प्रतीकात्मक तस्वीर | सूरज सिंह बिष्ट | दिप्रिंट
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बेंगलुरू/नई दिल्ली: अमेरिका स्थित स्मिथसोनिया इंस्टीट्यूशन में रखा नुकीली कीलों से जड़े लकड़ी के ब्रश जैसा एक असामान्य पैडल 1989 का एक अवशेष है जिसे अल्बामा के अधिकारी चिट्ठियों को छेदने के लिए इस्तेमाल करते थे. यह उस समय यलो फीवर के कारण एहतियात के तौर पर डाक को सल्फर से फ्यूमीगेट करने की प्रक्रिया का हिस्सा था.

लेकिन एक साल बाद जब शोधकर्ताओं ने पाया कि ये बीमारी एक मच्छर जनित वायरस के कारण फैली थी तो सारी चिट्ठियों को फ्यूमीगेट करने की पूरी कवायद निरर्थक साबित हुई.

यही बात अब कोविड-19 पर भी लागू होती भी नज़र आ रही है जबकि कई वैज्ञानिक ऐसा मान रहे हैं कि कांटैक्ट ट्रांसमिशन पर जोर दिया जाना गलत हो सकता है.

महामारी की शुरुआत के समय से ही दुनियाभर की स्वास्थ्य एजेंसियां इसकी रोकथाम के लिए जारी दिशानिर्देशों के तहत सतहों को कीटाणुरहित बनाने पर जोर देती रही हैं. इसी शर्त पर ही भारत में लॉकडाउन पाबंदियों में ढील दी गई और सख्ती से कीटाणुरहित करने के अभियान के वादे के साथ ही एयरपोर्ट, सिनेमा हॉल और मॉल जैसे सार्वजनिक स्थानों पर लोगों को बुलाने की अनुमति मिली है.

माना जाता है कि आप विभिन्न गतिविधियों के कारण संक्रामक कीटाणुओं या रोगाणुओं के संपर्क में आई सतहों को छूकर कोविड-19 की चपेट में आ सकते हैं— यही वजह है कि संक्रमण के खतरे से बचाने के लिए विभिन्न कंपनियां अब न केवल दरवाजों के हैंडल और बस सीटों जैसी सतहों के लिए, बल्कि फल और सब्जियों के लिए कीटाणुनाशक पेश कर रही हैं.

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हालांकि, महामारी की एक वर्ष की अवधि में सामने आए तमाम अहम वैज्ञानिक साक्ष्य इस तरफ इशारा करते हैं कि कोविड-19 का संक्रमण सतह को छूने की तुलना में हवा में मौजूद होने के कारण ज्यादा फैलता है.

इसका मतलब है कि इसकी संभावना ज्यादा है कि कमरे में वेंटीलेशन की पुख्ता व्यवस्था न होने पर आप किसी रोगी से पर्याप्त दूरी पर रहते हुए बातचीत करने के दौरान कोविड-19 की चपेट में आ सकते हैं— बजाये इसके कि आप उसके द्वारा छुए गए किसी एलिवेटर का इस्तेमाल करें.

लेकिन, रुकिए! वैज्ञानिक आपको अभी अपने सैनिटाइजर फेंकने को नहीं कह रहे हैं— आखिर हाथ साफ रखने से किसी को क्या नुकसान हो सकता है? वे तो सिर्फ यह कह रहे हैं कि स्वास्थ्य एजेंसियों को यह स्वीकार करने की जरूरत है कि कोविड संक्रमण एयरोसोल से फैलने का खतरा ज्यादा है और जनता को यह बात समझाना सुनिश्चित करना होगा.


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हमें क्या पता था और हमने क्या अनुमान लगाया

महामारी के एक वर्ष में आम जनता को अब तक सामान्य सुरक्षा नियमों की व्यापक जानकारी मिल चुकी है— मास्क लगाना, सामाजिक दूरी का पालन और नियमित रूप से हाथ धोना आदि. लेकिन वायरस अब भी फैल रहा है, विशेषज्ञ इसका कारण वायरस फैलने की वजहों को लेकर जागरूकता की कमी और ऐसे में प्रभावी सुरक्षा उपाय न अपनाए जाने को मान रहे हैं.

