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Tuesday, 6 October, 2026
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गन्ने की फसल पर रेड रॉट का संकट, समाधान के लिए वैज्ञानिकों पर टिकी किसानों की नज़र

बागपत और आसपास के जिलों में रेड रॉट बीमारी गन्ने की फसल बर्बाद कर रही है और किसान रसायनों पर ज्यादा पैसे खर्च कर रहे हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि गन्ने की सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली किस्म को बदलना ही शायद इसका एकमात्र रास्ता हो सकता है.

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नई दिल्ली: दूर से देखने पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैले सैकड़ों एकड़ गन्ने के खेत आज भी भारत के समृद्ध कृषि क्षेत्रों की तस्वीर जैसे लगते हैं, लेकिन थोड़ा पास जाकर देखने पर यह तस्वीर टूट जाती है.

देवेंद्र कुमार धामा गन्ने के आठ फुट लंबे डंठल की ओर हाथ बढ़ाते हैं. उनकी उंगलियां गन्ने के पीले बाहरी हिस्से पर पड़े जंग जैसे रंग के धब्बों को छूती हैं. उनके मेहनत से सख्त हो चुके हाथ गन्ने को मोड़ते हैं तो वह बहुत आसानी से टूट जाता है. इसके अंदर वह हल्का सफेद, रस से भरा रेशा नहीं है, जिसका रस चीनी, शीरा, रम और कभी-कभी बीयर तक बनाता है. गन्ना लगभग अंदर से खोखला हो चुका है, लाल रंग का हो गया है और उस पर हरे रंग की फफूंद के धब्बे हैं, जिनसे मानसून की हवा में तेज़ और खट्टी गंध फैल रही है. अब 60 साल से ज्यादा उम्र के धामा को यह पता लगाने के लिए किसी जांच की ज़रूरत नहीं है कि उनके गन्ने को किसने बर्बाद किया है—वह है रेड रॉट.

रेड रॉट गन्ने के पौधे के अंदर के हिस्से को खा जाता है, जिससे वह खोखला हो जाता है और लाल रंग का दिखाई देता है. उस पर हरे रंग की फफूंद के धब्बे हो जाते हैं, जिनसे तेज और खट्टी गंध निकलती है | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
रेड रॉट गन्ने के पौधे के अंदर के हिस्से को खा जाता है, जिससे वह खोखला हो जाता है और लाल रंग का दिखाई देता है. उस पर हरे रंग की फफूंद के धब्बे हो जाते हैं, जिनसे तेज और खट्टी गंध निकलती है | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

धामा ने दिप्रिंट से कहा, “यह ऊपर से शुरू हुआ, सड़न शुरू हुई और बीमारी गन्ने की नसों के जरिए नीचे की ओर फैलती गई. जब तक हम इस फसल की कटाई करेंगे, पूरा गन्ना सूखे भूसे में बदल जाएगा. सुक्रोज खत्म हो चुका है, रस खट्टा है और गन्ने का वजन आधा रह गया है. यह कोई आम बीमारी नहीं है, यह गन्ने का कैंसर है.”

भारत के कृषि वैज्ञानिकों के लिए भी यह समय के खिलाफ दौड़ है. कोयंबटूर स्थित इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च के शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट यानी आईसीएआर-एसबीआई को 114 साल हो चुके हैं. 1912 में इसकी स्थापना के बाद से यह संस्थान गन्ने की बेहतर किस्में तैयार करने की कोशिश कर रहा है. इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन और गन्ने पर ऑल-इंडिया कोऑर्डिनेटेड रिसर्च प्रोजेक्ट यानी एआईसीआरपी भी नई किस्मों को बाजार में उतारने से पहले उनकी जांच करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं.

धामा की कहानी सिर्फ यूपी के बागपत के सांकरौद गांव तक सीमित नहीं है. यूपी के पूरे पश्चिमी इलाके में, जहां राज्य के कुल गन्ना उत्पादन का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा पैदा होता है, एक फफूंद वाली बीमारी ने कहर बरपा रखा है. इसे कई नामों से जाना जाता है—कोलेटोट्रिकम फाल्केटम, रेड रॉट और लाल सड़न रोग. कृषि वैज्ञानिकों के बीच यह फफूंद एक जानी-पहचानी खतरनाक बीमारी है, लेकिन गन्ने के खेतों में इसका बढ़ता हमला हाल का मामला है, जो लगातार एक ही किस्म की खेती किए जाने से बढ़ा है.

