बेंगलुरु: स्नेहिल आठ साल की उम्र से बेंगलुरु में रह रही हैं. उन्होंने स्कूल में अनिवार्य कन्नड़ लिखना सीखा था और खुद को बेंगलुरुवासी कहती हैं. फिर भी, इस साल ही, पढ़ाई से ब्रेक लेने और नए साल के एक पुराने संकल्प को फिर से याद करने के बाद, 23 साल की स्नेहिल आखिरकार उस भाषा को बोलना सीखने के लिए क्लासरूम पहुंचीं, जिसे वह अपनी ज़िंदगी के ज्यादातर समय से अपने आसपास सुनती आई थीं.
उन्हें रोज़मर्रा की ज़िंदगी चलाने के लिए कन्नड़ की ज़रूरत नहीं थी. उनके दोस्त अंग्रेज़ी बोलते हैं और कॉलेज और काम के दौरान भी ज्यादातर लोग अंग्रेज़ी ही बोलते थे, लेकिन जमशेदपुर की रहने वाली स्नेहिल को BMTC की बस में मिली एक बुजुर्ग महिला याद हैं, जो उनसे बात करना चाहती थीं, लेकिन सिर्फ कन्नड़ बोलती थीं. स्नेहिल को इतनी कन्नड़ आती थी कि वह बातचीत को आगे बढ़ा सकें.
उन्होंने कहा, “वह छोटी-सी बातचीत भी मुझे बहुत खुश कर गई.”
स्नेहिल उन बेंगलुरु निवासियों की बढ़ती संख्या का हिस्सा हैं, जो कर्नाटक से बाहर के हैं और कन्नड़ सीखना चुन रहे हैं. भाषा को लेकर गर्व बढ़ रहा है, साथ ही बाहर से शहर में काम करने आने वाले उन प्रवासी कामगारों के प्रति असहिष्णुता और गुस्सा भी बढ़ रहा है, जो कन्नड़ सीखने की कोशिश नहीं करते. कन्नड़ टीचर्स का कहना है कि उनकी क्लास में डॉक्टर, वकील, मनोवैज्ञानिक, पत्रकार, स्टार्टअप फाउंडर्स, आईटी प्रोफेशनल, माताएं और रिटायर्ड लोग आते हैं. इनमें से कई लोग सालों से शहर में रह रहे हैं, लेकिन उन्हें अपनी नौकरी या सामाजिक जीवन में कन्नड़ की जरूरत नहीं पड़ी. इंस्टाग्राम और दूसरे प्लेटफॉर्म ने भी कन्नड़ सीखने का एक अलग ऑनलाइन माहौल बनाया है.
कन्नड़ को लेकर पिछले कई सालों में कई राजनीतिक आंदोलन हुए हैं. इनमें 1980 के दशक की शुरुआत का गोकाक आंदोलन भी शामिल है, जब लेखकों, छात्रों और कन्नड़ संगठनों ने स्कूलों में भाषा की बड़ी भूमिका की मांग की थी. बेंगलुरु को भारत की Silicon Valley कहा जाने लगा और 1990 और 2000 के दशक के आईटी बूम के बाद तेज़ी से बढ़ते शहर में करोड़ों प्रवासी आने लगे. इसके बाद स्थानीय भाषा को लेकर चिंता और बढ़ गई.
2011 की जनगणना के एक विश्लेषण में पाया गया कि शहर में 107 भाषाएं बोली जाती हैं, जिससे यह भारत के सबसे ज्यादा भाषाई विविधता वाले शहरी केंद्रों में से एक बन गया. कन्नड़ करीब 44.5 प्रतिशत आबादी की भाषा थी. इसके बाद तमिल, तेलुगु, उर्दू, हिंदी और कई दूसरी भाषाएं थीं.

