Thursday, 27 January, 2022
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महंगाई कुछ कम होगी- 5 कारण जिनकी वजह से आपको ऊंची कीमतों के बारे में ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए

महंगाई का मई का आंकड़ा कुछ दोषपूर्ण था, इसमें तेजी विश्व बाज़ार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, जींसों की कीमतों में वृद्धि और सप्लाइ में अड़चनों के कारण आई थी.

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मई में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) में 6.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. अप्रैल में यह वृद्धि 4.2 प्रतिशत दर्ज की गई थी. इसके कारण यह आशंका पैदा हो गई कि भारतीय रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति को सख्त कर देगा.

मई के आंकड़े को कुछ दोषपूर्ण माना जा सकता है क्योंकि यह वृद्धि मुख्यतः विश्व बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, जींसों की कीमतों में वृद्धि, और लॉकडाउन के कारण सप्लाइ में अड़चनों के चलते हुई. इसके मद्देनजर मौद्रिक नीति के तहत ब्याज दरों में वृद्धि करना उपयुक्त नहीं होता.


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दरों में छेड़छाड़ क्यों न करें

सबसे पहले तो हमें यह मानना पड़ेगा कि मई के सीपीआइ का आंकड़ा सही तस्वीर नहीं दे सकता. महंगाई के मई के आंकड़े मई 2020 के आंकड़े के आधार पर निकाले गए हैं, जिन्हें अभ्यारोपित किया गया है. पिछले साल लॉकडाउन के कारण केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय उप-तत्वों की महंगाई के आंकड़े निकालने के लिए कीमतों के कोटेशन नहीं ले पाया था.

रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति कमिटी ने भी मौद्रिक नीति तय करने के मकसद से सीपीआइ सीरीज़ में व्यतिक्रम के रूप में अप्रैल और मई 2020 के लिए अभ्यारोपित प्रिंट्स को स्वीकार किया था. सही आकलन के लिए बाद के महीनों की महंगाई के आंकड़ों को देखना ही उपयोगी होगा.

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दूसरा, ऊंची मुद्रास्फीति खाद्य सामग्री की कीमतों में वृद्धि के कारण हुई है. प्रोटीन वाली चीजों और सब्जियों की कीमतें बढ़ी हैं. स्थानीय लॉकडाउन के कारण सप्लाइ चेन में बाधाएं पैदा हुईं. यह थोक मूल्य सूचकांक (डब्लूपीआइ) और सीपीआइ खाद्य सामग्री की कीमतों में महीने-दर-महीने वृद्धि (मौसम के लिहाज से समायोजित) में अंतर से स्पष्ट होता है. खाद्य सामग्री के डब्लूपीआइ में अप्रैल और मई के बीच 0.86 फीसदी की कमी आई, तो उनके सीपीआइ में 1.1 फीसदी की वृद्धि हो गई. डब्लूपीआइ और सीपीआइ में महीने-दर-महीने वृद्धि में यह अंतर सप्लाइ में अड़चनों के कारण आया.

कोविड के मामलों में कमी और सरकारी प्रतिबंधों में छूट के बाद सप्लाइ में अड़चनें दूर हो सकती हैं. इससे महंगाई में कुछ कमी आ सकती है. दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून के समय पर आ जाने से भी खाद्य सामग्री की कीमतों पर लगाम लग सकता है.

तीसरा, मौद्रिक नीति प्रायः एक-दो साल के लिए ही होती है. चूंकि हम उम्मीद कर रहे हैं कि मौजूदा महंगाई अगली तिमाही तक थोड़ी कम हो जाएगी, इसलिए मौद्रिक नीति मौजूदा ऊंची मुद्रास्फीति पर शायद ही लगाम लगाएगी. दरअसल, जब तक आर्थिक वृद्धि में तेजी नहीं आती तब तक रिजर्व बैंक दरों में वृद्धि शायद ही करेगा. केंद्रीय बैंक सप्लाइ की वजह से नहीं बल्कि मांग की वजह से आई मुद्रस्फीति का मुक़ाबला करने के लिए ब्याज दरों में वृद्धि नहीं करता, जैसा कि अभी हो रहा है.