पिछले 15 साल से ज्यादा समय में यूपी ने गन्ने की खेती का सुनहरा दौर देखा है. इसकी वजह थी सीओ 0238 या करण—4. यह गन्ने की एक किस्म है, जिसे 2009 में आईसीएआर-एसबीआई के पूर्व निदेशक, 2023 के पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित और यूपी काउंसिल ऑफ शुगरकेन रिसर्च के पूर्व निदेशक बख्शी राम ने तैयार किया था. किसान इसे ‘दो-सौ-अड़तीस’ या 238 कहते हैं. इस किस्म ने किसानों की पैदावार बढ़ाकर करीब 80 से 85 क्विंटल प्रति बीघा कर दी, जो करीब 0.62 एकड़ है. अच्छी पैदावार ने देशभर के किसानों को आकर्षित किया और जल्द ही यूपी की करीब 90 प्रतिशत खेती योग्य गन्ने की जमीन पर सीओ 0238 की खेती होने लगी.

हालांकि, शुरुआत में यह किस्म रेड रॉट के लिए प्रतिरोधी हो सकती थी, लेकिन सीओ 0238 के सैकड़ों एकड़ में उगाए जाने से इस बीमारी को फैलने और बदलने के लिए बहुत बड़ा मौका मिल गया. बीमारी का रोगाणु खुद को बदलता, उसके मुताबिक ढलता और नए रूप बनाता गया, जो सीओ 0238 की आनुवंशिक सुरक्षा को भी तोड़ सकते थे. इसका नतीजा यह हुआ कि जो फसल पहले सबसे भरोसेमंद फसलों में से एक मानी जाती थी, वह अब अनिश्चित हो गई है. गन्ने की सफलता की कीमत अब किसानों को चुकानी पड़ रही है.

2019-2020 और 2025-2026 के गन्ना पेराई सीजन के बीच यूपी का उत्पादन 126.4 लाख टन से घटकर 89.5 लाख टन रह गया है. बागपत, मेरठ और मुजफ्फरनगर के खेतों में इस गिरावट का मतलब है कि किसान अपनी फसलों पर अतिरिक्त दवाओं के लिए हजारों रुपये खर्च कर रहे हैं और अपनी लागत निकालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

बख्शी राम ने दिप्रिंट से फोन पर कहा, “मैंने उन्हें चेतावनी दी थी कि ऐसा हो सकता है. शुरुआत में मैंने सलाह दी थी कि इसे करीब 50 प्रतिशत क्षेत्र तक ही रखा जाए, लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी क्योंकि किसानों और उद्योग दोनों को इससे फायदा हो रहा था, लेकिन अब जब यह त्रासदी हो चुकी है, मैं बर्बाद हो चुके किसान के पास जाकर यह नहीं कह सकता कि ‘मैंने तो पहले ही कहा था’.”

एक खेत तक सीमित रहने को तैयार नहीं यह बीमारी

फतेहपुर माजरी में करीब आधा दर्जन गन्ना किसान जूट से बुनी चारपाइयों पर पालथी मारकर बैठे हैं. इनमें से कुछ दूसरे किसानों से ज्यादा थके हुए नज़र आते हैं. वे इसलिए परेशान हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कल उन्होंने अपने खेतों में जिन दवाओं का छिड़काव किया था, वे सुबह हुई बारिश में बह गई हैं. पुरानी और घिसी हुई नोटबुक में उनका बढ़ता कर्ज और केमिकल व दवाओं की बढ़ती संख्या की रसीदों का हिसाब दर्ज है.

