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Saturday, 10 January, 2026
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नेटफ्लिक्स से ऑस्कर तक होमबाउंड का सफर, लेकिन देवरी गांव में आज भी अधूरा है इंसाफ और सुकून का सपना

पर्दे पर चंदन और शोएब को महत्वाकांक्षा और संभावनाएं दी गई हैं — सरकारी नौकरी की तैयारी करते युवा, सिपाही बनने के सपने देखते हुए. हालांकि, हकीकत थोड़ी अलग थी.

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बस्ती: दुख ने खेतिहर मज़दूर राम चरण (55) को कम बोलने वाला इंसान बना दिया है. वे आज भी पैरों के लगातार दर्द के बावजूद काम करते हैं, दवाइयां निगलते हैं और फिर भी आगे बढ़ते रहते हैं, लेकिन एक चीज़ ऐसी है जो सालों से बनाए गए उनके संयम को पल भर में तोड़ सकती है.

और वह उनके फोन में है. वह है होमबाउंड—एक फिल्म, जो उनके बेटे अमृत कुमार पर बनी है, लेकिन उन्होंने खुद को वह फिल्म देखने की इजाज़त नहीं दी.

उन्होंने कहा, “मैं इसे झेल नहीं पाऊंगा. इसलिए मैं इसके बारे में सोचने भी नहीं देता.” जबकि कुछ मीटर दूर उनका 14 साल का बेटा शिवम अपने Mi फोन पर डाउनलोड की हुई पायरेटेड फिल्म चला रहा था. राम चरण दूरी बनाए रहे—मुस्कान अब आधी से भी कम, आंखें भीगी हुईं, मानो सालों के संयम को बहा देने ही वाली हों.

जैसे-जैसे उनके बेटे की कहानी नेटफ्लिक्स पर हर घर की याद बनती जा रही है, राम चरण की ज़िंदगी उस पल में जमी हुई है, जब उन्हें अमृत की मौत की फोन कॉल मिली थी. सात सदस्यों वाला परिवार अब भी कोविड संकट के दौरान परिवार के कमाने वाले अमृत की मौत से उबर नहीं पाया है और उस आर्थिक व भावनात्मक खालीपन को समझने की कोशिश कर रहा है, जो वह पीछे छोड़ गया. एक मां, जो खुद को कभी आराम नहीं करने देती, लगातार घर के कामों में व्यस्त रहती है. एक पिता, जो यादों और भूलने के बोझ को ढोते हुए चलता है और पांच बच्चे—इतने छोटे कि भाई की अनुपस्थिति को पूरी तरह समझ नहीं पाते, लेकिन इतने बड़े कि महसूस कर सकें कि परिवार में कुछ ऐसा बदल गया है, जो अब कभी ठीक नहीं होगा.

शिवम, नेटफ्लिक्स की होमबाउंड में अपने भाई अमृत से प्रेरित किरदार चंदन को अपने पिता के फोन पर देखते हुए | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट
शिवम, नेटफ्लिक्स की होमबाउंड में अपने भाई अमृत से प्रेरित किरदार चंदन को अपने पिता के फोन पर देखते हुए | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट

उनके दो कमरों वाले ईंट के घर की दीवारें बिल्कुल खाली हैं. अमृत की एक भी तस्वीर कहीं टंगी नहीं है. दरवाज़े पर डॉ. बी.आर. आंबेडकर की एक छोटी सी तस्वीर लगी है, जो उस एकमात्र आस्था का संकेत है, जिसे सात लोगों के इस परिवार ने हमेशा जाना है.

जब सबसे छोटे बेटे ने फोन पर फिल्म का एक दृश्य चलाया—मां उठीं और कमरे से बाहर चली गईं. कमरे में बस लंबी, ठंडी आहों की आवाज़ बची रह गई.

दो दोस्तों की वायरल तस्वीर—जिसमें एक दोस्त दूसरे को अपनी गोद में पकड़े हुए है, उसने पत्रकार और लेखक बशारत पीर को एक लेख लिखने के लिए प्रेरित किया, जो आगे चलकर इस फिल्म के बनने का कारण बना.

होमबाउंड दो दोस्तों, चंदन और शोएब, पर केंद्रित है, जिनकी कहानी असल ज़िंदगी में अमृत और मोहम्मद सैयुब की लाइफ पर बेस्ड है.

