अहमदाबाद: गुजरात की राजधानी अहमदाबाद के 134 साल पुराने औपनिवेशिक दौर के एलिस ब्रिज पर काम कर रहे मजदूर उस समय सीमा को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं, जो 365 दिन पहले ही बीत चुकी है. करीब 35 मजदूर रोज़ाना 14 घंटे काम कर रहे हैं. दिन हो या रात, गर्मी हो या ठंड, वे लोहे के खंभों पर खड़े होकर स्टील की बीम की मरम्मत और पुराने हिस्सों को बदलने का काम कर रहे हैं. उनकी सुरक्षा के लिए सिर्फ सेफ्टी चश्मे और चेहरे और सिर को ढकने के लिए रुमाल है, लेकिन अगर वे फिसल जाएं तो उन्हें बचाने के लिए कोई सेफ्टी हार्नेस नहीं है.
जब अहमदाबाद नगर निगम (AMC) ने 2024 में पुल के जीर्णोद्धार का काम शुरू किया था, तब इसे 18 महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अब भी काम पूरा होने से काफी दूर है. इंजीनियरों का कहना है कि शुरुआती अनुमान से करीब 40 फीसदी ज्यादा काम सामने आया है. इसमें से काफी काम पुल के हिस्सों को खोलने के बाद ही दिखाई दिया. जंग लगी बीम, फ्लोर बीम और स्ट्रिंगर्स को बदलना पड़ा है. इसके अलावा सामग्री और मजदूरों की कमी भी देरी की वजह बन रही है.
पुल की मरम्मत का काम मार्च 2024 में शुरू हुआ था, लेकिन AMC ने पहला ब्लूप्रिंट छह महीने बाद, सितंबर में उपलब्ध कराया. पुल का जीर्णोद्धार 18 महीने में यानी सितंबर 2025 तक पूरा होना था, लेकिन पहले तय समय सीमा निकल गई, फिर छह महीने की मोहलत दी गई और वह समय सीमा भी बीत गई.
इसी दौरान परियोजना की लागत भी करीब 60 फीसदी बढ़ गई है—26.8 करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 42.9 करोड़ रुपये हो गई है. एक सदी से ज्यादा पुराने लोहे और स्टील के आर्च ब्रिज के जीर्णोद्धार के दौरान कई संरचनात्मक चुनौतियां सामने आई हैं. अतिरिक्त काम में मुख्य ट्रस के जोड़ की मरम्मत, नीचे की गर्डर और स्ट्रिंगर्स को बदलना, जर्जर निचले डेक का दोबारा निर्माण और पुल के पिलर को मजबूत करना शामिल है.

राजकमल बिल्डर्स इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड के प्रोजेक्ट इंजीनियर दीपक बक्शे ने कहा, “जीर्णोद्धार और मजबूती का काम काफी जटिल है और यह कहना मुश्किल है कि काम कब पूरा होगा. हम इसे पूरा करने के लिए दिन-रात यहां काम कर रहे हैं. लेकिन हमने जो काम किया है, वह लगभग पुल को नए सिरे से बनाने जैसा है.”
देरी और लागत में बढ़ोतरी इस बात के बिल्कुल उलट है कि एलिस ब्रिज कैसे बनाया गया था. 1892 में इंजीनियर हिम्मतलाल धीरजराम भाचेच ने करीब 4.07 लाख रुपये की लागत से यह पुल बनाया था. यह उस समय मंजूर किए गए पांच लाख रुपये से भी कम था. ब्रिटिश अधिकारियों को शक हुआ कि इतनी बड़ी संरचना अनुमानित लागत से कम में कैसे बन सकती है. उन्होंने पुल के निर्माण की जांच के आदेश दिए. लेकिन पुल इस जांच में खरा उतरा.
अब एक सदी से ज्यादा समय बाद चुनौती पुल बनाने की नहीं, बल्कि उसे बचाने और मजबूत करने की है.
