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Thursday, 8 January, 2026
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भारतीयों के मास्टरजी से मिलने का तरीका बदल रहा है यह नया टेलरिंग स्टार्टअप

टेलर इंडस्ट्री पर अभी कोई तुरंत खतरा नहीं है, लेकिन यह ऐप तेज़ी से बदलती गिग इकॉनमी की दुनिया के लिए तैयार हो रहा है.

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पुणे: पुणे की एक आम दोपहर थी. अपने पसंदीदा थाई रेस्टोरेंट में बैठे प्रीतम ओंस्कर और प्रवीण जडे पारंपरिक सिलाई के कारोबार को आधुनिक बनाने पर बात कर रहे थे. यह वही काम था जो जडे को परिवार से विरासत में मिला था. वहीं ओंस्कर ने भारत के तेज़ी से बदलते बाज़ार में लोगों की आदतों को देखते हुए इस कारोबार को समझना शुरू किया था.

तभी अच्छे कपड़ों में सजा एक व्यक्ति उनकी टेबल पर रुका और प्रवीण की तारीफ की.

उस व्यक्ति ने कहा, “इस सूट की फिटिंग वाकई शानदार है”.

यह कोई मामूली बातचीत नहीं थी. वह व्यक्ति पुणे के एक शाही परिवार का बेटा था. ऐसा नाम जो आज भी शहर के पुराने और रसूखदार लोगों के बीच अहम माना जाता है. उसकी यह तारीफ दोनों के लिए एक साफ संकेत थी.

आज प्रीतम ओंस्कर और प्रवीण जडे एक ऐसे स्टार्टअप के को-फाउंडर हैं जो भारत में लोगों और उनके दर्जियों के रिश्ते को बदल रहा है. इस स्टार्टअप का नाम है टेलर स्मार्ट.

प्रवीण जडे ने दिप्रिंट से कहा, “ऐसी बातें हमें और बेहतर काम करने के लिए प्रेरित करती हैं. सिलाई का कारोबार बहुत असंगठित है. अब तक किसी ने इसे ठीक से व्यवस्थित करने की कोशिश नहीं की क्योंकि यह काफी बिखरा हुआ है. भारत का बड़ा टेलरिंग सेक्टर आज भी अनौपचारिक तरीके से चलता है. मैं एक पारंपरिक परिवार से आता हूं और मुझे लगा कि इस कला को उसका सही सम्मान मिलना चाहिए”.

प्रीतम ओंस्कर ने मुंबई से लेकर सिंगापुर तक करीब 23 साल कॉरपोरेट बोर्डरूम में काम किया. उन्होंने मर्जर संभाले और एयरटेल व टाटा कम्युनिकेशंस जैसी बड़ी कंपनियों के साथ काम किया. इसके बाद उन्होंने अपना कुछ शुरू करने का फैसला किया.

आज वही फैसला पुणे और कई दूसरे शहरों में दर्जियों के काम करने के तरीके और उनकी ज़िंदगी को बदल रहा है.

टेलर स्मार्ट की शुरुआत 2017 में इस सोच के साथ हुई कि लोगों को बेहतर फिटिंग मिले. आठ साल बाद यह प्लेटफॉर्म 25 शहरों में फैल चुका है और 800 से ज्यादा दर्जियों के साथ काम कर रहा है.

प्रीतम ओंस्कर ने कहा, “फास्ट फैशन के दौर में हम एक स्लो फैशन ब्रांड हैं. हम घर आकर नाप लेते हैं और कपड़े सिलने की सुविधा देते हैं. चार साल हो गए हैं जब से मैं पूरी तरह कंपनी से जुड़ा हूं. तब से हमारा बिजनेस लगातार बढ़ रहा है. पिछले साल हमारा रेवेन्यू 1.4 करोड़ रुपये था और इस साल हम 3 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर चुके हैं”.

प्रीतम ओंस्कर ने भारतीय टेलरिंग सर्विस में मौजूद कमी को पहचाना और इसे डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने को अपना टारगेट बनाया. ओंस्कर और जडे को दर्जियों का डेटा जुटाने और फैब्रिक डील्स तय करने में करीब चार साल लगे.

