Tuesday, 25 January, 2022
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मुद्रा संकट के डर से विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाते रहने के उलटे नतीजे भी मिल सकते हैं

रिजर्व बैंक के पास अब 608 अरब डॉलर का भंडार जमा हो गया है और भारत दुनिया में सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाला पांचवां देश बन गया है लेकिन यह अंततः रुपये को कमजोर ही करेगा

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नये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) का विदेशी मुद्रा भंडार बहुत तेजी से बढ़ रहा है. अप्रैल 2020 के बाद से आरबीआइ के डॉलर के भंडार में 100 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है और यह कुल 608 अरब डॉलर का हो गया है. इस तरह भारत दुनिया में सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाला पांचवां देश बन गया है.

केंद्रीय बैंक इसे उचित ठहराने के लिए विदेशी मुद्रा का पर्याप्त भंडार रखने की बातें कर रहा है. कहा जा रहा है कि आरबीआइ सिर्फ इतना बड़ा भंडार रखता है जो आयात के 15 महीने के बिल का भुगतान करने को पर्याप्त हो जबकि दूसरे देश इससे ज्यादा का भंडार रखते हैं. स्विट्ज़रलैंड, जापान, रूस, चीन भारत की तुलना में ज्यादा बड़ा भंडार रखते हैं जो क्रमशः 39, 20, 16 महीने के आयात बिल के लिए पर्याप्त हो. लेकिन पिछले दो दशकों से आरबीआइ मुद्रा की गतिविधियों के मद्देनजर विदेशी मुद्रा भंडार रखने लगा है.


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मुद्रा पर नज़र, लेकिन मुद्रास्फीति के लक्ष्य के विपरीत

विदेशी मुद्रा भंडार में हाल में जो वृद्धि हुई है वह रुपये की कीमत में वृद्धि को रोकने की कोशिश के तहत हुई है. जून 2020 में रुपया-डॉलर विनिमय दर 75.6 थी, आज यह मामूली सुधार के साथ 72.8 है. आरबीआइ के हस्तक्षेप के कारण बड़ी मूल्य वृद्धि को रोका जा सका. मुद्रा के साथ ऐसे खेल से दूसरे देश तो नाराज होते ही हैं, यह मुद्रास्फीति को बढ़ाने के कारण महंगा भी पड़ता है.

इसके अलावा, अगर मुद्रा पर अटकलों का गहरा हमला होता है तब गिरावट को रोकने के लिए भंडार का इस्तेमाल नहीं किया जाता. पहले, आरबीआइ रुपये की कीमत में गिरावट को रोकने के लिए मुद्रा नीति को सख्त करता था और पूंजीगत नियंत्रणों का प्रयोग करता था, न कि अपने अरबों की बिक्री करता था. केंद्रीय बैंक रुपये की मूल्यवृद्धि नहीं चाहता क्योंकि यह निर्यातों को गैर-प्रतिस्पर्द्धी बना देता है. इसलिए वह डॉलर खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप करता है.

चीन ने दशकों तक यह रास्ता अपनाया, जिसे ‘पड़ोसी को भिखारी बनाओ’ वाली नीति कहा जाता है क्योंकि यह दूसरे देशों का बुरा हाल करता है. इस साल अप्रैल में अमेरिका ने भारत को उन देशों में शुमार रखने का फैसला किया, जो ‘करेंसी मैनीपुलेटर’ (मुद्रा के साथ खेल करते) हैं. भारत दिसंबर 2020 से ऐसे देशों में शुमार है.

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अमेरिका उन देशों को ‘करेंसी मैनीपुलेटर’ की सूची में डाल देता है, जो 12 महीने की अवधि में इन तीन में से दो कसौटियों को पूरा करते हैं—1. अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार सरप्लस 20 अरब डॉलर पर पहुंच गया हो; 2. करेंट अकाउंट सरप्लस जीडीपी के कम-से-कम 2 प्रतिशत के बराबर हो; 3. विदेशी मुद्रा की कुल खरीद देश के जीडीपी के कम-से-कम 2 प्रतिशत के बराबर हो. अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने अप्रैल में जो रिपोर्ट जारी की है उसके अनुसार, भारत को इस सूची में इसलिए रखा गया क्योंकि पिछले 12 महीने में आरबीआइ ने जीडीपी के 5 प्रतिशत के बराबर विदेशी मुद्रा की खरीद की, और अमेरिका के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार सरप्लस 20 अरब डॉलर से ज्यादा का हो गया.
मुद्रा के मामले में आरबीआइ के हस्तक्षेप के कई नुक़सानों में सबसे अहम यह है कि इसके विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि घरेलू वित्तीय व्यवस्था में पैसे की सप्लाइ बढ़ा देती है. इससे मुद्रास्फीति के दबाव पैदा होते हैं और यह अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक हो सकता है.


