछ हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ कुछ अभद्र टिप्पणियां कीं.

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फारूक़ी, व्यास और एंथनी फिलहाल ज़मानत पर बाहर हैं.


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समता का सिद्धांत

फारूक़ी को तीन नाकाम कोशिशों के बाद ज़मानत हासिल हुई, जब पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों का संज्ञान लिया कि गिरफ्तारी के लिए उसके द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का, इस मामले में पालन नहीं किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से लैस फारूक़ी के सह-अभियुक्तों ने, समता के आधार पर ज़मानत लेने की कोशिश की लेकिन वो सभी अपनी कोशिशों में कामयाब नहीं हो पाए.

जहां ख़ान की दूसरी ज़मानत याचिका- जिसमें उन्होंने समता के आधार का हवाला दिया था- निचली अदालत ने ख़ारिज कर दी, वहीं व्यास और एंथनी को इसी आधार पर उनकी तीसरी कोशिश में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अंतरिम ज़मानत दे दी. यादव भी ज़मानत की तीन नाकाम कोशिशें कर चुके हैं और अब वो अपनी ज़मानत याचिकाओं की नामंज़ूरी को, सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की प्रक्रिया में हैं.

व्यास और एंथनी को 12 फरवरी को ज़मानत दे दी गई, जब हाईकोर्ट ने फारूक़ी के मामले में जारी, सुप्रीम कोर्ट के आदेश का संज्ञान लिया.

हाईकोर्ट ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट द्वारा, 5 फरवरी 2021 को जारी आदेश की रोशनी में, समता बनाए रखते हुए आवेदक को अस्थाई ज़मानत का हक़दार माना जाता है’.

समता का सिद्धांत अमूमन सह-अभियुक्तों को ज़मानत हासिल करने में मदद करता है, चूंकि इसमें कहा गया है कि अगर एक अभियुक्त को ज़मानत मिल जाती है, तो ये दूसरे अभियुक्त को भी दी जा सकती है यदि उसके केस का आधार समान हो.

लेकिन, 9 फरवरी को इंदौर ज़िला एवं सत्र न्यायालय ने ख़ान की दूसरी ज़मानत अर्ज़ी को ख़ारिज कर दिया.

कोर्ट के आदेश के अनुसार, पुलिस का दावा है कि ख़ान, जो मुम्बई में एक सिविल इंजीनियर है, गिरफ्तार किए गए दूसरे लोगों के साथ, उस कार्यक्रम के आयोजकों में से था. पुलिस ने कोर्ट को ये भी कहा कि फारूक़ी के साथ मिलकर, ख़ान काफी समय से सोशल मीडिया के ज़रिए, इस तरह के आयोजन करता रहा है और उनके खिलाफ मुम्बई और उत्तर प्रदेश के जॉर्ज टाउन पुलिस स्टेशन में पहले भी इस तरह के मामले दर्ज हुए हैं.

कोर्ट ने ज़मानत याचिका को ख़ारिज कर दिया और कहा कि फारूक़ी को सुप्रीम कोर्ट से केवल अंतरिम ज़मानत दी गई है और इसलिए ख़ान को उनकी रेगुलर ज़मानत याचिका में, समता का लाभ नहीं दिया जा सकता. अंतरिम ज़मानत एक अस्थाई ज़मानत होती है, जो तब दी जाती है जब किसी व्यक्ति की रेगुलर ज़मानत याचिका किसी कोर्ट में लंबित हो.

सेशंस कोर्ट की ये भी राय थी कि 11 जनवरी को ख़ान की पहली ज़मानत अर्ज़ी ख़ारिज किए जाने के बाद से, हालात में कोई बदलाव नहीं आया है. उसने कहा कि सिर्फ इसलिए कि फारूक़ी को ज़मानत मिल गई, ये नहीं कहा जा सकता कि हालात में कोई बदलाव आया है, जिससे ख़ान को ज़मानत दी जाए.