एलिस ब्रिज ऐसा अकेला मामला नहीं है. AMC की कई बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं, जिनमें नरोडा पाटिया-गैलेक्सी जंक्शन फ्लाईओवर और पल्लव जंक्शन फ्लाईओवर शामिल हैं, अपनी समय सीमा पूरी करने में जूझ रही हैं. द टाइम्स ऑफ इंडिया की फरवरी 2026 की एक रिपोर्ट में कहा गया कि 396 करोड़ रुपये की लागत वाली नगर निगम की 10 परियोजनाएं अपनी समय सीमा से पीछे चल रही थीं. वहीं, मार्च 2025 की एक अलग रिपोर्ट में कहा गया कि उस समय निर्माणाधीन सभी नौ फ्लाईओवर और एक अंडरपास तय समय से पीछे चल रहे थे.
AMC अधिकारियों ने कहा कि भूमिगत यूटिलिटी को दूसरी जगह ले जाने, जमीन अधिग्रहण और अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल जैसी वजहों से देरी हो रही है. वहीं, ठेकेदारों ने देरी के लिए काम शुरू करने में हुई दिक्कतों, यूटिलिटी शिफ्टिंग और वन भूमि को लेकर विवाद जैसी वजहों का हवाला दिया है.
AMC के सिविल इंजीनियर जिग्नेश शाह ने कहा, “एलिस ब्रिज का जीर्णोद्धार सिर्फ एक पुराने पुल की मरम्मत करना नहीं है. हमें उन हिस्सों को बदलना है जो समय के साथ खराब हो गए हैं, संरचना को मजबूत करना है और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि इसका 130 साल पुराना मूल स्वरूप और डिजाइन बिल्कुल न बदले. यही वजह है कि यह काम नया पुल बनाने से काफी अलग है.”
तोड़ने से संरक्षण तक
एलिस ब्रिज सिर्फ स्टील से बना एक ढांचा नहीं है. इसने दशक दर दशक अपने आसपास अहमदाबाद को बदलते देखा है. 1892 में इसके निर्माण से साबरमती नदी के पश्चिमी किनारे पर रिहायशी इलाकों और सार्वजनिक संस्थानों के विस्तार का रास्ता खुला.
जैसे-जैसे शहर अपनी चारदीवारी वाले पूर्वी हिस्से से आगे बढ़ा, यह पुल एक अहम कड़ी बन गया. 20वीं सदी की शुरुआत तक यह सिर्फ नदी पार करने का रास्ता नहीं रहा, बल्कि शहर की सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का भी हिस्सा बन गया. 1921 में सरदार पटेल के नेतृत्व में विदेशी सामान के बहिष्कार (स्वदेशी आंदोलन) से लेकर 1930 में महात्मा गांधी की दांडी यात्रा के दौरान हुई सभाओं तक, इस पुल ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कई अहम दौर देखे हैं. पीढ़ियों से यह अहमदाबाद की रोजमर्रा की जिंदगी का भी हिस्सा रहा है. इसके नीचे रविवार का बाजार लगता था और इस पर से प्रभात फेरियां गुजरती थीं.
अहमदाबाद के इतिहासकार और Amdavad-Katha और Aa Chhe Amdavad के लेखक डॉ. माणेक पटेल ने कहा, “2014 तक साबरमती के किनारे पुल के नीचे रविवार का बाजार लगता था. गांधीजी की नमक यात्रा यहां से गुजरी थी और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पुल पर प्रभात फेरियां निकाली जाती थीं. पहले, जब बगल में दूसरे पुल नहीं थे, तब एलिस ब्रिज बहुत खूबसूरत दिखाई देता था. अब इसके आसपास ये अतिरिक्त पुल बन गए हैं.”

1997 तक बढ़ते वाहन यातायात के कारण मूल पुल छोटा पड़ने लगा था. इसके बाद एलिस ब्रिज के दोनों तरफ दो नए कंक्रीट पुल बनाए गए, जबकि पुराने ढांचे को बरकरार रखा गया. 15 साल बाद AMC ने पुल का संरक्षण मूल्यांकन करने के लिए Darr Consultants को एक रिपोर्ट तैयार करने का काम दिया. रिपोर्ट में पुल को तोड़ने की सलाह दी गई थी. हालांकि, इसके बाद AMC ने यह पता लगाने की कोशिश शुरू की कि क्या आधुनिक तकनीकों की मदद से इस विरासत ढांचे को बचाया जा सकता है.