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क्या विदेशी मुद्रा भंडार घरेलू मुद्रा को कमजोर नहीं होने देता?

बड़े विदेशी मुद्रा भंडार को इसलिए भी उपयोगी माना जाता है कि यह केंद्रीय बैंक को मुद्रा को कमजोर होने से बचाने की पर्याप्त ताकत देता है. अगर डॉलर के मुक़ाबले मुद्रा का मूल्य घटने लगता है तब केंद्रीय बैंक डॉलर के भंडार में से बिक्री करके स्थानीय मुद्रा की खरीद कर सकता है और उसका मूल्य गिरने से रोक सकता है. लेकिन मुद्रा पर जब अटकलों के कारण दबाव हो तब ऐसा शायद ही हो पाता है.

अमेरिकी सरकार से मिले विशाल वित्तीय पैकेज के कारण उसकी अर्थव्यवस्था में काफी सरगर्मी है, और मुद्रास्फीति बढ़ रही है. ऐसे में अमेरिकी फेडरल रिजर्व पॉलिसी ब्याज दर में वृद्धि कर सकता है. अगर ऐसा होता है तब भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की हालत मई 2013 के ‘टेपर टैंट्रम’ कांड वाली हो जाएगी जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अपनी ‘क्वांटिटेटिव ईजिंग पॉलिसी’ को संकुचित करने का संकेत दे दिया था. इसके कारण भारत और दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी बाहर जाने लगी और उनकी मुद्राओं में गिरावट आ गई थी.

जमा कोश से बिक्री करके विनिमय दर का बचाव करने से सटोरियों को मौका मिल जाता है. जब लोग देखते हैं कि आरबीआइ जमा कोश से बिक्री कर रहा है तब वे यह उम्मीद करने लगते हैं कि कोश बेहद निचले स्तर पर पहुंच जाएगा और केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप रोकने को मजबूर हो जाएगा और तब मुद्रा कमजोर पड़ जाएगी. ऐसा होने से पहले ही विदेशी और देसी निवेशक पैसे निकालने लगते हैं. मुद्रा पर उनकी सट्टेबाजी रुक जाती है और मुद्रा का मूल्य तेजी से गिरने लगता है.

इसे रोकने के लिए आरबीआइ ने मुद्रा नीति सख्त की, सिस्टम से तरलता पर लगाम लगा दी और पूंजी पर नियंत्रण लगा दिया. उसने जमा कोश का बहुत छोटा हिस्सा इस्तेमाल किया. मई 2013 में उसका विदेशी मुद्रा भंडार करीब 288 अरब डॉलर का था. मई-सितंबर 2013 के बीच उसने 22 अरब डॉलर बेच दिए. इसके बावजूद रुपये का मूल्य मई 2013 में 56.5 से सितंबर 2013 में 62.8 हो गया.

केंद्रीय बैंक के जमा कोश से व्यवसाय जगत को यह भरोसा होता है कि रुपया तेजी से कमजोर नहीं हो जाएगा. वह मानता है कि मुद्रा में बड़ी उथलपुथल होने पर आरबीआइ जमा कोश का इस्तेमाल करेगा. यह इन फ़र्मों को अपनी बैलेंसशीट में डॉलर को छुपाने से रोकता है. इसके चलते एक ऐसा दुष्चक्र बन जाता है कि आरबीआइ जमा कोश जितना बढ़ाता है, इन फ़र्मों का भरोसा इतना बढ़ता है कि वे खुला कारोबार करते हैं और वित्तीय हानि से बचाव की लागत से बचते हैं, और तब आरबीआइ को जमा कोश बढ़ाने का ज्यादा औचित्य हासिल हो जाता है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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