इसके बाद सोशल मीडिया आया, जहां कन्नड़ बोलने वालों और प्रवासियों या हिंदी बोलने वालों के बीच रोजमर्रा की बातचीत बार-बार भाषा से जुड़े वायरल विवादों में बदलने लगी. सार्वजनिक जगहों पर हिंदी के इस्तेमाल को लेकर बहस और ऑटो और कैब ड्राइवरों से कन्नड़ जानने की मांग ने भी इस सवाल को जिंदा रखा कि शहर में किसे कौन-सी भाषा बोलनी चाहिए. जब भी ऐसा कोई विवाद बढ़ता है, Reddit और एक्स पर “अगर बेंगलुरु में रहना है तो कन्नड़ बोलना सीखो” जैसी बातें कही जाने लगती हैं.
कन्नड़ सीखने वालों की वजह अक्सर इतनी टकराव वाली नहीं होती. कुछ लोग पड़ोसियों से छोटी-मोटी बातचीत करना चाहते हैं, घरेलू काम करने वालों को बेहतर तरीके से निर्देश देना चाहते हैं, दुकानदारों से बेहतर मोलभाव करना चाहते हैं या मरीजों को उनकी बीमारी के बारे में बेहतर तरीके से समझाना चाहते हैं. कुछ लोग शहर को बेहतर समझना चाहते हैं, अंग्रेज़ी बोलने वाली कॉरपोरेट दुनिया से बाहर काम करना चाहते हैं या बस ऐसी जगह पर खुद को बाहरी व्यक्ति जैसा महसूस करना बंद करना चाहते हैं, जिसे वे सालों से अपना घर कहते आए हैं.
लेकिन सोशल मीडिया पर होने वाले इन झगड़ों ने सभी सीखने वालों के लिए यह साफ कर दिया है कि कन्नड़ सीखने की बात कितनी अहम हो गई है. कई लोगों का कहना है कि कन्नड़ जानना खुद को सुरक्षित रखने का एक तरीका भी है—इससे वे दुकानदारों के ज्यादा पैसे लेने या भाषा न बोल पाने की वजह से उनके साथ गलत व्यवहार किए जाने से बच सकते हैं.
स्नेहिल के लिए इसका फायदा पहले से दिखने लगा है. वह कन्नड़ बोलने वाले दोस्तों की बातचीत का कुछ हिस्सा समझ सकती हैं, कन्नड़ फिल्में देख सकती हैं और कन्नड़ रील्स में छिपे मजाक और भाव समझ सकती हैं.
उन्होंने कहा, “यह आपको एक पूरी नई दुनिया से जोड़ता है, जो बहुत खूबसूरत और बहुत समृद्ध है.”

जुड़ने के लिए सीखना
Nile School of Languages and Education में स्नेहिल हफ्ते के एक दिन होने वाली कन्नड़ क्लास में तीन और छात्रों के साथ बैठी हैं. उनकी शिक्षिका श्वेता भट मल्ली नाम की बच्चों की एक पतली किताब से जोर से पढ़ती हैं, जबकि छात्र—मास्टर्स की तैयारी कर रही एक कंटेंट क्रिएटर, टेक सेक्टर में काम करने वाली एक मिड-करियर प्रोफेशनल, एक कारोबारी और घर संभालने वाली एक महिला—अपनी उंगलियों से शब्दों को देखते हुए पढ़ते हैं.
वे भारत के अलग-अलग हिस्सों से आए हैं और कन्नड़ सीखने की उनकी वजहें भी अलग-अलग हैं.
40 साल की अपूर्वा 2012 में उत्तर प्रदेश से बेंगलुरु आई थीं. उनके लिए इसकी वजह लोगों से जुड़ना है. उन्होंने शहर में कंसल्टेंसी के काम से अपना करियर शुरू किया और बाद में शादी की और उनका एक बेटा हुआ. एक दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद उन्हें लगा कि अब भाषा सीखने का समय आ गया है.
उन्होंने कहा, “मुझे लग रहा था कि मैं दूसरों से थोड़ी दूर हूं. मैं लोगों से जुड़ नहीं पा रही थी.”
अब वह पड़ोसियों, सिक्योरिटी गार्ड और डिलीवरी एजेंट से होने वाली बातचीत समझ सकती हैं.
उन्हें हाल ही में अपनी एक कन्नड़ दोस्त के घर जाना याद है, जहां उनकी दोस्त की मां खाना परोस रही थीं. जब उन्हें बताया गया कि अपूर्वा कन्नड़ सीख रही हैं, तो वह महिला बहुत खुश हो गईं और उन्होंने अपूर्वा को ज्यादा खाना परोसा.
अपूर्वा ने कहा, “उन्हें बहुत खुशी होती है. उन्हें जुड़ाव महसूस होता है.”
पश्चिम बंगाल की रहने वाली सुपर्णा पांच साल से बेंगलुरु में रह रही हैं. उनके लिए वजह ज्यादा तुरंत थी. वह सब्जी बेचने वालों, ऑटो ड्राइवरों और दुकानदारों के हाथों ठगी से बचना चाहती थीं.

