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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फाइल फोटो । दिप्रिंट
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नई दिल्ली: असम में भाजपा की सहयोगी पार्टी असम गण परिषद ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक पर नाराजगी जताते हुए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का साथ छोड़ दिया. असम गण परिषद के अध्यक्ष अतुल बोरा ने मीडिया से कहा, ‘हमने भाजपा नेतृत्व को विधेयक के नकारात्मक प्रभाव और असम की जनता का रुख समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन भाजपा ने विधेयक को आगे बढ़ाने का फैसला कर हमें गठबंधन तोड़ने के लिए मजबूर कर दिया.’

इसके साथ ही, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वह 16वीं ऐसी पार्टी बन गई जो राजग से अलग हो गई. अब मीडिया में इस बात के कयास और तेज़ हो गए कि राजग पर संकट बढ़ रहा है. हालांकि, भाजपा का कहना है कि ‘पुराने सहयोगी साथ छोड़ते हैं तो नये सहयोगी जुड़ते हैं. किसी पार्टी के साथ छोड़ देने से राजग कमजोर नहीं होगा. गठबंधन पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में है.’

अगर पिछले पांच साल की गठबंधन राजनीति पर नजर डालें तो राजग में सहयोगी दलों के अलगाव का सिलसिला 2014 में ही शुरू हो गया था. 2014 में हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले ​हरियाणा जनहित कांग्रेस ने भाजपा पर धोखा देने का आरोप लगाकर गठबंधन से अलग हो गई. हरियाणा जनहित कांग्रेस के अध्यक्ष कुलदीप बिश्नोई ने आरोप लगाया था कि ‘भाजपा धोखेबाज पार्टी है. हमने हमेशा गठबंधन धर्म निभाया लेकिन भाजपा ने हमें धोखा दिया. भाजपा क्षेत्रीय दलों को खत्म करना चाह रही है.’

इसके बाद तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव के पहले दिसंबर, 2014 में एमडीएमके ने गठबंधन करने के मात्र छह महीने बाद ही भाजपा से नाता तोड़ लिया था. एमडीएमके चीफ वाइको ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ​तमिलों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया था. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के पहले ही डीएमडीके ने भी भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया. जबकि लोकसभा चुनाव में डीएमडीके राजग में शामिल थी और 14 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. हालांकि, पार्टी सभी 14 सीटें हार गई थी.

लोकसभा चुनाव 2014 के समय आंध्र प्रदेश के फिल्म कलाकार पवन कल्याण की जन सेना पार्टी ने टीडीपी और भाजपा के साथ हाथ मिलाया था, लेकिन बाद में वह भी गठबंधन से बाहर हो गई. बाद में पवन कल्याण ने आरोप लगाया कि भाजपा आयकर छापों के माध्यम से प्रतिशोध की राजनीति कर रही है.

केरल में 2016 विधानसभा चुनाव से पहले आरएसपी (बोल्शेविक) ने भाजपा से दूरी बना ली ​थी. हाल ही में केरल में सीके जानू की पार्टी जनाधिपत्य राष्ट्रीय सभा ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया और कहा कि भाजपा ने अपना वादा नहीं निभाया इसलिए वह गठबंधन से बाहर हो रही है.

इसके बाद 2017 में महाराष्ट्र के स्वाभिमानी पक्ष ने भाजपा की नीतियों के विरोध में मोर्चा खोला और गठबंधन से बाहर हो गई. इस पार्टी के प्रमुख और सांसद राजू शेट्टी ने राजग छोड़ते समय मोदी सरकार और महाराष्ट्र की भाजपा सरकार पर किसान विरोधी होने का आरोप लगाया था.


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नागालैंड में 2018 में भाजपा ने एनडीपीपी से गठबंधन किया तो इसके विरोध में एनपीएफ ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया. भाजपा और एनपीएफ का गठबंधन 15 साल पुराना था. 2018 की शुरुआत में ही हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (हम) के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने राजग का साथ छोड़ दिया था और विपक्षी गठबंधन में शामिल हो गए थे. मांझी गठबंधन की तरफ से राज्यसभा में अपना एक उम्मीदवार चाहते थे, ऐसा नहीं होने पर उन्होंने बगावत कर दी.

इसी तरह एस रामदॉस की पार्टी पीएमके लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ थी. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी ने शर्त रखी कि एस रामदॉस के बेटे अम्बुमणि रामदॉस को पार्टी सीएम का प्रत्याशी बनाए. भाजपा ने यह शर्त स्वीकार नहीं की और पीएमके गठबंधन से अलग हो गई.