सड़न शुरू होने के बाद फसल कमजोर हो जाती है और उसका बढ़ना रुक जाता है | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
सड़न शुरू होने के बाद फसल कमजोर हो जाती है और उसका बढ़ना रुक जाता है | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

45 साल के विपिन मलिक ने कहा, “पहले गन्ने की पुरानी किस्मों से हमें करीब 40 से 50 क्विंटल प्रति बीघा उत्पादन मिलता था, लेकिन 238 से करीब 80 क्विंटल तक उत्पादन होने लगा. यह जंगली झाड़ियों की तरह बढ़ता था. एक बीज से आठ मोटे गन्ने निकल आते थे.” विपिन ने इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया की एक शाखा में असिस्टेंट बैंक मैनेजर की नौकरी छोड़कर फतेहपुर माजरी, गन्ने के खेतों और अपने बीमार माता-पिता के पास लौटने का फैसला किया था. अब वह इस फैसले की सलाह किसी को नहीं देते. उन्होंने कहा, “गन्ने की खेती में अब कोई मुनाफा नहीं बचा है. इस बीमारी ने हमें बर्बाद कर दिया है.”

हालांकि, किसानों को अपने खेतों के लिए दवाओं और कीटनाशकों के इस्तेमाल की सलाह दी गई है, लेकिन इतने बड़े इलाके में फैल चुकी फफूंद वाली बीमारी को सिर्फ एक खेत में अलग से ठीक करना मुश्किल है. किसान इस बात को अच्छी तरह समझते हैं. हर कुछ हफ्तों में उनमें से कोई एक अपने खेत में दवा का छिड़काव करता है, लेकिन आसपास के खेतों में रेड रॉट बचा रहता है और कुछ ही समय में फिर उसके गन्ने के खेत में पहुंच जाता है.

मौसम के बदलते तरीके ने भी इस तबाही को और बढ़ा दिया है. जब गर्म और नमी वाली पुरवाई हवाएं बिहार और पूर्वी यूपी से चलकर आती हैं, तो वे फफूंद के बीजाणुओं को अपने साथ लेकर हवा के जरिए दूसरी जगहों तक पहुंचाती हैं. जब लगातार होने वाली बारिश गन्ने के खेतों में पानी भर देती है, तो जड़ें सड़ने लगती हैं, पौधे की रोगों से लड़ने की क्षमता और कमजोर हो जाती है और किसान बेबस होकर सब कुछ देखते रहने के अलावा कुछ नहीं कर पाता.

बागपत के कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. शिवम सिंह ने कहा, “रेड रॉट बीमारी बीज और मिट्टी, दोनों से फैलती है. अगर संक्रमित बीज का टुकड़ा लगाया जाता है, तो पूरे सीजन में बीमारी बढ़ती जाती है. गन्ने को दूसरे साल भी दोबारा फसल के रूप में रखा जाता है. शुरुआत में 5-10 प्रतिशत संक्रमण अगले सीजन में बढ़कर 30-40 प्रतिशत तक पहुंच सकता है. किसान मिट्टी या बीज के टुकड़े का ट्रीटमेंट नहीं कर पाते और समय के साथ सीओ 0238 की बीमारी से लड़ने की क्षमता कम हो गई है. जैसे कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाला व्यक्ति हल्की बारिश में भी निमोनिया की चपेट में आ सकता है, वैसे ही यह किस्म अब बीमारी के मामूली हमले के सामने भी कमजोर पड़ जाती है.”

सिंह के मुताबिक, एकमात्र समाधान गन्ने की किस्म को बदलना है, क्योंकि रसायनों के जरिए रेड रॉट को नियंत्रित करना “लगभग असंभव” है. रसायनों के छिड़काव का असर सीमित होता है और बुवाई से पहले बीज को दवा में डुबोना भी महंगा उपाय है.

परेशान मलिक मानते हैं कि ऐसा लगता है कि उनके साथ कुछ भी नहीं है. न तो उनके खेत, जिनमें अक्सर एक फसल से दूसरी फसल तक फफूंद के बीजाणु पहुंच जाते हैं, न मौसम और अनिश्चित बारिश, न चीनी मिलें और निश्चित रूप से सरकार भी नहीं.

जैसे-तैसे गुज़ारा कर रहे किसान

हर दो हफ्ते में, जब चीनी मिलों से मिलने वाली किस्तों का पैसा 76 साल के खुशी राम के झुर्रीदार हाथों में पहुंचता है, तो वह मिली हुई पूरी रकम सीधे पास के कृषि केमिकल विक्रेताओं के पास ले जाते हैं. अपनी बीमार फसल के लिए दवाएं खरीदने में ही प्रति फसल 4,000 से 8,000 रुपये तक खर्च हो जाते हैं.

