चंडीगढ़: यह वीडियो सबसे पहले इंस्टाग्राम पर सामने आया.
एक 14 साल की लड़की का वीडियो बिना उसकी सहमति के बनाया गया था. बाद में एक 22 साल के युवक, जिसे वह जानती थी, ने उसे इस वीडियो के जरिए धमकाया और यह क्लिप ऑनलाइन वायरल हो गई. जब यह मामला सब-इंस्पेक्टर आशा देवी तक पहुंचा, तब यह सिर्फ यौन उत्पीड़न का मामला नहीं रहा, बल्कि डिजिटल सबूत जुटाने, उसका स्रोत पता लगाने और कोर्ट में सबूत को मजबूती से रखने की होड़ बन गई.
कुछ महीनों बाद इस मामले में 20 साल की सजा सुनाई गई.
उसी साल एक और कॉल आई, इस बार अस्पताल से. एक नाबालिग लड़की गर्भवती हालत में भर्ती हुई थी. देवी के लिए ऐसे मामले अक्सर चुपचाप शुरू होते हैं और तब सामने आते हैं जब मेडिकल मदद जरूरी हो जाती है.
लेकिन इन्हें सजा तक पहुंचाना बहुत मुश्किल होता है. इसमें बयान लेना, मेडिकल सबूत जुटाना, डीएनए जांच करना और अक्सर पीड़िता और उसके परिवार पर दबाव से निपटना शामिल होता है.
29 अप्रैल को चंडीगढ़ पुलिस ने 136 कमेंडेशन सर्टिफिकेट फर्स्ट क्लास दिए. ये अवॉर्ड हत्या, यौन अपराध और ड्रग बरामदगी जैसे कई मामलों में दिए गए, जिन्हें अधिकारियों ने बेहतरीन जांच का उदाहरण बताया.
वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि कुछ मामले अपने पैमाने और तरीके के कारण अलग थे, जिनमें राज्यों के बीच तालमेल और संवेदनशील मामलों में जटिल सबूत जुटाना शामिल था. लेकिन पुलिस के अंदर यह भी माना जाता है कि ऐसा काम रोजमर्रा की ड्यूटी का हिस्सा है, जो अक्सर फाइलों तक ही सीमित रह जाता है.
यही फर्क, यानी शानदार काम के दावे और लोगों की शंका भरी सोच के बीच का अंतर, इन अवॉर्ड्स की पृष्ठभूमि बनता है.
आशा देवी की न्याय की लड़ाई
41 साल की आशा देवी, जो एक दशक से ज्यादा समय से पुलिस में हैं, उन अधिकारियों में शामिल हैं जिन्हें ये 136 कमेंडेशन सर्टिफिकेट फर्स्ट क्लास दिए गए. उन्हें बच्चों के यौन अपराधों से जुड़े POCSO मामलों में सजा दिलाने के लिए यह सम्मान मिला, जिनमें दोनों मामलों में 20 साल की सजा हुई.
लेकिन इन पुरस्कारों के पीछे की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं होती जितनी अंतिम फैसले में दिखती है. कई मामलों में आरोपी वही होता है जिसे बच्चा जानता है, जैसे पड़ोसी या रिश्तेदार, जो भरोसा बनाकर उसका गलत फायदा उठाता है.
देवी ने कहा, “वे उन्हें बुलाते हैं, धमकाते हैं और कभी-कभी वीडियो भी बना लेते हैं.”
इसके बाद जांच बहुत नाजुक हो जाती है. बयान सावधानी से दर्ज करने होते हैं, मेडिकल सबूत समय पर जुटाने होते हैं और कुछ मामलों में डिजिटल सबूत फिर से तैयार करने पड़ते हैं. हर कदम पर केस कमजोर पड़ने का खतरा रहता है, जैसे परिवार पीछे हट जाए, पीड़िता पर दबाव बढ़ जाए या गवाह मुकर जाए.
देवी ने कहा, “कई बार परिवार समझौता करना चाहता है या सहयोग बंद कर देता है. लेकिन अगर थोड़ी भी कमी रह जाए तो केस प्रभावित हो सकता है. सब कुछ ठीक से जुड़ा होना जरूरी है.”

इंस्टाग्राम वाले मामले में जांच जल्दी ही आगे बढ़ गई. वीडियो के स्क्रीनशॉट तुरंत सुरक्षित किए गए, अकाउंट का पता लगाया गया और यह साबित करने के लिए डिवाइस की जांच की गई कि वीडियो किसने बनाया और अपलोड किया.
