कानपुर: हर चुनावी मौसम में इस कपड़ा नगरी में एक जाना-पहचाना नारा गूंजता था—मेक कानपुर ग्रेट अगेन. 2000 के शुरुआती सालों तक उम्मीदवार जर्जर हो चुकी कपड़ा मिलों को फिर से चालू करने और शहर को उसकी पुरानी शान लौटाने का वादा करते थे.
एक समय कानपुर को “पूरब का मैनचेस्टर” कहा जाता था—एक ऐसा शहर जिसने देश की औद्योगिक क्रांति की अगुवाई की. कपड़ा मिलें इसकी सबसे बड़ी पहचान थीं, जहां हजारों मजदूर काम करते थे और ऊनी कंबलों से लेकर बेडशीट तक का उत्पादन होता था. फिर उग्र ट्रेड यूनियनवाद, सरकारी कुप्रबंधन और आधुनिकीकरण में नाकामी का घातक मेल सामने आया. 1970 के दशक में कानपुर में लहराते नशे में डूबे नारों और लाल झंडों में ही शहर का पतन छिपा था.
आज भी वे प्रतिष्ठित मिलें कीमती जमीन पर खाली पड़ी हैं और बॉलीवुड की अपराध फिल्मों की पृष्ठभूमि बनती हैं. ये खुद को दोबारा गढ़ने में नाकाम एक शहर की उदास तस्वीर हैं.
आखिरकार आजादी के दौर के पुराने श्रम कानूनों से भारत का रिश्ता टूट रहा है, जिनकी वजह से कानपुर में ट्रेड यूनियन फली-फूली थीं. सरकार ने हड़ताल करना मुश्किल, कंपनियों के लिए छंटनी आसान और यूनियनों की सौदेबाजी की ताकत कमजोर कर दी है. कारोबारी कहते हैं कि यह कदम बहुत देर से उठाया गया और झटके में लिए गए यूनियनवाद और हड़तालों के महिमामंडन की कीमत देश को भारी पड़ी.
कानपुर आज भी भारतीय सोच में इस बात का गहरा प्रतीक है कि मजदूरों की हड़तालें किसी उद्योग की मौत का कारण बन सकती हैं. हाल की गिग वर्कर्स की हड़ताल के दौरान भी इसका जिक्र हुआ.
“मिल मालिकों को यूनियनों ने इतना परेशान किया कि वे शांति से मिल चला ही नहीं पाए. ऐसे मामले भी हुए हैं, जब हड़ताल के दौरान मैनेजरों की हत्या कर दी गई,” इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन कानपुर के चेयरमैन आरके अग्रवाल ने कहा, जो खुद इसी शहर में पले-बढ़े हैं. “फैक्ट्री हर वक्त खतरे में रहती थी, क्योंकि वे यूनियन मजदूर जो चाहें, जला देते थे.”

जिन मिलों ने कभी शहर की अर्थव्यवस्था और राजनीति को आकार दिया, वे आज खामोश खंडहर हैं. जो आंदोलन मजदूरों की जायज मांगों—उचित वेतन और सुरक्षा—से शुरू हुए थे, वे धीरे-धीरे कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीति से जुड़े, कभी-कभी हिंसक टकराव में बदल गए. हड़तालें, झड़पें और आधुनिकीकरण का विरोध नुकसान बढ़ाता गया, जिसके चलते 1970 के दशक में इंदिरा गांधी ने कपड़ा मिलों का राष्ट्रीयकरण किया—जो एक जादुई इलाज की तरह पेश की गई मौत की फांस साबित हुआ.
लेकिन सरकारी कब्जे से पतन सिर्फ धीमा हुआ. 1990 के शुरुआती सालों तक ज्यादातर मिलों पर ताले लग गए. पीछे रह गए बेरोजगार मजदूर, बकाया भुगतान और लाल इमली जैसे जर्जर परिसर—एक ऐसे शहर के प्रतीक, जो आज भी अपने औद्योगिक बिखराव के नतीजे झेल रहा है.
