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Sunday, 4 January, 2026
होमफीचरकोलकाता का प्रिया सिनेमा भद्रलोक का गढ़ है. सत्यजीत रे से लेकर ‘धुरंधर’ तक, हर शो हाउसफुल

कोलकाता का प्रिया सिनेमा भद्रलोक का गढ़ है. सत्यजीत रे से लेकर ‘धुरंधर’ तक, हर शो हाउसफुल

बंगाल के 700 सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघर घटकर 130 रह गए हैं, लेकिन दक्षिण कोलकाता का प्रिया सिनेमा आज भी हाउसफुल दर्शक खींच रहा है. ‘हमने दशकों से खुद को मार्केट और पोजिशन किया है.’

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कोलकाता: रविवार की एक गर्म दोपहर साढ़े बारह बजे, दक्षिण कोलकाता के हरियाली और कैफे से सजे देशप्रिय पार्क में स्थित सिंगल-स्क्रीन प्रिया सिनेमा हॉल के बाहर फुटपाथ पर लंबी कतार लगी है. ‘धुरंधर’ के पोस्टर में गुस्सैल और रणवीर सिंह ऊपर से देखते नज़र आते हैं, लेकिन आंखों की ऊंचाई पर लगे बड़े बोर्ड पर हॉल की पहचान का एक और स्थायी निशान है—सत्यजीत रे की फिल्म अरण्येर दिन रात्रि में भोली-सी आंखों वाली शर्मिला टैगोर.

1959 से यहां खड़े इस सिनेमा हॉल के मिडिल-क्लास दर्शकों के लिए प्रिया ऐसा विकल्प है, जो आरामदायक भी है और खर्च के लिहाज़ से भी ठीक और उनकी सामाजिक संवेदनाओं को ठेस भी नहीं पहुंचाता. 4 किलोमीटर के दायरे में एक आईनॉक्स और मेनोका नाम का एक और यूनिप्लेक्स है, लेकिन भद्रलोक परिवारों, छिपकर मिलने वाले प्रेमियों और जादवपुर यूनिवर्सिटी के शोरगुल वाले छात्र समूहों के लिए पहली पसंद आज भी प्रिया ही है.

जादवपुर यूनिवर्सिटी के दिनों से लेकर पत्नी के साथ रोमांटिक डेट नाइट्स और अब पारिवारिक आउटिंग तक प्रिया आने वाले नियमित दर्शक अभिजीत भट्टाचार्य ने कहा, “मेनोका का दर्शक वर्ग निचले तबके से आता है. वहां बहुत सारे रिक्शावाले जाते हैं.”

भारत में बचे हुए कुछ गिने-चुने सफल सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों में से एक, प्रिया ने खुद को मिडिल-क्लास के गढ़ के तौर पर स्थापित कर लिया है. यह न तो जयपुर के राजमंदिर जैसा भव्य डेस्टिनेशन सिनेमा है और न ही इसने पुरानी दिल्ली के दरियागंज स्थित डिलाइट की तरह खुद को पूरी तरह बदलकर एक हाइब्रिड, बजट सिनेमा बना लिया है. इसके बजाय, यह बंगाल के लोगों के नॉस्टैल्जिया प्रेम, नियमित तकनीकी अपग्रेड और बांग्ला, हिंदी व अंग्रेज़ी फिल्मों के समझदारी भरे मिश्रण का फायदा उठाता है.

कोलकाता ऐसा शहर है जो अतीत में जीता है और नॉस्टैल्जिया लोगों को प्रिया में फिल्म देखने के लिए खींच लाता है, लेकिन हमें युवाओं पर भी ध्यान देना होगा. सिर्फ सिंगल-स्क्रीन का कॉन्सेप्ट होना काफी नहीं है, मल्टीप्लेक्स जैसी सुविधाएं भी देनी होंगी

— अग्निवेश दत्ता, निदेशक, प्रिया सिनेमा

फिर आता है दत्ता फैक्टर. इस सिनेमा को चलाने वाली पिता-पुत्र की जोड़ी कोलकाता के एलीट सर्कल्स में जानी-पहचानी है. 62 वर्षीय-अरिजीत दत्ता फिल्मों में कैमियो भी करते हैं, जबकि उनके बेटे अग्निवेश ने नेटफ्लिक्स प्रोजेक्ट्स पर काम किया है और कांस समेत कई रेड कार्पेट इवेंट्स में परिवार का प्रतिनिधित्व किया है. अपने सुनहरे दौर में परिवार की प्रोडक्शन कंपनी पूर्णिमा फिल्म्स, जिसका नाम अरिजीत की मां के नाम पर रखा गया, उसने सत्यजीत रे की गूपी ग्येन बाघा बायेन (1969) जैसी फिल्मों को भी सपोर्ट किया था.