उन्होंने कहा, “जब मैं कुछ खरीदने जाती हूं, तो वे कन्नड़ में बात करते हैं और मुझे कुछ भी समझ नहीं आता. वे हमेशा मुझसे ज्यादा पैसे लेते हैं और मैं भाषा की वजह से बहस नहीं कर पाती.”
सुपर्णा अब Nile में कन्नड़ और अंग्रेजी दोनों सीख रही हैं, ताकि वह अपने बेटे की स्कूल की पढ़ाई में मदद कर सकें और शहर में बेहतर तरीके से काम कर सकें.
कई छात्र शुरुआत में कहते हैं कि उन्हें “कन्नड़ बिल्कुल नहीं आती”, लेकिन जब भट उन्हें eshtu यानी “कितना” जैसे कुछ आम शब्द बताती हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि उन्होंने जितना सोचा था, उससे ज्यादा भाषा सीख ली है.
जो लोग पहले से कोई भारतीय भाषा बोलते हैं, उनके लिए कन्नड़ सीखने की शुरुआत कुछ जानी-पहचानी चीजों से भी हो सकती है. भट कहती हैं कि दक्षिण भारतीय भाषाएं बोलने वाले लोग अक्सर कुछ शब्दों और वाक्यों की बनावट को पहचान लेते हैं, जबकि हिंदी बोलने वाले संस्कृत से आए कुछ शब्दों को पहचान सकते हैं.
इसके बाद अगला कदम उन्हें भाषा इस्तेमाल करने के लिए तैयार करना है.
इसीलिए भट की क्लास में शहर के लोगों के साथ रोजमर्रा की बातचीत की भूमिका निभाने की प्रैक्टिस कराई जाती है: सब्जी वाले से सामान मांगना, दुकानदार से बात करना या ऑटो ड्राइवर को रास्ता बताना.
उन्होंने कहा, “कन्नड़ गलत हो या सही, इससे फर्क नहीं पड़ता. अगर आप कन्नड़ में बोलते हैं, अगर बोलना शुरू करते हैं, सही हो या गलत, लोग आपको पसंद करेंगे.”

कामचलाऊ कन्नड़ से प्रोफेशन ग्रेजुएट्स तक
बन्नेरघट्टा में Spoken Kannada Made Easy चलाने वाली सौम्या एस. ने 2010 में अनौपचारिक तरीके से कन्नड़ पढ़ाना शुरू किया था. वह उन पड़ोसियों, बच्चों और बुजुर्गों की मदद करती थीं, जो भाषा की बुनियादी बातें सीखना चाहते थे.
शुरुआती वर्षों में उनके छात्र ज्यादातर कन्नड़ की बुनियादी बातें सीखना चाहते थे: घरेलू काम करने वालों, सिक्योरिटी गार्ड, ऑटो ड्राइवर और दुकानदारों से बात करने के लिए शब्द और वाक्य.
इसके बाद इसमें बदलाव आया. 2014 तक लोगों के एक-दूसरे को बताने से उनके पास ज्यादा छात्र आने लगे और उन्होंने ग्रुप क्लास शुरू कर दीं.
अब उनके छात्रों में मेडिकल छात्र, डॉक्टर, वकील, मनोवैज्ञानिक, पत्रकार, आईटी प्रोफेशनल, स्टार्टअप फाउंडर्स और बुजुर्ग शामिल हैं. कुछ छात्र तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से आते हैं. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा और अमेरिका के छात्रों को भी पढ़ाया है. उनके सभी छात्र ज्यादातर 18 से 45 साल की उम्र के हैं.
सौम्या ने कहा, “एक वजह जागरूकता है. और दूसरी वजह यह है कि अब बहुत सारे मौके खुल रहे हैं. 2000 के दशक में सिर्फ आईटी था. अब लोग जानते हैं कि जब आपको भाषा आती है, तो आपके पास कई दूसरे विकल्प भी होते हैं, जिन्हें आप तलाश सकते हैं.”
उनके मुताबिक, ये मौके टेक्नोलॉजी से आगे काउंसलिंग, पत्रकारिता, डिजिटल मार्केटिंग, सोशल मीडिया, कला और संगीत तक फैले हैं.