AMC के सिविल इंजीनियर जिग्नेश शाह ने कहा, “यह हमारे शहर का गौरव था, यह हमारी विरासत थी. इसे तोड़ना इसके अस्तित्व को खत्म करने जैसा होता. हम इसकी एक सदी पुरानी खूबसूरती को बनाए रखना चाहते थे और साथ ही इसे मजबूत भी करना चाहते थे.”
2012 में Darr Consultants की रिपोर्ट के बाद जब पुल को तोड़े जाने की खबर सामने आई, तो अहमदाबाद के लोगों और विरासत संरक्षण से जुड़े कार्यकर्ताओं ने इसका जोरदार विरोध किया. यह अभियान 2013 तक जारी रहा.
यही वह समय था जब ऐतिहासिक ढांचे को बचाए रखने का विचार जोर पकड़ने लगा. पुल का व्यवस्थित तरीके से मूल्यांकन करने की दिशा में बड़ा कदम 2017 में उठाया गया, जब AMC ने पुराने पुलों और फ्लाईओवर की जांच के लिए एक समिति बनाई. समिति को उन ढांचों की पहचान करने का काम दिया गया जिन्हें मरम्मत की जरूरत थी और उनके लिए उचित मरम्मत योजना सुझाने को कहा गया.
AMC के सिविल इंजीनियर जिग्नेश शाह ने कहा, “दिसंबर 2019 में एलिस ब्रिज का सर्वे करने के लिए CASAD Consultants Pvt Ltd को टेंडर दिया गया था. इसका मकसद यह पता लगाना था कि किस तरह की मरम्मत की जरूरत है और कितने हिस्से के जीर्णोद्धार और मजबूती की जरूरत होगी. इसका उद्देश्य सिर्फ पुल को मजबूत करना नहीं था—नगर निकाय पुल को एक हेरिटेज गैलरी में बदलने की भी योजना बना रहा था.”
इस सर्वे के नतीजों ने AMC के सामने मौजूद सवाल को ही बदल दिया—सवाल यह नहीं रह गया कि एलिस ब्रिज को तोड़ा जाना चाहिए या नहीं, बल्कि यह हो गया कि मूल ढांचे के कितने हिस्से को बचाया जा सकता है.
AMC ने पुल का स्ट्रक्चरल सर्वे कराने के लिए 71 लाख रुपये का बजट रखा था. 2019 में हुए सर्वे में पाया गया कि पुल का मुख्य डेक इतना खराब हो चुका था कि उसकी मरम्मत संभव नहीं थी. डेक को सहारा देने वाली फ्लोर बीम और स्ट्रिंगर्स भी जंग खा चुके थे और उन्हें बदलने की जरूरत थी.
AMC के सिविल इंजीनियर जिग्नेश शाह ने कहा, “पुल के पिलर या पियर्स का विस्तृत रासायनिक विश्लेषण करने के बाद हमने पाया कि नई तकनीक के जरिए धातु के पिलर के निचले हिस्से को मजबूत किया जा सकता है.”
शुरुआती इंजीनियरिंग सलाह पुल की नींव और स्टील के ढांचे में जंग लगने के कारण उसे तोड़ने के पक्ष में थी. लेकिन बाद की जांच में पता चला कि नई तकनीक की मदद से ढांचे के कम से कम कुछ हिस्सों को मजबूत किया जा सकता है. इसके बाद परियोजना का रुख पुल को तोड़ने से हटकर उसके संरक्षण की ओर हो गया.

AMC के सिविल इंजीनियर जिग्नेश शाह ने कहा, “इसके बाद देश में कोविड-19 महामारी आ गई, जिससे प्रक्रिया में देरी हुई. 2023 में हमने ग्लोबल टेंडर जारी किया, लेकिन हमें कोई बोली नहीं मिली. हमने दोबारा टेंडर जारी किया और आखिरकार काम राजकमल बिल्डर्स को दिया गया.”