ट्रैक्टर से खेत की जुताई में 1,000 रुपये खर्च होते हैं, मजदूरी पर 1,000 रुपये और लगते हैं, गन्ने का बीज खरीदने में प्रति बीघा 2,500 से 3,000 रुपये लगते हैं और खाद व यूरिया पर करीब 2,000 रुपये प्रति बीघा खर्च होता है. जिन किसानों के पास अपनी ज़मीन नहीं है, उनके लिए सिर्फ जमीन का किराया 12,000 रुपये प्रति बीघा है. अपनी लागत निकालने के लिए उन्हें कम से कम 60 क्विंटल प्रति बीघा उत्पादन करना ज़रूरी है, लेकिन पिछले साल वे सिर्फ करीब 35 से 40 क्विंटल ही पैदा कर पाए और किसी तरह गुजारा किया.

हर दो हफ्ते में, जब 76 साल के खुशी राम को चीनी मिलों से किस्तों में पैसा मिलता है, तो वह अपनी बीमार फसल के लिए दवाएं खरीदने के लिए मिली पूरी रकम सीधे पास के कृषि रसायन विक्रेताओं के पास ले जाते हैं | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
हर दो हफ्ते में, जब 76 साल के खुशी राम को चीनी मिलों से किस्तों में पैसा मिलता है, तो वह अपनी बीमार फसल के लिए दवाएं खरीदने के लिए मिली पूरी रकम सीधे पास के कृषि रसायन विक्रेताओं के पास ले जाते हैं | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

राम ने कहा, “हम जैसे-तैसे गुजारा करते हैं. पुराने समय में खेती में नकद पैसे का बहुत ज्यादा खर्च नहीं होता था. पांच साल पहले कोराजेन का दो बार छिड़काव पूरे सीजन के लिए काफी होता था. अब हमें हर 20 दिन में छिड़काव करना पड़ता है. लेकिन आज छिड़काव करो और तीन हफ्ते के अंदर ऊपर की पत्तियां पीली हो जाती हैं और बीमारी वापस आ जाती है. हम मिट्टी में फर्टेरा, कार्बोफ्यूरान, थायोडिकार्ब और टेबुकोनाजोल डालते हैं. लेकिन स्थानीय बाजारों में मिलने वाले आधे केमिकल बेकार हैं.”

लेकिन 62 साल के धर्मपाल उन किसानों में शामिल नहीं हैं जो अब भी सीओ 0238 पर भरोसा करते हैं. दूसरे लोग उन्हें ‘ताऊजी’ कहते हैं और वह हर कुछ साल में अपने खेत में लगाने के लिए गन्ने की नई किस्मों के बारे में जानकारी जुटाते हैं. ताऊजी अपने गन्ने के खेतों के बीच से आगे बढ़ते हैं. गन्ने की तेज धार वाली पत्तियां उनके हाथों पर बिना दिखाई दिए छोटे-छोटे कट लगा देती हैं, लेकिन वह उन्हें हटाते हुए खेत के अंदर जाते रहते हैं. उन्हें यह बताते हुए गर्व होता है कि इन खेतों में सीओ 0238 नहीं है. इसके बजाय उन्होंने कई दूसरी किस्में लगाई हैं – 16202, 18231, 19321 और 17018.

धर्मपाल खुशी से कहते हैं, “देखो, यहां कोई बीमारी नहीं है!”

मलिक बीच में टोकते हैं, “मुनाफा भी नहीं है.”

ताऊजी की यह हरकतें ज्यादातर लोगों के लिए मनोरंजन का विषय हैं. हालांकि, वे रेड रॉट से प्रभावित फसलों के लिए हजारों रुपये दवाओं पर खर्च करते हैं, फिर भी वे ऐसी किस्म को पसंद करते हैं जिससे कम से कम कुछ तय पैदावार मिलने की उम्मीद हो. ताऊजी के प्रयोग अक्सर उन्हें और बड़े नुकसान की ओर ले जाते हैं. उनकी पैदावार कम है और बीज की कीमत ज्यादा है. यह ऐसा मेल है जिस पर कोई दूसरा किसान जोखिम नहीं लेना चाहता. ताऊजी यह बात जानते हैं, लेकिन उनका जो काम एक बेकार सा “शौकिया प्रोजेक्ट” लग सकता है, वह पश्चिमी यूपी में रेड रॉट के संकट के समाधान का एक हिस्सा हो सकता है.