देवी ने बताया, “हमने तुरंत स्क्रीनशॉट लिए और सुरक्षित रखे. फिर उसे आरोपी के फोन से जोड़ा.”
मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज पीड़िता का बयान एक अहम सबूत बना, जिसे मेडिकल रिपोर्ट और डिजिटल सबूत से भी साबित किया गया.
उन्होंने कहा, “ऐसे मामलों में वीडियो ही अपराध भी होता है और सबूत भी. लेकिन यह सही तरीके से साबित करना जरूरी है कि यह कहां से आया और किसने बनाया.”
दूसरे मामले में स्थिति अलग थी. गर्भावस्था के कारण मामला ज्यादा मेडिकल जांच और डीएनए सबूत पर आधारित था.
देवी ने कहा, “हमें जैविक संबंध साबित करना होता है, बयान दर्ज करने होते हैं और सब कुछ सही तरीके से दस्तावेज करना होता है.”
उन्होंने बताया कि ऐसे कई POCSO मामलों में बाल कल्याण अधिकारियों के साथ भी तालमेल करना पड़ता है, खासकर जब गर्भावस्था देर से पता चलती है और गर्भपात संभव नहीं होता.
हर कदम समय पर करना जरूरी होता है.
देवी ने कहा, “अगर मेडिकल सबूत लेने में देरी हो जाए या बयान सही से दर्ज न हों, तो बाद में केस पर असर पड़ सकता है.”
चंडीगढ़ की पुलिसिंग संकट
POCSO एक्ट के तहत मामलों में महिला सब-इंस्पेक्टर को जांच अधिकारी बनाया जाता है. चंडीगढ़ के साउथ सबडिवीजन में, जो पांच मुख्य पुलिस थानों को कवर करता है, आशा देवी ऐसे कई मामलों को संभालती हैं.
चंडीगढ़ के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस सागर प्रीत हुड्डा ने पुलिस कर्मियों को जांच, अपराध का पता लगाने और अपराध रोकने के काम के लिए 136 कमेंडेशन सर्टिफिकेट फर्स्ट क्लास दिए. ये सम्मान हत्या, NDPS मामलों और POCSO एक्ट के तहत यौन अपराधों से जुड़े मामलों में दिए गए, साथ ही स्थानीय और विशेष कानूनों के तहत बरामदगी के मामलों में भी. जिन आठ मामलों में सजा हुई, उनमें से 5 POCSO से जुड़े थे, 2 NDPS से और 1 हत्या का मामला था.
चंडीगढ़ के सारंगपुर पुलिस स्टेशन के बाहर.
सम्मान दिए जाने के सिर्फ तीन दिन बाद, एलांते मॉल के बाहर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. यह वीडियो आधी रात के आसपास शूट किया गया था. इसमें एक हिंसक झगड़ा दिखा जो बढ़कर मारपीट में बदल गया और कई लोग घायल हो गए.

करीब 100 मीटर दूर चंडीगढ़ पुलिस की PCR गाड़ी खड़ी थी. लेकिन लड़ाई के दौरान कोई पुलिसकर्मी बीच में आता हुआ नहीं दिखा.
स्थानीय लोगों का कहना है कि लड़ाई खत्म होने के बाद ही पुलिसकर्मी वहां पहुंचे.
इस वीडियो के बाद पुलिस की त्वरित कार्रवाई पर फिर सवाल उठे.
चंडीगढ़ के लोगों में यह चिंता नई नहीं है. कई लोगों के लिए पुलिसिंग अब जरूरत से ज्यादा चालान और कार्रवाई से जुड़ी है, न कि समय पर रोकथाम से.
एक चंडीगढ़ के वकील ने कहा, “लगता है पुलिस तभी काम करती है जब कुछ हो चुका होता है. वे अपराध रोकने के बजाय उसका इंतजार करते हैं.”
एक अन्य निवासी, जिसकी उम्र 50 साल से ज्यादा है और जो पूरी जिंदगी चंडीगढ़ में रहा है, ने कहा, “हर जगह बैरिकेड और नाका पॉइंट हैं, लेकिन पीक समय में सक्रिय ट्रैफिक नियंत्रण कम दिखता है.”
उन्होंने कहा, “अब सब ऑटोमेटेड हो गया है, लेकिन इसका मतलब है कम मानव हस्तक्षेप.”
