नई दिल्ली: पिछले हफ्ते जारी एक सरकारी सर्वे के अनुसार, उत्तर और पूर्वोत्तर राज्यों में मरीजों को सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर सबसे ज्यादा जेब से खर्च करना पड़ता है, जबकि दक्षिण और बॉर्डर राज्यों में लोग प्राइवेट अस्पतालों में सबसे ज्यादा खर्च करते हैं.
हाउसहोल्ड सोशल कंजम्प्शन: हेल्थ सर्वे, जो नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) के 80वें राउंड का हिस्सा है, बताता है कि नागालैंड, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और उत्तर प्रदेश में सरकारी अस्पतालों में सबसे ज्यादा आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च दर्ज हुआ, जबकि तमिलनाडु, तेलंगाना और जम्मू-कश्मीर में प्राइवेट अस्पतालों पर सबसे ज्यादा खर्च हुआ.
सर्वे में यह भी पाया गया कि प्राइवेट सेक्टर में सिक्किम, जम्मू-कश्मीर, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और त्रिपुरा जैसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रति भर्ती केस सबसे ज्यादा खर्च होता है.
20 अप्रैल 2026 को जारी यह सर्वे जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच किया गया था. यह देश का आठवां बड़ा हेल्थ सर्वे है, जब से 1950 के दशक में देश के सामाजिक-आर्थिक डेटा प्रोग्राम में बीमारी (मॉर्बिडिटी) को ट्रैक करना शुरू किया गया था. इसमें ग्रामीण और शहरी भारत के 1,39,732 घर शामिल हैं.
हेल्थकेयर में आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च (OOPE) का मतलब है वह पैसा जो मरीज या उसका परिवार इलाज के समय सीधे देता है. इसमें दवाइयों, जांच, सर्जन की फीस और दस्ताने या सिरिंज जैसी चीजों पर खर्च शामिल होता है—जिसका पैसा सरकार या इंश्योरेंस से वापस नहीं मिलता.
गुजरात के गांधीनगर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ के पूर्व निदेशक डॉ. दिलीप मावलंकर ने बताया कि सरकारी अस्पताल में भी मरीजों को अक्सर उन चीजों के लिए पैसा देना पड़ता है जो वहां उपलब्ध नहीं होतीं या पूरी तरह कवर नहीं होतीं.
उन्होंने कहा, “यह संख्या जितनी ज्यादा होगी, इलाज कराने वाले परिवारों पर आर्थिक बोझ उतना ही ज्यादा होगा.”
उत्तर और पूर्वोत्तर राज्यों में सरकारी अस्पतालों में ज्यादा खर्च
सर्वे के अनुसार, सरकारी अस्पतालों में प्रति भर्ती सबसे ज्यादा औसत खर्च नागालैंड (16,342 रुपये) और मणिपुर (16,007 रुपये) में है. इसके बाद हिमाचल प्रदेश (13,084 रुपये), उत्तर प्रदेश (12,878 रुपये), पंजाब (12,200 रुपये) और हरियाणा (10,987 रुपये) हैं—जो राष्ट्रीय औसत 6,631 रुपये से काफी ज्यादा है.
ये आंकड़े ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों के संयुक्त खर्च को दिखाते हैं और इसमें प्रसव (बच्चे का जन्म) शामिल नहीं है.
पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, ये आंकड़े काफी हद तक यह दिखाते हैं कि राज्य सरकारें अपने अस्पताल सिस्टम को कितना फंड देती हैं.
मावलंकर ने कहा, “अगर सरकारी अस्पताल को अच्छा फंड मिलता है, तो आदर्श रूप से मरीज को यात्रा खर्च के अलावा कुछ भी खर्च नहीं करना चाहिए. अस्पताल को दवाइयां, दस्ताने, खाना, जांच और सभी ज़रूरी सेवाएं देनी चाहिए.”
लेकिन जिन राज्यों में सरकार पर्याप्त खर्च नहीं करती, वहां मरीजों को दवाइयों, कंज्यूमेबल्स, इम्प्लांट और इलाज से जुड़ी दूसरी चीजों के लिए अपनी जेब से पैसा देना पड़ता है.
उन्होंने कहा कि किसी राज्य के अमीर होने का मतलब यह नहीं कि उसके अस्पतालों को अच्छा फंड मिलेगा. “राज्य अमीर हो सकता है, लेकिन वह अस्पतालों को पैसा न दे.”

दक्षिण और बॉर्डर राज्यों में प्राइवेट अस्पतालों में ज्यादा खर्च
सर्वे में पाया गया कि प्राइवेट सेक्टर में जम्मू-कश्मीर में प्रति भर्ती खर्च सबसे ज्यादा (77,217 रुपये) है, इसके बाद तमिलनाडु (74,168 रुपये) है. तेलंगाना (64,228 रुपये) भी सबसे ज्यादा खर्च वाले राज्यों में है—ये सभी प्राइवेट अस्पतालों के राष्ट्रीय औसत 50,508 रुपये से ज्यादा हैं.
पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के. श्रीनाथ रेड्डी ने दप्रिंट से कहा कि तमिलनाडु और तेलंगाना में ज्यादा खर्च वहां के शहरी हेल्थ सिस्टम की संरचना को दिखाता है.
उन्होंने कहा, “शहरी राज्यों में प्राइवेट अस्पतालों का ज्यादा खर्च कॉरपोरेट अस्पतालों की कीमतों, विशेषज्ञ डॉक्टरों और टेक्नोलॉजी वाले इलाज के ज्यादा इस्तेमाल, और प्राइवेट सेक्टर पर कमजोर नियंत्रण को दिखाता है.”
मावलंकर ने बाज़ार की स्थिति की ओर इशारा करते हुए कहा कि जब सरकारी अस्पताल कमजोर होते हैं, तो प्राइवेट अस्पतालों की कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं रहता.
सिक्किम: प्रति भर्ती 1.44 लाख रुपये के साथ अलग मामला
सिक्किम में प्राइवेट अस्पताल में औसत खर्च 1,44,555 रुपये है, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग तीन गुना है और देश में सबसे ज्यादा है.
रेड्डी ने कहा कि यह आंकड़ा सांख्यिकीय और संरचनात्मक दोनों कारणों को दिखाता है.
उन्होंने कहा, “छोटा राज्य होने के कारण, कुछ महंगे मामलों की वजह से औसत ज्यादा दिख सकता है.”
उन्होंने यह भी कहा कि थर्ड-लेवल इलाज (टर्शियरी केयर) की सीमित सुविधा होने के कारण कई गंभीर मरीजों को राज्य के बाहर भेजा जाता है, जिससे खर्च बढ़ जाता है.
उन्होंने कहा, “कम संख्या में अस्पताल होने से प्रतिस्पर्धा भी कम होती है और कीमतें बढ़ सकती हैं.”