कोयंबटूर स्थित आईसीएआर के शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट की ओर से एक नई किस्म सीओ 20016 जारी किए जाने की तैयारी है. इसे करण 20 भी कहा जाता है. संस्थान को उम्मीद है कि यह नई किस्म सीओ-0238 की जगह ले सकती है.

करण 20 को अभी व्यावसायिक तौर पर जारी नहीं किया गया है. इसे जल्द ही सेंट्रल वैरायटल रिलीज कमेटी के सामने रखा जाएगा और अगले साल यह किसानों के लिए उपलब्ध हो सकती है. अब तक पिछले तीन वर्षों में इस किस्म के कड़े परीक्षण किए गए हैं. इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि इस किस्म से सीओ-0238 की तुलना में प्रति हेक्टेयर ज्यादा गन्ना पैदा होने की संभावना है. हालांकि, यह किस्म रेड रॉट से कितनी सुरक्षित होगी, यह अभी तय नहीं हुआ है.

गन्ने जैसी फसल में बीमारी से लड़ने की क्षमता पैदा करना एक जटिल प्रक्रिया है. गन्ना एक ऑक्टाप्लॉइड पौधा है, यानी इसकी हर कोशिका के केंद्रक में आठ क्रोमोसोम होते हैं. मक्के में दो, गेहूं में छह और कपास में चार क्रोमोसोम होते हैं. इसी वजह से गन्ने में किसी भी तरह की जीन एडिटिंग बहुत मुश्किल है.

बख्शी राम ने कहा, “गन्ने की नई किस्में पारंपरिक तरीके से तैयार की जाती हैं. हमें पहले मूल पौधों की पहचान करनी होती है और फिर यह देखना होता है कि उन्हें आपस में मिलाने पर उनके गुण किस तरह मिलते हैं. 2009 से रिसर्च सेंटरों ने कई किस्में जारी की हैं, लेकिन कोई भी सीओ 0238 की गन्ने की पैदावार और चीनी की रिकवरी की बराबरी नहीं कर पाई है.”

किसान परेशान, वैज्ञानिक नई किस्म खोजने की कोशिश में

जब रात होती है और किसान ‘हुक्के पर चर्चा’ के लिए एक साथ बैठते हैं, तो उनमें से कुछ युवा किसान अब भी वह समय याद करते हैं जब वे अपने माता-पिता के खेतों में दौड़ते थे और आसमान से दवाओं का छिड़काव करने वाली मशीनों को देखकर हैरान होते थे. सरकार पहले ऐसा करती थी, लेकिन राज्य सरकार की उस पहल को बंद हुए कई दशक हो चुके हैं.

यूपी में गन्ने की कीमत स्टेट एडवाइज्ड प्राइस यानी एसएपी के तहत तय होती है. फिलहाल यह करीब 370 रुपये प्रति क्विंटल है. किसान कई साल से मांग कर रहे हैं कि इस कीमत को बढ़ाकर कम से कम 500 या 600 रुपये प्रति क्विंटल किया जाए.

मलिक गुस्से में कहते हैं, “यह कैसी विडंबना है, देखिए. मिल हमारा गन्ना लेती है, उससे सफेद चीनी, शीरा, शराब और अच्छी गुणवत्ता वाला इथेनॉल बनाती है. बचा हुआ रेशा लेकर पार्टिकल बोर्ड बनाती है. गन्ने से निकलने वाली गाद से जैविक खाद और कंप्रेस्ड बायोगैस बनाती है. वे इतना पैसा कमा रहे हैं, लेकिन हमें सिर्फ 370 रुपये मिलते हैं! पार्ले-जी बिस्किट के एक पैकेट के भी ज्यादा अधिकार हैं. दुकानदार आपसे 5 रुपये से कम या ज्यादा नहीं ले सकता. ऐसा क्यों है कि किसान के तौर पर हमें खाद एमआरपी पर, डीजल एमआरपी पर, ट्रैक्टर एमआरपी पर खरीदना पड़ता है, लेकिन जब हम अपनी फसल बेचते हैं तो कीमत कोई दूसरा तय करता है?”