“विडंबना यह है कि कपड़ा उद्योग का आधुनिकीकरण, जिससे उत्पादन की प्रक्रिया तेजी से बंटी, वही कानपुर के उद्योग के लिए मौत का कारण बना,” बिजनेस स्टैंडर्ड के एडिटोरियल डायरेक्टर ए के भट्टाचार्य ने कहा. “जो मिलें बीमार हो चुकी थीं, उनका राष्ट्रीयकरण तो हुआ, लेकिन उन्हें फिर से खड़ा करने की खास कोशिश नहीं हुई. इससे वे और ज्यादा बीमार हो गईं.”
शुरुआती यूनियनें
कानपुर 1900 के शुरुआती वर्षों से ही ट्रेड यूनियनों का गढ़ रहा है. एल्गिन, म्योर, लाल इमली, स्वदेशी कॉटन और जेके कॉटन जैसी मशहूर मिलों ने पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से हजारों मजदूरों को आकर्षित किया.
“देश और दुनिया में कानपुर दो वजहों से जाना जाता था—उद्योग और मजदूर आंदोलन,” राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय मजदूर संघ के वरिष्ठ सदस्य और पूर्व यूनियन नेता सुखदेव मिश्रा ने कहा. “ये दोनों एक-दूसरे से जुड़े थे. आप इन्हें अलग नहीं कर सकते.”
लंबी शिफ्टें, नौकरी की असुरक्षा, वेतन कटौती और सुरक्षा नियमों की कमी ने सामूहिक संघर्ष की शुरुआती शक्लें पैदा कीं—मजदूर बस्तियों में समितियां और सुपरवाइजरों से तालमेल करने वाले बिचौलिए.
1919 में शहर ने पहली हड़ताल देखी. ‘लॉस्ट वर्ल्ड्स: इंडियन लेबर एंड इट्स फॉरगॉटन हिस्ट्रीज’ की लेखिका चित्रा जोशी ने लिखा कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही थीं, लेकिन नाममात्र वेतन में बढ़ोतरी नहीं हो रही थी.
इस हड़ताल का व्यापक असर पड़ा. शनिवार, 22 नवंबर 1919 को वूलन मिल्स के मजदूर काम छोड़कर बाहर आ गए. जल्द ही एल्गिन, म्योर और विक्टोरिया मिल्स के मजदूर भी जुड़ गए. आसपास की जूट, आटा और टैनिंग फैक्ट्रियों के मजदूर भी शामिल हो गए. 20 हजार से ज्यादा मजदूर हड़ताल पर चले गए.
“हड़ताल आठ दिन चली. मजदूरों को बड़ी रियायतें मिलीं—वेतन में बढ़ोतरी, बोनस और कामकाजी हालात में सुधार,” जोशी ने लिखा.
समय के साथ हड़तालें और मिल बंद होना कानपुर की सामान्य तस्वीर बन गईं. माहौल जोशीला था और किसी ने नहीं सोचा कि यह शहर की औद्योगिक पहचान को कैसे खोखला कर रहा है.
तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने कानपुर के मिल मजदूरों के नाम एक पत्र भी लिखा. यह पत्र पहले कानपुर के हिंदी अखबार ‘प्रताप’ में और 27 सितंबर 1937 को अंग्रेजी अखबार ‘द लीडर’ में छपा. यह वह साल था, जब वेतन कटौती, छंटनी और काम के बोझ को लेकर हड़तालें तेज हुई थीं.
“मुझे पूरा विश्वास है कि मजदूर जितने संगठित होंगे, उतनी ही बेहतर तरीके से अपनी स्थिति सुधार पाएंगे. लेकिन यह ताकत कहां से आती है. यह संगठन में है,” नेहरू ने लिखा. “इसलिए मजदूरों को सबसे पहले एक मजदूर सभा या ट्रेड यूनियन बनानी चाहिए.”
लेकिन उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि हिंसक प्रदर्शन समाधान नहीं हैं. उन्होंने लिखा कि जो लोग दूसरों को “डरा-धमकाकर” सब कुछ हासिल करना चाहते हैं, वे “मूर्खों की दुनिया” में जी रहे हैं. उन्होंने बाजार की हकीकत को भी स्वीकार किया.
“मजदूरों को यह नहीं भूलना चाहिए कि आखिरकार उनका वेतन मिलों और फैक्ट्रियों के मुनाफे से ही आता है. अगर मिल में काम खराब है, उत्पादन कम है, तो मुनाफा भी उसी अनुपात में घटेगा,” नेहरू ने लिखा. “ऐसी स्थिति में या तो मिल बंद हो जाएगी या उसका बोझ मजदूरों पर पड़ेगा.”
