यूक्रेन फिलहाल अपने इलाके लाइमैन में जो जवाबी ‘ऑपरेशन विवाल्डी’ चला रहा है, आज की इस तस्वीर को प्रस्तुत करता है कि ड्रोनों, इलेक्ट्रोनिक साधनों, ‘माइन्स’ यानी बारूदी सुरंगों, आर्टिलरी यानी तोपों-टैंकों, और निरंतर ‘सर्विलान्स’ यानी चौकसी से भरे रणक्षेत्र में हमला कैसे किया जा सकता है. इसमें उन तमाम टेक्नोलॉजी की मदद से किए जाने वाले आक्रामक युद्ध के जाने-पहचाने तत्व शामिल हैं, जिन टेक्नोलॉजी ने इन तत्वों के इस्तेमाल के तरीके को बदल दिया है.
सूचना के मामले में बढ़त, स्थानीय स्तर पर ड्रोनों की श्रेष्ठता, गहराई में मार करने में कमजोरी, दुश्मन द्वारा खड़ी की गई बाधा को तोड़ने के साथ-साथ आक्रमण में तालमेल, और मौके का फायदा उठाना इस युद्ध की प्रमुख विशेषता होती है. भारत के लिए, ‘विवाल्डी’ कार्रवाई के लिए सैन्य संयोजन (फॉर्मेशन) से ऊपर के स्तर को लेकर भी सवाल खड़े करता है. भारतीय सेना जबकि ‘इंटिग्रेटेड बैटल ग्रुपों’ (आईबीजी) का गठन कर रही है, तब क्या ऐसे कई फॉर्मेशन्स को कमांड करने और उससे कार्रवाई करवाने के लिए कोर मुख्यालयों में बदलाव करने पड़ेंगे?
ऑपरेशन विवाल्डी
यूक्रेन और पश्चिमी देशों से मिली खबरों के अनुसार, महीनों से लाइमैन सेक्टर पर रूस का दबाव और उसकी घुसपैठ बढ़ने के बाद ‘ऑपरेशन विवाल्डी’ किया गया. रूस की 20वीं और 25वीं कंबाइंड आर्म्स आर्मी 20 महीने से लाइमैन की ओर बढ़ रही थीं. लाइमैन रेलवे और सड़कों का एक महत्वपूर्ण जंक्शन है. रूसी सेना ने शहर के उत्तरी हिस्से को एक ठिकाने की तरह विकसित कर दिया था और यूक्रेनी रक्षा ठिकानों का सामना करने के लिए घुसपैठ की रणनीति का इस्तेमाल किया था.

यूक्रेन की थर्ड आर्मी कोर ने मई 2026 में ऑपरेशन विवाल्डी शुरू किया. इसमें यूक्रेन की कई सैन्य इकाइयों और विशेष फॉर्मेशन का इस्तेमाल किया गया. इनमें 60वीं और 66वीं मेकनाइज्ड ब्रिगेड, 125वीं हेवी मेकनाइज्ड ब्रिगेड, तीसरी असॉल्ट ब्रिगेड की एक बटालियन टैक्टिकल ग्रुप, टोही और टैंक-रोधी यूनिट, स्पेशल ऑपरेशन्स फोर्सेज और दूसरी संबद्ध फॉर्मेशन शामिल थीं. कोर ने बड़ी संख्या में मानवरहित सिस्टम्स का भी इस्तेमाल किया.
युद्धक्षेत्र के लिए तैयारी अग्रिम रक्षा मोर्चे से काफी पीछे तक की गई. यूक्रेनी सेना ने रूस के सैन्य साजोसामान, ईंधन, गोला-बारूद, कमांड चौकियों, संचार तंत्र, इलेक्ट्रोनिक सिस्टम्स और ड्रोन इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमले किए. शुरुआत में हमले रूसी सेना के पीछे 50 किलोमीटर तक किए गए और फिर 120 किलोमीटर तक किए गए. यूक्रेन की व्यापक ‘मिडल-स्ट्राइक’ सोच के तहत सामरिक FPV ड्रोनों और लंबी दूरी तक मार करने वाले स्ट्रेटेजिक सिस्टम्स की पहुंच के बीच 30 से 200 किलोमीटर का क्षेत्र आता है.