अरण्येर दिन रात्रि के रिस्टोर्ड वर्जन की स्क्रीनिंग के लिए कांस 2025 में अग्निवेश दत्ता (सफेद टक्सीडो में). उन्होंने मूल प्रोडक्शन कंपनी पूर्णिमा फिल्म्स का प्रतिनिधित्व किया | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
अरण्येर दिन रात्रि के रिस्टोर्ड वर्जन की स्क्रीनिंग के लिए कांस 2025 में अग्निवेश दत्ता (सफेद टक्सीडो में). उन्होंने मूल प्रोडक्शन कंपनी पूर्णिमा फिल्म्स का प्रतिनिधित्व किया | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

लेकिन सत्यजीत रे से जुड़े रिश्तों और आर्टहाउस शुरुआत से भी ज़्यादा, मालिक अरिजीत दत्ता प्रिया की लंबी उम्र का श्रेय रणनीति और सही पोजिशनिंग के मेल को देते हैं. उनकी चमकदार लकड़ी की मेज़ पर फाइलों के ढेर हैं, जिनमें उनके दादा नेपाल चंद्र दत्ता द्वारा शुरू किए गए इस सिनेमा हॉल पर लिखे गए हर लेख की कटिंग रखी है.

दत्ता ने कहा, “हमने दशकों से खुद को मार्केट और पोजिशन किया है, मल्टीप्लेक्स आने से बहुत पहले. हमने अखबारों में लेख, टेलीविजन इंटरव्यू, फिल्म प्रीमियर, बातचीत और चर्चाओं जैसे कई पीआर एक्टिविटी कीं.”

द मावेरिक मालिक

कोलकाता के पार्टी सर्किट में अरिजीत दत्ता को ज़्यादातर लोग ‘डाडुल’ के नाम से जानते हैं. ऐसी ही एक पार्टी में फिल्ममेकर शूजित सिरकार ने उन्हें मद्रास कैफे (2013) में एक भूमिका की पेशकश की थी. इस फिल्म में उन्हें मल्लाया का किरदार मिला, जो एलटीटीई के गोपालस्वामी महेंद्रराजा पर आधारित था.

लेकिन पोनीटेल वाले सोशलाइट चेहरे के पीछे सिनेमा हॉल को बचाए रखने, फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन में उतरने और अपने बिज़नेस पोर्टफोलियो को बढ़ाने की दशकों की कड़ी मेहनत छिपी है.

दत्ता ने 1990 में कारोबार संभाला, जब यह कर्ज़ में डूबा हुआ था और खुद सिनेमा उद्योग संकट में था.

उन्होंने सिगरेट का कश लेते हुए याद किया, “यह वीसीआर, पाइरेसी और केबल टीवी का दौर था, जब रिलीज़ के एक-दो हफ्ते बाद ही नई फिल्में टीवी पर दिखा दी जाती थीं. हालात बेहद खराब थे.”

प्रिया सिनेमा के भीतर अपने दफ्तर में अरिजीत दत्ता. कोलकाता के पार्टी सर्किट में ‘डाडुल’ के नाम से मशहूर, वह मद्रास कैफे में मल्लाया के किरदार में बड़े पर्दे पर भी नज़र आए | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
प्रिया सिनेमा के भीतर अपने दफ्तर में अरिजीत दत्ता. कोलकाता के पार्टी सर्किट में ‘डाडुल’ के नाम से मशहूर, वह मद्रास कैफे में मल्लाया के किरदार में बड़े पर्दे पर भी नज़र आए | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

दत्ता फिल्मी माहौल में पले-बढ़े थे, लेकिन वे अलग सोच और तैयारी के साथ आए. बचपन में उन्हें हिंदी फिल्में देखने से रोका जाता था, क्योंकि उनमें कभी-कभी भद्दी सामग्री होती थी; बंगाली सिनेमा को सुरक्षित विकल्प माना जाता था. उन्होंने सेंट पॉल्स, दार्जिलिंग से स्कूली पढ़ाई की, जादवपुर यूनिवर्सिटी में पढ़े और 1986 में IISBWM से मैनेजमेंट की डिग्री पूरी की, लेकिन पिता आशीम की मौत के बाद जब कारोबार की बागडोर उनके हाथ आई, तो जल्द ही उन्होंने सख्त बिज़नेस समझ दिखा दी.