अहमदाबाद की इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी राजकमल बिल्डर्स इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को पुल और फ्लाईओवर बनाने का दो दशक से ज्यादा का अनुभव है. कंपनी ने अहमदाबाद में CTM क्रॉस रोड और ठक्कर-बापूनगर फ्लाईओवर के अलावा शाहिबाग रेलवे ओवरब्रिज जैसे प्रोजेक्ट पर भी काम किया है.
जीर्णोद्धार की चुनौतियां
130 साल पुराने स्टील के ढांचे को बचाए रखना एक नया पुल बनाने से बिल्कुल अलग तरह की चुनौतियों से भरा है.
आज मूल स्टील का पुल वाहनों के लिए बंद है और अहमदाबाद के रोजमर्रा के ट्रैफिक का भार उठाने वाले नए कंक्रीट पुलों के बीच खड़ा है. ढांचे के कुछ हिस्सों पर स्कैफोल्डिंग लगी है, जबकि मजदूर इसके जोड़, गर्डर, स्ट्रिंगर्स और डेक की मरम्मत का काम कर रहे हैं.
लेकिन 130 साल पुराने पुल का जीर्णोद्धार उसके पुराने हिस्सों को बदलने जितना आसान नहीं रहा. पुल के कुछ हिस्सों को खोलने के बाद ही इंजीनियरों को पता चला कि ढांचा कितना खराब हो चुका है. इसके चलते काम में देरी हुई.

राजकमल प्राइवेट बिल्डर्स के प्रोजेक्ट इंजीनियर बक्शे ने कहा, “इस देरी के पीछे कई वजहें हैं. जब हमने काम शुरू किया तो काम करीब 40 फीसदी बढ़ गया. सर्वे में उन चीजों का पता नहीं चल सकता जो लोहे की प्लेट हटाने के बाद सामने आती हैं. इसके अलावा अमेरिका-इरान की लड़ाई की वजह से सामान की सप्लाई में भी देरी हुई. इसी दौरान AMC ने हमें एक और पुल की मरम्मत का काम दे दिया, इसलिए मजदूरों को दोनों जगह बांटना पड़ा.”
वहीं, AMC का कहना है कि जीर्णोद्धार का काम आगे बढ़ने के साथ परियोजना का दायरा भी बढ़ता गया.
AMC के सिविल इंजीनियर जिग्नेश शाह ने कहा, “काम आगे बढ़ने के साथ परियोजना में कई चीजें जोड़ी गई हैं. अब हम यहां लिफ्ट, लाइटिंग और बैठने की व्यवस्था भी कर रहे हैं, ताकि पुल का इस्तेमाल पैदल चलने वालों के लिए एक जगह के तौर पर किया जा सके. यह एक प्रतिष्ठित ढांचा है, इसलिए हम इसे बहाल करने के साथ-साथ एक खूबसूरत सार्वजनिक जगह भी बनाना चाहते हैं.”
पुल की साइट पर मजदूर संकरी ट्रस के भीतर स्टील के हिस्सों को काटने, घिसने और जोड़ने का काम कर रहे हैं. डेक के ऊपर लगी एक गैंट्री का इस्तेमाल सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए किया जा रहा है. आसपास कंप्रेसर, वेल्डिंग मशीन और हाथ से इस्तेमाल होने वाले औजार पड़े हैं. कुछ हिस्सों में पुराने और जंग लगे ढांचे पर चमकदार स्टील के नए गर्डर लगाए गए हैं.
मजदूरों के लिए चुनौती यह है कि मूल ढांचे को नुकसान पहुंचाए बिना खराब हिस्सों को बदला जाए.

झारखंड से काम की तलाश में गुजरात आए एक मजदूर ने कहा, “दिक्कत तब होती है जब परियोजना में लगातार नए काम जुड़ते जाते हैं. इससे समय सीमा भी बढ़ती है और हमारा काम भी.”
1997 से एलिस ब्रिज वाहनों की आवाजाही के लिए बंद है, इसलिए इसकी मरम्मत के कारण ट्रैफिक डायवर्जन की जरूरत नहीं है. बहाल किए जा रहे ढांचे को सिर्फ पैदल चलने वालों के लिए हेरिटेज स्पेस के तौर पर विकसित करने की योजना है.