इस ऑपरेशन ने मानवरहित हवाई और जमीनी सिस्टम्स के असामान्य तालमेल को भी दिखाया. यूक्रेनी सेना ने मानवरहित जमीनी वाहनों (UGV) को रूसी सेना की पोजीशन्स के पीछे पहुंचाने के लिए हेवी बॉम्बर ड्रोनों का इस्तेमाल किया. इसके बाद UGV ने सैन्य साजोसामान और दूसरे ठिकानों पर हमले किए. हवाई रास्ते से डिलीवरी और जमीनी रोबोटों के तालमेल ने छोटे मानवरहित सिस्टम्स की पहुंच बढ़ाई और अग्रिम मोर्चे पर तैनात दुश्मन सेना के पीछे नुकसान पहुंचाने के अतिरिक्त तरीके उपलब्ध कराए.
जमीनी हमले में इन उपायों को मिलाकर इस्तेमाल किया गया. यूक्रेनी सेना के फॉर्मेशन ने ड्रोनों को स्थानीय स्तर पर उन इलाकों में ज्यादा कारगर बनाया, जिन्हें कार्रवाई के लिए चुना गया था, जबकि इलेक्ट्रोनिक युद्ध और जवाबी UAS ने रूसी सेना को युद्धक्षेत्र की पूरी जानकारी मिलने से रोका. गहराई में किए गए हमले और मानवरहित सिस्टम्स रूसी सेना के सैन्य साजोसामान और कमांड व्यवस्था को कमजोर करते रहे, क्योंकि जमीनी सेना रक्षा घेरे के बीच से आगे बढ़ती रही.
इसलिए, ऑपरेशन विवाल्डी ऐसे आक्रमण का आधुनिक उदाहरण है, जिसमें सूचना तंत्र, ड्रोन, गोला-बारूद, इलेक्ट्रोनिक युद्ध सिस्टम्स और जमीनी कार्रवाई सब एक अभियान के हिस्से के रूप में मिलकर काम करते हैं.
सूचना तंत्र की बढ़त
विवाल्डी की एक सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें जमीनी हमला करने से पहले और उसके दौरान भी सूचना व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश की जाती रही. यूक्रेनी कमांडरों ने ऑपरेशन की सुरक्षा और सूचना व्यवस्था पर काफी जोर दिया. यूक्रेनी सेना ने इलेक्ट्रोनिक युद्ध सिस्टम्स, जवाबी UAS ऑपरेशन्स और रूसी टोही तथा कमांड नेटवर्क पर हमले करने में छिपने और धोखा देने की रणनीति अपनाई.
आधुनिक युद्धक्षेत्र में सेंसरों का एक बड़ा नेटवर्क होता है. छोटे ड्रोन मोर्चे की करीबी तस्वीर उपलब्ध कराते रहते हैं, जबकि इलेक्ट्रोनिक खुफिया सिस्टम्स, सैटेलाइट से मिलने वाली तस्वीरें और दूसरे सिस्टम व्यापक तस्वीर उपलब्ध कराने में मदद करते हैं. इसलिए हमला करने वाली सेना ऐसे कदम उठाती है, जिनसे विरोधी सेना को ऑपरेशन के बारे में अधूरी और उलझन भरी जानकारी मिले, वह भी देर से.
यूक्रेन ने ऐसा कई तरह की गतिविधियों के जरिए किया. उसने रूसी ड्रोन ऑपरेटरों और लॉन्च स्थलों को निशाना बनाया. इलेक्ट्रोनिक युद्ध सिस्टम्स ने रूसी टोही और संचार तंत्र में खलल डाला. यूक्रेन ने कमांड चौकियों और सूचना उपकरणों पर हमले किए, जबकि सैन्य फॉर्मेशन ने हमले की तैयारी में सूचना व्यवस्था का इस्तेमाल किया. यूक्रेनी तीसरी कोर ने इलेक्ट्रोनिक युद्ध सिस्टम्स वाली ऐसी ‘सुरक्षा ड्रोन’ सिस्टम का वर्णन किया है, जिसने ऑपरेशन के दौरान करीब 20 हजार रूसी ड्रोनों को नाकाम किया. यह आंकड़ा यूक्रेन का युद्धकालीन दावा है.