प्रिया में स्क्रीनिंग से आगे बढ़ते हुए कारोबार फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन, टूरिज़्म और पब्लिक–प्राइवेट पार्टनरशिप तक फैल गया. वक्त के साथ प्रिया सिनेमा को प्रिया एंटरटेनमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड (PEPL) में शामिल किया गया, जहां ज्यादा कॉर्पोरेट कार्य संस्कृति और विविध आय स्रोत बनाए गए. दत्ता के मैनेजिंग डायरेक्टर रहते हुए PEPL ने सोनी पिक्चर्स, पैरामाउंट और वॉल्ट डिज़्नी की फिल्मों का वितरण संभाला, साउंड सिस्टम को डॉल्बी एटमॉस में अपग्रेड किया और पश्चिम बंगाल व त्रिपुरा सरकारों के साथ मिलकर जर्जर सिनेमा हॉलों को फिर से जीवित किया.

आज के दौर में सिंगल-स्क्रीन सिर्फ जुनून की परियोजनाएं हो सकती हैं. अगर मैं इस इमारत को वर्किंग स्पेस के लिए किराए पर दे दूं, तो कम से कम 50 गुना ज्यादा कमा सकता हूं, लेकिन जब तक मैं हूं, प्रिया भी रहेगा

— अरिजीत दत्ता, मालिक, प्रिया सिनेमा

मल्टीप्लेक्स के दौर में भी प्रिया अपने समय से आगे था. यह पूर्वी भारत का पहला सिनेमा था, जहां इंटरनेट और कंप्यूटरीकृत टिकटिंग शुरू हुई. यहां ब्रांड टाई-अप किए गए, प्रीमियर पर खर्च किया गया और कभी-कभी नए फिल्मकारों पर दांव भी लगाया गया.

उनके बेटे अग्निवेश दत्ता ने कहा, “अन्य थिएटर शिबोप्रसाद मुखर्जी और नंदिता रॉय की इच्छे (2011) को लेकर आश्वस्त नहीं थे, लेकिन मेरे पिता ने फिल्म को कुछ शो देने का फैसला किया.” फिल्म हिट रही और बाद में मुखर्जी ने आभार स्वरूप थिएटर स्टाफ को घड़ियां भेंट कीं.

प्रिया सिनेमा में पुराना और नया साथ-साथ — धुरंधर का होर्डिंग और रिस्टोर्ड अरण्येर दिन रात्रि का पोस्टर | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
प्रिया सिनेमा में पुराना और नया साथ-साथ — धुरंधर का होर्डिंग और रिस्टोर्ड अरण्येर दिन रात्रि का पोस्टर | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

हालांकि, व्यावहारिक सोच के चलते दत्ता जानते थे कि सिर्फ सिनेमा पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. इसलिए उन्होंने टूरिज़्म में भी कदम रखा. उन्होंने पुरुलिया के खैराबेरा में ईको एडवेंचर रिज़ॉर्ट शुरू किया—एक ऐसा इलाका जो कभी माओवादी ठिकाने के रूप में चर्चा में था और 2018 में पत्नी ईशा दत्ता के साथ सिक्किम में टेमी बंगला भी खोला.

दत्ता ने कहा, “आज के दौर में सिंगल-स्क्रीन सिर्फ जुनून के प्रोजेक्ट हो सकते हैं. अगर मैं इमारत को कामकाजी स्पेस के लिए किराए पर दे दूं, तो 50 गुना ज्यादा कमा सकता हूं, लेकिन जब तक मैं हूं, प्रिया भी रहेगा.”

उन्होंने यह भी कहा कि अगर उन्हें अब “उसका खिंचाव” महसूस नहीं हुई, तो वे इमारत किराए पर दे सकते हैं, लेकिन अब बेटे के कारोबार में शामिल होने से वह दिन दूर लगता है. वह थिएटर के हर पहलू पर पैनी नज़र रखते हैं—उनकी मेज पर एक मॉनिटर लगा है, जिसमें थिएटर के अलग-अलग हिस्सों का सीसीटीवी फीड चलता रहता है.