उनके शब्द भविष्यवाणी साबित हुए. ठीक यही हुआ.
समय के साथ यूनियनें स्थानीय राजनीति से गहराई से जुड़ गईं. सीपीआई(एम) का असर मजदूर आंदोलनों और राज्य की राजनीति दोनों में बढ़ा. पार्टी के समर्थन वाले ट्रेड यूनियन नेता एस एम बनर्जी ने 1957 से 1971 तक लगातार चार बार कानपुर से निर्दलीय लोकसभा सीट जीती.
“यूनियनें इतनी ताकतवर हो गई थीं कि हर मिल के बाहर लाल झंडा दिखता था,” आरके अग्रवाल ने कहा, जो हथौड़ा और हंसिया वाले सीपीआई(एम) के झंडे की बात कर रहे थे. “छोटी-छोटी बातों पर भी मजदूर हड़ताल पर चले जाते थे या काम बंद कर देते थे.”
अधिकारों की लड़ाई हिंसक हुई
कानपुर के पतन के लिए किसे दोषी ठहराया जाए, इस पर सबकी राय एक जैसी नहीं है. राष्ट्रीयकरण, लगातार हड़तालें और पावरलूम—सब कुछ इसमें शामिल है. आरएसएस समर्थित यूनियनें भी 1970 और 1980 के दशक के मजदूरों को सीधे दोषी ठहराने से बचती हैं.
सुखदेव मिश्रा आज के उन कारोबारी मालिकों से सहमत नहीं हैं, जो कहते हैं कि मजदूर छोटी बातों—जैसे ज्यादा बोनस, छुट्टियां और बेहतर टेरा-कॉटन यूनिफॉर्म—के लिए हड़ताल करते थे.
“ज्यादातर मांगें आर्थिक और वेतन से जुड़ी थीं,” मिश्रा ने कहा. उन्होंने बताया कि मशाल जुलूस, प्रदर्शन, धरना और भूख हड़ताल लगभग हर मिल में आम थे.
शुरुआती यूनियन नेता कानपुर में बड़े नाम थे. कानपुर मजदूर सभा के सूर्य प्रसाद अवस्थी जैसे लोगों को आज भी सेवानिवृत्त मजदूर ‘साफ छवि’ वाला नेता मानते हैं.
“वे प्रबंधन के साथ बैठते थे, मजदूरों की समस्याएं रखते थे और ईमानदारी से बातचीत करते थे. उनका मकसद पूरी फैक्ट्री बंद कराना नहीं था,” 68 वर्षीय राजेंद्र प्रसाद शर्मा ने कहा, जो 1983 से 2017 तक म्योर मिल में सुपरवाइजर रहे.
1919 की पहली हड़ताल से लेकर 1930 और 1940 के दशक तक विरोध आमतौर पर हिंसक नहीं होते थे. मजदूर काम छोड़ते थे और शांतिपूर्ण धरने देते थे. यूनियनें उग्र नहीं मानी जाती थीं.
लेकिन 1950 के बाद हालात बदले. आंदोलन हिंसक होने लगे. स्थिति बिगड़ गई और यही कानपुर उद्योग के अंत की शुरुआत थी.
1977 में स्वदेशी कॉटन मिल में बकाया वेतन को लेकर हुए प्रदर्शन में पुलिस की गोलीबारी में 12 लोग मारे गए. हजारों मजदूरों ने फैक्ट्री घेर ली और प्रबंधन को बंधक बना लिया. इस हड़ताल के बाद राज्य सरकार को 1978 में उत्तर प्रदेश समय पर वेतन भुगतान अधिनियम लाना पड़ा.

“हड़ताल को पुलिस की बर्बर कार्रवाई से दबाया गया, जिसमें कई मजदूर मारे गए. इस दमन से पूरे शहर में हड़ताली मजदूरों के प्रति सहानुभूति की लहर दौड़ गई,” चित्रा जोशी ने लिखा.
इस मुद्दे पर संसद में भी बहस हुई. राज्यसभा सांसद हामिदा हबीबुल्लाह ने कहा कि मजदूरों के परिवार “भूखे मर रहे होंगे” क्योंकि वेतन नहीं मिला था.