चौथा, जिन लोगों को यह चिंता है कि केवल सीपीआइ ही नहीं बल्कि डब्लूपीआइ भी बढ़ा है और इससे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में भी वृद्धि हो जाएगी, उन्हें नीची ‘बेस इफेक्ट’ को याद रखना चाहिए. हालांकि डब्लूपीआइ आधारित मुद्रास्फीति में मई में 12.94 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन यह मुख्यतः तेल तथा जींसों की कीमतों में वृद्धि और नीची ‘बेस इफेक्ट’ के कारण हुआ. मई 2020 में डब्लूपीआइ आधारित मुद्रास्फीति 3.37 प्रतिशत थी.

पांचवा, ऐसा लगता है कि वैश्विक कारणों और लॉकडाउन से जुड़ी वजहों ने सीपीआइ में वृद्धि में प्रमुख भूमिका निभाई. खुदरा महंगाई को जिन चीजों ने बढ़ाया उनमें ‘ईंधन और रोशनी’ शामिल थीं, जिनकी कीमतों में 11.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई, और ‘अन्य’ चीजों की कीमतों में 7.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई.

‘अन्य’ चीजों में प्रमुख वर्ग ‘परिवहन और संचार’ का था, जिसकी कीमतों में दहाई अंकों में, 12.38 प्रतिशत की वृद्धि हुई. यह पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 60 प्रतिशत तक की वृद्धि के कारण हुआ. स्वास्थ्य पर खर्चों में बढ़ोतरी और ‘पर्सनल केयर आदि’ पर खर्चों में वृद्धि ने ‘अन्य’ वर्ग की चीजों की महंगाई बढ़ाई.


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आगे क्या होगा

हमें उम्मीद है कि आगे जाकर महंगाई कम होगी. स्थानीय लॉकडाउन में छूट और मंडियों में प्रमुख सब्जियों की आवक के कारण कीमतों में तेज गिरावट दिखी.

कोविड महामारी की दूसरी लहर लौट रही है और अधिकतर राज्यों ने प्रतिबंधों में छूट घोषित कर दी है. हालात सुधरते गए तो सप्लाइ में अड़चनें और घटेंगी और कीमतों में भी गिरावट आएगी.

दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून के समय पर आने और कोविड के मामलों में कमी से खरीफ फसल की बुवाई को बढ़ावा मिलेगा. इससे आगामी महीनों में मुद्रास्फीति और कम होगी. खाद्य तेलों की कीमतों में कमी लाने के लिए सरकार वनस्पति तेलों के आयात पर शुल्क घटाने के बारे में विचार कर रही है. भारत खाद्य तेलों का सबसे बड़ा आयातक है.

तेलहन का घरेलू उत्पादन घरेलू मांग के अनुपात से इसलिए नहीं बढ़ा है कि किसान अनाज उगाने को ज्यादा तरजीह देने लगे हैं. वनस्पति तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें चढ़ी हैं और इसके कारण घरेलू कीमतें भी बढ़ी हैं. दालों की कीमतों को भी सरकार अपने भंडार से दालों का कुछ हिस्सा खुले बाज़ार में डालकर कम कर सकती है.

लेकिन आयातित महंगाई ऊंची बनी रहेगी, जिसका सामना नीतिगत उपाय करके ही किया जा सकता है.
विकसित देशों में मांग में भारी तेजी आई है और इसके साथ ही उपभोग और निवेश की मांग में भी तेजी आई है. इसके कारण लौह अयस्क, तांबा, और इस्पात आदि की कीमतें बढ़ी हैं.

आर्थिक गतिविधियां जब और सामान्य होंगी तब इन चीजों की वजह से बनी लागत को लेकर दबाव और मजबूत होगा. मांग में निरंतर वृद्धि के साथ कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी रह सकती है. देश में डीजल और पेट्रोल की कीमतों को ईंधन पर टैक्स घटाकर कम किया जा सकता है.

(इला पटनायक एक अर्थशास्त्री और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं. राधिका पांडे एनआईपीएफपी में सलाहकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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