आज यह प्लेटफॉर्म 25 शहरों में 800 से ज्यादा विशेषज्ञ दर्जियों के साथ काम कर रहा है. दुबई में भी इसकी ब्रांच है. रिलायंस रिटेल की अवंत्रा के साथ इसकी पार्टनरशिप है. कस्टमर्स अब टेलरिंग को सिर्फ मोहल्ले के भरोसे का काम नहीं, बल्कि एक प्रीमियम ऑन डिमांड सेवा के रूप में देखने लगे हैं.

पुणे के ऑफिस में प्रीतम ओंस्कर | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट
पुणे के ऑफिस में प्रीतम ओंस्कर | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट

भारत की कस्टम टेलरिंग इंडस्ट्री

टेलर स्मार्ट उस पुरानी परंपरा को बदल रहा है जिसमें परिवार दशकों तक एक ही भरोसेमंद दर्जी पर निर्भर रहते थे और हर सिलाई के लिए उसकी दुकान पर जाते थे. यह स्टार्टअप रेडीमेड कपड़ों के दबदबे वाले बाज़ार में भी अपनी जगह बना रहा है जो पिछले कुछ दशकों में तेज़ी से बढ़ा है.

फिलहाल दर्जी इंडस्ट्री को कोई सीधा खतरा नहीं है, लेकिन टेलर स्मार्ट एक ऐसे भविष्य की तैयारी कर रहा है जो तेज़ी से गिग इकॉनमी की ओर बढ़ रहा है. यह ढीले ढाले तरीके से काम कर रहे आत्मनिर्भर दर्जियों को औपचारिक ढांचे में ला रहा है ताकि आने वाले बदलाव के लिए वे तैयार रहें.

प्रीतम ओंस्कर ने कहा, “यह एक मिथक है कि दर्जी का बाज़ार खत्म हो रहा है. भारत में आज भी 62 प्रतिशत लोग सिले हुए कपड़े पहनते हैं. लोगों को लगता है कि यह महंगा और समय लेने वाला होता है, लेकिन हम दोनों गलतफहमियां तोड़ रहे हैं. यह किफायती है और सेवा आपके घर तक मिलती है”.

ओंस्कर चाहते हैं कि मोहल्ले का साधारण दर्जी स्मार्ट बने और नई अर्थव्यवस्था के लिए तैयार हो.

भारत की कस्टम टेलरिंग इंडस्ट्री आज भी बहुत बड़ा है. पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे 2023-24 के मुताबिक, भारत में पिछले साल करीब 1 करोड़ 20 लाख दर्जी थे. जो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के कुल कामगारों का लगभग छठा हिस्सा हैं, लेकिन इनमें से करीब 80 प्रतिशत दर्जी खुद के लिए काम करते हैं और उनकी औसत मासिक आय करीब 6 हज़ार रुपये है.

दर्जियों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन यह रेडीमेड फास्ट फैशन की बढ़ती मांग का भी संकेत है. भारत का कस्टम अपैरल बाज़ार 2024 में 4.88 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2032 तक 10.75 करोड़ डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है, जिसमें मेड टू मेजर कपड़े भी शामिल हैं.

45 साल के राहुल साटे अपने एक रिश्तेदार की शादी के लिए सूट सिलवाना चाहते थे. टाइम बहुत कम था. कई दुकानों और स्थानीय दर्जियों के चक्कर लगाने के बाद भी टाइम पर डिलीवरी का भरोसा नहीं मिला. आखिर में टेलर स्मार्ट ने उनकी मदद की.

चार साल बाद साटे अब इस सर्विस के रेगुलर कस्टमर हैं और अब तक एक दर्जन से ज्यादा कपड़े सिलवा चुके हैं.

राहुल साटे ने बताया कि उन्होंने चार दिन में कपड़े चाहिए थे और बिना बार-बार फोन किए कपड़े वक्त पर मिल गए. उन्हें लगातार अपडेट भी मिलते रहे.