1970 के आखिर और 1980 के शुरुआती वर्षों में और भी कई आंदोलन हुए. कुछ कम उग्र थे, जैसे त्रिवेणी मेटल ट्यूब्स में, जहां बिना नोटिस या मुआवजे के ‘अवैध तालाबंदी’ कर दी गई थी.
“हमने ऐसा प्रदर्शन किया, जिसमें कर्मचारियों ने मुंह पर नोट चिपका लिए,” मिश्रा ने कहा. उन्होंने बताया कि यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन उस समय अखबारों में खूब छाया.
सबसे बड़ा, चर्चित और विघटनकारी आंदोलन 1989 का “रेल रोको” था. यह तब हुआ, जब मिलें पहले ही राष्ट्रीयकरण के बाद खराब हालत में थीं. के के पांडेय समिति ने कपड़ा उद्योग को बचाने के लिए वेतन और काम के बोझ में बदलाव की सिफारिश की थी.
“सिफारिश थी कि मजदूर चार की जगह छह करघे चलाएं. तर्क यह था कि उत्पादन बढ़ेगा तो मिलें बचेंगी. मजदूरों ने छह करघे चलाने से इनकार कर दिया,” मिश्रा ने कहा, जिनका संगठन बीएमएस भी इस आंदोलन में शामिल था.
हजारों मजदूर रेलवे पटरियों पर बैठ गए और शहर की रेल सेवा ठप कर दी. दिल्ली, लखनऊ और कोलकाता के रूट रुक गए. मजदूरों ने मांग की कि मंत्री खुद पटरियों पर आकर बातचीत करें.
“प्रबंधन मशीनों में सुधार चाहता था. लेकिन स्थानीय नेताओं ने मजदूरों को फायदे नहीं बताए. सिर्फ नुकसान गिनाए,” 1984 में मिल में काम शुरू करने वाले संतोष कुमार ने कहा.
करीब छह दिन बाद सरकार को पांडेय समिति की सिफारिशें वापस लेनी पड़ीं. सीपीआई(एम) नेता सुभाषिणी अली इस आंदोलन की अगुवाई कर रही थीं.
लाल और यूनियन झंडों के बीच अली 1970 और 1980 के दशक में मजदूर जुलूसों का नेतृत्व करती रहीं. सादी साड़ी में वे मजदूर बस्तियों में जाकर उनकी बदहाल जिंदगी देखती थीं. “रेल रोको” आंदोलन के बाद 1989 में वे कानपुर से लोकसभा पहुंचीं. आज भी उद्योग समर्थक उन्हें उद्योग के पतन का जिम्मेदार मानते हैं. लेकिन अली का नजरिया अलग है.
“उद्योग सालों से बीमार था और मुझे गर्व है कि हमने उसे जितना हो सका, जिंदा रखा,” अली ने दिप्रिंट से कहा. उन्होंने कहा कि पांडेय अवॉर्ड से हजारों अस्थायी मजदूरों की नौकरी चली जाती. “जेके कॉटन मिल के बाहर फुटपाथ पर वही पॉलिएस्टर कपड़ा आधे दाम में बिक रहा था, जो मिल में बनता था. जेके कॉटन के मजदूर भी वही खरीदते थे.”
“रेल रोको” आंदोलन पहले से लड़खड़ाते कपड़ा उद्योग के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ. एक-एक कर मिलें बंद होने लगीं. मई 1989 में जेके कॉटन बंद हुई और हजारों मजदूर बेरोजगार हो गए. 1992 में नेशनल टेक्सटाइल कॉरपोरेशन की पांचों मिलें भी बंद हो गईं. वहां सिर्फ कुछ सुरक्षाकर्मी और कर्मचारी बिना काम के वेतन पाते रहे.
कानपुर की कारोबारी आत्मा कैसे मारी गई
शहर हमेशा से ऐसा नहीं था जैसा आज दिखता है—एक पोस्ट-इंडस्ट्रियल, कपड़ा मिलों का कब्रिस्तान. 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में, जब मिलें औपनिवेशिक शासन के तहत थीं, तब वे ब्रिटिश सेना के लिए ऊनी कंबल, बेडशीट और यूनिफॉर्म बड़े पैमाने पर तैयार करती थीं.