इसलिए स्थानीय लोगों के लिए इसका असर आने-जाने की दिक्कत से ज्यादा अहमदाबाद के इतिहास के एक हिस्से तक पहुंच से जुड़ा है. करीब 10 साल से पुल पैदल चलने वालों के लिए भी बंद है. इसके दोबारा खुलने में हो रही देरी का मतलब है कि लोग अब भी इस जगह का फिर से इस्तेमाल करने का इंतजार कर रहे हैं.
26 वर्षीय जयंत भट्ट ने कहा, “ऐसा नहीं है कि किसी चीज से समझौता किया जा रहा है. बस इस पुल की हमारे लिए ऐतिहासिक और भावनात्मक अहमियत है. आम लोगों ने इसे इस्तेमाल किए हुए बहुत समय हो गया है. अब इसे जल्द से जल्द खोल देना चाहिए.” जयंत ने इस ऐतिहासिक पुल के बारे में अपने पिता से कई किस्से सुने हैं.
ऐतिहासिक महत्व
एलिस ब्रिज का इतिहास उसके स्टील के ढांचे से कहीं आगे तक जाता है. गुजरात के इतिहासकार रिजवान कादरी के मुताबिक, मूल पुल 1869-1870 में बनाया गया था. यह लकड़ी का बना था और आम लोगों के बीच “लक्कड़ियो पुल” यानी लकड़ी का पुल के नाम से मशहूर हो गया था.
पहला पुल ज्यादा समय तक नहीं टिक सका. 22 सितंबर 1875 को आई भीषण बाढ़ ने इस ढांचे को तबाह कर दिया. साबरमती के तेज बहाव ने पुल को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया और उसके कई हिस्से बह गए. इसके बाद अहमदाबाद को नदी पर एक नए पुल की जरूरत पड़ी.
अहमदाबाद के इतिहासकार डॉ. माणेक पटेल ने कहा, “नए पुल का निर्माण इंजीनियर हिम्मतलाल धीरजलाल भाचेच ने किया था. उन्होंने यह काम अपेक्षाकृत कम लागत में पूरा किया. इसके बाद शक हुआ कि निर्माण में सस्ती सामग्री का इस्तेमाल किया गया है. इसकी जांच हुई, लेकिन भाचेच को किसी भी तरह की गड़बड़ी के आरोप से मुक्त कर दिया गया. उनके काम को अधिकारियों ने मान्यता दी और बाद में उन्हें ‘राव बहादुर’ की उपाधि से सम्मानित किया गया.”
1892 में गुजरात के नॉर्थ जोन के कमिश्नर सर बैरो हेल्बर्ट एलिस के सम्मान में पुल का नाम एलिस ब्रिज रखा गया. इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाला स्टील बर्मिंघम से मंगाया गया था.

यह पुल धीरे-धीरे अहमदाबाद की सामूहिक स्मृति का भी हिस्सा बन गया. पटेल के मुताबिक, पुल पर “Ellisbridge” और “1892” लिखा गया था, जबकि शहर के बुजुर्ग लोग इसे अब भी लक्कड़ियो पुल के नाम से पुकारते रहे.
पटेल ने अपनी एक किताब में पुल का नाम बदलने की कोशिश के बारे में भी लिखा है. 1997 में जब AMC ने स्टील के मूल ढांचे में कंक्रीट के एक्सटेंशन जोड़े, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने इसका नाम बदलकर स्वामी विवेकानंद ब्रिज कर दिया.
अहमदाबाद के इतिहासकार डॉ. माणेक पटेल ने कहा, “मैंने निगम को एक पत्र लिखा था और कमिश्नर से भी मुलाकात की थी. उन्होंने मुझे भरोसा दिया था कि विवेकानंद ब्रिज नाम वाली नई नेमप्लेट हटा दी जाएगी, लेकिन वह कभी नहीं हटाई गई. लेकिन हर कोई इसे एलिस ब्रिज के नाम से जानता है. यहां तक कि निगम और अखबार भी इसे एलिस ब्रिज ही कहते हैं.” पटेल ने यह बात अपने लैपटॉप पर पुल की एक तस्वीर दिखाते हुए कही.
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