सबसे बड़ी बहस का मुद्दा यह है कि ट्रांसमिशन की प्राथमिक वजह ड्रॉपलेट, एयरोसोल हैं या सतह पर वायरस की मौजूदगी.

सतह के जरिये या फोमाइट ट्रांसमिशन तब होता है जब किसी सक्रिय वायरस (संक्रमित करने में सक्षम) की मौजूदगी वाली सतह को कोई छूता है और फिर अपने हाथ से चेहरे पर स्पर्श करता है. इससे बचने का एहतियाती उपाय सतहों को कीटाणुरहित बनाना और अपने हाथों को बार-बार धोते रहना है.

महामारी के शुरुआती समय में तमाम अध्ययन इस तरह के चौंकाने वाले नतीजे सामने लाते रहे हैं जिसमें बताया गया कि किस तरह की सतह पर सार्स-कोव-2 वायरस कितने समय तक जीवित रहता है.

जनवरी 2020 में जर्नल ऑफ हॉस्पिटल रिसर्च की ओर से प्रकाशित एक पेपर में दावा किया गया कि यह वायरस धातु और प्लास्टिक की सतह पर नौ दिनों तक जीवित रहता है, जो सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (सार्स) और मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (मर्स) जैसे अन्य कोरोनावायरस के मौजूदा प्रयोगशाला अध्ययनों पर आधारित था. मार्च में न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में एक अध्ययन ने बताया कि वायरस प्लास्टिक की सतह पर तीन दिनों तक और कार्डबोर्ड पर 8 घंटे तक जीवित रह सकता है.

ऐसे निष्कर्षों ने तत्काल ध्यान खींचा और कीटाणुशोधन और स्वच्छता को लेकर लगातार संदेश फैलाए जाते रहे.

हालांकि, इसके बावजूद जब महामारी लगातार फैलती रही तो एयरोसोल विशेषज्ञों ने इसके वायुजनित होने पर ध्यान आकृष्ट करना तेज किया और अधिकारियों से अनुरोध किया कि वह इस बात की जानकारी फैलाएं कि नोवेल कोरोनावायरस सिर्फ ड्रॉपलेट और सतहों के जरिये संक्रमित नहीं करता बल्कि एयरोसोल माध्यम से भी फैलता है.

एयरबोर्न, एयरोसोल और ड्रॉपलेट

यद्यपि ‘एयरबोर्न’ और ‘एयरोसोल’ का इस्तेमाल अक्सर एक-दूसरे के पूरक के तौर पर होता है लेकिन वास्तव में— यदि ओवरलैपिंग हो तो ट्रांसमिशन के तरीके में इनका मतलब अलग-अलग होता है. एयरबोर्न ट्रांसमिशन तब होता है जब अलग-अलग आकार के सस्पेंडेट पार्टिकिल— कफ वाली ड्रॉपलेट सहित— हवा में फैल जाते हैं. इसमें भारी बूंदें खांसने या छींकने वाले व्यक्ति के आसपास हवा में कुछ देर मौजूद रहती हैं और उसके आसपास मौजूद लोगों में संक्रमण का खतरा बढ़ा देती हैं. यही बूंदें जब सतह पर गिरती हैं, तो वे फोमाइट बन जाती हैं.

मनुष्यों के सांस लेने से जो बूंदें उत्पन्न होती हैं उनका आकार 0.1 माइक्रोमीटर से लेकर 1,000 माइक्रोमीटर तक होता है. 5 से लेकर 1,000 माइक्रोमीटर के बीच की बूंदों को बड़ा माना जाता है, जबकि आमतौर पर जिन्हें एयरोसोल कहा जाता है उनका आकार 5 माइक्रोमीटर से कम होता है. सार्स-कोव-2 वायरस आकार में लगभग 0.1 माइक्रोमीटर है.