24-साल के मोहम्मद सैयुब ने दिप्रिंट से फोन पर बातचीत में कहा, “जब मैंने आखिरकार फिल्म देखी, तो सब कुछ बहुत अच्छे से दिखाया गया था. वह सीन देखकर मैं बहुत भावुक हो गया, जहां चंदन ने आधी बेहोशी की हालत में शोएब को अपनी बाहों में पकड़ा हुआ है. मैं लगातार यही सोचता रहा—काश मैं अपने दोस्त को बचा पाता, काश मैंने थोड़ी और कोशिश की होती, लेकिन उसकी किस्मत में बचना नहीं था. आज भी उसकी यादें लौट आती हैं और उसकी फोटो देखकर मैं टूट जाता हूं.” फिल्म में शोएब का किरदार उन्हीं से प्रेरित है.

एक अलग हकीकत

उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के देवरी गांव में बहुत कम लोगों ने होमबाउंड देखी है. ज़्यादातर ग्रामीण बस इतना जानते हैं कि उनके गांव के दो परिवारों पर एक फिल्म बनी है. पिछले नवंबर में उन्हें बताया गया था कि गांव के चौराहे पर एक बड़े सफेद कपड़े पर फिल्म दिखाई जाएगी. यह वादा एक बार फिर टल गया है—अब मार्च 2026 तक.

कई लोग कहते हैं कि फिल्म अभी अधूरी है, या शायद रिलीज़ ही नहीं हुई है. यह जानना कि फिल्म ऑस्कर तक पहुंच गई है, भी ज़्यादा लोगों के ध्यान में नहीं आया—वे दूर की उपलब्धियां उन्हें अमूर्त लगती हैं, उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से कटी हुई. यहां तक कि गांव के सरपंच को भी फिल्म के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, जबकि नोएडा में काम करने वाले एक ग्रामीण ने रिलीज़ के दिन ही इसे डाउनलोड किया और गांव के कुछ लोगों के साथ साझा किया.

जिस ज़मीन में अमृत को दफनाया गया था, वह उसके घर से लगभग 400 मीटर दूर है और अब वहां ऊंची घास उग आई है | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट
जिस ज़मीन में अमृत को दफनाया गया था, वह उसके घर से लगभग 400 मीटर दूर है और अब वहां ऊंची घास उग आई है | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट

करीब 700 की आबादी वाला यह गांव, जिसमें ज़्यादातर हिंदू रहते हैं, ईंट और मिट्टी-फूस के घरों का मिला-जुला इलाका है. गलियों में बांस के झुरमुट और गन्ने के खेत दिखाई देते हैं. यहां किसान मुख्य रूप से धान, गेहूं, गन्ना और दालें उगाते हैं और गांव में बिजली हर घंटे तीन से चार बार कट जाती है.

ईशान खट्टर और अनन्या पांडे के क्लोज़अप विज्ञापन वाले पोस्टर गांव भर में लगे हैं—कुछ लोग इसे फिल्म की लोकप्रियता से फायदा उठाने की चतुर मार्केटिंग रणनीति कह सकते हैं, लेकिन यह कोशिश बेकार है, क्योंकि ज़्यादातर ग्रामीणों ने फिल्म देखी ही नहीं है.

गांव के एक निवासी ने कहा, “ये पोस्टर तो बस कुछ समय से लगे हुए हैं. इन्हें कुछ महीने पहले लगाया गया था.”

पर्दे पर चंदन और शोएब को महत्वाकांक्षा और संभावनाएं दी गई हैं—सरकारी नौकरियों की तैयारी करते युवा, सिपाही बनने का सपना देखते हुए और उस सीमित दुनिया से आगे की ज़िंदगी की कल्पना करते हुए, जिसमें वे पैदा हुए थे. फिल्म उम्मीद से भरी है और दर्शकों से कहती है कि ज़्यादा चाहना न तो अस्वाभाविक है और न ही गलत. हालांकि, हकीकत थोड़ी अलग थी.

अमृत और मोहम्मद सैयुब ने कभी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी नहीं की. दोनों ने आठवीं क्लास के बाद पढ़ाई छोड़ दी और सूरत की एक फैक्ट्री में कपड़ा और साड़ियां बनाने का काम करने लगे.

सैयुब, जो अब दुबई में निर्माण मज़दूर के रूप में काम कर रहा है, तीन साल से घर नहीं लौटा है. देवरी से हज़ारों किलोमीटर दूर, उसने तीन दोस्तों के साथ मिलकर यह फिल्म देखी.