पिछले यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान राष्ट्रीय लोक दल, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन ने कई बार कहा था कि चुनाव ‘गन्ना’ के मुद्दे पर था, ‘जिन्ना’ के मुद्दे पर नहीं. यह बात अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर लगाए जाने को लेकर हुए विवाद के संदर्भ में कही गई थी. जैसे-जैसे यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, फतेहपुर माजरी के किसान फिर से गन्ने को चुनावी मुद्दा बनाने के लिए तैयार हैं.

हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दो वर्षों में गन्ने की कीमत करीब 30 रुपये बढ़ाई है, लेकिन मलिक ने तुरंत यह भी कहा कि इसके साथ ही परिवहन का खर्च भी जल्द बढ़ गया.

बागपत से भारतीय जनता पार्टी के विधायक योगेश धामा ने कहा, “यह कोई ‘मुद्दा’ नहीं है. गन्ने की फसल में हमेशा से बीमारियां रही हैं. हम जानते हैं कि बीमारियां बढ़ी हैं और हर साल की तरह हम किसानों को उनकी फसल की मिलने वाली कीमत बढ़ाएंगे. पहले से ही सब्सिडी मौजूद है. संभव है कि किसानों को इनके बारे में जानकारी न हो. योगी जी ने कहा है कि हम इस पर बात करेंगे और देखेंगे कि क्या किया जा सकता है.”

वह जमीन जिसे किसान छोड़ना नहीं चाहते

बागपत में सूरज ढलते समय, एक आवारा डॉग गन्ने के दो खेतों के बीच बनी संकरी पगडंडी पर धीरे-धीरे चलता है. वह एक खेत से दूसरे खेत में चला जाता है और इस बात से बेखबर है कि अब खेतों के बीच लोहे की तार लगी हुई है, लेकिन देवेंद्र कुमार धामा के लिए उन तारों को नज़रअंदाज करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि इन्हीं तारों ने उनके कभी 95 बीघा के एक बड़े खेत को कई छोटे-छोटे खेतों में बांट दिया है.

पीढ़ी दर पीढ़ी जमीन के बंटवारे के बाद, अब इन खेतों के छोटे-छोटे हिस्से धीरे-धीरे काटकर बेचे जा रहे हैं. हर हफ्ते जमीन की रजिस्ट्री में एक और एंट्री होती है और कोई दूसरा किसान बैंक का कर्ज चुकाने, बच्चे की शादी करने या निजी कोचिंग की फीस देने के लिए एक-दो बीघा जमीन बेच देता है.

धामा के किसी भी बच्चे की जमीन पर खेती करने में दिलचस्पी नहीं है, लेकिन पुरानी पीढ़ी के लिए अपने खेतों को छोड़ना लगभग सोच से भी बाहर है.

देवेंद्र कुमार धामा का कभी 95 बीघा का खेत अब कई छोटे-छोटे खेतों में बदल गया है | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
देवेंद्र कुमार धामा का कभी 95 बीघा का खेत अब कई छोटे-छोटे खेतों में बदल गया है | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

धामा ने कहा, “जमीन कोई सामान नहीं है. यह हमारे पूर्वजों की धरोहर है. अगर आपके पास जमीन है, तो आपके पास इज्जत है. अगर आप बीमार पड़ जाएं या आपको पैसे उधार लेने हों, तो लोग आपको 50,000 रुपये दे देंगे, अगर उन्हें पता है कि आपके नाम पर दो बीघा जमीन है. लेकिन एक बार जमीन बेच दी, तो कोई आपको एक कप चाय भी नहीं देगा.”

कभी गन्ना ऐसी फसल हुआ करता था, जो किसान को गरीबी से बाहर निकाल सकती थी. आज वही किसान बेबस होकर इंतजार कर रहे हैं, जबकि वैज्ञानिक यूपी में रेड रॉट बीमारी के फैलने से पहले गन्ने की नई किस्में खोजने की जल्दी में हैं. इस दौड़ में किसान किनारे खड़ा होकर देख रहा है और उम्मीद कर रहा है कि वैज्ञानिक जीत जाएंगे.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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