इसके अलावा 2018 में ही चंद्रबाबू नायडू की तेलगू देशम पार्टी (तेदेपा) ने राजग छोड़कर कांग्रेस के साथ गठबंधन की घोषणा की. उन्होंने कहा, हम लोकतंत्र की मजबूती और राष्ट्र को बचाने के लिए एक साथ आ रहे हैं.

पश्चिम बंगाल में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने भी भाजपा का साथ छोड़ा. गोरखा मुक्ति मोर्चा का आरोप था कि भाजपा ने गोरखाओं को धोखा दिया ​है. कर्नाटक में केपीजेपी ने भाजपा छोड़कर जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन ज्वाइन कर लिया.

असम गण परिषद से ठीक पहले उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) भाजपा का साथ छोड़कर विपक्षी गठबंधन में जा मिली. राजग छोड़कर विपक्षी गठबंधन में शामिल होते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने कहा, ‘राजग में हमारा लगातार अपमान हो रहा था.’ यहां तक कि नीतीश कुमार ने उन्हें नीच कहकर अपमानित किया. बिहार के ही नेता मुकेश सहनी की ‘विकासशील इंसान पार्टी’ भी अब विपक्षी महागठबंधन के साथ है. उपेंद्र कुशवाहा नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री थे, तो मुकेश सहनी को अमित शाह का करीबी माना जाता रहा, लेकिन अब वे विपक्षी गठबंधन के साथ खड़े हैं.

जम्मू और कश्मीर में सत्ता में रहते हुए भी पीडीपी से भाजपा का गठबंधन जून, 2018 में टूट गया, जबकि महबूबा मुफ्ती खुद मुख्यमंत्री थीं. अंतत: वहां पर पीडीपी, कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच गठबंधन की संभावना बन रही थी, लेकिन राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया.

असम गण परिषद के राजग से बाहर होने के साथ अपना दल (एस) की संयोजक अनुप्रिया पटेल और पार्टी अध्यक्ष आशीष पटेल ने भी कड़े तेवर अपनाए और कहा कि भाजपा अपना रवैया सुधारे, वरना वे गठबंधन से बाहर हो सकते हैं. अनुप्रिया पटेल फिलहाल केंद्र में मंत्री हैं. इसके अलावा उत्तर प्रदेश में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) के ओमप्रकाश राजभर भी लंबे समय से भाजपा से नाराज हैं और गठबंधन से बाहर जाने का संकेत कई बार दे चुके हैं.

मंगलवार को दोनों दलों का एक ही दिन पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक कर खुलकर नाराजगी जाहिर करने के अपने राजनीतिक संकेत हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 29 दिसंबर को गाजीपुर की रैली महाराजा सुहेलदेव को समर्पित थी, लेकिन सुहेलदेव के आदर्शों पर बनी राजभर की पार्टी ने इस कार्यक्रम का बहिष्कार किया.

मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने भी संकेत दिया है कि वे नागरिकता (संशोधन) विधेयक के मुद्दे पर राजग का साथ छोड़ सकते हैं. उन्होंने कहा कि वे अपनी नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के नेताओं से राजग का साथ छोड़ने के मसले पर चर्चा करेंगे और उसके बाद कोई निर्णय लेंगे.

बिहार में राजग के मजबूत घटक दल माने जाने वाले लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान ने भी परोक्ष रूप से धमकी दी थी कि वे राजग छोड़ सकते हैं.

हाल ही में उत्तर प्रदेश के बहराइच से सांसद सावित्री बाई फुले ने भी भाजपा को दलित विरोधी बताते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया और घोषणा की वे 2019 में भाजपा को हराने के लिए काम करेंगी.

महाराष्ट्र के प्रमुख दलों में से एक शिवसेना पिछले तीन वर्षों से लगातार भाजपा के लिए मुखर विपक्षी बनी हुई ​है. हालांकि, शिवसेना ने ​अभी तक भाजपा से अलग होने की घोषणा नहीं की है, लेकिन उसके बारे में भी कयास लगाए जा रहे हैं कि पार्टी भाजपा और केंद्र सरकार के प्रति जैसा रुख अपना रही है, वह भी राजग गठबंधन से अलग हो सकती है. शिवसेना ने अब तक केंद्र या राज्य कहीं भी भाजपा से अलग नहीं हुई है, लेकिन यह घोषणा जरूर कर चुकी है कि वह 2019 में लोकसभा चुनाव अकेले दम पर लड़ेगी.

भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से एक-एक क्षे​त्रीय दलों का अलग होना यह संकेत है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में हवा का रुख बदल सकता है. राजग और भाजपा के कमजोर होने के संकेत इस बात से भी मिल रहे हैं कि भाजपा के अंदर भी बार-बार नाराजगी की बात कही जाती है.