सैयुब ने कहा, “अमृत और मैंने अपनी दोस्ती को अपनी पूरी ताकत से निभाया. अब वह चला गया है और हमारे ऊपर एक फिल्म बन गई है, लेकिन उसकी गैरमौजूदगी की तन्हाई कभी नहीं जाती. वह दर्द मेरे साथ रहता है, और हमेशा रहेगा.”

‘कुछ न कुछ हमेशा अधूरा लगता है’

सर्दी की एक सुबह की ठंड में, अमृत की मां सुभावती (40) हाथ से बने मिट्टी के चूल्हे के सामने बैठकर अपने बच्चों के लिए पराठे बना रही थीं. लड़कियों ने पराठों की फरमाइश की थी—उनकी सर्दियों की छुट्टियों का पहला दिन था. छोटे चूल्हे के पास जलावन की लकड़ियां रखी थीं. सबसे छोटा शिवम रोटी के साथ शिमला मिर्च और मटर की सब्ज़ी खा रहा था और बोला, “ज़बरदस्त बना है” जिससे उसकी मां के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई.

यह रसोई चार महीने पहले बनी छोटी झोपड़ी में नया जोड़ है, जिसकी फूस और बांस की छत सिर्फ एक हफ्ते पहले ही पूरी हुई थी, जो उनके घर के सामने है.

पहले रसोई घर के अंदर के एक कमरे में थी. अब वह खाली पड़ी है. बाकी कमरों में बस आटे का एक स्टील का ड्रम और एक गैस चूल्हा रखा है, जो लगभग कभी जलता नहीं.

सुभावती की रसोई | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट
सुभावती की रसोई | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट

पास के एक सरकारी स्कूल में पढ़मे वाली सुमन ने कहा, “हम सब्ज़ी उधार पर लेते हैं और जब पैसे होते हैं, तब भुगतान कर देते हैं. वे भविष्य में पुलिस अधिकारी बनना चाहती है, इससे मेरे माता-पिता को घर चलाने में मदद मिलेगी.”

उनकी मां अपना दुख लगातार काम में खुद को उलझाकर छुपाती रहती थीं—उपले बनाना, आंगन बुहारना और ऐसे घरेलू कामों में लगी रहना, जो कभी खत्म नहीं होते. 40 साल की उम्र में ही सुभावती उम्र से बड़ी दिखने लगी हैं, उनके पैर फटे और घिसे हुए हैं—एक ऐसी छवि, जिसे फिल्म ने बाद में उनकी पहचान का अहम हिस्सा बना दिया.

सुभावती ने कहा, “सब कुछ ठीक लगता है, फिर भी कुछ न कुछ हमेशा अधूरा सा लगता है.”

शिवम को छोटी-छोटी चीज़ों में खुशी मिल जाती है—दोस्तों के साथ रील बनाना. रील्स में वह भोजपुरी गानों पर चश्मा लगाए चलता है, कभी-कभी एक-दो डांस स्टेप भी करता है. फिर वह दौड़कर अपनी मां को दिखाता है, और जब वह उसे “हीरो” कहती हैं, तो वह खुशी से झूम उठता है.

राम चरण और सुभावती की आमदनी बेहद अस्थिर है. वे साल में सिर्फ दो से तीन महीने ही खेत मज़दूरी का काम कर पाते हैं. उनके पास एक गाय है, जिसका दूध परिवार के काम आता है. हालांकि, ज्यादातर दूध पड़ोसियों को बेच दिया जाता है.

राम चरण ने कहा, “2003 में सरकार ने हमें यह ज़मीन दी थी. यह बंजर थी और जिनके पास ज़मीन नहीं थी, उन्हें इसे संभालने के लिए दी गई थी. 10 साल बाद इसके कागज़ बनते हैं. अगर सब ठीक हो, तो ज़मीन स्थायी रूप से आपकी हो जाती है; नहीं तो कोई भी स्थानीय अधिकारी इसे ले सकता है. दो-चार साल पहले हमने स्थानीय बाबू से रजिस्ट्रेशन कराने को कहा, लेकिन उन्होंने इसके लिए 40 हज़ार रुपये की रिश्वत मांगी.”