पिछले तीन महीनों की घटनाओं ने भी चिंता बढ़ाई है. 18 मार्च को सेक्टर 9 में एक 31 साल के व्यक्ति की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई, जिससे शहर में प्रिवेंटिव पुलिसिंग पर सवाल उठे.
हालांकि आरोपी 30 घंटे के अंदर गिरफ्तार हो गए, लेकिन घटना के होने और आरोपियों के भागने से पुलिस की रोकथाम क्षमता पर सार्वजनिक आलोचना हुई.
चंडीगढ़ में लगभग 6000 पुलिसकर्मी हैं, करीब 50 PCR वाहन हैं और 2000 से ज्यादा CCTV कैमरे एक केंद्रीय कमांड और कंट्रोल सिस्टम से जुड़े हैं. लेकिन लोगों का कहना है कि इससे हमेशा सुरक्षा का भरोसा नहीं मिलता.
चिंता तब और बढ़ी जब कुछ दिनों बाद एक 16 साल का लड़का दिनदहाड़े चली गोली से बाल-बाल बच गया, जिससे यह धारणा और मजबूत हुई कि जमीन पर पुलिसिंग उम्मीद के मुताबिक नहीं है.
प्रभावित परिवार क्या कहते हैं
चंडीगढ़ की राजीव गांधी कॉलोनी में एक झुग्गी बस्ती में लगभग 12 साल की एक लड़की 10 रुपये का सिक्का देकर चिप्स के दो पैकेट मांगती है.
दुकानदार ने उसे देखते हुए कहा, “मेरी बेटी भी इसी उम्र की थी. इस उम्र का बच्चा क्या समझता है?”
पिछले साल उसकी 11 साल की बेटी सार्वजनिक शौचालय जाने के लिए बाहर गई थी. जब दुकानदार ने उसे ढूंढा तो उसने देखा कि एक आदमी उसके साथ दुर्व्यवहार कर रहा था.
मौली जागरान पुलिस स्टेशन एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर है. पुलिस जल्दी मौके पर पहुंची और आरोपी को पकड़ लिया.
पीड़िता की मां ने कहा, “जांच अधिकारी पूरे समय हमारे साथ रहे. मेडिकल टेस्ट से लेकर FIR तक, सब उसी दिन हो गया.”

आरोपी को बाद में 20 साल की सजा हुई.
उन्होंने कहा, “मैं सबसे सख्त सजा चाहती थी. लेकिन उन्होंने मुझे बताया कि क्या संभव है. कम से कम मुझे पता है कि वह जल्द वापस नहीं आएगा.”
इस केस में शामिल चार पुलिसकर्मी, जिनमें असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर रमेश कुमार भी शामिल थे, जिन्हें सबसे पहले मौके पर पहुंचने वालों में से एक माना गया, उन्हें भी अप्रैल में सम्मान मिला. कुमार 30 साल से ज्यादा समय से सेवा में हैं.
एक अन्य POCSO मामले में, जो मौली जागरान का ही था और जिसमें 8 साल की लड़की शामिल थी, आरोपी को 30 साल की सजा मिली.

एक पिता परस ने कहा, “एक भी समय ऐसा नहीं था जब वे हमारे साथ नहीं थे. जांच अधिकारी हमें लगातार हिम्मत देते रहे और कहा कि हमें डरना नहीं है और प्रक्रिया पूरी करनी है.”
उन्होंने कहा कि पुलिस ने न सिर्फ कानूनी प्रक्रिया में मदद की, बल्कि उससे आगे भी मदद की.
उन्होंने कहा, “उन्होंने मेरी बेटी को काउंसलिंग में मदद की. मुझे बार-बार पुलिस स्टेशन नहीं जाना पड़ा, वे खुद हमारे पास आए. लेकिन अब हम आगे बढ़ना चाहते हैं और इसे फिर से नहीं जीना चाहते.”
परस मानते हैं कि सम्मान सही है.
उन्होंने कहा, “जब अधिकारी काम करते हैं तो उन्हें सम्मान मिलना चाहिए. लेकिन फिर भी मेरी रोजमर्रा की जिंदगी में पुलिस का डर रहता है, क्योंकि मैं एक स्ट्रीट वेंडर हूं.”