सूचना और कार्रवाई के बीच का रिश्ता मूल बात है. पहले से जायजा लिए जा चुके युद्धक्षेत्र से गुजरता एक फॉर्मेशन ऐसी सूचनाएं उपलब्ध करा सकता है, जो तोपखाने, ड्रोन, इलेक्ट्रोनिक युद्ध सिस्टम्स और रिजर्व सेना की आवाजाही के काम आ सकती हैं. उस सूचना की गुणवत्ता और गति वास्तविक मूवमेंट के लिए जगह बनाती है.
इसलिए सूचना के मामले में बढ़त कार्रवाई की शर्त बन जाती है. यह स्थानीय और अस्थायी भी हो सकती है. हमला करने वाली सेना जिस सेक्टर में आगे बढ़ने का फैसला करती है, उसके आसपास निगरानी, इलेक्ट्रोनिक युद्ध, जवाबी UAS और छल करने पर जोर दे सकती है और मूवमेंट के दौरान अनुकूल सूचना व्यवस्था बनाने की कोशिश कर सकती है.
ऑपरेशन विवाल्डी इस समीकरण को खासतौर पर उजागर करता है. इस आक्रमण के लिए जरूरी था कि यूक्रेन रूस को उपलब्ध होने वाली सूचनाओं को सीमित करे और इसके साथ ही रूस की स्थितियों, मूवमेंट और कमजोरियों के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल करे.
स्थानीय स्तर पर ड्रोन की बढ़त
ऑपरेशन विवाल्डी की दूसरी सबसे बड़ी विशेषता ऑपरेशन वाले क्षेत्र में मानवरहित सिस्टम्स की बड़ी संख्या थी. यूक्रेन ने टोही ड्रोन, हमलावर ड्रोन, इलेक्ट्रोनिक सिस्टम्स, जवाबी UAS आदि को जमीनी हमले का अहम हिस्सा बनाया. तीसरी कोर को भी बड़ी संख्या में मानवरहित सिस्टम्स मिले. इस तरह मानवरहित उपकरणों का भारी जमावड़ा हो गया.
लंबी दूरी वाले यूक्रेनी ड्रोन रूसी सेना की तैनाती के पीछे दूर तक ऑपरेट करते रहे और उनका इस्तेमाल नदियों पर पुलों, सैन्य साजोसामान और सप्लाई रूटों के खिलाफ किया गया. यूक्रेनी सेना ने रूसी रूबिकोन ड्रोन संगठन और उसके साजोसामान, गोला-बारूद, लॉन्च स्थलों और अनुभवी ऑपरेटरों को निशाना बनाया. व्यापक अभियान का मकसद विमानों, ऑपरेटरों, संचार तंत्र और कमांड व्यवस्था से लैस रूसी मानवरहित सिस्टम को कमजोर करना था.
इससे ड्रोनों को स्थानीय स्तर पर बढ़त हासिल होने की संभावना बनती है. हमलावर सैन्य फॉर्मेशन उस जगह पर टोही व्यवस्था, हमलावर ड्रोन, जवाबी UAS व्यवस्था और इलेक्ट्रोनिक युद्ध सिस्टम के इस्तेमाल पर जोर दे सकता है, जहां वह दुश्मन सेना को भेदना और अपनी कार्रवाई करना चाहता है. इस तरह की बढ़त कई घंटों से लेकर लंबे समय तक बनी रह सकती है. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि बचाव करने वाला पक्ष किस हद तक टिक सकता है.