“1915 में पूरी क्षमता से काम करते हुए, एक मिल ने 1.25 करोड़ गज (करीब 1.145 करोड़ मीटर) यूनिफॉर्म कपड़ा, 1.325 करोड़ जोड़ी मोजे और दस्ताने, 2.40 लाख पाउंड (करीब 1,09,000 किलो) काठी की फेल्ट और लगभग 15 लाख फील्ड और सर्विस यूनिफॉर्म तैयार कीं,” एसपी मेहरा ने अपनी किताब मैनचेस्टर ऑफ द ईस्ट: द राइज़ एंड फॉल ऑफ इंडस्ट्री इन कानपुर में लिखा.
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान कानपुर की मिलों ने मित्र देशों के युद्ध प्रयासों में अहम योगदान दिया. यह दौर इस क्षेत्र में ‘औद्योगिक प्रगति का उत्प्रेरक’ साबित हुआ. 1918 तक कानपुर में 28,413 दिहाड़ी मजदूर काम कर रहे थे. इनमें से 10,695 मजदूर छह सूती कताई और बुनाई मिलों में काम कर रहे थे, मेहरा ने लिखा.
द्वितीय विश्व युद्ध और 1947 में भारत की आजादी के बाद सैन्य ऑर्डर तेजी से घट गए. इसके बाद मिलों ने भारतीय उपभोक्ताओं पर ध्यान केंद्रित किया—स्कूल यूनिफॉर्म, शॉल, तौलिये और साड़ियां. वे भारतीय सेना को भी सामान देती रहीं, हालांकि मात्रा काफी कम हो गई.
“हर मिल की अलग सायरन होती थी—कहीं सुबह 7 बजे, कहीं 6:30 बजे. उसी से हम स्कूल के लिए उठते थे,” आरके अग्रवाल ने कहा. “सड़कें साइकिलों से भर जाती थीं, जब मजदूर अपनी-अपनी मिलों की ओर जाते थे.”
उस समय कानपुर में रौनक थी. 1959 में जब दूरदर्शन ने प्रसारण शुरू किया, तो जेके इलेक्ट्रॉनिक्स शहर में टीवी सेट बनाने वाली शुरुआती लाइसेंस प्राप्त कंपनियों में शामिल थी.
धीरूभाई अंबानी खुद कारोबार के लिए शहर आते थे. शहर के बुजुर्ग कारोबारी आज भी याद करते हैं कि उनके दौरे किसी उत्सव से कम नहीं होते थे.

शहर दूसरे औद्योगिक केंद्रों से काफी आगे था. अग्रवाल 1973 में आईआईटी कानपुर से स्नातक होने के बाद पुणे में टाटा मोटर्स जॉइन करने के बाद का एक किस्सा याद करते हैं.
“वे मुझ पर हंस रहे थे. कह रहे थे कि कानपुर इतना बड़ा औद्योगिक इलाका है, तुम पुणे क्यों आ गए,” उन्होंने कहा. “उस समय शहर की यही छवि थी. और कानपुर का जीडीपी शायद देश के शीर्ष सात शहरों में था.”
लेकिन यह ज्यादा दिन नहीं चला.
कुछ साल बाद अग्रवाल जब लौटे, तो कानपुर में गिरती मिल संस्कृति देखी. निजी मिल मालिक मजदूर-हितैषी कानूनों और उस समय सीपीआई(एम) के वर्चस्व वाली स्थानीय सरकार—दोनों से निराश हो रहे थे.
उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी के कई नेता हड़ताल न होने देने के बदले मिल मालिकों से रिश्वत लेते थे.
“आखिरकार मिल मालिकों ने नई तकनीक में निवेश बंद कर दिया और पैसा निकालकर सूरत, अहमदाबाद और दूसरे शहरों में प्लांट लगाने लगे, क्योंकि यूनियनें उन्हें लगातार परेशान कर रही थीं. वे शांति से मिल चला ही नहीं पा रहे थे,” उन्होंने कहा.
अग्रवाल ने याद किया कि जेके कॉटन ने वाटर जेट तकनीक आयात की थी, लेकिन उसे इस्तेमाल नहीं कर पाए क्योंकि “मजदूरों ने हंगामा कर दिया”. मजदूरों को लगा कि इससे छंटनी होगी, जबकि मालिकों का कहना था कि मशीनें उत्पादकता बढ़ाने के लिए लाई गई थीं.