उन्होंने कहा, “इन सभी के लिए आपको स्थानीय भाषा की जरूरत होती है.”
इसी वजह से उनके कोर्स अब ज्यादा व्यावहारिक हो गए हैं. एक डॉक्टर को इंग्लिश न बोलने वाले मरीजों से बात करने के लिए कन्नड़ की ज़रूरत होती है; एक काउंसलर को क्लाइंट्स से बात करने के लिए और एक पत्रकार को ग्राउंड से रिपोर्ट करने के लिए.
उन्होंने कहा, “मैं सिर्फ उस व्यावहारिक कन्नड़ पर ध्यान देती हूं, जो भाषा बोलने के लिए सच में जरूरी है.”
यह बदलाव सिर्फ बेंगलुरु तक सीमित नहीं है. सौम्या का कहना है कि कुछ ऐसे उम्रदराज प्रोफेशनल, जो सालों से शहर या विदेश में रह रहे हैं, अब मैसूरु, मांड्या और छोटे कस्बों और गांवों में घर खरीद रहे हैं या बस रहे हैं. वहां अंग्रेजी और हिंदी का सहारा कम लिया जा सकता है.
उनकी क्लास की फीस 450 रुपये प्रति घंटा है. शुरुआती और इंटरमीडिएट ग्रुप क्लास दो महीने चलती हैं, जबकि एडवांस्ड वन-ऑन-वन कोर्स छात्र की जरूरत के हिसाब से तैयार किए जाते हैं और एक महीने से छह महीने तक चल सकते हैं.

रील्स पर कन्नड़
दूसरा बड़ा बदलाव फोन पर हुआ है.
सौम्या ने इंस्टाग्राम और दूसरे प्लेटफॉर्म पर कन्नड़ सिखाने वाले शिक्षकों का एक अलग ऑनलाइन माहौल बनते देखा है. यहां हज़ारों वीडियो में शब्दावली, वाक्य और रोज़मर्रा में इस्तेमाल होने वाले शब्द और वाक्यांश सिखाए जाते हैं.
जो महिलाएं पूरा समय घर संभालती हैं और दूसरे लोग, जो बेंगलुरु के ट्रैफिक और जाम की वजह से आसानी से क्लास तक नहीं जा सकते, उनके लिए ये वीडियो घर से सीखने का एक तरीका हैं. कुछ लोगों के लिए क्लास लोगों से मिलने और अकेलापन कम करने का एक तरीका भी बन गई हैं.
लेकिन ऑनलाइन सीखने की एक समस्या भी है: बहुत ज्यादा विकल्प.
उन्होंने कहा, “आपको पता नहीं होता कि क्या सीखना है, कैसे सीखना है और आपको किसी चीज के लिए जवाबदेह भी नहीं होना पड़ता. फिर हम अपनी पढ़ाई टालते रहते हैं.”
कुछ छात्र जो इंस्टाग्राम या यूट्यूब से शुरुआत करते हैं, बाद में व्यवस्थित क्लास में आ जाते हैं.
एआई के ट्रांसलेशन टूल्स के साथ भी ऐसा ही है. छात्र सौम्या को बताते हैं कि वे कन्नड़ सीखने के बजाय अलग-अलग वाक्यों का अनुवाद करने के लिए चैटजीपीटी या जेमिनाई का इस्तेमाल करते हैं.
उन्होंने कहा, “अनुवाद किसी तुरंत आने वाली समस्या को हल कर सकता है, लेकिन वह आपको भाषा की लय, संदर्भ और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले शब्दों और वाक्यों का इस्तेमाल नहीं सिखा सकता.”

चलते-फिरते कन्नड़
बेंगलुरु में कन्नड़ सीखने के बढ़ते माहौल में एक विरोधाभास है: भाषा में ज्यादा लोगों की दिलचस्पी हो सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि पारंपरिक क्लासरूम में छात्रों की संख्या भी बढ़ रही हो.
भट, जो करीब एक दशक से Nile institute में अंग्रेजी और कन्नड़ पढ़ा रही हैं, कहती हैं कि क्लास में आने वाले छात्रों की संख्या काफी कम हुई है.
उन्होंने कहा, “पहले हमारे जितने छात्र हुआ करते थे, उनकी संख्या बहुत कम हो गई है.”
यूट्यूब समेत ऑनलाइन संसाधन इसकी एक वजह हो सकते हैं. उनके मुताबिक, दूसरी वजह खुद बेंगलुरु है.
उन्होंने कहा, “आपको जो भी भाषा आती है, उससे आप काम चला सकते हैं. इसलिए यहां आपको वास्तव में कन्नड़ जानने की जरूरत नहीं है.”
10 शिक्षकों की टीम के साथ KannadaClass.com चलाने वाली उमा ने कोविड के बाद पूरी तरह ऑनलाइन पढ़ाना शुरू कर दिया. अब उनकी क्लास बेंगलुरु के बाहर और भारत के बाहर रहने वाले छात्रों तक भी पहुंचती हैं. वहीं, वन-ऑन-वन क्लास कामकाजी लोगों को अपने समय के हिसाब से कन्नड़ सीखने की सुविधा देती हैं.
कुछ लोग इसलिए सीख रहे हैं क्योंकि कन्नड़ उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा है; वहीं कुछ ऐसे बड़े लोग हैं, जो कर्नाटक में पले-बढ़े हैं लेकिन घर पर कन्नड़ नहीं बोलते थे.
माता-पिता को उमा की बार-बार दी जाने वाली सलाह में से एक यह है कि सिर्फ क्लास करने से बच्चा भाषा में माहिर नहीं हो सकता. खुलकर बोलने में झिझक अब भी एक समस्या है.
उमा ने कहा, “भाषा तब आती है जब आप मुंह खोलकर बोलते हैं, तभी वह आएगी.”
लेकिन बड़े लोगों के लिए मुख्य मुश्किल अक्सर क्लास के बाद अभ्यास करने का समय निकालना होती है.