किसी वायरस का एयरोसोल ट्रांसमिशन आमतौर पर वायरस के हवा में फैलने या फिर अन्य एयरोसोल— धूल या प्रदूषण कणों के साथ मिल जाने से होता है लेकिन यह मुख्यत: कफ या पानी के संपर्क में आने पर ज्यादा होता है जो वायरस पार्टिकिल के नष्ट होने से पहले उसे काफी दूर तक पहुंचा सकते हैं.

जून 2020 में पर्यावरण संरक्षण पर पीर-रिव्यूड एक अध्ययन ने बताया कि प्रदूषित क्षेत्रों में लोग कोविड-19 से ज्यादा गंभीर तौर पर प्रभावित हैं.

एयरोसोल ट्रांसमिशन पहले अन्य कोरोनावायरसों में भी देखा गया था. 2004 हांगकांग के अमॉय गार्डन में फैले सार्स, जिसमें लगभग 300 लोग प्रभावित हुए थे, का कारण जल निकासी पाइपों में एक रोगी के मल का एयरोलिसेशन होना पाया गया था.

श्वसन संबंधी अन्य बीमारियां जैसे सामान्य सर्दी-खांसी, खसरा, तपेदिक और चिकन पॉक्स भी मुख्य रूप से एयरोसोल माध्यम से ही फैलती हैं.


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एयरोसोल ट्रांसमिशन

एयरोसोल केवल सांस लेने, खांसी या छींके आने की स्थिति में, पर और बोलने और गाने के दौरान भी उत्पन्न हो सकते हैं. खांसने या गाने जैसी तेज आवाज करने वाली गतिविधियां कथित तौर पर इन एयरोसोल द्वारा तय की जाने वाली दूरियों को बढ़ा देती हैं.

मई में यूएस सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल (सीडीसी) ने वाशिंगटन में गाने के अभ्यास वाले एक सुपरस्प्रेडर इवेंट को रिकंस्ट्रक्ट किया था. 10 मार्च को लगभग 61 लोग ढाई घंटे के लिए मिले और साथ गाना गया और खाना खाया. इस समूह में सिमप्टोमैटिक कोविड मरीज शामिल था. 17 मार्च तक वहीं उपस्थित लोगों में 53 बीमार हो गए थे, जिसमें तीन को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और दो की मौत हो गई.

गायन संबंधी इवेंट के अलावा कुछ अन्य सुपरस्प्रेडर इवेंट वाले क्लस्टर का भी पता लगा जिन्हें इंडोर ट्रांसमिशन या जेल और अस्पताल जैसे बंद जगहों में संक्रमण फैलने के कारणों से जोड़ा गया. इसका प्राथमिक कारण हवा की धारा में एयरोसोल फैलना माना गया.

इसमें सबसे बड़ा ‘वायरल’ एक्सपोजर इवेंट चीनी शोधकर्ताओं द्वारा पिछले अप्रैल में किए गए एक अध्ययन में शामिल है जिसमें चीन के गुआंगझोउ में एक वातानुकूलित रेस्तरां में एक शाम लोगों को मौजूदगी बड़े पैमाने पर संक्रमण की वजह बनी थी.

24 जनवरी 2020 को एक सिमप्टोमैटिक मरीज समेत पांच सदस्यों वाले एक परिवार ने वहां खाना खाया था. उसी दिन वहां खाना खाने वाले नौ अन्य लोग अगले दो सप्ताह में बीमार हो चुके थे. इसमें चार तो उक्त रोगी के रिश्तेदार ही थे जबकि संक्रमण की चपेट में आए पांच अन्य लोग दो अन्य टेबल पर मौजूद लोगों के साथ बैठे थे, जो संक्रमित नहीं हुए.

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने उल्लेख किया कि संक्रमित लोग ऐसी जगहों पर बैठे थे जहां से एयरकंडीशन की हवा उक्त मरीज के पास से होकर गुजर रही थी.

पीर-रिव्यूड इस अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया, ‘इस महामारी को सिर्फ ड्रॉपलेट के कारण फैलने वाले संक्रमण के तौर पर नहीं माना जा सकता है.’