नाका ड्यूटी, इंस्टिंक्ट और पुलिसिंग
मलोया में, जो चंडीगढ़ के दक्षिण में एक गांव है, वहां पुलिसिंग अलग तरह की दिखती है. संकरी गलियां घनी रिहायशी कॉलोनियों से होकर गुजरती हैं, जो पंजाब बॉर्डर के पास हैं. अधिकारी इसे संवेदनशील इलाका बताते हैं, जहां आने-जाने की लगातार आवाजाही रहती है.
मलोया पुलिस स्टेशन में 15 कर्मियों को इस साल कमेंडेशन सर्टिफिकेट दिए गए हैं. लेकिन इनमें से सभी सम्मान बड़े मामलों की जांच के लिए नहीं हैं. इनमें से कई रोजमर्रा की पुलिसिंग से जुड़े हैं, जैसे नाका ड्यूटी में घंटों खड़े रहना, संदिग्धों पर नजर रखना और अपनी समझ से कार्रवाई करना.
शहर के अलग-अलग एंट्री और एग्जिट पॉइंट्स पर पुलिस टीमें पूरे दिन तैनात रहती हैं. वे गाड़ियों को रोकते हैं, दस्तावेज चेक करते हैं और किसी भी संदिग्ध चीज को देखते हैं. अधिकारियों ने बताया कि कई बार इन्हीं सामान्य जांचों से केस शुरू होते हैं.
इंस्पेक्टर जसबीर सिंह, SHO मलोया, जो झांपुर बॉर्डर पर नाका ड्यूटी के दौरान पिस्टल और जिंदा कारतूस बरामद करने वाली टीम का हिस्सा थे, उन्हें भी इस साल सम्मान मिला है.
कई कमेंडेशन NDPS एक्ट के तहत भी दिए गए हैं, जिनमें ड्रग्स, अवैध शराब और इंजेक्शन की बरामदगी शामिल है. पुलिस स्टेशन सेक्टर 36 में अधिकारियों ने काजहेरी में 30 ग्राम हेरोइन बरामद की, जो सिर्फ सूचना के आधार पर कार्रवाई करके की गई.

एक अन्य केस में, सेक्टर 11 में NDPS के दो अलग-अलग मामले, जो 2019 में नाका ड्यूटी के दौरान पकड़े गए थे, 2025 में जाकर सजा तक पहुंचे. इसमें आरोपी को 10-10 साल की सजा हुई. जब्त सामान में 20 इंजेक्शन शामिल थे, जिनमें फेनिरामाइन मेलिएट और बुप्रेनोर्फिन थे.
अधिकारियों के लिए ये केस दिखाते हैं कि पुलिसिंग में नतीजे तुरंत नहीं मिलते और सजा तक पहुंचने में सालों लग सकते हैं. लेकिन यह भी साफ होता है कि रोज की जांच, जो अक्सर सामान्य मानी जाती है, गंभीर मामलों की शुरुआत बन सकती है.
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एक संगठित बाइक नेटवर्क की ट्रैकिंग
कुछ केस अस्पताल या चेकपॉइंट से शुरू होते हैं, और कुछ दिनों तक पैटर्न ट्रैक करने से सामने आते हैं.
चंडीगढ़ के दक्षिण-पश्चिम डिवीजन में बाइक चोरी के कई मामले सामने आने लगे थे. बुलेट और R15 बाइक बार-बार पॉलसोरा और डडूमाजरा जैसे इलाकों से चोरी हो रही थीं, कभी-कभी एक ही रात में 4 या 5 बाइक. इससे लगने लगा कि यह सिर्फ स्थानीय चोरी नहीं है.
DCP धीरज कुमार ने बताया कि CCTV में वही चेहरे बार-बार दिख रहे थे. इसके बाद पुलिस ने तरीका बदला. जब मोहाली के बाद CCTV ट्रेल खत्म हो गई, तो टीम ने उल्टा सोचना शुरू किया, यानी आरोपी कहां गए, यह नहीं, बल्कि वे शहर में कैसे आए.
एक बस कंडक्टर से जवाब मिला. आरोपी रात की बसों से मोगा और फिरोजपुर से आते थे. इसके आधार पर पुलिस ने पंजाब के बस स्टैंड्स की CCTV जांच की और गिरोह की पहचान कर ली.