प्रिया सिनेमा में हर शो का रिकॉर्ड रखने वाली हस्तलिखित रजिस्टर | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
प्रिया सिनेमा में हर शो का रिकॉर्ड रखने वाली हस्तलिखित रजिस्टर | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

हाल ही में एक शनिवार को वह सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट के छात्रों को इंटरव्यू दे चुके थे, जो हॉल पर एक डॉक्यूमेंट्री बना रहे हैं. हाल के दिनों में उन्होंने काम की रफ्तार धीमी कर दी है. उनका रूटीन कारोबार की समीक्षा, पास के जिम जाना और फिर दफ्तर में कुछ घंटे बिताने के बाद थिएटर के ऊपर स्थित पारिवारिक फ्लैट में लौटने का होता है.

उन्होंने कहा, “अब यहां एक अच्छी तरह चलने वाली व्यवस्था है. इसलिए मैं कम काम करना, पहाड़ों की ओर ज्यादा निकल जाना और आराम करना पसंद करता हूं.”

हालांकि, यह सुकून भरा दौर एक बेहद मुश्किल समय के बाद आया है.

एक आग और एक फीनिक्स

कभी बंगाल में करीब 700 सिंगल-स्क्रीन थिएटर हुआ करते थे, जो अब घटकर सिर्फ 130 रह गए हैं, जिनमें राज्य संचालित नंदन और राधा स्टूडियो भी शामिल हैं, जो आर्ट-हाउस और स्वतंत्र सिनेमा को बढ़ावा देते हैं. इस उदास परिदृश्य में प्रिया एक डार्क हॉर्स है. यह न सिर्फ व्यावसायिक रूप से टिकाऊ है, बल्कि उसने कम समय में दो बड़े झटके भी झेले.

5 अगस्त 2018 को प्रिया थिएटर के पास एक मोमो रेस्तरां की रसोई में आग लग गई. धुआं अरिजीत के दफ्तर तक पहुंच गया और दर्शकों को तुरंत बाहर निकाला गया. भले ही बड़ी दुर्घटना टल गई, लेकिन प्रिया का अस्तित्व सवालों में आ गया. बंगाल सरकार ने सिनेमा को फायर लाइसेंस नवीनीकरण का आदेश दिया और तब तक थिएटर बंद करना पड़ा.

छह महीने तक चली मरम्मत, कागज़ी कार्रवाई और फायर सेफ्टी सुधारों के बाद फरवरी 2019 में हॉल दोबारा खुला. सीटें 785 से घटाकर 543 कर दी गईं और खर्च करीब 45 लाख रुपये आया. तभी, जैसे ही हालात सुधरने लगे, कोविड आ गया.

प्रिया भद्रलोक परिवारों और जादवपुर यूनिवर्सिटी के छात्रों की पसंदीदा जगह है | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
प्रिया भद्रलोक परिवारों और जादवपुर यूनिवर्सिटी के छात्रों की पसंदीदा जगह है | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

पाबंदियां हटने के बाद प्रिया को जो सहारा मिला, वह इसकी किफायत, पुराने दर्शकों की वफादारी और पुष्पा: द राइज (2021), केजीएफ: चैप्टर 2 (2022) और द कश्मीर फाइल्स (2022) जैसी हिट फिल्मों की बदौलत था.

दिसंबर की एक दोपहर, मैनेजर धीरज यादव धुरंधर के लिए टिकट बुकिंग देखते हुए हर कुछ सेकंड में लैपटॉप स्क्रीन रिफ्रेश होते देख रहे थे.

उन्होंने संतोष भरी मुस्कान के साथ कहा, “अगले दो शो भी हाउसफुल हैं.”

कीमतें भी बड़ी भूमिका निभाती हैं. स्टॉल टिकट 105 रुपये से शुरू होकर रीक्लाइनर के लिए 345 रुपये तक जाते हैं. यह नज़दीकी मल्टीप्लेक्स से अब भी 200–300 रुपये सस्ता है.

यह फोटो खींचने के लिए भी एक शानदार जगह है. इनॉक्स में फोटो खींचने का कोई मतलब नहीं, लेकिन यहां बंगाली सिनेमा का इतिहास है

— मूवीगोअर अर्नब नील बसु

ऐसे समय में, जब सुप्रीम कोर्ट ने मल्टीप्लेक्स की महंगी खाने-पीने की दरों पर फटकार लगाई है, प्रिया 70 रुपये में मिल्क कॉफी और 180 रुपये में पैटी-बेवरेज कॉम्बो देता है. पॉपकॉर्न और अन्य स्नैक्स की कीमत 150 रुपये तक सीमित है.