फिर किसी संक्रमित की मौजूदगी या उसके वहां से हटने के बाद भी हवा में रहने वाले वायरस से संक्रमण फैलने को लेकर भी चिंता जताई गई.

फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के रिसर्च प्रोफेसर डॉ. जॉन लेडनिकी के नेतृत्व में एक अध्ययन में अस्पताल में भर्ती कोविड मरीजों के आसपास लगभग 5 मीटर की दूरी की हवा का नमूना लिया गया और टीम को उसमें कुछ सक्रिय वायरस पार्टिकल मिले थे.

उन्होंने बताया कि यही वजह है कि शोधकर्ता अब भी एयरोसोल ट्रांसमिशन पर डाटा जुटाने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं क्योंकि हमारे पास वह तकनीक नहीं है जिसकी हमें आवश्यकता है. हवा में किसी सक्रिय वायरस का पता लगाना काफी मुश्किल काम है क्योंकि नमूना लेने की प्रक्रिया के दौरान ही वायरस पार्टिकल टूटने या प्रभावी तौर पर उसके निष्क्रिय होने की संभावना रहती है.

उन्होंने कहा, ‘गैर-सक्रिय सार्स-कोव-2 का सांस के साथ अंदर जाना कोविड-19 का कारण नहीं बन सकता. इसलिए, जब लोग हवा के नमूने लेते हैं और वायरस को एकत्र करते हैं वह गैर-सक्रिय हो जाता है और ऐसे में माना जाता है कि उससे कोई खतरा नहीं रहता.’

हाल ही में फेरेट्स पर किए गए एक अध्ययन (बायोरेक्सिव के प्रीप्रिंट सर्वर पर प्रकाशित) जो अलग-अलग सतह पर थे लेकिन 90 डिग्री के कोण वाले पीवीसी पाइप के जरिये संपर्क में थे, ने दिखाया कि एयरोसोल हवा में एक मीटर से अधिक दूरी तय कर सकते हैं.

लेडनिकी ने कहा, ‘जब आप बहुत छोटे द्रव्यमान वाले कणों की बात करते हैं तो ये गुरुत्वाकर्षण के नियमों के अनुसार हवा में नीचे नहीं गिरते हैं. इसके बजाये जब आर्द्रता अपेक्षाकृत कम होती है, तो वे ऊपर की ओर लगने वाले बल (एयर करंट) के कारण लंबे समय तक हवा में मौजूद रह सकते हैं, जिनके बारे में हम आमतौर पर सोचते नहीं हैं.’

फोमाइट ट्रांसमिशन पर अध्ययन

इसके विपरीत, फोमाइट ट्रांसमिशन पर अध्ययन का सीमित डाटा ही हासिल हुआ है.

अमेरिका स्थित रुटगर्स यूनिवर्सिटी में माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. इमानुएल गोल्डमैन ने कहा, ‘पुख्ता तौर पर दो-तीन ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें फोमाइट ट्रांसमिशन हुआ है लेकिन इन्हें एयरबोर्न ट्रांसमिशन से बाहर नहीं किया जा सकता है. डॉ. इमानुएल ने पिछले साल जुलाई में लांसेंट में एक लेख में इस बात को रेखांकित किया था कि फोमाइट ट्रांसमिशन के डर को बढ़ाचढ़ाकर बताया गया हो सकता है.

उन्होंने कहा कि इसका सबसे अकाट्य सबूत चीन में एक संभावित ट्रांसमिशन था जिसमें आयातित फ्रोजन सी-फूड में एक जीवित वायरस पाया गया था. इस शिपमेंट को पहुंचाने में शामिल दो बंदरगाह कर्मी बाद में पॉजिटिव पाए गए थे लेकिन इसकी पुष्टि नहीं की जा सकी कि वह पैकेजिंग के संपर्क में आने के कारण संक्रमित हुए थे.