दूरी की कीमत
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (93,769 रुपये) और त्रिपुरा (92,654 रुपये) में भी प्राइवेट अस्पताल में इलाज का खर्च ज्यादा है.
रेड्डी ने इसे “दूरी की कीमत” बताया—दवाइयों और उपकरणों की ज्यादा लागत, विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, मरीजों को बाहर ले जाने का खर्च और कम आबादी जिसके कारण लागत कम नहीं हो पाती.
मावलंकर ने कहा कि दूर-दराज इलाकों में प्रतिस्पर्धा की कमी के कारण प्राइवेट अस्पताल अपनी मर्जी से कीमत तय कर लेते हैं.
उन्होंने कहा, “दूर के इलाकों में प्रतिस्पर्धा कम होने के कारण प्राइवेट सेक्टर ज्यादा पैसे ले सकता है. जबकि कम लागत वाली अर्थव्यवस्था होने के कारण कीमतें कम होनी चाहिए.”
चैरिटेबल अस्पताल: जितना सस्ता समझा जाता है उतना नहीं
सर्वे में यह भी सामने आया कि चैरिटेबल और ट्रस्ट द्वारा चलाए जाने वाले अस्पतालों में भी जेब से होने वाला खर्च कई राज्यों में प्राइवेट अस्पतालों के बराबर या कुछ मामलों में ज्यादा है. राष्ट्रीय स्तर पर चैरिटेबल अस्पतालों में प्रति भर्ती औसत खर्च 39,530 रुपये है, जबकि प्राइवेट अस्पतालों में यह 50,508 रुपये है, लेकिन कई राज्यों में यह अंतर बहुत कम है. तमिलनाडु में चैरिटेबल अस्पताल में प्रति भर्ती खर्च 1,20,994 रुपये है, जो वहां के प्राइवेट अस्पताल खर्च 74,168 रुपये से ज्यादा है.
पश्चिम बंगाल में यह खर्च 83,856 रुपये और कर्नाटक में 67,214 रुपये है, जो उनके प्राइवेट अस्पताल खर्च के करीब है.
भोपाल के पब्लिक हेल्थ रिसर्चर डॉ. अनंत भान ने कहा कि यह आंकड़े आम धारणा को चुनौती देते हैं. उन्होंने कहा, “यह कहना आसान है कि सरकारी अस्पताल प्राइवेट से सस्ते होते हैं, लेकिन ट्रस्ट या NGO के अस्पताल भी बहुत सस्ते नहीं होते.”
उन्होंने कहा कि इसका कारण अस्पताल चलाने की लागत है. “NGO को हर खर्च के लिए पैसा जुटाना पड़ता है. इसलिए उनकी लागत कॉरपोरेट या प्राइवेट अस्पताल से थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन मरीज और उनके परिवार पर आर्थिक बोझ फिर भी काफी रहता है. लगभग उतना ही या बहुत करीब जितना प्राइवेट सेक्टर में होता है.”
भान ने कहा कि इस निष्कर्ष का हेल्थ पॉलिसी पर असर पड़ता है. “ये आंकड़े इस धारणा के खिलाफ जाते हैं कि चैरिटेबल अस्पताल में इलाज हमेशा सस्ता होता है.”
OOPE हेल्थकेयर में आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण संकेतक है.

डेटा की सीमाएं
हालांकि, दोनों एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी कि सरकारी और प्राइवेट आंकड़ों की सीधी तुलना नहीं करनी चाहिए. सरकारी अस्पतालों को सब्सिडी मिलती है, इसलिए वहां खर्च कम होना सामान्य है, कोई खास बात नहीं.
मावलंकर ने यह भी कहा कि सर्वे यह नहीं बताता कि हर राज्य में कितने लोग सरकारी या प्राइवेट अस्पताल का उपयोग करते हैं, जिससे निष्कर्ष निकालना सीमित हो जाता है.
उन्होंने कहा, “सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों के केस अलग-अलग हो सकते हैं.”
उनका कहना है कि सरकारी अस्पताल आम मामलों को संभालते हैं, जबकि जटिल इलाज प्राइवेट सेक्टर में जाते हैं, जिससे वहां का औसत खर्च ज्यादा हो जाता है.
NSS हेल्थ सर्वे घरों के मेडिकल खर्च का अनुमान लगाने के लिए सरकार का मुख्य स्रोत है और यह नेशनल हेल्थ अकाउंट्स में भी शामिल होता है. पिछला ऐसा सर्वे 2017-18 में किया गया था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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