अमृत के परिवार के पास एक गाय है. पहले उनके पास एक भैंस भी थी | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट
अमृत के परिवार के पास एक गाय है. पहले उनके पास एक भैंस भी थी | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट

उस छोटे से प्लॉट पर सरकार उन्हें 2,000 रुपये महीने की सहायता देती है, जिसे राम चरण ने परिवार के खर्चों के लिए एकमात्र नियमित आय बताया.

राम चरण सुबह 4 बजे उठते हैं, नहाते हैं, आंबेडकर की तस्वीर के सामने दिया जलाते हैं और 5 बजे तक बाहर निकल जाते हैं. उन्होंने कहा, “पैरों में चाहे जितना दर्द हो, मैं न सो पाता हूं, न चुपचाप बैठ सकता हूं. मैं हमेशा चलता रहता हूं.”

घर का खर्च चलाने के लिए, राम चरण ने पिछले साल नाबालिग शिवम को एक महीने के लिए सूरत भेजा था, ताकि वह अपनी बड़ी बहन और उसके ससुराल वालों के साथ रह सके. उन्हें उम्मीद थी कि वह गांव से बाहर की ज़िंदगी देखेगा और कुछ आर्थिक मदद कर पाएगा, लेकिन शिवम अपने दोस्तों के साथ गांव में ज़्यादा समय बिताना चाहता था और जल्दी ही लौट आया.

सुमन ने कहा, “भैया अब पढ़ाई नहीं करता. उसने आठवीं के बाद स्कूल छोड़ दिया. पापा उसे जनवरी में फिर भेजेंगे, ताकि वह काम कर सके और खर्चों में मदद कर सके.”

देवरी में ये पैटर्न आम हैं. ज़्यादातर लड़के आठवीं के बाद स्कूल छोड़कर देश भर में मज़दूरी के काम की तलाश में निकल जाते हैं. शिवम का पड़ोसी नोएडा में काम करता है, एक मुंबई में और एक सूरत में, जबकि कुछ लोग सिम कार्ड की दुकान जैसे छोटे कारोबार चलाने के लिए गांव में ही रह जाते हैं. वहीं लड़कियां घर पर ही रहती हैं, मां के साथ घरेलू कामों में हाथ बंटाती हैं, जब तक कि परिवार उनकी शादी की तैयारी शुरू नहीं कर देता.

विरोधाभास

सुभावती अपने मेहमानों का स्वागत स्टील के गिलास में पानी और गुड़ की एक छोटी कटोरी से करती हैं — उत्तर प्रदेश के गन्ना बेल्ट में सर्दियों में यह आम बात है. अमृत की मौत तक परिवार जो भी मिलता था, उसी में मेहनत करके गुज़ारा करता रहा, लेकिन उसकी मौत ने सब कुछ उलट-पुलट कर दिया.

अमृत के सबसे अच्छे दोस्त का घर इससे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है. यहां आने वाले मेहमानों का स्वागत बिस्कुट, नमकीन, ड्राई फ्रूट्स और मिठाइयों से भरी बड़ी थाली से किया जाता है और पानी लंबे, साफ कांच के गिलासों में परोसा जाता है जिन पर बारीक डिजाइन बने होते हैं. सैयूब हर महीने 15,000 से 20,000 रुपये घर भेजता है.

वे एक संयुक्त परिवार में रहते हैं. घर के उनके हिस्से में बिना रंगे तीन कमरे हैं, जबकि सैयूब के पिता, 60-वर्षीय मोहम्मद यूनुस, अपना ज़्यादातर समय बरामदे में रखे बिस्तर पर लेटे हुए बिताते हैं.

मोहम्मद सैयूब का घर | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट
मोहम्मद सैयूब का घर | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट

उनके तीन बेटे हैं, जिनमें से हर एक महीने में करीब 25,000 से 30,000 रुपये कमाता है — बस इतना कि परिवार किसी तरह चल सके, लेकिन खुद यूनुस लगभग चल-फिर नहीं पाते. गठिया की वजह से बिस्तर पर करवट बदलना भी दर्दनाक हो गया है और वे पूरी तरह अपनी पत्नी पर निर्भर हैं.

ठंड से बचने के लिए हाथ आग के पास करते हुए, जबकि धुआं उनके चेहरे के चारों ओर घूम रहा था, उन्होंने कहा, “मैं कई महीनों से आयुर्वेदिक दवाएं ले रहा हूं. डॉक्टर कहते हैं ऑपरेशन की ज़रूरत है, लेकिन हम इसका खर्च नहीं उठा सकते.”