उन्होंने आगे कहा, ‘दूसरी ओर फोमाइट ट्रांसमिशन के अभाव के सबूत मौजूद हैं. उदाहरण के तौर पर दक्षिण कोरिया में एक मिश्रित उपयोग वाली इमारत में एक कॉल सेंटर कर्मियों के कोविड-19 से पीड़ित होने पर उन दफ्तर के सभी लोग संक्रमित हो गए. लेकिन उस इमारत के रहने वाले (लगभग 1,000 लोग) बाकी लोगों में से केवल तीन को ही कोविड-19 (जो संभवत: एयरोसोल के माध्यम से चपेट में आए) पॉजिटिव पाया गया.’

उन्होंने कहा, ‘साझे एलिवेटर के इस्तेमाल जैसे फैक्टर को देखते हुए यहां सबसे अहम बात ये है कि अगर फोमाइट ट्रांसमिशन यानी सतह के जरिये संक्रमण होता तो बिल्डिंग के कई और लोग पॉजिटिव पाए जाते.’

जुलाई में लिखे अपने पीस में उन्होंने तर्क दिया था कि ‘फोमाइट्स (निर्जीव सतहों या वस्तुओं) के जरिये ट्रांसमिशन को उन अध्ययनों के आधार पर स्वीकारा गया है जिनकी वास्तविक जीवन के परिदृश्यों से समानता कम ही है.’ उनके तर्क का लब्बोलुआब यह था कि अध्ययन में वायरस की बहुत बड़ी मात्रा का उपयोग किया गया था, जबकि वास्तविक परिस्थितियों में सतह पर इतनी मात्रा उनके जमा होने के आसार कम ही हैं.

शुरुआती चेतावनी देने वाले एयरोसोल डिस्पर्सल और एटमॉस्टफिरिक केमेस्ट्री से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि शुरू में डब्ल्यूएचओ की तरफ से छह फीट की दूरी अपनाने की सलाह दिया जाना दरअसल 90 साल पहले ड्रॉपलेट पर किए गए शोध पर आधारित हैं, जब सब-माइक्रोन एयरोसोल का अध्ययन करने की तकनीक मौजूद नहीं थी.

हाल के निष्कर्षों से पता चलता है कि छोटे एयरोसोल पार्टिकिल 12 घंटे से अधिक समय तक बंद जगह पर हवा में मौजूद रहते हैं.

लेडनिकी ने कहा, ‘यह अवधारणा कि वायरस वातावरण के संपर्क में आकर फैलता है, मुख्यत: माउस हेपेटाइटिस वायरस (कोरोनावायरस पर सबसे अच्छे शोध) के अध्ययन पर आधारित है.’

उन्होंने कहा, ‘चूहे वास्तव में ज्यादा छींकते नहीं हैं. इसके बजाये वायरस मल, मूत्र और दूषित सतहों के संपर्क में आने से फैलता है. लेकिन लोग चूहे नहीं हैं. हम अपनी नाक जमीन पर नहीं रगड़ते हैं और आम तौर पर जमीन पर गिरे खाद्य पदार्थों को भी नहीं खाते हैं.’

एक तरफ जहां शोधकर्ता समुदाय सैद्धांतिक तौर पर फोमाइट को ट्रांसमिशन का प्राथमिक कारण मान रहा है लेकिन पिछले कुछ महीनों में प्रकाशित कई अध्ययनों— दिसंबर में मिलिट्री मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित पीर-रिव्यूड समीक्षा समेत— में इस थ्योरी को समर्थन मिलता दिख रहा है कि एयरोसोल या डॉपलेट की तुलना में संक्रमण के सतह से फैलने की संभावना कम ही होती है.

अमेरिका के कोलोराडो-बोल्डर विश्वविद्यालय में एनालिटिकल, इन्वायरमेंटल और एटमॉस्फिएरिक केमेस्ट्री डिवीजन के प्रोफेसर डॉ. जोस-लुइस जिमिनेज कहते हैं, ‘सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों को बताया जाना चाहिए अन्य लोगों के सांस लेने के कारण वायरस हवा से भी फैलता है.’

