Monday, 27 June, 2022
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महिला दिवस पर सम्मानित मनोचिकित्सक ने कहा- मीडिया मानसिक बीमारियों को गलत ढंग से दिखाता है

मनोचिकित्सक तारा रंगास्वामी उन 29 महिलाओं में हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर नारी शक्ति सम्मान से सम्मानित किया गया है. वह कहती हैं कि उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में जागरूकता, प्रोफेशनल्स, और सेवाओं तक पहुंच की कमी है.

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नई दिल्ली: मनोचिकित्सक तारा रंगास्वामी के मुताबिक मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भारतीय मीडिया और फिल्म में जिस तरह की बातें गढ़ी गई हैं उससे इसे कलंक की तरह दिखाने की प्रवृत्ति को मजबूती मिलती है. साथ ही, मीडिया में मानसिक बीमारियों को गलत तरीके से दिखाया जाता है. वह कहती हैं कि इसे बदलने की ज़रूरत है.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर आठ मार्च को रामनाथ कोविंद ने जिन 29 महिलाओं को नारी शक्ति सम्मान दिया उनमें तारा रंगास्वामी का भी नाम है. रंगास्वामी एक प्रसिद्ध मानसिक स्वास्थ्य शोधकर्ता हैं. उन्हें साल 2016 में देश स्तर पर सिजोफ्रेनिया को मानसिक विकलांगता की श्रेणी में शामिल करवाने का लिए जाना जाता है.

दिप्रिंट को दिए एक इंटरव्यू में रंगास्वामी ने देश में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता और इससे जुड़े पूर्वाग्रहों, मीडिया में इसको लेकर गढ़ी गई बातों और आगे की रणनीति को लेकर बात की.

उन्होंने कहा कि उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता, सेवा और प्रोफेशनल्स तक लोगों की पहुंच की सख्त ज़रूरत है.

उन्होंने कहा, ‘शहरी क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ी है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र अब भी इस मामले में पीछे है. दक्षिण भारत के ग्रामीण इलाकों में छोटे संगठन और सरकार की ओर से काम किया जा रहा है, देश के उत्तरी हिस्सों में अब भी जागरूकता, प्रोफेशनल्स या सेवाएं मौजूद नहीं है.’

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नेशनल हेल्थ सर्वे 2016 के मुताबिक भारत के 150 मिलियन लोगों को मनोचिकित्सक के इलाज की ज़रूरत है.

चेन्नई में सिजोफ्रेनिया रिसर्च फाउंडेशन की सह-संस्थापक और वाइस चेयरपर्सन रंगास्वामी मानती हैं कि सिजोफ्रेनिया और दूसरी मानसिक बीमारियों को लेकर सरकार की ओर से जागरूकता फैलाने की जरूरत है.

उन्होंने विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 में मानसिक विकलांगता को शामिल करने के लिए कड़ी पैरवी की थी. उन्होंने आइडियाज टूल बनाया है. जिसका सिजोफ्रेनिया के स्तर को आधिकारिक स्तर पर मापने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है.

उन्होंने कहा, ‘यह समझने की जरूरत है कि सिज़ोफ्रेनिया की वजह काला जादू नहीं है, बल्कि यह मानव मस्तिष्क की संरचना और जैविक गड़बड़ी की वजह से होने वाली एक बीमारी है. हमारा अंतिम प्रयास यह होना चाहिए कि मरीज किस तरह से अपना काम अच्छी तरह से कर पाते हैं. हमें यह देखना होगा कि मेडिकल और मानसिक-सामाजिक मदद से मरीज कितना बेहतर जीवन जी पाते हैं.’

उन्होंने कहा कि इस पॉलिसी में सिजोफ्रेनिया से 40 फीसदी से ज्यादा प्रभावित होने पर सरकार कुछ सहायता मुहैया करवाती है. मरीज के परिवार के सदस्यों को मरीज की उन ज़रूरतों को समझना होगा जो इस बीमारी से उबरने में उनकी मदद करता है.

रंगास्वामी के मुताबिक, भारत में 0.5 से 1 फीसदी लोग सिजोफ्रेनिया से प्रभावित हैं. हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में इस बीमारी का पता चलने और उसके इलाज में 8 से 10 साल लग जाते हैं.


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मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बदलता नजरिया

विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक की सलाहकार समिति की सदस्य रंगास्वामी मानती हैं कि महामारी की वजह से मानसिक बीमारी को लेकर भारत में नजरिया तेजी से बदला है.

उन्होंने कहा, ‘महामारी के बाद, नीति बनाने वाले और राजनेताओं ने भी देखा है कि मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर मुद्दा बन गया है. कई अध्ययनों से यह पता चलता है कि तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं बढ़ी हैं.’

उन्होंने कहा, ‘शहरी क्षेत्रों में यह देख कर अच्छा लगता है कि युवा इलाज के लिए पहुंच रहे हैं और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर बात कर रहे हैं.  इससे इलाज सामान्य बात हो जाती है.’

उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों को मीडिया ने कलंक की तरह और गलत तरीके से दिखाता है.

मीडिया और फिल्मों में गढ़े गए नैरेटिव को बदलने की ज़रूरत पर बल देते हुए उन्होंने कहा, ‘मानसिक स्वास्थ्य की समस्या को मीडिया जिस तरह से दिखाता है उसे इस पर विचार करने की  ज़रूरत है. मानसिक स्वास्थ्य की समस्या वाले अपराधियों को खूब तवज्जो दी जाती है और उन्हें ‘साइको’ बताया जाता है और इस तरह के शब्द सुर्खियां बनती हैं. इससे मानसिक स्वास्थ्य की समस्या को कलंक मानने को बढ़ावा मिलता है.’

उन्होंने कहा, ‘फिल्मों में भी यह दिखाया जाता है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे लोग किस तरह से ‘मंद बुद्धि’ के होते हैं और सामाजिक नियमों-कायदों का पालन कर पाने में असमर्थ होते हैं. जागरूकता बढ़ाकर इसमें बदलाव लाते हुए फिल्मों और मीडिया में मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं का सामना कर रहे लोगों की वास्तविक चुनौतियों और उनकी सफलता को दिखाए जाने की ज़रूरत है.’

प्रतिष्ठित करियर में जुड़ा एक और सम्मान

नारी शक्ति सम्मान के बारे में बात करते हुए 69 साल की रंगास्वामी ने कहा, ‘इससे न सिर्फ़ मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ेगी, बल्कि मनोविज्ञान के अध्ययन के प्रति युवा महिलाओं का झुकाव बढ़ेगा.’

रंगास्वामी तमिलनाडु की उन तीन महिलाओं में शामिल हैं जिन्हें देश में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता फैलाने में उनके योगदान लिए यह सम्मान मिला है.

रंगास्वामी को साल 2014 में ब्रिटेन के रॉयल कॉलेज ऑफ साइक्रेटिस्ट ने मानद उपाधि से नवाजा गया था. साल 2010 में उन्हें उसी रॉयल कॉलेज से प्रेसिडेंट का गोल्ड मेडल मिला था.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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