गहराई तक मार करने के यूक्रेनी अभियान ने रूसी ड्रोन सिस्टम को परोक्ष रूप से प्रभावित किया. ईंधन और सैन्य साजोसामान की व्यवस्था पर यूक्रेनी हमलों ने रूसी ड्रोन और इलेक्ट्रोनिक ऑपरेशन्स के लिए उपलब्ध संसाधनों में कटौती कर दी. इलेक्ट्रोनिक युद्ध सिस्टम्स के लिए काफी बिजली चाहिए और ड्रोन के लिए बैटरियां, कल-पुर्जे, संचार यंत्र और प्रशिक्षित ऑपरेटर चाहिए. सैन्य साजोसामान के खिलाफ अभियान ने मानवरहित उपकरणों वाले युद्ध और पारंपरिक युद्ध, दोनों को प्रभावित किया.
जमीनी कार्रवाई से गहराई से जुड़े ड्रोन एयर सपोर्ट को मजबूत और तेजी से प्रतिक्रिया देने वाले तरीके के रूप में सामरिक युद्धक्षेत्र में वापस लाते हैं. भारतीय संदर्भ में, ‘CAS’ का महत्व हाल के वर्षों में कम हुआ है, क्योंकि खतरे के आकलन, प्लेटफॉर्म की उपलब्धता और सैद्धांतिक विकल्पों के कारण ध्यान दूसरी तरफ चला गया है. ऑपरेशन विवाल्डी संकेत देता है कि मानवरहित सिस्टम्स चूंकि एक और साधन के रूप में उपलब्ध हैं, इसलिए यह भूमिका प्रासंगिक होती है.
ड्रोन वाली लड़ाई और जमीनी लड़ाई के बीच संबंध महत्वपूर्ण है. टोही, निशानदेही, दमन, रूट के चुनाव और निर्णायक जगह पर कार्रवाई के लिए ड्रोन के मामले में बढ़त एक जरूरी शर्त बन जाती है.
गहराई तक हमला, भेदन और दोहन
ऑपरेशन विवाल्डी दुश्मन की क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर करने वाली कार्रवाई के महत्व पर जोर देता है. रूसी सेना के पीछे यूक्रेनी हमले लगातार बढ़ते गए और वे सैन्य साजोसामान, ईंधन, गोला-बारूद, कमांड चौकियों, इलेक्ट्रोनिक युद्ध सिस्टम्स, ड्रोन इन्फ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई रूटों को निशाना बनाते रहे. लक्ष्य अग्रिम मोर्चों को समर्थन देने वाली सिस्टम्स और उन्हें ताकत देने वाली रिजर्व सेना को कमजोर करना रहा.
इस ऑपरेशन ने दुश्मन को कमजोर करने और जमीनी कार्रवाई के बीच करीबी तालमेल को भी दिखाया. गोला-बारूद, ड्रोन, इलेक्ट्रोनिक युद्ध सिस्टम्स और जमीनी सेना समय के हिसाब से एक के बाद एक काम करते रहे. इसके कारण रूसी सेना को यह समझने के लिए कम समय मिला कि मुख्य कार्रवाई क्या हो रही है, रिजर्व सेना को कब आगे बढ़ाया जाए और रक्षा की मुद्रा कब अपनाई जाए.
इसके बाद दोहन महत्वपूर्ण हो जाता है. दुश्मन सेना में सेंध लगाने से एक मौका बनता है, जिसका फायदा तभी तक उठाया जा सकता है जब तक सेना को उस सेंध से आगे बढ़ाया जाता है. युद्ध आगे बढ़ने के साथ रूस को रिजर्व सेना, तोपखाने, ड्रोन के इस्तेमाल और रक्षात्मक मुद्रा अपनाने का समय मिल सकता है. इसलिए हमलावर को शुरुआती गड़बड़ी के बने रहने तक मौके का फायदा उठाने के लिए एक सैन्य फॉर्मेशन तैयार रखने की जरूरत होगी.
ऑपरेशन विवाल्डी ने लाइमैन के आसपास अहम सामरिक बढ़त दिलाई है. इसके बाद रूसी सेना ने झेरेबेत्स नदी की ओर सेना की तैनाती की और यह दिखाने की कोशिश की कि शुरुआती सेंध लगने के बावजूद गति बनाए रखना महत्वपूर्ण है.