टेलरस्मार्ट अपने ग्राहकों को ऐसे फैब्रिक सैंपल भेजता है | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट
टेलरस्मार्ट अपने ग्राहकों को ऐसे फैब्रिक सैंपल भेजता है | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट

राहुल साटे ने कहा, “यह सुविधा और क्वालिटी का मामला है. इस प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी तेज़ी और फ्लेक्सिबिलिटी है. आप कितने भी बदलाव कहें ये लोग करते हैं और आपको संतुष्ट करते हैं”.

39 साल के रोमित सिंह के लिए भरोसेमंद दर्जी की तलाश कभी खत्म न होने जैसी थी. जब तक एक दोस्त ने उन्हें टेलर स्मार्ट की सलाह नहीं दी.

रोमित सिंह ने कहा, “मुझे सारे फैब्रिक ऑप्शन घर पर ही मिल जाते हैं. दो तीन दुकानों पर जाने का समय बच जाता है और सब कुछ घर बैठे हो जाता है”.

पुराने कारोबार का नया रूप

प्रीतम ओंस्कर और प्रवीण जडे अपने ही स्टार्टअप के ब्रांड एंबेसडर हैं. दोनों खुद सिले हुए कपड़े पहनते हैं और आपस में नए एक्सपेरिमेंट करते रहते हैं.

जडे ओंस्कर के कपड़े सिलते हैं और डिजाइन के साथ प्रयोग करते हैं. उनका ताजा प्रयोग है नारंगी रंग का ब्लेजर जो उन्होंने ओंस्कर के लिए सिला है. इसमें लाइनिंग नहीं है. ताकि गर्म मौसम में मीटिंग के दौरान इसे आराम से पहना जा सके.

टेलर स्मार्ट से पहले प्रीतम ओंस्कर का करियर काफी सफल माना जाता था. 23 सालों में उन्होंने कई सेक्टर और क्षेत्र देखे. क्रॉम्पटन ग्रीव्स और ह्यूजेस टेलीकॉम में काम किया. फिर रिलायंस कम्युनिकेशंस. एयरटेल और अंत में टाटा कम्युनिकेशंस में 11 साल बिताए.

पुणे में छोटे से ऑफिस में टेलरस्मार्ट बोर्ड | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट
पुणे में छोटे से ऑफिस में टेलरस्मार्ट बोर्ड | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट

नौकरी छोड़ने का फैसला अचानक नहीं था. उन्होंने 2017 में टेलर स्मार्ट के साथ काम शुरू किया. लेकिन 2021 में जाकर पूरी तरह कंपनी से जुड़े.

पुणे कार्यालय में प्रवीण | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट
पुणे कार्यालय में प्रवीण | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट

प्रीतम ओंस्कर ने कहा, “जब टेलर स्मार्ट बढ़ने लगा. तो मुझे लगा कि इसके आगे के ग्रोथ के लिए मुझे फुल टाइम चाहिए. इसलिए मैंने नौकरी छोड़ दी. और पूरी तरह इसे समय देना शुरू किया”.

मास्टरजी से टेलर स्मार्ट तक

पुणे की संकरी गलियों में भीड़ भरी सड़कों के बीच छोटे छोटे कमरे हैं जहां दर्जी काम करते हैं. एक ही कमरे में तीन से चार लोग काम करते हैं. फर्श पर कपड़ों के बड़े बड़े गट्ठर पड़े रहते हैं. एक कोने में कोई शर्ट सिल रहा होता है तो दूसरे कोने में कोई कपड़ा काट रहा होता है. सिलाई मशीन पर टेलर स्मार्ट का टैग टंगा रहता है जो चुपचाप उस कमरे पर नज़र रखता है. इन यूनिट्स में आज करीब 50 प्रतिशत काम टेलर स्मार्ट के जरिए आता है.

दानीश अली ने कहा, “पहले हमें साल में सिर्फ छह से सात महीने ही काम मिलता था, लेकिन अब टेलर स्मार्ट की वजह से पूरे साल काम रहता है. हमारी कमाई बढ़ी है और अब हम वही काम करते हैं जिसमें हम माहिर हैं. जैसे अगर मैं पैंट सिलने में अच्छा हूं तो मुझे पैंट का काम मिलता है. शर्ट का काम उस दर्जी को दिया जाता है जो उसमें स्पेशलिस्ट है”.