“ऐसी स्थिति में उद्योगपति ज्यादा दिन टिक नहीं सकते. इसलिए उन्होंने सब कुछ बंद कर दिया,” अग्रवाल ने नाराजगी जताते हुए कहा. “वे मशीनें 15 साल तक कभी खोली ही नहीं गईं. बस वहीं पड़ी रहीं.”
सुभाषिणी अली ने ट्रेड यूनियनों पर लगाए जा रहे आरोपों से सख्ती से असहमति जताई. अली, जिनके पिता न्यू विक्टोरिया मिल में वरिष्ठ प्रबंधक थे, ने कहा कि 1960 के दशक तक ज्यादातर मिलों के लिए बंद होना या बंद होने का खतरा हकीकत बन चुका था.
“मिलों के बंद होने की मुख्य वजह यह थी कि सरकारी नीतियों ने पावरलूम सेक्टर को बढ़ावा दिया, उन्हें कम वेतन पर लंबे समय तक काम करने दिया और उत्पाद शुल्क से छूट दी,” अली ने कहा.
उनके मुताबिक, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारी मुनाफा कमाने के बाद भी मालिकों ने मिलों, मशीनरी और उत्पादों के मिश्रण को आधुनिक नहीं बनाया. “वे ग्रामीण बाजार के लिए मोटा कपड़ा और सस्ती छपी हुई साड़ियां बनाते रहे,” उन्होंने कहा.
मिलों को राष्ट्रीय नियंत्रण में लाना
ट्रेड यूनियनवाद, प्रतिस्पर्धा और रसायन, पावरलूम और सीमेंट जैसे नए और ज्यादा मुनाफे वाले उद्योगों के मिश्रण ने मिल मालिकों का ध्यान भटका दिया. 1960 के दशक के अंत और 1970 के शुरुआती वर्षों तक मिलों को भारी नुकसान होने लगा.
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बड़े मानवीय और रोजगार संकट से बचने के लिए इन ‘बीमार’ इकाइयों के प्रबंधन को सरकार के हाथ में लेने का फैसला किया.
1968 में नेशनल टेक्सटाइल कॉरपोरेशन लिमिटेड का गठन किया गया. लेकिन सिर्फ प्रबंधन संभालना काफी नहीं था. संपत्तियों का बेहतर नियंत्रण और उनका आधुनिकीकरण करने के लिए लंबे समय तक निवेश जरूरी था, इसलिए स्वामित्व का हस्तांतरण किया गया.
1974 में सिक टेक्सटाइल अंडरटेकिंग्स (नेशनलाइजेशन) एक्ट पारित हुआ. इसके तहत देशभर की 103 बीमार कपड़ा मिलों का राष्ट्रीयकरण किया गया, जिनमें कानपुर की कई प्रमुख मिलें शामिल थीं. सात साल बाद, 1981 में ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन—जिसके पास लाल इमली और एल्गिन मिल थीं—का भी राष्ट्रीयकरण हुआ.
“इन्हें ‘न नफा, न नुकसान’ के आधार पर चलाया गया, ताकि मजदूरों को रोजगार मिलता रहे और बेरोजगारी न बढ़े,” एनटीसी की म्योर मिल के पूर्व सुपरवाइजर राजेंद्र प्रसाद शर्मा ने कहा. “सरकारी स्वामित्व का मतलब नौकरी की सुरक्षा और स्पष्ट दिशा था. इसलिए मजदूर नेताओं ने राष्ट्रीयकरण का समर्थन किया.”
लेकिन इससे बची-खुची उद्यमशीलता भी खत्म हो गई.
सुभाषिणी अली ने न्यू विक्टोरिया मिल के राष्ट्रीयकरण और पुनः संचालन की मांग वाले आंदोलन का नेतृत्व किया.
“बाकी सभी यूनियनों ने इसका विरोध किया और इसे अव्यावहारिक बताया. इसके बावजूद हम सैकड़ों मजदूरों को लगातार जेल भरो आंदोलन के लिए जुटाने में सफल रहे. उनकी पत्नियों को भी गिरफ्तारी देने के लिए संगठित किया गया,” अली ने कहा. “मैं उनके साथ थी और हम 15 दिन जेल में रहे.”