अपने भाई-बहन के साथ फिल्म देखने आए संजय डे ने कहा, “मैं पास ही रहता हूं और यह हमारा कंफर्ट ज़ोन है. यह ऐसा है जैसे अपने ही बाड़ी में फिल्म देख रहे हों—बस स्क्रीन बड़ी है और आसपास लोग हैं.”

प्रिया सिनेमा की लॉबी बंगाली फिल्म इतिहास के एक छोटे संग्रहालय की तरह भी है | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
प्रिया सिनेमा की लॉबी बंगाली फिल्म इतिहास के एक छोटे संग्रहालय की तरह भी है | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

बंगाल सरकार ने भी सुलभ और किफायती सिनेमा हॉल की ज़रूरत को माना है. 18 दिसंबर को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बंगाल की मिनी-सिनेमा नीति की घोषणा की, जिसमें करीब 50 सीटों वाले छोटे, एयर-कंडीशंड ऑडिटोरियम और डिजिटल प्रोजेक्शन सिस्टम का प्रस्ताव है. उद्देश्य यह है कि पुराने हॉल बंद होने के बावजूद थिएटर में फिल्म देखने की संस्कृति बनी रहे. निजी खिलाड़ी भी इस खाली जगह को भर रहे हैं. पूर्वी भारत की सबसे बड़ी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी एसवीएफ ने बंगाल में 27 स्थानों पर 57 स्क्रीन खोली हैं—जैसे बोलपुर, मालदा और कल्याणी—ताकि उन इलाकों में सिनेमा लौट सके, जहां सिंगल-स्क्रीन बंद हो चुके हैं.

सीढ़ियों पर सजे विंटेज बंगला फिल्म पोस्टर | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
सीढ़ियों पर सजे विंटेज बंगला फिल्म पोस्टर | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

लेकिन प्रिया में विरासत और एक खास गंभीरता भी आकर्षण का हिस्सा है. लॉबी में अरिजीत दत्ता के पिता और दादा की तस्वीरें लगी हैं, साथ ही पूर्णिमा फिल्म्स के बैनर तले बनी फिल्मों के पोस्टर और पुराने शो की झलकियां भी. प्रवेश द्वार के पास एक विंटेज कार और पियानो भी सजे हैं.

मूवीगोअर अर्नब नील बसु ने पॉपकॉर्न का डिब्बा संभालते हुए कहा, “यह फोटो खींचने के लिए शानदार जगह है. इनॉक्स में फोटो खींचने का कोई मतलब नहीं, लेकिन यहां बंगाली सिनेमा का इतिहास है.”

सत्यजीत रे का कनेक्शन

1960 के दशक में, जब दूसरे निर्माता सत्यजीत रे की फैंटेसी एडवेंचर फिल्म गूपी ग्येन बाघा ब्येन से जुड़ने में हिचकिचा रहे थे, तब अरिजीत की मां पूर्णिमा ने फिल्म का संगीत सुना और अपने पति आशीम तथा ससुर नेपाल चंद्र दत्ता को यह जोखिम उठाने के लिए राज़ी किया.

यह दांव सफल रहा. फिल्म 51 हफ्तों तक चली और उनके बैनर पूर्णिमा फिल्म्स को नेशनल अवॉर्ड का हैट्रिक मिला. इससे पहले भी इस बैनर को तपन सिन्हा की हाते बाज़ारे (1967), जिसमें अशोक कुमार और वैजयंतीमाला थे, और अरुंधति देवी की छुट्टी (1967) जैसी फिल्मों से सफलता मिल चुकी थी. इन फिल्मों ने एडिलेड, ऑकलैंड और टोक्यो जैसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में पुरस्कार जीते और बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बियर की दौड़ में भी शामिल रहीं.

नेपाल चंद्र दत्ता और आशीम दत्ता, जो अरिजीत के दादा और पिता थे, सत्यजीत रे के शुरुआती समर्थकों में शामिल थे | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
नेपाल चंद्र दत्ता और आशीम दत्ता, जो अरिजीत के दादा और पिता थे, सत्यजीत रे के शुरुआती समर्थकों में शामिल थे | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

नेपाल और उनके पिता आशीम, रे की क्लासिक फिल्म अरण्येर दिन रात्रि के भी निर्माता थे, जिसे हाल ही में फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन ने रिस्टोर किया है. परिवार के सत्यजीत रे के साथ करीबी निजी रिश्ते भी थे.