सैयूब के बड़े भाई सुहैल ने सूरत में दोनों दोस्तों के साथ कुछ साल काम और ज़िंदगी गुज़ारी है — साथ खाना बनाना, साथ-साथ मजदूरी करना. अब वह गांव और आसपास के इलाकों में पेंटिंग के ठेके लेता है और बाइक से सफर करता है. इससे पहले वह मुंबई में पीओपी (प्लास्टर ऑफ पेरिस) का काम सीख रहा था, एक शहर से दूसरे शहर घूमते हुए प्रवासी मजदूर की तरह. आज भी उसका काम कभी-कभार ही मिलता है, नियमित नहीं.

सुहैल ने अब तक फिल्म नहीं देखी है. उसने कहा, “जब यह यूट्यूब पर आएगी, तब मैं पूरी फैमिली को दिखाऊंगा.”

एक ‘साधारण’ दोस्ती

अमृत को अपने फोन पर फिल्में देखना बहुत पसंद था, लेकिन सैयूब अक्सर उसे रोक देता था. उसे याद है कि कई बार वह अमृत को डांटता था, कहता था कि स्क्रीन देखने के बजाय हाथ के काम पर ध्यान दो.

सैयूब ने कहा, “अगर वह आज यहां होता और जानता कि उस पर फिल्म बनी है, तो वह बहुत खुश होताय.”

जब भी सैयूब गांव आता है, वह हमेशा अमृत के घर जाता है और अमृत की मां आज भी उसे “चुन्नू” कहकर बुलाती हैं.

होमबाउंड के निर्देशक नीरज घेवान ने फिल्म बनाते वक्त सैयूब से लंबी बातचीत की थी और “यह सुनिश्चित किया था कि दोनों परिवारों को उनकी संतुष्टि के अनुसार उदार मुआवजा दिया जाए.”

फिल्म में उनकी दोस्ती को साधारण दिखाया गया है, लेकिन एक सीन — गांव वालों के बीच क्रिकेट मैच में शोएब को हल्के-से अलग-थलग दिखाया गया है, जहां उसके धर्म की वजह से उसे यह महसूस कराया जाता है कि वह यहां का नहीं है: “अपने लोगों के साथ जाकर खेलो, यहां आने की ज़रूरत नहीं है.”

फिर भी फिल्म में उनकी दोस्ती कभी असाधारण नहीं लगती — ठीक वैसे ही, जैसे असल ज़िंदगी में हमेशा लगती थी.

सैयूब और अमृत की उम्र में सिर्फ चार साल का फर्क था और वे लगभग साथ-साथ ही बड़े हुए थे. अमृत, सैयूब से छह साल पहले सूरत चला गया था, लेकिन जब भी वह घर लौटता, दोनों पास की चाय की दुकान तक लंबी सैर पर जाते और घंटों बातें करते.

समय और दूरी के साथ ही सैयूब उस रिश्ते का मतलब पूरी तरह समझ पाया. उसने कहा, “सबसे पहले एक-दूसरे में इंसानियत देखो. धर्म या जाति बाद में आती है — इंसानियत पहले आती है. अगर हम ज़िंदगी का सामना साथ-साथ करें, तो सब कुछ आसान हो जाता है.”

शिवानी अपनी हिंदी की किताब से पढ़ाई करते हुए | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट
शिवानी अपनी हिंदी की किताब से पढ़ाई करते हुए | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट

अमृत के घर लौटकर, अतीत का कोई भी ज़िक्र उस चुप्पी को तोड़ देता है, जो अब परिवार उसकी मौत को लेकर बनाए रखता है. वे अब उसके बारे में बात नहीं करते. और जब करते हैं, तो सुभावती सह नहीं पातीं.

वह सामने के बरामदे में बैठी थीं, आंखें आंसुओं से भरी हुई. वह बार-बार अपनी साड़ी के पल्लू से उन्हें पोंछ रही थीं. उनके पास उनकी सबसे छोटी बेटी, शिवानी (9), अपनी हिंदी की स्कूल की किताब से जोर-जोर से पढ़ रही थी, “जब वो एक केकड़ा ऊपर आने की कोशिश करता.”

सुभावती ने धीमे से कहा, “जब मैं मर जाऊंगी, तभी मैं उसे भूल पाऊंगी. अगर मेरा बेटा आज जिंदा होता, तो वह अच्छी कमाई करता. वह मेरा बहुत अच्छा ख्याल रखता.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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