कुछ दिनों बाद जब कंडक्टर ने बताया कि आरोपी फिर से आ रहे हैं, तो पुलिस पहले से तैयार थी. गिरोह के 4 लोगों को चंडीगढ़ में पकड़ लिया गया. इसके बाद जांच पंजाब तक गई और 17 चोरी की मोटरसाइकिल बरामद की गई. कई बाइक पर नकली नंबर प्लेट लगे थे और उन्हें भीड़ में मिलाकर रखा गया था ताकि पहचान मुश्किल हो.
वे चोरी की बाइक बंद नेटवर्क में बेच रहे थे. टीम को सैकड़ों खड़ी गाड़ियों में से जाकर हर वाहन को अलग-अलग जांचना पड़ा.
DCP के अनुसार, इस तरह ट्रैकिंग का तरीका और इतनी बड़ी रिकवरी असामान्य थी.
उन्होंने कहा कि उन्होंने पहले कभी ऐसा पैटर्न नहीं देखा, जहां एक गिरोह राज्य सीमाओं के पार काम कर रहा हो और इतने बड़े स्तर पर चोरी कर रहा हो.
उन्होंने बताया कि यह केस एक ही बड़ी सफलता नहीं था, बल्कि छोटे-छोटे हिस्सों को जोड़ने से बना, जैसे CCTV फुटेज, ट्रांसपोर्ट रूट और स्थानीय जानकारी. यह दक्षिण-पश्चिम डिवीजन के कई मामलों में से एक था, जिनके लिए इस साल सम्मान मिला.
अवॉर्ड क्या मायने रखते हैं
कई अधिकारियों के लिए कमेंडेशन सर्टिफिकेट सिर्फ औपचारिक सम्मान नहीं हैं, बल्कि उस काम की पहचान हैं जो अक्सर दिखाई नहीं देता.
सब-इंस्पेक्टर आशा देवी इन अवॉर्ड्स के बारे में बात करते समय उत्साहित हो जाती हैं. यह पहली बार नहीं है जब उन्हें यह सर्टिफिकेट मिला है. वे अपने फोन में पुरानी तस्वीरें दिखाती हैं, हर समारोह की यादें संभालकर रखी हुई हैं.
उन्होंने कहा, “मैं इन्हें घर पर रखती हूं. जब इन्हें देखती हूं तो लगता है कि काम को पहचान मिल रही है.”
वे 10 साल से ज्यादा समय से पुलिस में हैं और कई जटिल मामलों को संभाल चुकी हैं, जिनमें कई गवाह, मेडिकल प्रक्रिया और लंबे कोर्ट केस शामिल होते हैं. उनके लिए इस काम में निजी जिंदगी के लिए बहुत कम समय बचता है.

उन्होंने कहा, “इस नौकरी में फिक्स टाइम नहीं होता. कभी-कभी निजी जीवन ही नहीं रहता. लेकिन जब पुरस्कार मिलता है तो लगता है कि मेहनत वर्थ है.”
उन्होंने इसे एक तरह का रीसेट बताया. “काम कितना भी हो, जब रिवार्ड मिलता है तो थकान कुछ समय के लिए भूल जाती है. इससे आगे काम करने की प्रेरणा मिलती है.”
अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी यही बात मानते हैं. DCP धीरज कुमार ने कहा कि ऐसे सम्मान पूरे बल के लिए प्रेरणा का काम करते हैं.
उन्होंने कहा, “जब अधिकारी देखते हैं कि अच्छा काम पहचाना जा रहा है, तो दूसरे भी उसी स्तर पर काम करने के लिए प्रेरित होते हैं.”

उन्होंने यह भी कहा कि इसका असर जनता पर भी पड़ता है. “ऐसे सम्मान पुलिस और जनता के बीच भरोसे की कमी को कम करते हैं. हमारा लक्ष्य सिर्फ शहर को सुरक्षित बनाना नहीं है, बल्कि लोगों को सुरक्षित महसूस कराना भी है.”
लेकिन अधिकारी यह भी मानते हैं कि शहर में पुलिसिंग का बहुत सारा काम अवॉर्ड या सार्वजनिक ध्यान तक नहीं पहुंचता. जांचें महीनों या सालों चलती हैं और कई प्रयास सिर्फ केस फाइलों तक ही सीमित रह जाते हैं.
देवी के लिए प्रेरणा साफ है. उन्होंने कहा, “मैं आखिरी तक लड़ती हूं. यही काम है.”