अरिजीत ने बताया, “1970 के दशक में नक्सल आंदोलन के चरम पर, आशानी संकेत के लिए सत्यजीत रे को मिला गोल्डन बियर स्टैच्यू मेरी दादी के बिस्तर के नीचे छिपाकर रखा गया था.”

नई तकनीक अपनाने के बावजूद, अरिजीत अतीत को पूरे सम्मान के साथ संभालते हैं. दूसरी मंज़िल पर प्रिया सिनेमा का सबसे पुराना प्रोजेक्टर एक पवित्र धरोहर की तरह सजाकर रखा गया है, लेकिन असली जीवित इतिहास हैं प्रोजेक्शनिस्ट चंद कुमार मंडल. अनुरोध करने पर वह आज भी दर्शकों को दिखाते हैं कि पहले फिल्म रीलें मशीन में कैसे डाली जाती थीं.

अनुभवी प्रोजेक्शनिस्ट चंद कुमार मंडल पुराने प्रोजेक्टर का काम समझाते हुए | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
अनुभवी प्रोजेक्शनिस्ट चंद कुमार मंडल पुराने प्रोजेक्टर का काम समझाते हुए | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

पिछले साल, मंडल को सिनेमा प्रोजेक्शन के लिए फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया गया. यह पुरस्कार निर्देशक ज्यूसेप्पे टॉर्नाटोरे—जिनकी फिल्म सिनेमा पैराडीसो एक प्रोजेक्शनिस्ट पर आधारित है—ने 27 सितंबर 2024 को मुंबई के रीगल सिनेमा हॉल में आयोजित समारोह में दिया.

उनका सर्टिफिकेट अब प्रिया के कॉन्फ्रेंस रूम में टंगा है, जहां दीवारों पर लोकेशन पर शूट करते हुए रे की ब्लैक-एंड-व्हाइट तस्वीरें भी लगी हैं.

प्रोजेक्शन रूम के भीतर आज भी एक पुराना प्रोजेक्टर रखा हुआ है. मंडल ने 1991 की उस रात को याद किया, जब शो के बीच यह लगभग फेल हो गया था.

धुरंधर में रणवीर सिंह की तस्वीरें अब लॉबी में छाई हैं. पहले प्रिया को ‘एसआरके हॉल’ कहा जाता था, जबकि नवीन सिनेमा सलमान खान से जुड़ा माना जाता था | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
धुरंधर में रणवीर सिंह की तस्वीरें अब लॉबी में छाई हैं. पहले प्रिया को ‘एसआरके हॉल’ कहा जाता था, जबकि नवीन सिनेमा सलमान खान से जुड़ा माना जाता था | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

उन्होंने याद किया, “यह नया प्रोजेक्टर था और हमारे थिएटर में संजय दत्त–माधुरी दीक्षित की फिल्म साजन चल रही थी. एक समय प्रोजेक्टर अटक गया और कंपनी के इंजीनियर भी इसे ठीक नहीं कर पाए. मैंने गहरी सांस ली, ऊपर जाकर सिगरेट पी और फिर एक दूसरे कर्मचारी की मदद से इसे दोबारा चालू कर दिया.”

आज 40 और 50 की उम्र के कई बंगालियों के लिए, प्रिया को शाहरुख खान का हॉल माना जाता था, जबकि एक और सिंगल स्क्रीन नवीन (जो अब भी चल रहा है) सलमान खान की फिल्मों से जुड़ा था.

पिछले चार दशकों से यहां कतारें संभालने और छोटे-मोटे काम करने वाले स्वपन सात्रा ने बताया, “जब दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे चल रही थी, तो टिकट काउंटर पूरी रात खुला रहता था. शाहरुख से पहले, महिलाएं जितेंद्र की तोहफा और हिम्मतवाला जैसी फिल्मों को लेकर दीवानी थीं. हॉल हमेशा खचाखच भरा रहता था, गेट तक भीड़ उमड़ आती थी.”