जिमिनेज कहते हैं, ‘लोगों को यह कल्पना करनी होगी कि अन्य लोग सिगरेट की धुएं की तरह हवा में अदृश्य धुआं छोड़ रहे हैं, और वह इसमें कम से कम समय सांस लेने के लिए क्या कुछ कर सकते हैं. एक बार जब लोग इसे समझ जाएंगे तो उन्हें पता चल जाएगा कि उन्हें किसी विशेष स्थिति में क्या करना है.’


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स्वास्थ्य एजेंसियां क्या कहती हैं

दुनियाभर की प्रमुख स्वास्थ्य एजेंसियों की एयरोसोल ट्रांसमिशन पर ध्यान केंद्रित करने की गति धीमी है, जिसमें ज्यादातर अभी भी हाथ धोने, सतहों को कीटाणुरहित करने और सोशल डिस्टेंसिंग पर ही जोर दे रही हैं.

महामारी के शुरुआती दिनों के दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) जोर देकर कहा था कि कोविड एयरबोर्न नहीं है.

जुलाई में उसने कहा, ‘यह निर्धारित करने के लिए आगे अध्ययन की जरूरत है कि क्या उन जगहों पर हवा के नमूनों में व्यवहार्य सार्स-कोव-2 का पता लगाना संभव है, जहां एयरोसोल उत्पन्न करने की कोई प्रक्रिया न हो और ट्रांसमिशन में एयरोसोल की क्या भूमिका हो सकती है.’

इसने इस संदर्भ में कहा कि ‘कुछ सतहों पर सार्स-कोव-2 वायरस के अस्तित्व में रहने और कुछ समय तक जीवित रहने के सुसंगत साक्ष्य मिले हैं’ लेकिन साथ ही कहा कि ‘ऐसी कोई विशिष्ट रिपोर्ट नहीं है जो सीधे तौर पर सतहों से संक्रमण फैलने का पुष्ट करती हो.’

अमेरिकी सीडीसी लगातार हाथ धोने के तरीकों, इसमें लगने वाले समय और महत्व पर जोर दे रही है, लेकिन साथ ही लोगों को कम हवादार स्थानों से बचने की सलाह भी देती है. गत मई में इसने कहा, ‘यह हो सकता है कि कोई व्यक्ति वायरस की मौजूदगी वाली सतह या वस्तु को छूने के बाद अपने मुंह, नाक या आंखों को हाथ लगाने के कारण कोविड-19 की चपेट में आ जाए लेकिन इसे संक्रमण का मुख्य तरीका नहीं माना जा सकता है.’

भारत में भी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए आधिकारिक गाइडलाइन और आम लोगों के लिए एफएक्यू में भी हाथ धोने और सतहों को साफ-सुथरा रखने पर जोर दिया गया है.

गोल्डमैन ने कहा, ‘उस धारणा को बदलना बहुत मुश्किल है, जिसे महामारी के शुरुआती दौर में प्रचारित किया गया था. यह विशेषज्ञों द्वारा दी गई गलत जानकारी पर आधारित था जिन्होंने गहरी सफाई की सलाह देने का वैज्ञानिक आधार पर गहन आकलन नहीं किया था. कुछ शोधपत्र थे जो दर्शा रहे थे कि वायरस कुछ दिनों तक सतह पर जीवित रहता है. दुर्भाग्य से विशेषज्ञ यह समझने में नाकाम रहे कि ये परिणाम वास्तविक जीवन के परिदृश्यों में नहीं, बल्कि लैब की कृत्रिम परिस्थितियों में निकले थे.

वेंटिलेशन

किसी बंद जगह को सुरक्षित बनाने का सबसे आसान तरीकों में से एक है खिड़कियां खोलना और क्रॉस वेंटिलेशन की व्यवस्था करना. एयर फिल्टर और प्यूरीफायर भी लाभकारी हो सकते हैं.

