Monday, 8 August, 2022
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क्रेच सुविधा, सप्ताह में 40 घंटे काम- नर्सों के काम करने की स्थितियां कैसे सुधारना चाहती है मोदी सरकार

स्वास्थ्य मंत्रालय ने नर्सों के काम की स्थितियां सुधारने के लिए मसौदा दिशानिर्देश जारी किए हैं और अगले एक महीने में आम लोगों तथा हितधारकों से सुझाव आमंत्रित किए हैं.

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नई दिल्ली: हर स्वाथ्य देखभाल सुविधा में क्रेच सुविधाएं, सालाना स्वास्थ्य जांच, सप्ताह में काम के 40 घंटे निर्धारित और आपात स्थिति में अतिरिक्त घटों के लिए कॉम्प ऑफ- ये उन मसौदा दिशा-निर्देशों के कुछ प्रावधान हैं, जिन्हें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (एमओएचएफडब्लू) ने सभी स्वास्थ्य देखभाल संस्थाओं में नर्सों के काम की स्थितियां सुधारने के लिए तैयार किया है.

मंत्रालय ने अगले एक महीने में इन पर आम लोगों और हितधारकों से सुझाव आमंत्रित किए हैं जिसके बाद मसौदा दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप दे दिया जाएगा.

लेकिन, स्वास्थ्य चूंकि राज्यों का विषय है इसलिए अधिकारियों का कहना है कि गाइडलाइन्स को अंतिम रूप देकर अधिसूचित किए जाने के बाद भी, संबंधित स्वास्थ्य संस्थानों में इन नियमों को लागू कराने का जिम्मा राज्यों का होगा.

अपने मसौदे में मंत्रालय ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की ग्लोबल स्ट्रैटजी ऑन ‘ह्यूमन रिसोर्सेज फॉर  हेल्थ:वर्कफोर्स 2030’ का हवाला दिया है जिसमें ‘स्वास्थ्य श्रमबल के व्यक्तिगत, रोजगार और पेशे से जुड़े अधिकारों को, जिनमें काम करने का सुरक्षित और अच्छा माहौल, किसी भी तरह के भेदभाव, जबरदस्ती और हिंसा से मुक्ति शामिल है, बनाए रखने की बात की गई है.

मसौदा दिशा-निर्देशों में स्वास्थ देखभाल संस्थाओं के लिए अनिवार्य किया गया है कि नर्सिंग स्टाफ को अस्पताल परिसर या किसी उचित दूरी पर आवास उपलब्ध कराए जाएं.

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ड्राफ्ट गाइडलाइन्स में प्रस्ताव दिया गया है, ‘तमाम नर्सिंग स्टाफ को वार्षिक स्वास्थ्य जांच, आवश्यक टीकाकरण और उन स्वास्थ्य देखभाल प्रतिष्ठानों के भीतर मौजूद अस्पताल सेवाओं के उपयोग की सुविधाएं दी जानी हैं, जहां वो कार्यरत हैं’.

उनमें आगे कहा गया है: ‘स्वास्थ्य देखभाल प्रतिष्ठानों को सुनिश्चित करना है कि सभी यूनिटों/वॉर्डों में पर्याप्त इनफ्रास्ट्रक्चर और अच्छी तरह से सुसज्जित कार्यस्थान हों जिससे नर्सिंग स्टाफ कुशलता के साथ काम कर सकें. सभी स्वास्थ्य देखभाल प्रतिष्ठानों में नर्सिंग स्टाफ के लिए अलग वॉशरूम्स और चेंजिंग रूम्स होंगे (जिनमें पीने का पानी, पैंट्री सुविधाएं, लॉकर्स, साफ वर्दी शामिल हैं)’.

मसौदा दिशा-निर्देशों के अनुसार, नर्सों को आवश्यक निजी सुरक्षा उपकरण निशुल्क उपलब्ध कराने का जिम्मा, उस अस्पताल या क्लीनिक का होगा जो उन्हें काम पर रखता है.


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नर्सों के बीच ऊंची संघर्षण दर

भारत में नर्सों की कमी है. उसके अलावा नर्सों के बीच संघर्षण दर भी ऊंची है और ये स्थिति बड़े अस्पतालों में भी है जिसका कारण विदेशों अवसरों की उपलब्धता और भारत में काम की स्थितियों का मुश्किल होना है. गाइडलाइंस का उद्देश्य इन्हीं मुश्किलों से निपटना है.