28 साल के दानीश अली 14 साल की उम्र में पुणे आए थे और तब से लगातार काम कर रहे हैं. शुरुआती सालों में उन्होंने सिलाई सीखी. आठ साल पहले उन्होंने अपनी खुद की दुकान शुरू की. आज वह पुरुषों के कपड़ों में लगभग सब कुछ सिलते हैं. पैंट. कुर्ता. शेरवानी. ब्लेजर. फॉर्मल सूट.

शुरुआत में उनके साथ तीन लोग काम करते थे. अब यह संख्या दस से ज्यादा हो चुकी है. टेलर स्मार्ट के साथ जुड़ने के बाद काम बढ़ा और उन्होंने और लोगों को रखा.

पुणे में एक टेलरस्मार्ट कार्यशाला | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट
पुणे में एक टेलरस्मार्ट कार्यशाला | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट
वर्कशॉप में अपने सहकर्मियों के साथ दानिश अली | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट
वर्कशॉप में अपने सहकर्मियों के साथ दानिश अली | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट

दानीश अली ने कहा, “टेलर स्मार्ट से जुड़ने के बाद मेरी आमदनी करीब 50 प्रतिशत बढ़ गई है. हमें प्रोफेशनल काम मिलता है और पेमेंट हमेशा टाइम पर होती है. मुझे यह इतना अच्छा लगा कि मैंने अपने गांव मुरादाबाद उत्तर प्रदेश से दो और लोगों को बुला लिया और अब वे भी मेरे साथ काम कर रहे हैं”.

टेलर स्मार्ट में एक प्रशिक्षित मास्टरजी ग्राहकों के घर जाकर नाप लेते हैं और यह नाप दर्जी तक पहुंचाया जाता है. दर्जी को कपड़ा और माप मिल जाता है और वह कपड़ा सिलना शुरू कर देता है.

प्रीतम ओंस्कर ने कहा, “हमारे यहां कई लोग पेरोल पर होते हैं. डिजाइनर. मास्टरजी. और एक रनर जो दर्जियों. दुकानों और ग्राहकों के घर के बीच आना जाना करता है. दर्जियों को हर कपड़े के हिसाब से पेमेंट मिलती है. इससे दर्जी को दुकान छोड़कर बाहर नहीं जाना पड़ता और ग्राहक को दर्जी के पीछे भागना नहीं पड़ता”.

टेलर स्मार्ट का सबसे बड़ा ग्राहक आधार पुणे में है जहां से इसकी शुरुआत हुई थी. अब यह दुबई तक फैल चुका है.

टेलर की दुकान में एक सफेद शर्ट पर टेलरस्मार्ट टैग | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट
टेलर की दुकान में एक सफेद शर्ट पर टेलरस्मार्ट टैग | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट

प्रीतम ओंस्कर ने कहा, “मैं पहले कॉरपोरेट सेक्टर में काम करता था. एक दोस्त ने मेरी मुलाकात प्रवीण ज़ेड से कराई जिनका परिवार कस्टम टेलरिंग के कारोबार में था. वहीं से टेलर स्मार्ट की शुरुआत हुई, लेकिन इसे खड़ा करने में काफी मेहनत और रिसर्च लगी”.

सफर की शुरुआत

टेलर स्मार्ट की फाउंडिंग टीम ने पांच साल तक अलग अलग मॉडल्स को समझा और दर्जियों की पहचान की. 2017 में पुणे से काम शुरू हुआ, लेकिन देशभर में विस्तार के लिए टीम ने कई शहरों की यात्राएं कीं. स्थानीय नेटवर्क के जरिए दर्जियों को खोजा और उनका एक विस्तृत डेटाबेस तैयार किया. यही आज इस प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी ताकत है.

प्रवीण जडे ने कहा, “सबसे मुश्किल काम दर्जियों को साथ जोड़ना था. हमें शहर दर शहर जाना पड़ा. दर्जियों से मिलना पड़ा. उनका काम देखना पड़ा और उनकी स्किल के हिसाब से डेटाबेस बनाना पड़ा. हमने उन्हें रेटिंग दी. पांच स्टार. चार स्टार. यहां तक कि दो स्टार भी और उसी हिसाब से उन्हें काम दिया गया”.