उसी जज ने फारूक़ी को ज़मानत नहीं दी थी

न्यायमूर्ति रोहित आर्य, जिन्होंने 12 फरवरी को व्यास और एंथनी को ज़मानत दी थी, वही जज हैं जिन्होंने 28 जनवरी को फारूक़ी और यादव की ज़मानत अर्ज़ी ख़ारिज की थी.

25 जनवरी को फारूक़ी और यादव की ज़मानत याचिका पर सुनवाई के दौरान, जस्टिस आर्य ने उनके वकीलों से पूछा था, ‘लेकिन आप दूसरों की धार्मिक भावनाओं का नाजायज़ फायदा क्यों उठाते हैं? आपकी मानसिकता में क्या ख़राबी है? अपने कारोबार के लिए आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?’

जज ने ज़मानत देने की अनिच्छा का भी इज़हार किया था और फारूक़ी के वकील- सीनियर एडवोकेट विवेक तनखा- से पूछा कि क्या वो ज़मानत याचिका वापस लेना चाहते हैं. लेकिन तनखा ने ज़ोर देकर कहा कि फारूक़ी ने ‘कोई अपराध नहीं किया है’, और उन्हें ज़मानत दी जानी चाहिए.

अपना आदेश सुरक्षित रखते हुए, जज ने कहा था, ‘ऐसे लोगों को छोड़ा नहीं जा सकता’.

फारूक़ी और यादव की ज़मानत याचिकाएं ख़ारिज करते हुए हाईकोर्ट ने उस समय कहा था कि अभियोजन द्वारा अभी तक जुटाए गए साक्ष्यों से पृथमदृष्टया लगता है कि इन दोनों ने, ‘नागरिकों के एक वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए, ‘जानबूझकर इरादतन’, ‘घिनौनी और अपमानजनक बातें’ कहीं थीं.

जज ने कहा था, ‘ये ऐसा केस नहीं है, जिसमें सबूत नहीं हैं’. ये तीसरी बार था, जब फारूक़ी और यादव की ज़मानत नामंज़ूर हुई थी.

अर्नेष कुमार का फैसला

लेकिन, एक हफ्ते के बाद, 5 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने फारूक़ी को अंतरिम ज़मानत दे दी. ये सुप्रीम कोर्ट जज अर्नेष कुमार का फैसला था, जो फारूक़ी के काम आया.

2014 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में गिरफ्तारी के लिए, जिनके अपराध की सज़ा सात साल तक हो सकती है, व्यक्तियों की गिरफ्तारी के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित की थी. कोर्ट ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 41ए के प्रावधानों को दोहराया, जिनमें उन शर्तों को सूचीबद्ध किया गया है, जिन्हें पुलिस को ऐसे मामलों में, किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के लिए पूरा करना होता है.

धारा 51 के उप-खंड (1)(बी) (ii) में, ऐसी 5 स्थितियां दी गई हैं, जैसे पुलिस अधिकारी को यक़ीन होना चाहिए कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करना आवश्यक है, ताकि उसे दूसरा अपराध करने से रोका जा सके, या वो सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को धमकाने का काम न कर सके.

अर्नेष कुमार के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले पुलिस को उसकी गिरफ्तारी की एक चेक लिस्ट ठीक से भरकर देनी होगी और वो कारण बताने होंगे जिनकी वजह से गिरफ्तारी की गई.

इन आरोपों का संज्ञान लेते हुए कि गिरफ्तारी के लिए अर्नेष कुमार के फैसले में निर्धारित दिशा-निर्देशों का, इस मामले में पालन नहीं किया गया था, सुप्रीम कोर्ट ने फारूक़ी को अंतरिम ज़मानत दे दी. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा पिछले साल दर्ज एक मामले में जारी किए गए प्रोडक्शन वॉरंट पर भी रोक लगा दी.

फारूक़ी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाख़िल करके अपने ख़िलाफ एफआईआर को रद्द किए जाने की भी मांग की है.

यादव के मामले में उनके वकील अंशुमन श्रीवास्तव ने दिप्रिंट से कहा कि वो अगले कुछ दिन में, सुप्रीम कोर्ट में उनकी ज़मानत के लिए एक याचिका दायर करने जा रहे हैं.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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