कोर मुख्यालय में सुधार कितना जरूरी
भारत ने ‘IBG’ का जो विचार दिया है, वह बड़ा संगठनात्मक बदलाव है. ‘IBG’ पर मैंने अपने पिछले लेख में विचार किया था कि कोर के पारंपरिक ढांचे के तहत कोर मुख्यालय को दो-तीन डिवीजनल मुख्यालयों से निपटना पड़ता है. हर मुख्यालय को कई ब्रिगेडों और सहायक शाखाओं को कंट्रोल करना पड़ता है. ‘IBG’ मॉडल इस बीच की परत को हल्का करता है और कोर को कार्रवाई करने वाले ब्रिगेड के आकार के लगभग स्वकेंद्रित फॉर्मेशन से सीधे जोड़ता है.
सेना अब XVII कोर के तहत चार IBG के गठन की ओर बढ़ रही है. हर IBG में 5,000 से ज्यादा सैनिक होंगे और इनमें थलसेना, तोपखाने, इंजीनियर, सैन्य साजोसामान, रखरखाव और मेडिकल के कर्मचारी शामिल होंगे. कोर मुख्यालय के तहत गोला-बारूद की व्यवस्था करने वाला एक ग्रुप भी जोड़ने की योजना है.
ऑपरेशन विवाल्डी एक दिलचस्प तुलना का मौका भी देता है. यूक्रेन की तीसरी कोर ने कार्रवाई करने वाली कई ब्रिगेडों और विशेष फॉर्मेशन के जरिए ऑपरेशन चलाया, जबकि टोही व्यवस्था, ड्रोन, इलेक्ट्रोनिक युद्ध सिस्टम्स, गोला-बारूद, सैन्य साजोसामान और डीप ऑपरेशन्स के बीच तालमेल बनाए रखा गया. कोर ने संबद्ध फॉर्मेशन और मानवरहित सिस्टम्स को भी ऑपरेशन के साथ जोड़ा.
यह कोर मुख्यालयों पर बड़ी जिम्मेदारियां डालता है. उसे ऑपरेशन का खाका बनाना होगा, बताना होगा कि जोर कहां-कहां देना है, डीप फायर और मानवरहित सिस्टम्स में तालमेल बनाना होगा, इलेक्ट्रोनिक युद्ध सिस्टम्स को संभालना होगा, कई ब्रिगेडों के बीच तालमेल बनाए रखना होगा, रिजर्व सेना को कंट्रोल करना होगा और बदलती स्थिति के अनुसार ऑपरेशन को आगे बढ़ाना होगा.
इसलिए भारत के लिए सवाल IBG से ऊपर के स्तर का हो जाता है. सेना ने कार्रवाई के लिए फॉर्मेशन का नया स्वरूप बनाया है. सूचनाओं पर केंद्रित आक्रमण की कार्रवाई में कई IBG को कमांड करने के लिए क्या कोर मुख्यालयों में भी उसी हिसाब से संगठनात्मक और काम करने के तरीके में बदलाव जरूरी होगा?
इस मुद्दे में मुख्यालयों का संगठन, खुफिया व्यवस्थाओं का मिश्रण, निशानदेही, गोला-बारूद, UAS और EW कंट्रोल, संचार तंत्र, सैन्य साजोसामान, रिजर्व सेना का प्रबंधन और निर्णय लेने के अधिकार आदि शामिल हैं. मुख्यालयों को कोर और कार्रवाई करने वाले फॉर्मेशन तक सीमित करने से बाकी मुख्यालयों का महत्व बढ़ जाएगा.
ऑपरेशन विवाल्डी भारत को IBG योजना के अगले चरण की समीक्षा करने का उपयोगी मौका देता है. IBG कार्रवाई के लिए फॉर्मेशन उपलब्ध कराता है. कोर मुख्यालयों को ऑपरेशन के लिए ऐसी स्थितियां तैयार करनी होंगी, जिनमें ये सभी फॉर्मेशन एकजुट आक्रमण सिस्टम के रूप में काम कर सकें.
ब्रिगेडियर अनिल रमन (रिटायर्ड) तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में रिसर्च फेलो हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: MbS को अपने दादा अब्दुलअजीज से सीखना चाहिए कि साजिशों का खेल नौसिखियों के लिए नहीं होता