आखिरकार तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह—जो ट्रेड यूनियनों के कट्टर विरोधी थे—ने हस्तक्षेप किया और मिलों के राष्ट्रीयकरण की सिफारिश की.
लेकिन राष्ट्रीयकरण भी किस्मत नहीं बदल सका. मिलें जैसे-तैसे चलती रहीं और मजदूर मासिक वेतन पाकर खुश थे. “जो व्यक्ति मुनाफे के लिए मिल नहीं चला पाया, एनटीसी क्या कर लेगी,” आरके अग्रवाल ने कुर्सी पर पीछे झुकते हुए कहा.
1984 में एनटीसी की मिल में शामिल हुए, अब रिटायर्ड सुरक्षा गार्ड संतोष कुमार रोज मिल के बाहर लगे बोर्ड के पास से गुजरते थे, जिस पर लिखा था—“म्योर मिल, नेशनल टेक्सटाइल कॉरपोरेशन, यू.पी. लिमिटेड.”
“इसका मतलब न यह पूरी तरह राज्य की है, न केंद्र की. न यहां राज्य का कानून ठीक से लागू होता है, न केंद्र का,” उन्होंने कहा.
बीएमएस के सुखदेव मिश्रा सरकार, पारिवारिक विवादों और वित्तीय कुप्रबंधन को दोषी मानते हैं. लेकिन आरएसएस से जुड़े यूनियन नेता होने के नाते वे वामपंथी यूनियनों पर मजदूरों को ‘झूठे सपने’ दिखाने का भी आरोप लगाते हैं.
“उन्होंने मजदूरों को गलत किस्म के आंदोलनों की ओर धकेला, जिनका नतीजा मिलों के बंद होने के रूप में निकला. इसकी कीमत आज भी मजदूर चुका रहे हैं,” मिश्रा ने कहा.
आज शहर की कुछ मिलें धीरे-धीरे रिक्लेमेशन प्रक्रिया से गुजर रही हैं. 2023 में रिपोर्ट आई कि यूपी कोऑपरेटिव स्पिनिंग मिल्स फेडरेशन और यूपी स्टेट टेक्सटाइल कॉरपोरेशन लिमिटेड जैसी सरकारी इकाइयों की मिलों का अधिग्रहण हो रहा है. करीब 3,000 करोड़ रुपये की देनदारी निपटाने के लिए जमीन निवेशकों को देने की योजना है.
अक्टूबर 2025 में ऐतिहासिक म्योर मिल राज्य सरकार को लौटा दी गई, क्योंकि एनटीसी लीज नवीनीकरण नहीं कर सकी. अब देखना है कि औद्योगिक विरासत बचेगी या मुंबई के लोअर परेल की तरह इतिहास और व्यावसायिक विकास का कोई मिश्रित रूप उभरेगा.
मिलों के बाद की जिंदगी
कपड़ा उद्योग के बाद भी कानपुर में जिंदगी है. हाल के वर्षों में यह पान मसाला अरबपतियों का शहर बन गया है.
हालांकि कानपुर अपनी आर्थिक ऊंचाई तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया, लेकिन औद्योगिक इलाकों में उम्मीद की हल्की किरण है. उद्योग कुंज में ऑटोमोटिव और इंजीनियरिंग कंपनियां नजर आती हैं. अग्रवाल खुद प्लास्टिक से बने ऑटोमोटिव पुर्जों का निर्यात करते हैं.
“शहर हर साल 10,000 करोड़ रुपये का निर्यात करता है, जिसमें 6,000 करोड़ रुपये सिर्फ चमड़ा उद्योग से आते हैं,” अग्रवाल ने कहा. “कानपुर की चमड़े की काठी दुनिया भर में मशहूर हैं.”
और फिर आईआईटी कानपुर है.
ए के भट्टाचार्य के मुताबिक, शहर आज भी अपने “मजबूत शैक्षणिक भंडार” पर भरोसा कर सकता है. “यहां एक बेहद मजबूत आईआईटी है. दुर्वूरी सुब्बाराव, संजय मल्होत्रा और एन आर नारायण मूर्ति—तीनों आईआईटी कानपुर से हैं,” उन्होंने कहा. उन्होंने जोड़ा कि शहर सेवाक्षेत्र को उसी तरह नहीं अपना पाया, जैसा दक्षिण भारत के राज्यों ने किया.