ऑस्ट्रेलिया स्थित क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी में एयरोसोल साइंस रिसर्चर और डब्ल्यूएचओ टास्कफोर्स की सदस्य डॉ. लिडिया मोराव्स्का, जिन्होंने 2003 में सार्स के एयरोसोल ट्रांसमिशन का अध्ययन किया था, का कहना है, ‘बहुत कम राष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियां वेंटिलेशन पर जोर देती हैं. कुछ तो इस जोखिम को पूरी तरह से नजरअंदाज कर देती हैं. अधिकारियों को साझा की जाने वाली सभी जगहों पर बेहतर वेंटिलेशन पर जोर देना चाहिए. वेंटिलेशन को ‘हाई’ पर सेट किया जाना चाहिए और एयर रेटिकुलेशन से बचना चाहिए.’

उन्होंने कहा, ‘अगर हवा में वायरस को हटाने के लिए वेंटिलेशन अपर्याप्त है, तो सोशल डिस्टेंसिंग और अन्य सिफारिशों के बावजूद संक्रमण हो जाएगा.’ साथ ही कहा कि अपर्याप्त वेंटिलेशन को एयर प्यूरिफायर की मदद से सुधारा जा सकता है.

जिमिनेज ने भी प्रभावी कम्युनिकेशन पर जोर दिया. उन्होंने कहा, ‘डब्ल्यूएचओ और सीडीसी जैसी एजेंसियों ने ऐसी गाइडलाइन और वीडियो संदेश और ट्वीट जारी किए कि वेंटिलेशन बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन कभी यह स्पष्ट नहीं किया कि क्यों. उसी समय (वे) यह भी कहते रहे कि एयरबोर्न ट्रांसमिशन जरूरी नहीं है. इसलिए लोग भ्रमित हो चुके हैं और कई लोग वेंटिलेशन की व्यवस्था नहीं करते या यह नहीं जानते हैं कि इसे कैसे करना है.’


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वैज्ञानिक पहल और प्रतिक्रियाएं

डब्ल्यूएचओ ने जहां कोविड-19 के संदर्भ में वेंटिलेशन पर चर्चा करते हुए दिशानिर्देश जारी किए हैं, कई वैज्ञानिकों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र एजेंसी ने संक्रमण फैलाने में इसकी भूमिका पर प्रभावी ढंग से जोर नहीं दिया है.

जिमिनेज सहित कई वैज्ञानिकों और एटमॉस्फिरिक पार्टिकल विशेषज्ञों ने बाकायदा डाटा के साथ कोविड ट्रांसमिशन पर खुद अपने स्तर पर एफएक्यू दस्तावेज तैयार किए हैं.

सिटिजन साइंटिस्ट ने भी जागरूकता फैलाने के लिए ‘कोविड इज एयरबोर्न’ कलेक्टिव बनाया और डब्ल्यूएचओ से तुरंत ही एयरोसोल की भूमिका को मान्यता देने की अपील की.

इसके विपरीत, ताइवान और हांगकांग जैसी जगहों, जिन्होंने 2003-2004 के सार्स के प्रकोप से कड़े सबक सीखे हैं, में एयरोसोल से संक्रमण रोकने के लिए पूरी एहतियात बरती गई. अब, कुछ देशों ने पूरी पैनडेमिक वेंटिलेशन गाइड भी तैयार कर ली है.

लेडनिकी ने कहा, ‘वायरस के संपर्क में आने का खतरा काफी हद तक इस पर निर्भर करता है कि संबंधित व्यक्ति पीड़ित से कितनी दूरी पर है. लेकिन कम आर्द्रता वाले स्थानों में वायरस न केवल लंबे समय तक हवा में रह सकता है बल्कि हवा चलने की स्थिति में काफी दूर तक भी जा सकता है. कई स्वास्थ्य एजेंसियां सार्स-कोव-2 के एयरबोर्न होने के खतरे का ठीक से आकलन करने में नाकाम रही हैं.’