लंबी रातें, लंबे केस
सभी मामले जो कमेंडेशन तक पहुंचे, वे तेज या हाई-प्रोफाइल नहीं थे. कुछ केस कई सालों तक चले और उन अधिकारियों से भी आगे निकल गए जिन्होंने उन्हें शुरू किया था.
मनीमाजरा पुलिस स्टेशन में, 2023 में दर्ज एक हत्या का मामला मुख्य रूप से पीड़ित की पत्नी की गवाही पर आधारित था, जो अकेली चश्मदीद थी और उसने अपने पति को एक नशे में धुत व्यक्ति द्वारा मारे जाते देखा था. यह केस धीरे-धीरे अदालत में आगे बढ़ा, जिसमें लगातार फॉलो-अप और सावधानी से दस्तावेज तैयार करने की जरूरत पड़ी. जब आरोपी को आजीवन कारावास की सजा हुई, तब जांच अधिकारी सब-इंस्पेक्टर अमरजीत सिंह पहले ही रिटायर हो चुके थे. उनकी टीम भी अलग-अलग जगहों पर ट्रांसफर हो चुकी थी, जो पुलिसिंग में आम बात है, जहां केस अक्सर अधिकारियों से ज्यादा लंबे चलते हैं.
लेकिन उसी स्टेशन पर काम एक पल में बदल भी सकता है.
एक कॉल आती है जिसमें बताया जाता है कि गुजरात के एक गांव में मिली एक लड़की कहती है कि वह मनीमाजरा की है.
कुछ ही सेकंड में पूरा माहौल बदल जाता है. बातचीत कर रहे अधिकारी स्क्रीन की तरफ मुड़ जाते हैं. तुरंत कॉल किए जाते हैं. जानकारी दोहराई और जांची जाती है. रिसेप्शन पर बैठी कर्मचारी ध्यान से सुनती है और फिर बताती है कि उसे वह चेहरा जाना-पहचाना लग रहा है. वह लड़की पहले भी स्टेशन आ चुकी हो सकती है.
यह एक छोटी सी बात पूरी जांच की दिशा बदल देती है.
रिकॉर्ड निकाले जाते हैं, नाम मिलाए जाते हैं, और टुकड़ों को जोड़ना शुरू होता है. आधे घंटे के अंदर टीम लड़की की पहचान कर लेती है, उसके परिवार से संपर्क करती है और गुजरात पुलिस के साथ मिलकर उसे एक शेल्टर में रखने की व्यवस्था करती है. यह केस खबरों में नहीं आता, लेकिन अधिकारी इसे ऐसे काम का उदाहरण बताते हैं जो सिस्टम से ज्यादा इंसान की समझ और याददाश्त पर निर्भर करता है.
दूसरी जगहों पर रफ्तार धीमी है, लेकिन लगातार चलती रहती है.
जब रात सारंगपुर में ढलती है, सड़कें खाली होने लगती हैं, लेकिन पुलिस स्टेशन के अंदर दिन खत्म नहीं होता. फाइलें खुली रहती हैं, CCTV फुटेज लगातार चलती रहती है, और अधिकारी एक डेस्क से दूसरी डेस्क पर जाकर समय रेखाएं दोबारा जांचते हैं.

इसी माहौल में एक POCSO केस शुरू हुआ. 10 से 12 साल की एक लड़की को ऑटो रिक्शा में उठाया गया, एक सुनसान जगह पर उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया और फिर सड़क किनारे छोड़ दिया गया. वह घर वापस पहुंची, लेकिन आरोपी की पहचान नहीं कर पाई.
असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर अजेय कुमार ने कहा, “यह अंधेरे में निशाना लगाने जैसा था.”
टीम ने शुरुआत से काम किया. अलग-अलग रास्तों के CCTV फुटेज देखे, एक ऐसे वाहन की पहचान की जो टाइमलाइन से मेल खाता था, और फिर शहर में उसकी मूवमेंट ट्रैक की. धीरे-धीरे पूरा लिंक सामने आने लगा. तीन दिन के अंदर आरोपी का पता लगा लिया गया और उसे गिरफ्तार कर लिया गया. बाद में इस केस में 20 साल की सजा हुई.
इस केस के साथ-साथ एक ई-रिक्शा चोरी रैकेट के मामले में भी सारंगपुर पुलिस स्टेशन के कई अधिकारियों को सम्मान मिला. इनमें कुमार भी शामिल थे, जिन्हें जांच में भूमिका के लिए दो सर्टिफिकेट दिए गए.
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