प्रीतम ओंस्कर ने बताया कि कई कंपनियों ने उनसे दर्जियों का यह डेटाबेस मांगा, लेकिन टेलर स्मार्ट ने इसे कभी साझा नहीं किया. यही इस प्लेटफॉर्म की रीढ़ है.

टेलरस्मार्ट के पुणे ऑफिस में स्टाफ | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट
टेलरस्मार्ट के पुणे ऑफिस में स्टाफ | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट

पहले कुछ प्लेटफॉर्म ऑनलाइन टेलरिंग सर्विस देते थे जहां दर्जियों को सैलरी पर रखा जाता था और एक ही दर्जी हर तरह के कपड़े सिलता था. कपड़े की सप्लाई भी एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि ज्यादातर फैब्रिक कंपनियां थोक में ही कपड़ा बेचती थीं. टेलर स्मार्ट को फैब्रिक कंपनियों को मनाने में कई साल लगे ताकि वे हर ऑर्डर के हिसाब से कम मात्रा में कपड़ा देने को तैयार हों.

प्रीतम ओंस्कर ने कहा, “दो चीज़ों ने हमारे बिजनेस को प्रॉफिटेबल बनाया. पहला हमने दर्जियों को सैलरी पर नहीं रखा. उन्हें हर ऑर्डर के हिसाब से पेमेंट मिलती है. दूसरा हम फैब्रिक कंपनियों को साथ लाने में कामयाब रहे. शुरू में वे हल्का कपड़ा बेचने को तैयार नहीं थीं, लेकिन धीरे धीरे उन्होंने हम पर भरोसा किया”.

टेलर स्मार्ट को दो बड़े स्रोतों से काम मिलता है. एक उसका खुद का प्लेटफॉर्म जहां ग्राहक सिलाई के ऑर्डर देते हैं. दूसरा रिलायंस अवंतिका जो उसकी साड़ी ब्रांड है और बेलगावी समेत कई शहरों में मौजूद है.

अवंतिका के सभी स्टोर्स में टेलर स्मार्ट के दर्जी मौजूद रहते हैं जो वहां साड़ी खरीदने वाली महिलाओं के लिए ब्लाउज सिलते हैं.

प्रीतम ओंस्कर ने कहा, “आप कह सकते हैं कि हम वहां थर्ड पार्टी की तरह काम करते हैं. ज्यादातर जगहों पर महिला दर्जी काम करती हैं. हमें अवंतिका से काम मिलता है और उनके स्टोर्स हमारे ब्रांड को भी पहचान देते हैं क्योंकि हमारा नाम स्टॉल पर लिखा होता है”.

स्टार्टअप ने बड़े स्तर पर विज्ञापन से दूरी बनाई है. इसके बजाय उन्होंने कॉरपोरेट ऑफिसों में जाकर पुराने कपड़े दान करने के कैंप लगाए जो अलग अलग एनजीओ के साथ किए गए. जो कर्मचारी कपड़े दान करते थे उन्हें टेलर स्मार्ट का 10 प्रतिशत डिस्काउंट वाउचर दिया जाता था.

प्लेटफॉर्म को ज्यादातर ऑर्डर व्हाट्सएप ग्रुप्स से मिलते हैं. हर शहर के लिए अलग ग्रुप. यहां तक कि कॉरपोरेट कंपनियों के लिए भी अलग ग्रुप बनाए गए हैं.

अब अगला लक्ष्य ऐप को मजबूत करना है. फिलहाल ऐप काम करता है, लेकिन उससे आने वाला बिजनेस अभी कम है.

प्रीतम ओंस्कर ने कहा, “हमें करीब 50 प्रतिशत बिजनेस अवंतिका स्टोर्स से मिलता है और बाकी का बड़ा हिस्सा व्हाट्सएप ग्रुप्स से आता है. हमारा अगला बड़ा कदम ऐप को पूरी तरह एक्टिव करना है ताकि ज्यादा ऑर्डर वहां से आएं”.

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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