प्रिया में सत्यजीत रे के लोकेशन पर शूट की तस्वीरों का बड़ा संग्रह है | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
प्रिया में सत्यजीत रे के लोकेशन पर शूट की तस्वीरों का बड़ा संग्रह है | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

बेटे की वापसी

उत्तराधिकारी अग्निवेश दत्ता ने कोलकाता और मुंबई के बीच एक टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता तय किया, फिर प्रिय के डायरेक्टर के तौर पर मौजूदा भूमिका में आए. एक चीज़ हमेशा समान रही, फिल्मों से उनका प्यार, चाहे वह चुपके से थिएटर में जाकर फिल्में देखना हो या खुद फिल्म बनाना.

33-वर्षीय अग्निवेश, जिनके पास लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी से फिल्म और मार्केटिंग की डिग्री है, याद करते हैं कि वह हॉल में दिखाई जाने वाली हर फिल्म देखने नीचे फिसल जाते थे.

उन्होंने कहा, “मैंने बंगाली फिल्म बॉम्बाइयर बॉम्बेटे (2003) लगातार 14 दिन देखी. दिल चाहता है हाउसफुल चल रही थी, तो मुझे सीट नहीं मिली, लेकिन मैं उसका गाना कोई कहे देखने ज़रूर जाता था.”

फिल्ममेकिंग में हाथ आज़माने के लिए अग्निवेश ने निर्देशक सुजॉय घोष के साथ कहानी 2 (2016) में असिस्टेंट के तौर पर शुरुआत की, फिर फैमिली बिज़नेस में एक्ज़ीक्यूटिव बने, लेकिन यह पहला दौर आसान नहीं था.

प्रिया सिनेमा की लॉबी में अग्निवेश दत्ता | फोटो: विशेष व्यवस्था
प्रिया सिनेमा की लॉबी में अग्निवेश दत्ता | फोटो: विशेष व्यवस्था

उन्होंने कहा, “मैंने हर विभाग में समय बिताया, बिज़नेस और हॉल के रोज़मर्रा के कामकाज को समझा, लेकिन मेरे पापा थिएटर के कामकाज को लेकर काफ़ी अड़े रहते हैं और तब मैं भी काफी युवा और अपरिपक्व था. इसलिए समय लगा.”

इसके बाद वह फिर मुंबई चले गए और घोष के साथ नेटफ्लिक्स फिल्म जाने जान तथा एंथोलॉजी लस्ट स्टोरीज़ 2 के उनके हिस्से में काम किया, लेकिन प्रिया का आकर्षण बहुत ज़्यादा था और 2023 में वह डायरेक्टर के रूप में कंपनी में लौट आए.

अग्निवेश के पास भविष्य के लिए एक साहसी नई सोच है, जो उनके पिता द्वारा पिछले तीन दशकों में बनाई गई मज़बूत नींव पर टिकी है.

अग्निवेश ने कहा, “कोलकाता एक ऐसा शहर है जो अतीत में जीता है और नॉस्टैल्जिया लोगों को प्रिय में फिल्म देखने खींच लाता है. लेकिन हमें युवाओं पर ध्यान देना होगा. सिर्फ सिंगल स्क्रीन का कॉन्सेप्ट होना काफी नहीं है, हमें मल्टीप्लेक्स जैसी सुविधाएं भी देनी होंगी. यही मेरा अंतिम लक्ष्य है.”

युवाओं, खासकर छात्रों और हॉस्टल में रहने वालों को आकर्षित करने के लिए मैगी, नाचोज़ और चिकन पॉपकॉर्न जैसे आइटम्स वाला नया मेन्यू शुरू करना भी उनकी ही पहल थी. वह अपने दादा-दादी के प्रोडक्शन बैनर को फिर से शुरू करने और नई बंगाली फिल्मों को इसमें जोड़ने की योजना भी बना रहे हैं.

लेकिन अपने पिता की तरह, वह भी अतीत की ताक़त को समझते हैं.

उन्होंने कहा, “हमारी सबसे बड़ी ताक़त यह है कि प्रिय का इतिहास बहुत समृद्ध और परतदार है, और आज के युवा विंटेज और रेट्रो चीज़ों में काफी दिलचस्पी लेते हैं. वे आते हैं और विंटेज कार या पियानो के सामने तस्वीरें खिंचवाते हैं.”

(यह भारत में सिंगल-स्क्रीन थिएटरों पर तीन हिस्सों की सीरीज़ की दूसरी रिपोर्ट है. पहली और दूसरी रिपोर्ट यहां पढ़ें.)

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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