भारत में हर 1 हजार व्यक्तियों पर 1.7 प्रशिक्षित नर्सें हैं जबकि डब्लूएचओ का नियम चार का है.

दिल्ली के एक अस्पताल में कार्यरत एक वरिष्ठ नर्सिंग अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, ‘नर्सों का काम बहुत कठिन होता है, उन्हें मरीजों की निराशा और कभी कभी डॉक्टरों का गुस्सा दोनों को झेलना पड़ता है. शिफ्ट ड्यूटी तो होती है लेकिन काम के घंटे कभी-कभी तय सीमा से बहुत अधिक हो जाते हैं.

‘ऐसा हमारे जैसे अस्पतालों में तो उतना नहीं होता लेकिन टियर- II और टियर –III के छोटे प्रतिष्ठानों में ज्यादा होता है, जहां उन्हें अकसर पैसा भी कम मिलता है’.

एक प्रतिष्ठित निजी अस्पताल में काम कर रही एक और वरिष्ठ नर्सिंग एग्जीक्यूटिव के अनुसार, उनके अस्पताल में करीब 40 प्रतिशत सालाना संघर्षण दर देखने को मिलती है.

बहुत से युवा पुरुष और महिलाएं विदेशों में काम करने की आकांक्षा के साथ नर्सिंग कॉलेजों में आते हैं और नौकरी पाने  के लिए जरूरी अनुभव हासिल करने मकसद से अस्पतालों में आ जाते हैं. लेकिन काम की मुश्किल परिस्थितियां संघर्षण दर को और बढ़ा देती हैं.

इंडस्ट्री के अनुमानों से संकेत मिलता है कि भारत में 35 लाख नर्सों की कमी है.

कोई विश्वसनीय अनुमान नहीं हैं कि फिलहाल भारत में कार्यरत नर्सों की संख्या कितनी है लेकिन एक राष्ट्रीय नियामक निकाय- इंडियन नर्सिंग काउंसिल के अधिकारियों के अनुसार, नर्सिंग रजिस्ट्रेशन ट्रैकिंग सिस्टम ने करीब 10 लाख नर्सों का डेटा अपडेट किया है.

उनका अनुमान है कि 10 लाख की ये संख्या, देश के कुल नर्सिंग श्रमबल का करीब 65 प्रतिशत है.

प्रमुख स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों की वरिष्ठ नर्सिंग अधिकारियों का कहना है कि कुछ प्रावधान जैसे स्वच्छ और अलग टॉयलेट्स, विश्राम कक्ष और दिन में आठ घंटे का काम बहुत सी जगहों पर मौजूद तो हैं लेकिन सिर्फ कागजों पर.


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नर्सों का संरक्षण

ड्राफ्ट गाइडलाइंस में अनिवार्य किया गया है कि कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अनुरूप, सभी स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों को एक आंतरिक शिकायत समिति का गठन करना चाहिए.

ड्राफ्ट गाइडलाइंस में कहा गया है, ‘सभी स्वास्थ्य देखभाल प्रतिष्ठानों को समुचित उपाय करने चाहिएं जिससे काम का एक स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण बनेगा और नर्सों के खिलाफ मानसिक – शारीरिक हिंसा पर रोक लगेगी. रात की शिफ्ट के दौरान नर्सों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, सभी स्वास्थ्य देखभाल प्रतिष्ठानों को आवश्यक उपाय करने चाहिएं. नर्सों की सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए उनके काम की जगह और उसके आसपास उचित रोशनी के लिए समुचित उपाय किए जा सकते हैं’.

रात की शिफ्ट में नर्सों की सुरक्षा के लिए भी, जिसमें पर्याप्त रोशनी का प्रावधान शामिल है, आवश्यक कदम उठाए जाने की जरूरत है.

मसौदा दिशा-निर्देशों के एक अनुभाग में, जिसमें हेल्थकेयर संस्थानों के लिए नर्सिंग नेतृत्व को बढ़ावा देना अनिवार्य किया गया है उसमें कहा गया है कि किसी मरीज का इलाज कैसे किया जाए इसमें नर्सों की राय भी ली जानी चाहिए.

इस अनुभाग में लिखा है, ‘नर्सों को इमर्जेंसी में मरीजों की छंटाई, और वॉर्ड्स में मरीजों की काउंसलिंग के कामों में भी सक्रिय रूप से भाग लेने का मौका दिया जाना चाहिए ताकि वो भी मरीजों के इलाज के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकें. नर्सों से जुड़े फैसलों में उनकी अधिक से अधिक राय मानी जानी चाहिए’.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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