जिमिनेज ने कहा, ‘यह खसरा की तुलना में कम संक्रामक है, लेकिन तपेदिक की तुलना में अधिक संक्रामक है, जो दोनों ही वायुजनित बीमारियां हैं. एजेंसियां को शायद यह डर सता रहा होगा कि इसे स्वीकार करने की स्थिति में भय और दहशत का माहौल पैदा हो जाएगा. लेकिन वास्तव में डर और दहशत का कारण यह है कि ये महामारी कई स्थानों पर इसलिए बेकाबू हो गई क्योंकि वे लोगों को यह नहीं बता रहे हैं कि वायरस कैसे फैलता है, ऐसे में लोग खुद की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं.’

हैंडवाश और कीटाणुनाशक

हालांकि, वैज्ञानिकों ने वेंटिलेशन की भूमिका स्वीकारने पर जोर देने का आग्रह किया है लेकिन हाथ धोने की अहमियत को कमतर नहीं मानते हैं, उनका कहना है कि यह सामान्य रूप से स्वच्छता के लिए जरूरी है.

हाथों को स्वच्छ रखना पूर्व में भी तमाम संक्रामक बीमारियों से बचने का तरीका माना जाता रहा है और यह आज भी प्रासंगिक है. हालांकि, इसका कोई सबूत नहीं है कि यह कोविड-19 फैलने से रोकता है लेकिन महामारी के इस समय में अन्य बीमारियों से बचाव स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर अनावश्यक बोझ न पड़ने देने में मददगार जरूर है.

गोल्डमैन ने कहा कि सैद्धांतिक रूप से यह संभावना कायम है कि अगर कोई व्यक्ति तत्काल ही वायरस के संपर्क में आई सतह को छूता है और फिर हाथों को धोए बिना अपना चेहरा छू लेता है तो वह संक्रमित हो सकता है.

उन्होंने कहा, ‘हाथ धोने से संभावित ट्रांसमिशन की चेन टूट जाती है. महामारी की स्थिति न होने पर भी नियमित रूप से हाथ धोना स्वच्छता के लिहाज से एक अच्छी आदत है क्योंकि इससे कई प्रकार के संक्रमण से बचा जा सकता है.’

मोराव्स्का ने यह भी कहा कि उन्हें नहीं लगता कि हाथ धोने संबंधी एजेंसी के दिशानिर्देशों को अभी संशोधित किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमण फैलने पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है.

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सतहों को कीटाणुमुक्त करने का काम सिर्फ ‘हाइजीन थिएटर’ है.

जिमिनेज ने कहा, ‘सतहों को कीटाणुमुक्त करना सिर्फ समय और धन की बर्बादी ज्यादा है. हमें ऐसा करना बंद कर देना चाहिए (खाली अस्पतालों को छोड़कर) और उस समय, धन और ऊर्जा को अन्य लोगों की सांसों के कारण फैलने वाले संक्रमण को रोकने में इस्तेमाल किया जाना चाहिए.’

मुंबई में रहने वाली पोषण विशेषज्ञ प्रिया कथपाल ने कहा कि उपभोक्ताओं को ऐसे उत्पादों से दूर रहना चाहिए जो फलों और सब्जियों को कीटाणुरहित करने का दावा करते हैं.

उन्होंने कहा, ‘मेरी राय में आपको फल और सब्जियों के लिए कीटाणुनाशक की बिल्कुल जरूरत नहीं है. पूरी तरह से साफ और गुनगुने पानी से फलों और सब्जियों को धोना कीटनाशक और कीटाणुओं दोनों से बचाता है.’

उन्होंने कहा, ‘शुरुआत में बहुत कम डाटा था. लेकिन अब डाटा आपको बताता है कि फोमाइट ट्रांसमिशन लगभग नहीं के बराबर होता है.’

उन्होंने यह भी कहा कि नियमित रूप से खाद्य स्वच्छता को जारी रखना चाहिए लेकिन वायरस के लिए अलग से सफाई जैसी जरूरत नहीं है. यह अच्छी तरह से स्थापित है कि गर्मी और पकाने से वायरस की सक्रियता खत्म हो जाती है और गर्म भोजन से यह नहीं फैल सकता है.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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