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 28 दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. हालांकि, खुद भाजपा को 282 सीटें मिली थीं जबकि 22 सहयोगी दलों ने मिलकर 54 सीटें हासिल की थीं. इस तरह राजग के पास कुल 335 सीटों का बहुमत था. हालांकि, लोकसभा चुनाव 2014 के बाद कई राज्यों में भाजपा ने छोटे दलों से गठबंधन किया है. मौजूदा समय में भाजपानीत राजग में 42 पार्टियां हैं, लेकिन अब तक सोलह सहयोगियों ने भाजपा का साथ छोड़ दिया है. लोकसभा चुनाव में भाजपा की दो सबसे सहयोगी थीं शिवसेना और तेलुगु देशम पार्टी. शिवसेना को लोकसभा में 18 और तेलुगु देशम को 16 सीटें मिली थीं. तेलुगु देशम गठबंधन से अलग हो चुकी है और शिवसेना धमकी दे रही है. अगर ये दोनों दल भाजपा से दूसरी बना लेते हैं तो यह पार्टी के लिए बड़ा नुकसान है.

राजग से कई पार्टियों के अलग होने के मसले पर राजनीति​क विश्लेषक अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘एक निर्णय के पीछे कई कारण होते हैं. मुख्य कारण की खोज करनी चाहिए. मुख्य कारण यह है कि भाजपा के सहयोगी दल नई राजनीतिक परिस्थिति का आकलन कर रहे हैं. वे यह देख रहे हैं कि 2019 के चुनाव में किसका पलड़ा भारी होगा. उन्हें ऐसा लग रहा है कि चुनावी हवा इस वक्त भाजपा और उसके सहयोगी दलों के साथ नहीं है, बल्कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की ओर है. इस बार गैर-भाजपा शक्तियों की मजबूती का सूचकांक 2014 के मुकाबले इस बार बहुत ऊंचा होगा. इसलिए यह समीकरण तेजी से बदल रहा है.’

हालांकि, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र तिवारी मानते हैं कि भाजपा के खिलाफ हवा से ज्यादा यह दबाव की राजनीति है. वे कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि भाजपा को हारता देख कर सब भाग रहे हैं. अनुप्रिया पटेल और ओमप्रकाश राजभर दबाव की राजनीति कर रहे हैं. वे गठबंधन में रहने की कुछ कीमतें चाहते हैं जो उन्हें नहीं मिल पाई हैं. जबकि भाजपा उन्हें मनाने की जगह अपने जनाधार को मजबूत करने में जुटी है. सवर्ण आरक्षण का प्रस्ताव उसी का हिस्सा है.’


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समीकरण तेजी से क्यों बदल रहे हैं? क्या भाजपा के साथ आए दलों को निजी स्तर पर कोई नुकसान हुआ, या जनता की नाराजगी की वजह से भाजपा से दूर जाना चाह रहे हैं? इसके जवाब में अभय दुबे कहते हैं, ‘मोदी सरकार पिछले पांच साल से तीन तरीकों से चली है. हेडलाइन मैनेजमेंट, डेटा मैंनेजमेंट और इवेंट मैनेजमेंट. यह सरकार यह सोचती है कि राजनीति का प्रबंधन किया जा सकता है. हर चीज मैनेज की जा सकती है. इस चक्कर में जमीन पर उसकी दावेदारियां संदिग्ध होती गई हैं. इसलिए हर सहयोगी को लगता है कि 2019 में 2014 जैसी स्थितियां नहीं होंगी. दूसरे, अटल बिहारी वाजपेयी के समय गठबंधन के दलों के साथ भाजपा ने बहुत अच्छा व्यवहार किया था, लेकिन इस सरकार ने सहयोगियों के अच्छा सलूक नहीं किया.’

अभय दु​बे यह भी मानते हैं इस सरकार में राजग की कभी बैठक नहीं बुलाई गई. नोटबंदी हो, सवर्णों को आरक्षण हो या इस तरह के दूसरे बड़े फैसले हों, राजग के सहयोगी दलों की न बैठक बुलाई गई, न ही कभी उनसे कोई राय ली गई. ये बातें भी उन्हें अखरती हैं.

उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता हिमांशु दुबे ने दिप्रिंट से कहा, ‘सभी राजनीतिक दल अपना नफा नुकसान देखते हैं. वे अपने फायदे के हिसाब गठबंधन करते हैं. इसलिए यह कोई चिंता का विषय नहीं है, क्योंकि चुनाव के पहले यह सब होता है. पुराने सहयोगी साथ छोड़ेंगे तो नये दल ऐसे हैं जो भाजपा के साथ जाना चाहते हैं. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमने जनता का विश्वास जीता है और आगामी लोकसभा चुनाव में और मजबूती से सत्ता में वापसी करेंगे.’


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