पहले कुछ शब्दों के बाद
63 साल के मुरली सुब्रमणियन के लिए यह अभ्यास अब उनकी सुबह की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है.
हर दिन वह अपने बेंगलुरु अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में घूमते हैं और हाउसकीपिंग और बागवानी के कर्मचारियों के साथ कन्नड़ बोलने की कोशिश करते हैं.
वह पूछते हैं, “Nivu hegiddiri — आप कैसे हैं? Male baruttadeye — क्या बारिश होने वाली है?”
सुब्रमणियन अक्टूबर 2022 में मुंबई से बेंगलुरु आए थे. रिन्यूएबल-एनर्जी कंसल्टेंट के तौर पर वह अंग्रेजी और हिंदी से काम और रोजमर्रा की जिंदगी चला सकते थे. फिर भी उन्होंने और उनकी पत्नी ने स्पोकन कन्नड़ की क्लास में दाखिला लिया. उन्होंने शुरुआती कोर्स पूरा किया, एडवांस्ड लेवल पर पहुंचे और अब कैब ड्राइवरों, दुकानदारों और फैसिलिटी-मैनेजमेंट स्टाफ के साथ कन्नड़ बोलने की कोशिश करते हैं.
एक बार उन्हें कन्नड़ में एक सभा को संबोधित करने के लिए भी कहा गया.
उनके लिए भाषा में कितनी अच्छी तरह बोल पाना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना यह कि शुरुआती कुछ शब्दों के बाद क्या होता है.
उन्होंने कहा, “जब आप उनकी भाषा बोलने की कोशिश करते हैं, तो लोग इसकी सराहना करते हैं और आपके साथ ज्यादा घुलने-मिलने लगते हैं.”

कभी-कभी बातचीत अंग्रेजी में चली जाती है. कभी उन्हें किसी से धीरे बोलने या अपनी गलती सुधारने के लिए कहना पड़ता है. लेकिन उनके मुताबिक, बातचीत आगे बढ़ती रहती है.
उन्होंने कहा, “दिन के आखिर में, जब आपकी ऐसी बातचीत होती है जिसमें दोनों में से किसी एक ने दूसरे की बात समझ ली हो, तो यह बहुत संतोष देने वाला अनुभव होता है और आप बहुत कुछ सीखते हैं.”
स्नेहिल भी छोटी-छोटी बातचीत में यही अहमियत देखती हैं. हाल ही में उन्होंने जंगल की सफाई के एक अभियान पर Instagram Reel बनाई और उन्हें एक ग्राउंड मार्शल से बात करनी थी, जो कन्नड़ में ज्यादा सहज दिख रहा था. थोड़ी-सी कन्नड़ जानने से उन्हें उससे बात करने का आत्मविश्वास मिला.
उन्हें उम्मीद है कि भाषा उसे पेशेवर तौर पर भी मदद करेगी. उनका कहना है कि बेंगलुरु ऐसा शहर हो सकता है जहां पूरे भारत से आए लोग अंग्रेजी में काम करते हैं, लेकिन जो लोग स्थानीय माहौल में काम करना, अपना कारोबार शुरू करना या स्थानीय समुदायों के साथ करीब से काम करना चाहते हैं, उन्हें कन्नड़ जानने का फायदा हो सकता है.
सुब्रमणियन के लिए इसका फायदा ज्यादा सीधा है.
उन्होंने कहा, “भाषा का ज्ञान आपको लोगों की संस्कृति के बारे में बहुत कुछ बताता है. हम जितनी ज्यादा भाषाएं बोल सकते हैं, उतने ही ज्यादा वैश्विक बनते जाते हैं.”
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