आज मिलों में कौन काम करता है
कानपुर की सबसे प्रतिष्ठित मिल—लाल इमली—अब सिर्फ अपने अतीत की परछाईं है. टूटी खिड़कियों से जंग लगी मशीनें दिखती हैं. बेल-बूटे और झाड़ियां लाल ईंट की दीवारों पर चढ़ गई हैं. कताई मशीनों की आवाजें गायब हैं. विशाल परिसर में बस कुछ सुरक्षा गार्ड और दफ्तर कर्मचारी बचे हैं.
67 वर्षीय राजेश कुमार को 1960 के दशक के सुनहरे दिन याद हैं, जब उनके पिता सिलाई और कढ़ाई विभाग में काम करते थे. तब लाल इमली ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन लिमिटेड के स्वामित्व में थी. 1981 में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ और अब यह वस्त्र मंत्रालय के अधीन है.
“1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान मेरे पिता कपड़े और कंबल घर लाते थे और मोमबत्ती की रोशनी में बटन सिलते थे,” कुमार ने कहा.
मकरावत गंज कॉलोनी में पले-बढ़े कुमार ने याद किया कि हर साल मिल परिसर में समारोह होते थे. “अधिकारी बच्चों को इनाम देते थे. फुटबॉल और हॉकी का सामान तक कंपनी देती थी,” उन्होंने कहा.
कंपनी के खर्च पर पढ़े-लिखे कुमार ने 1978 से 2018 तक लाल इमली में काम किया. वे पावरलूम पर सूट और कोट का कपड़ा बनाते थे और 15 दिन के 250 रुपये कमाते थे.
“तीसरी मंजिल पर करीब 150 पावरलूम थे. जब सब चालू होते थे, तो लगता था जमीन कांप रही है,” उन्होंने हंसते हुए कहा.
1994 में उन्हें क्लर्क पद पर पदोन्नत किया गया और वे 3,200 रुपये महीना कमाने लगे. “मैंने हाजिरी, अकाउंट्स और स्टोर का काम संभाला, फिर 2003 में हेड ऑफिस चला गया,” उन्होंने कहा.
आखिरी पद बिजनेस डेवलपमेंट का था, जहां वे दूसरी कंपनियों की पूछताछ देखते थे. रिटायरमेंट के बाद भी वे उसी कॉलोनी में रहते हैं. उनके दोनों बेटे—एक कानपुर कोर्ट में काम करता है और दूसरा गोवा के हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में—मिल में नहीं गए.
“उन्होंने हमारी ग्रेच्युटी नहीं दी है, इसलिए मैं कंपनी का घर खाली नहीं कर रहा,” कुमार ने सधे स्वर में कहा.
लेकिन गेट पर मौजूद क्लर्क विवेक जॉन की कहानी कुछ और है.
“हर महीने मैं किराया उनकी ग्रेच्युटी से काट रहा हूं, क्योंकि वे घर खाली नहीं कर रहे. कुछ लोगों की पूरी ग्रेच्युटी ही कट गई,” जॉन ने कहा.
जॉन उन गिने-चुने कर्मचारियों में हैं, जो परिसर की देखरेख, घुसपैठ रोकने और कागजी काम संभालते हैं. कई महीनों की सैलरी देरी के बावजूद वे रोज आते हैं.
वे मिल गेट के बाहर चाय पीते हुए उस नौकरशाही ठहराव की बात करते हैं, जिसमें वे फंसे हैं. “जब स्थानीय नेता केंद्र पर दबाव डालते हैं, तभी सैलरी आती है,” उन्होंने कहा.
इसी दौरान एक महिला अपने बेटे के साथ परिसर में आई. उसने बैंक स्टेटमेंट, रिटायरमेंट लेटर और डेथ सर्टिफिकेट गार्ड को दिए. उसका पति वर्षों तक मिल कैंटीन में काम करता था. वह जानना चाहती थी कि परिवार को कोई लाभ मिलेगा या नहीं.
“वह पूरी प्रक्रिया में फंस जाएगी. शायद कभी पैसा न मिले, चाहे वह उनका हक ही क्यों न हो,” जॉन ने कहा. “हमारा हाल देख लीजिए. एक वक्त ऐसा भी था, जब 26 महीने बाद सैलरी मिली थी.”
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